छत्तीसगढ़ में बढ़ते किसान उत्पीड़न के विरुद्ध 8 जनवरी को रायपुर में किसान संकल्प सम्मेलन


पिछले कुछ वर्षो से हमारे देश का किसान और कृषि दोनों ही गहरे संकट में है। वर्ष 2003 से लगभग 6 लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्याएं की है। यह जानते हुए कि देश में कृषि के अतिरिक्त अन्य कोई क्षेत्र ऐसा नही है जो कृषि पर निर्भर जनसंख्या को रोजगार उपलब्ध करा सके, बावजूद उसके केन्द्र व राज्य सरकारों द्धारा किसान विरोधी नीतियों को अपनाया और थोपा जा रहा है। किसानों के उपर हो रहे इस उत्पीड़न के विरुद्ध में आज किसान आक्रोशित हैं तथा जगह-जगह पर अपनी मांगों को लेकर बड़े तथा व्यापक आंदोलन कर रहे हैं। इस आंदोलन को और तीव्र करने के लिए 8 जनवरी 2018 को रायपुर, छत्तीसगढ़ के गांधी मैदान में किसान संकल्प का आयोजन किया जा रहा है। सम्मेलन में कॉमरेड हन्नान मोल्ला महासचिव अखिल भारतीय किसान सभा योगेन्द्र यादव स्वराज आंदोलन, देवेन्द्र शर्मा सामाजिक कार्यकर्ता व कृषि वैज्ञानिक प्रमुख वक्ता के रूप में मौजूद रहेंगे। हम आपके साथ यहां पर किसान सम्मेलन का आमंत्रण साझा कर रहे है;

भू - मंडलीकरण, उदारीकरण के प्रारंभिक दौर से बहुराष्ट्रीय कंपनियों व कार्पोरेट घरानों के मुनाफे के लिए शुरू हुई नीतियों ने भारतीय कृषि को तबाह किया हैं।

दोस्तो,

पिछले कुछ वर्षो से हमारे देश का किसान और कृषि दोनों ही गहरे संकट में है। वर्ष 2003 से लगभग 6 लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्याएं की है। या जानते हुए कि देश में कृषि के अतिरिक्त अन्य कोई क्षेत्र ऐसा नही है जो कृषि पर निर्भर जनसंख्या को रोजगार उपलब्ध करा सके, बावजूद उसके केन्द्र व राज्य सरकारों द्धारा किसान विरोधी नीतियों को अपनाया और थोपा जा रहा है।‘ धान का कटोरा‘ कहे जाने वाले हमारे छत्तीसगढ़ में भी किसानों की आर्थिक स्थिति लगातार बदहाल होती जा रही हैं जिससे पिछले कुछ वर्षों से किसान आत्महत्याएं बढ़ी है। बेतहाशा बढ़ती लागतें एवं फसलों के सही दाम नहीं मिलने के कारण कड़ी मेहनत के बाद भी 99 फीसदी किसान और ज्यादा गरीब व कर्ज के जाल में फंसते जा रहे हैं।

भू - मंडलीकरण, उदारीकरण के प्रारंभिक दौर से बहुराष्ट्रीय कंपनियों व कार्पोरेट घरानों के मुनाफे के लिए शुरू हुई नीतियों ने भारतीय कृषि को तबाह किया हैं। भारत में किसानों की हालत सुधारने और कृषि संकट से उबरने के लिए स्वामीनाथन आयोग का गठन हुआ जिसने 2006 में अपनी सिफारिशों को केन्द्र सरकार को सौंपी। इसमें इतिहास में पहली बार किसान के श्रम को भी एक मूल्य की तरह देखा गया और फसलों के मूल्य निर्धारण में इसे लागत में जोड़ने की सिफारिश की गयी। किसानों को कर्ज व गरीबी से उबारने के लिए लागत मूल्य का डेढ़ गुना समर्थन मूल्य देने सहित अन्य प्रोत्साहन देने की सिफारिश की गई, परंतु सरकारें इन सिफारिशों को लागू करने में विफल रही हैं। भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में स्वामीनाथन आयोग की रिर्पोट लागू करने एवं किसानों को बोनस देने का वादा किया था, लेकिन 2014 में केन्द्र में सरकार बनाने और छत्तीसगढ़ में तीसरी बार सत्ता में आने के बाद भी उसने अपना वादा पूरा नहीं किया।

इस वर्ष छत्तीसगढ़ में गंभीर सूखे की स्थिति हैं, किसान को कर्ज चुकाना तो दूर की बात है उसे अपना जीवन यापन करना भी मुश्किल हो रहा है। इन परिस्थितियों में छत्तीसगढ़ के किसानों ने राज्य सरकार को उनका वादा याद दिलाते हुए सूखा राहत राशि, बोनस, कर्जमाफी और समर्थन मूल्य देने की मांगो पर किसान संकल्प यात्रा का आयोजन किया तो 8 जिलों में धारा 144 लगाकर किसानों के ऊपर दमनात्मक कार्यवाही करते हुए नियम विरूद्ध गिरफ्तारियां की। राज्य सरकार किसानों को राहत देने के बजाये उद्योगपतियों को हजारों करोड़ की सब्सिडी दे रही है। कुछ समय पूर्व ही मौजूद सरकार ने राज्य को प्राप्त होने वाले राजस्व में से केवल 4 चुनिन्दा कोयला खनन कंपनियों को 3000 करोड़ रूपयें की छूट स्टाम्प डयूटी में दी है। सिर्फ चुनावी फायदे के लिए 1200 करोड़ रूप्ये मोबाईल वितरण के लिए आवंटित किया गया। इतना ही नही प्रदेश के 20 हजार गांव को मिलने वाले 14 वें विता आयोग की राशि में अवैधानिक ढंग से कटौती करते हुए 600 करोड़ रूप्ये मोबाईल टावर लगने टेलीकाम कंपनियों को दिया जा रहा है।

हाल ही में एक और जन विरोधी व उद्योग के हित में निर्णय लेते हुए आदेश जारी किया गया, जिसमें ग्रीष्मकालीन धान की फसल एवं सिंचाई पर पाबंदी लगाते हुए उद्योगों को पानी पर पहली प्राथमिकता देने का निर्णय लिया गया। इस आदेश का पालन नहीं करने वाले किसानों को जेल भेजने का भी प्रावधान रखा गया। यह आदेश स्पष्ट रूप् से यह दर्शाता है कि राज्य में जल उपयोग की प्राथमिकता में सिंचाई को अंतिम पंक्ति में रखते हुए औद्योगिक जल उपयोग को पहली प्राथमिकता दी गई हैं। सरकार के इस आदेश से न सिर्फ किसान बल्कि पानी पर निर्भर मछुवारा समुदाय की भी आजीविका संकट में है।

घने वन क्षेत्रों के आदिवासी किसानों को खनन, बांध व उद्योग के नाम पर विस्थापित किया जा रहा है। पांचवी अनुसूची, पेसा एवं वनाधिकार मान्यत कानून के प्रावधानों का उल्लंघनन कर आदिवासियों के जंगल, जमीन को विधि विरूद्ध तरीके से पूंजीपितयों को दिए जाने का कार्य स्वयं राज्य सरकार द्वारा किया जा रहा हैं। यहां तक कि वर्ष 2013 में बने भू- अधिग्रहण व पुनर्वास कानून में कंपनियों के पक्ष में संशोधन करते हुए उसे कमजोर करने सबंधी अध्यादेश लाने का किया जिसका पुरजोर विरोध देश भर के जन आंदोलन ने किया और तीन- तीन बार अध्यादेश लाने के बाद भी सरकार अब तक इसमें विफल रही। हालांकि राज्य सरकारों को यह छूट मिली हुई है कि वो अपने मुताबिक इस कानून मंे संशोधन करें जिसका फायदा उठाते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने उद्योगपतियों को मुनाफा पहंुचाने के लिए बहुत से संशोधन किये है।

साथियों, आज देश भर में किसान आक्रोशित है और अलग- अलग राज्यों मं इस आक्रोश का प्रदर्शन भी आंदोलनों के रूप् मे हो रहा है। हाल ही में राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, तमिलनाडू के किसानों के संघर्ष चर्चा में रहे है। दिल्ली में देश भर के किसानों ने एक साथ आकर किसान संसद लगाई यह इन आंदोलनों का दबाव ही था कि इन राज्य सरकारों को सीमित ही सही पर किसानों की मांगों को मानना पड़ा। इस आंदोलन को और धारदार बनाने के लिए आगामी 8 जनवरी को छत्तीसगढ़ के रायपुर शहर में किसान संकल्प सम्मेलन का आयोजन किया गया है, ताकि वहां से अपनी मांगो को पूरा करवाने तक किसान सतत् संघर्ष जारी रखें। आप सभी से अपील हैं कि इस किसान संकल्प सम्मेलन में अधिक से अधिक संख्या में शामिल होकर इसे सफल बनायें।

सम्मेलन में कॉमरेड हन्नान मोल्ला महासचिव अखिल भारतीय किसान सभा योगेन्द्र यादव स्वराज आंदोलन, देवेन्द्र शर्मा सामाजिक कार्यकर्ता व कृषि वैज्ञानिक प्रमुख वक्ता के रूप में मौजूद रहेंगे।

हमारी मांगे -
  • किसानों का समूर्ण कर्ज माफ करो।
  • स्वामीनाथन आयोगा की प्रमुख सिफारिश लागत का डेढ़ गुना समर्थन मूल्य दो।
  • पिछले दो वर्षो का धान 300 रूप्ये बोनस दो।
  • जबरन भूमि अधिग्रहण बंद हो।
  • पांचवी अनुसूची, पेसा और वनाधिकार मान्यता कानून का कड़ाई से पालन हो।

भवदीय
छत्तीसगढ बचाओं आंदोलन, जिला किसान संघ राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (मजदूर कार्यकर्ता समिति), अखिल भारतीय किसान सभा (छत्तीसगढ़ राज्य समिति), छत्तीसगढ़ किसान सभा, हसदेव अरण्य बचाओं संघर्ष समिति (कोरबा, सरगुजा), किसान संघर्ष समिति (कुरूद) आदिवासी महासभा (बस्तर) दलित आदिवासी मजदूर संगठन (रायगढ़), दलित आदिवासी मंच (सोनाखान) संयुक्त किसान संघर्ष मोर्चा (कांकोर), पेंड्रावन जलाशय बचाओं किसान संघर्ष समिति (बंगोली, रायपुर) भारत जन आंदोलन सरगुजा व गांव गणराज्य अभियान (सरगुजा) जनाधिकार संगठन (कांकोेर) मेहनतकश आवाश अधिकार संघ (रायपुर) जशपुर जिला संघर्ष समिति, भारतीय खेत मजदूर यूनियन (छत्तीसगढ़ राज्य समिति), राष्ट्रीय आदिवासी विकास परिषद् (छत्तीसगढ़ इकाई, रायपुर) आदिवासी एकता महासभा राष्ट्रीय आदिवासी अधिकार मंच)

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एक दूसरे के संघर्षों से सीखना और संवाद कायम करना आज के दौर में जनांदोलनों को एक सफल मुकाम तक पहुंचाने के लिए जरूरी है। आप अपने या अपने इलाके में चल रहे जनसंघर्षों की रिपोर्ट संघर्ष संवाद से sangharshsamvad@gmail.com पर साझा करें। के आंदोलन के बारे में जानकारियाँ मिलती रहें।