मध्य प्रदेश पुलिस की “छोटी सी गलती” खा गई सुदिया बाई की जिंदगी के “दस साल”


कहते हैं कि समय पंख लगाकर उड़ता है लेकिन इसी समय का एक-एक पल तब बिताना मुश्किल हो जाता है जब आप बिना किसी कसूर के मात्र एक गलत फहमी की वजह से दोषी करार दिए जाते हैं। यही है कहानी मध्य प्रदेश के हरदा जिले में रहने वाली सुदिया बाई ब्रजलाल की जिसने पुलिस की एक छोटी सी गलती की सजा भुगती लगातार दस सालों तक 100 से ज्यादा पेशियों में हाजिर होकर, 25 हजार से ज्यादा राशि इन पेशियों में हाजिर होने के किराए में खर्च कर और उससे ज्यादा समाज के ताने सह-सह कर। गौरतलब है कि 11 जुलाई 2007 को हरदा पुलिस ने एक घटना के आरोपी सुदिया बाई परसराम की जगह गल्ती से सुदिया बाई ब्रजलाल को आरोपी बना दिया। जिसकी वजह से सुदिया बाई ब्रजलाल 10 साल तक एक झूठे मुकदमे में उलझी रहीं। अदालत ने भले ही 11 जनवरी 2018 को सुदिया बाई ब्रजलाल को दोषमुक्त करार दे दिया लेकिन सवाल यह है कि पुलिस की इस तथाकथित छोटी सी “गलती” का जो हर्जाना सुदिया बाई ब्रजलाल ने भुगती है उसकी पूर्ती कौन करेगा? मामले की विस्तृत जानकारी के लिए हम आपके साथ श्रमिक आदिवासी संगठन की विज्ञप्ति साझा कर रहे है;

मध्य प्रदेश, हरदा 11 जनवरी, 2018, 10 साल तक सुदिया बाई परसराम के बदले केस भुगतने के बाद आज विशेष न्यायाधीश, हरदा  विजय अग्रवाल ने सुदिया बाई ब्रजलाल, 45 वर्ष  को आरोप से उन्मोचित करार दिया। इसके बाद, सुदिया बाई परसराम, उम्र 75 साल, पर आरोप तय किए गए मामले में सुखराम बामने, रमेशचन्द्र शर्मा एवं बैतूल से आए गुफरान खान ने पैरवी की। श्रमिक आदिवासी संगठन के बबलू नलगे एवं अनुराग मोदी ने कहा कि सुदिया बाई ब्रजलाल को 10 साल तक झूठे मामले में आरोपी बनाए रखने के लिए हरदा पुलिस , शासन एवं न्यायालय की गलती  के खिलाफ वो हाई कोर्ट में याचिका दर्ज करेंगे।

ज्ञात हो कि, 11 जुलाई, 2007 को वनग्राम ढेगा में हुई घटना के समबन्ध में रहटगांव थाने में  एफ आई आर क्रमांक 79/07 दर्ज हुई थी, जिसमें कुल 24 लोग आरोपी बनाए गए थे। इन सब पर यह आरोप था कि, इन आदिवासियों ने वनकर्मियों का अपरहण किया और उन्हें बन्दी बनाकर रखा। इस मामले गिरफ्तारी तो सुदिया बाई परसराम की हुई थी, लेकिन पुलिस ने साथ सुदिया बाई ब्रजलाल को भी आरोपी बनाकर पेश किया। इसलिए, न्यायालय ने त्रुटिवश सुदिय बाई परसराम की बजाए सुदिया बाई ब्रजलाल को आरोपी बना दिया। पिछले 10 साल में उन्हें कम से कम 100 बार पेशी पर आना पड़ा जिसमें उन्हें आने-जाने के किराए सहित वकील की फीस मिलाकर कम से कम 25 हजार रुपए की राशी खर्च की। इसके आलावा, 100 दिन के काम की नुकसानी और समाज में बदनामी और मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ा। वहीं, इस मामले में दर्ज काउंटर एफ आई आर में पुलिस ने आजतक सही जांच नहीं की है।





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