भूमि-अधिकारों की मांग को आगे बढ़ाते बैतूल के आदिवासी



-सम्मलेन से लौटकर  सौरभ सिन्हामहिपाल सिंह की रिपोर्ट

मध्य प्रदेश 4 फरवरी 2018। बैतूल जिले के घोडाडोंगरी ब्लाक के गाँव सिवनपाट में चल रहे ‘ग्राम सर्वोदय अभियान’ द्वारा भूमि के अधिकारों पर हुए एक-दिवसीय सम्मलेन में वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता श्री अनिल गर्ग ने 40 गाँव से आये करीब 1500 प्रतिनिधियों के समक्ष अपने वक्तव्य में कहा कि – सन 1950 से ज़मीन पर काबिज़ लोगों के अतिक्रमण के प्रकरण तो बने थे और वो जिला अभिलेखागार,तहसील के प्रकरण पंजी, पटवारी के पास  अतिक्रमण पंजी और खसरा पंजी में दर्ज हैं पर सरकारी अफसर उन्हें लोगों तक आसानी से पहुचने नहीं देते। इस सम्मलेन में भी अभिलेखों में दर्ज अधिकारों को समुदायों को अविलम्ब दिए जाने की मांग प्रमुखता से उठाई गयी ।


ग्राम सर्वोदय अभियान के बैनर तले गैर-विभाजित मध्य-प्रदेश की तकरीबन 1 लाख 20 हज़ार हेक्टर ज़मीन का मुद्दा भी आगे आया है । इन ज़मीनों को‘नारंगी भूमि’ मान कर राजस्व और वन विभाग ने लोगों के व्यक्तिगत और सामुदायिक हकों का लगातार हनन किया है । मध्य प्रदेश विधान सभा में 16 विषयों पर जानकारी इकठ्ठा करके ये पाया गया की आज़ादी के बाद के समय से वन-विभाग ने इन ज़मीनों पर जो कब्ज़े जमाये हैं उनमें लगातार लोगों ने अपने ही जंगल से वन-उपज या खेती करने पर कई मुकद्दमों का सामना किया है । 2006 में पास हुए वन अधिकार कानून में ‘ऐतिहासिक अन्याय’ का जो  ज़िक्र है, वो मध्य प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में भी आज भी उतना ही सच है । विभागीय महकमों में लोगों के हकों को मानते हुए पारित हुए कानून, सरकारी निर्देश या न्यायालयों के फैसलों की जानकारी नहीं है । अभियान ने प्रयास किया है कि लोगो में सामूहिकता उभरे, अधिकारी अपने काम का निर्वाह ठीक से और कानून को ध्यान में रखते करें । इसके लिए पिछले कुछ सालों में उनके साथ बातचीत भी बढ़ी है । जन-कार्यक्रमों को लोगों के बीच सिर्फ वाहवाही लूटने के लिए नहीं पर सच में लोगों के हकों के तरह समझ पाए, ऐसे प्रयास किये गए है ।


इस सम्मलेन में आठ गाँवों  -मनकाढाना, रैनीपाटी, सैयांगुड्डी, तीकखेडा, कुण्डीखेडा, निशान, डांगखेडा, भंडारपानी,मेंवन अधिकार कानून के 2008 में लागू होने के बावजूद राजस्व गाँव बनाने की प्रक्रिया शुरू तक नहीं की गयी है। वन-ग्रामों को 1980 में सरकार ने बंदोबस्त करके निस्तार पत्रक, अधिकार अभिलेख बनाये थे – जिन्हें आज तक वन-विभाग ने उन गाँव सरपंच और सचिवों को मुहैया नहीं कराये हैं । सम्मलेन में लोगों ने ये मांग उठाई की कानून के तहत वन-ग्रामों को राजस्व ग्राम बनाया जाए, गैर-आदिवासियों को भू-स्वामी का हक़ दिया जाये, ठनवों को वन-अधिकार का पट्टा दिया जाए औरजिन वन-ग्राम में रहने वाले परिवार के बुज़ुर्ग अब मर गए हैं, उनके बच्चों के हकों को भी कानूनन पहचाने जायें ।

गाँव के निस्तार पत्रक में गोठान, खलियान, चराई के स्थान, जलाऊ लकड़ी, छोटे-बड़े झाड के जंगल इन सबको वन विभाग ने अपने कब्ज़े में कर रखा है । मिटटी, रेत लाने पर भी अब अपराधिक मुक़दमे दर्ज करना हर दिन की बात है । वनाधिकार कानून में आज़ादी से पहले से व्याप्त अधिकार लोगों को दिए गए हैं जिनकी अवहेलना हर बार वन विभाग करता आया है । पट्टे के आवेदनों के साथ साथ सामुदायिक संसाधनों पर अधिकारों की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए, पहले की तरह निस्तार पंचायत बैठने की प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाना होगा – इनके लिए पूरे 40 गाँवके लोगों ने साथ आगे इस संघर्ष को आगे बढ़ने का निर्णय लिया । महुआ, तेंदू और अन्य लघु वन-उपज की बिक्री के लिए बने समितियों को भी पूरे पैसे नहीं मिलते, और इसमें मुनाफे के 30 प्रतिशत वन-विभाग ही गोल कर दे रहा है। इनका लेखा-जोखा लोगों के समक्ष लाया जाए, इसका भी भरपूर प्रयास करना है।


वेस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड (WCL)द्वारा कोयले के खनन के बाद इसक्षेत्र में कई बदलाव हो गए – खेती अनियमित हो गयी, पानी की उपलब्धता बेहद कम गयी, पर इनका कोई ठीक मुआवजा आज तक लोगों को नहीं मिला । राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने वर्ष1996 में ही खदान से उजड़े 37 आदिवासी परिवारों को नौकरी देनेके लिए खनन कंपनी और जिला प्रशासन को निर्देश दिए थे, पर आज तक भी सिर्फ 12 लोगों को ही नौकरियां मिली हैं । 1994 में कंपनी ने बक्डोना में 24 हेक्टर ज़मीन कामगारों के मकान बनाने के लिए अर्जित कर ली, लेकिन उनपर आज तक कोई घर नहीं बने । यहाँ तक कि नए भूमि अधिग्रहण कानून के आने के बाद भी प्रशासन ने इन ज़मीनों को वापस करवाने का कोई प्रयास नहीं किया । खनन के 20 किलोमीटर वर्ग क्षेत्र में WCL को हर साल 5-10 करोड़ रुपये वहाँ के विकास पर खर्च होना होता है, जिसको ये अन्यत्र खर्च कर लोगों को मिलने वाले किसी भी सुविधाओं से वंचित रखते हैं । कम्पनीटाल-मटोल कर विकास मद के पैसे या अधिग्रहित ज़मीन पर मनमानी करती है । भूमि सुधारके लिए सरकारी अफसर भी कोई काम नहीं करते, जबकि कानूनी प्रक्रिया बहुत पहले से उनसे ये आशा करती ही । साथ ही खननपर किसी भी तरह के विरोध को पुलिस और प्रसाशन के अफसर लोगों पे मारपीट या फर्जी केस लगा देते है,और गैर-कानूनी प्रक्रियायों को सरकारी संरक्षण देते हैं ।

सरकार अपने आपको पालक की तरह ना देख अब एक लेन-देन की तरह देखने लगी है, जिससे सत्ता शोषण करने के तरीके में बदल कर रह गया है । बिना हाथ फैलाये या चीख चिल्लाहट के बिनाकिसी भी पार्टी की सरकार हो, कोई भी काम नहीं करती । सरकारी योजना के लाभ लोगों को अधूरे तौर पर मिलने का बड़ा कारण उन्होंने नेताओं और अफसरों के एशो-आराम, गाडी-बंगले, महंगे उपहार पर किये जाने वाले सरकारी खर्चों को बताया गया।

सम्मलेन का संयोजन आदिवासी नेता श्री मदन चौहान जी ने किया । क्षेत्र के मुखिया कन्नू लाल जी और शंकर लाल दादा नेलोगों से ज़मीन के संघर्ष को आगे ले जाने का आवाह्न किया और पढाई और कानूनी जानकारी को पैना करने की बात कही । मकडई के आदिवासी नेता अजय साह और पूर्व सांसद और ग्राम सर्वोदय अभियान के संयोजक संदीप दीक्षित ने भी सम्मलेन में लोगों कीकानून द्वारा प्राप्त हकों की लड़ाई को आगे ले जाने में अपना समर्थन दिया । ज़मीन के मुद्दों में लोगों की कानूनी मदद कर रहे श्री गिरीश गर्ग, भोपाल से किसान नेता इरफ़ान जाफरी जीने भी लोगों के समक्ष अपनी बात रखी ।

1965 में योजना अधिक अन्न उपजाने की सरकारी योजना बनी जिनमें समिति बनके गाँव के लोगों को सामूहिक तौर पर खेती करने को दी गयी। लोगों ने बैलों से और अपने परंपरागत तरीकों से खूब मेहनत की । पर धीरे-धीरे उन्होंने कुछ समय के बाद उसमे खेती करना मुश्किल भी पायी, और कुछ लोगों ने वो ज़मीन छोड़ दीजिसपर वापस से वन-विभाग ने अपना कब्ज़ा जमा लिया । इससे साफ़ है कि कागज़ी तौर पर ज़मीन का पट्टा न मिलने से फिर से लोग भूमि-हीन हो गए । इस अभियान में लोगों को मधुमक्खी के छाते की तरह साथ आकर लड़ना, और कानून से लम्बी लड़ाई के बाद मिले अधिकार को समझना और अपने जीवन-यापन में बेहतरी लाने के लिए अपील की गयी ।

ऐसे में जन-संघर्ष और सामाजिक-राजनीतिक परिकल्पना में लोगों के विचार और हकों को संवैधानिक जगह मिलेगी, हम यही आशा करते हैं ।



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