चुटका परमाणु संयंत्र के खिलाफ चुटका व आसपास के गांवों की आदिवासी जनता द्वारा चलाए जा रहे जुझारू संघर्ष और तमाम जनपक्षधर संगठनों के सक्रीय समर्थन व प्रयासों से उभरे जबरदस्त जन-उभार के आगे सरकार ने घुटने टेकते हुए 24 मई 2013 को तय की गई जन-सुनवाई को अनिश्चित काल के लिए रद्द करना पड़ा।
ध्यान दें कि चुटका परमाणु संघर्ष समीति के नेतृत्व में इस परियोजना को निरस्त करने की मांग कर रहे स्थानीय नागरिकों ने पहले ही इस जन-सुनवाई के बहिष्कार की घोषणा कर दी थी। इसके बावजूद 23 मई को देर शाम तक इस जन-सुनवाई को करवाने के लिए सरकार पूरे ताम-झाम से तैयारी कर रही थी यहां तक कि जिस गाँव में पानी, शौचालय, बिजली व आवागमन के साधन भी नहीं हैं वहां सरकार ने जनसुनवाई के लिए लाखों रूपए खर्च कर एक टेंट लगाया जिसमे कई शौचालय, हाथ धोने के लिए वाश बेसिन, पंखे यहां तक कि आला अधिकारियों के लिए कूलर लगे थे। यही नही, आम जनता के पैसे का दुरुपयोग करते हुए न्युक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इण्डिया लिमिटेड (NPCIL) ने स्थानीय जनता को बहकाने के लिए मिठाइयां बांटी व दुष्प्रचार किया, लेकिन इसके बावजूद जनता चुटका परमाणु संयंत्र के खिलाफ अपने दृढ़ फैसले से नही डिगी। बरगी बांध द्वारा हुए विस्थापन और इसके खिलाफ लम्बे संघर्ष की चेतना से यहां के आदिवासी नागरिक यह समझ चुके हैं कि उनके संसाधनों को लूटने का सिलसिला सरकार कभी भी बंद नहीं करेगी, क्योंकि सरकार उनके लिए नहीं बल्कि मुट्ठी भर पूंजीपतियों और उनके विदेशी आकाओं के लिए काम करती है।
'ख़ुशहाल छत्तीसगढ़' की हकीकत:12 वें राज्योत्सव पर संघर्ष संवाद की पहल
छत्तीसगढ़ के 12 वें राज्योत्सव के मौक़े पर संघर्ष संवाद ने एक विशेष अभियान चलाया जिसका शीर्षक था- ‘छत्तीसगढ़ के 12 साल: क्या खोया, क्या पाया।‘ इसके तहत रोज़ाना छत्तीसगढ़ पर फ़ोकस विशेष सामग्रियां जारी की गयीं।
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