राजस्थान : संविधान के साथ चल रहे खिलवाड़ के खिलाफ आयोजित हुआ संविधान बचाओ देश बचाओ सम्मेलन

7 अप्रैल 2018 को संविधान बचाओ, देश बचाओ के मुद्दे पर एक सम्मेलन राजस्थान नागरिक मंच, संवाद समूह, संविधानिक अधिकार संगठन, जनांदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, जनवादी लेखक संघ सहित प्रगतिषील जनवादी समाजवादी जनसंगठनों की ओर से देराश्री षिक्षक सदन राजस्थान विष्वविद्यालय, जयपुर में आयोजित हुआ। जिसे लोकायत के संयोजक श्री नीरज जैन व प्रख्यात समाजवादी चिंतक डा.सुनीलम, विजय प्रताप ने संबोधित किया और भूमिका जानेमाने समाजषस्त्री प्रो.राजीव गुप्ता ने रखी। परिचर्चा का संचालन बसंत हरियाणा व दीपचंद माली ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डा.प्रीतम पाल, कैलाष मीणा व धर्मेन्द तामड़िया ने की।

वक्ताओं ने कहा कि संविधान एक ऐसा महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है जो आजादी के लम्बे संघर्षोे और बलिदानों के बाद नये सपने का भारत को बनाने व चलाने के लिए तैयार किया गया । यह सरकार को चलाने के लिए ढ़ाचा या यूं कहे कि फ्रेम वर्क प्रदान करता है और सरकार के सभी संस्थानों के प्रमुख अंगों के मुख्य कामों को निर्देशित करता है। इसमें संस्थानों के संचालन के मुख्य सिद्धान्तों को भी घोषित किया गया हैे। हमारे संविधान की प्रस्तावना में ‘हम भारत के लोग’ से संबोधन का आषय हर नागरिक के अधिकार और कर्तव्य को समाहित कर लोकतंत्र, समानता, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, बन्धुत्व के जो मूल भाव और विचारों को अंगीकार करने की भावना अभिव्यक्त की गई है, इनमें से किसी भी एक के अभाव में संविधान की सम्पूर्णता अभिव्यक्त नहीं होती है। संविधान की प्रस्तावना ही उसकी आत्मा है वह देश के हर नागरिक को समानता, सम्मान, जनतंत्र तथा आजादी की गारंटी देता है। प्राचीन भारत के सामंती राजा, महाराजाओं व अग्रंेजी हुकूमरानों ने जनता को उसके हकों से महरुम रक्खा और ये सभी हक एक स्वप्न मात्र ही थे।

प्राचीन भारत राजा महाराजाओं के अधीन था। सामंती प्रथा व उनकी गुलामी के बाद 200 सालों तक इस्ट इंडिया कम्पनी ने अपने राज का विस्तार किया और अग्रेजों द्वारा बनाये गये काले कानूनों का युग आया। दुनिया भर में लोग नई सुबह व आजादी के लिए लड़ाईयां लड़ रहे थे। हमारे देश के लोग भी उस भेदभाव पूर्ण टैक्स व्यवस्था, शोषणकारी नीतियों, अन्याय व अत्याचार के विरुद्ध अपनी आजादी के लिए उठ खडे हुए। एक लम्बी लड़ाई के बाद 15 अगस्त 1947 में आजाद मुल्क की कल्पना साकार हुई।

अब आजाद भारत में हर व्यक्ति को न्याय, समानता, सम्मान, स्वतं़त्रता मिले ऐसा समाजवादी जनतंत्र स्थापित करना था। लोगों का वैज्ञानिक द्रष्टिकोण बने तथा भाईचारा व देश की एकता को बरकरार रखने की भी चुनौती थी। प्रश्न था कि कैसे इन सभी आकांक्षाओं को जमीन पर लाया जा सके। इसे पूरा करने के लिए डाÛ भीम राव अम्बेडकर की अध्यक्षता में संविधान तैयार किया गया। लम्बी बहसों व संशोधनों के बाद देश में सर्वसम्मति से संविधान पारित किया गया और 26 जनवरी 1950 में लागू किया गया। जिसका सीधा यह मतलब था कि शासक मनमर्जी नहीं कर सकेगा। हर नीति और कानून संविधान में लिखे दिशा निर्देशों के अनरुप ही बनायेे जायेंगे। उसी के अनुरूप सरकारों को काम करना होगा। आज जो भी सुविधा मिल रही है या जो कानून बनाये गये है, वह किसी न किसी नीति या दिशा निर्देश के तहत् ही मिल रही है ना कि किसी की मेहरबानी से। हांलाकि समय समय पर बदलाव किये गये हैं परन्तु वे संविधान की प्रस्तावना में दिए गये मूल भावना के दायरे में रहे, उसके विरुद्ध कोई संषोधन नहीं हो सकते। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि संविधान सभी को कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है। चाहे कोई मजदूर हो, किसान हो या सामान्य कर्मचारी या मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री संविधान की नज़र में सभी नागरिक बराबर हैं।

यदि हम हमारे समाज को देखें, तो पाते हैं कि हम आये दिन रीति रिवाजांे व त्यौहारों में व्यस्त रहते हैं जबकि देश का संविधान जो हमारे जीवन के मुल तत्व आजादी व समानता को सुलभ करवाता है,, उसकी चर्चा हमारे बीच नहीें के ही बराबर है। हमारी जागरुकता में कमी का फायदा सत्ता में बैठे व ताकतवर लोग उठा कर हमारे संविधान से खिलवाड़ ़कर सकते हैं कुछ दिनों पहले ही उच्चतम न्यायालय के शीर्षतम न्यायाधीषों ने जनता के समक्ष अपनी बात रक्खी व चेतावनी दी जो इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ था यह स्थिति की गम्भीरता को दर्शाता है। ऐसे प्रयास किये जाने की खबरें तो आ ही रही हैं साथ शीर्ष संस्थानों व शिक्षण संस्थानों के साथ लगातार छेडछाड़ की जा रही है। हमारे देश में आरÛ एसÛ एसÛ एक ऐसा संगठन है जो शुरु से संविधान के खिलाफ रहा हैं। वह जाति, धर्म, लिंग के आधार पर समानता के मूल्य को नहीं मानता। ऐसे संगठन आज हमारे देश में सक्रिय हैं ऐसे में और भी जरुरी हो जाता है कि इसकी निरन्तर पड़ताल रक्खी जायें। ये हम सभीे नागरिकों, हर संस्थान तथा संगठन के हर सदस्य या हितग्राही की जिम्मेदारी है। संविधान में धर्म को माननेे व व्यक्तिगत आस्था रखने की छूट दी गई है परन्तु उसे राजनीति व संविधान से पूर्णत् स्वंतत्र रखा गया है। इसका अर्थ है कि देष किसी भी धार्मिक ग्रंथ से नहीं चलेगा (चाहे गीता हो या कुरान या अन्य कोई) यह हमारे संविधान से ही चलेगा। किसी की व्यक्तिगत आस्था हमारे संविधान के मूल्यों और सिद्धान्तों का क्षरण नहीं कर सकती है।

लोकतंत्र की स्थापना में सबसे प्रमुख लक्षण है, हर एक व्यक्ति को एक वोट का अधिकार परन्तु समानता, न्याय और लोगों के अधिकार तब तक संपूर्ण नहीे होगें जब तक आर्थिक व सामाजिक समानता हासिल नहीं होगी। इसकी चेतावनी सभी प्रमुख प्रणेताओं ने दी थी। यही बात स्वयं अम्बेडकर ने संविधान पेश करते समय स्पष्ट रुप से अपने भाषण में जोर देकर कही थी। आजादी के आंदोलन के शहीद भगत सिहं ने भी कहा था कि यदि लोगों को उनके अधिकार और समानता व आजादी न मिली तो हमारी यह आजादी अपना मूल अर्थ खो देगी। ऐसा हुआ तो 100 साल बाद देश मुझे फिर से याद करेगा। आज आजादी के 70 सालो में आर्थिक विषमता लगातार बढ़ती ही जा रही है व संविधान के अनूरुप काम काज नहीं हो रहा हैं। अमीर सामाजिक और राजनैतिक रुप से ताकतवर लोग के फायदे के लिए नीतियां को बदल रहे हैं। धर्म व जाति के आधार पर भेदभाव व मानव गरिमा को तोलना संविधान के विरुद्ध तथा राष्ट्रविराधी कार्य है।ं ऐसे मे जनवादी प्रगतिशील लोकतांत्रिक ताकतों को आगे बढ़कर सविधान की मूल भावना को बचाने के लिए एक जनमानस तैयार कर आन्दोलन खड़ा करना होगा तथा हर तरीके से चर्चा को जन सामान्य के बीच ले जाना होगा जिससे आजाद उन्नत व संकल्पित राष्ट्र का निर्माण हो सके ।

-बसंत हरियाणा

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