मुलताई गोली कांड की 20वीं बरसी पर जारी हुआ मुलताई घोषणा पत्र 2018


12 जनवरी 1998 को मुलताई में किसानों के ऊपर हुए गोलीकांड में 24 किसान मारे गए थे। 12 जनवरी 2018 को उस घटना के 20 साल हो गए हैं। सवाल किसानों के जीविका के संघर्ष को लेकर था और शासन के द्वारा उस पर हमला किया गया, जिसमे 24 किसानों की मौत हुई। आज भी वह सवाल मौजूद हैं, देश में किसान और मजदूर वर्ग आज भी जीविका की लड़ाई लड़ रहे हैं और नवउदारवाद के माहौल में नई पूंजीवादी ताकतें राज्य के साथ मिलकर और तेज हमला कर रही है। किसान संघर्ष समिति ने मुलताई घोषणा पत्र 2018 जारी कर संघर्ष को और तेज करने का ऐलान किया है;

प्रस्तावः

1.    किसान संघर्ष समिति द्वारा आयोजित 20वीं शहीद किसान स्मृति सम्मेलन में शामिल हुए प्रतिनिधि 12 जनवरी 1998 को मुलताई किसान आंदोलन पर हुए पुलिस गोलीचालन में शहीद 24 किसानों को भावभीनी श्रद्धांजलि देते हुए किसान आंदोलन को मजबूती देने का संकल्प लेते हैं।

2.    मुलताई पुलिस गोलीचालन के बाद सरकार बदली लेकिन 20 साल बाद भी मध्य प्रदेश सरकार ने शहीद किसानों के शहीद स्तंभ के निर्माण के लिए आजतक अनुमति प्रदान नहीं दी है। मध्य प्रदेश का राजस्व विभाग बस स्टैंड के सामने स्थित किसान स्तंभ की जमीन को छोटे झाड़ का जंगल बताकर भूमि ना तो आबंटित करने को तैयार है, ना ही स्वयं सरकार शहीद स्तंभ का निर्माण कर रही है। यह शहीद किसानों का अपमान है। सम्मेलन म प्र सरकार से शहीद स्तंभ के निर्माण के लिए किसान संघर्ष समिति को भूमि आबंटित करने या बस स्टैंड पर बने किसान स्तंभ पर शिलालेख लगाने की अनुमति देने या स्वयं इसी स्थान पर शासन की ओर से शहीद किसान स्तंभ का निर्माण किए जाने की मांग दोहराता है।

3.    सम्मेलन 12 जनवरी 1998 के पुलिस गोलीचालन के दोषी अधिकारियों पर हत्या का मुकदमा चलाने, सभी शहीद परिवारों के आश्रितों को स्थाई शासकीय नौकरी देने, मुलताई तहसील को शहीद किसान स्मारक घोषित करने तथा शासन के स्तर पर शहीद हुए किसानों को शहीद का दर्जा देने की राज्य सरकार से मांग करता है।

4.    सम्मेलन भाजपा सरकार द्वारा 6 जून 2017 को मंदसौर जिले में अहिंसक किसान आंदोलन पर पुलिस गोलीचालन कर 5 किसानों की हत्या करने तथा 1 किसान को पीट-पीट कर मार डालने की तीव्र निंदा करता है। मंदसौर गोलीचालन के दोषी अधिकारियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज करने तथा सैकड़ों किसानों पर दर्ज किए गये फर्जी मुकदमें सरकार से वापस लेने की मांग करता है। सम्मेलन मंदसौर में पुलिस गोली चालन के बाद किसानों पर सतत दमन की कार्यवाही की निंदा करता है तथा स्थानीय किसानों द्वारा गोलीचालन के एक महीने बाद 6 जुलाई 2017 को सरकारी दमन का मुकाबला करते हुए देशभर के किसान संगठनों के साथ मिल कर शहीद किसान स्मृति सम्मेलन सफलतापूर्वक आयोजित करने के लिए मंदसौर के किसानों को बधाई देता है। शहीद किसानों की स्मृति में सरकारी रोक के बावजूद ग्रामवासियों द्वारा मूर्तियां स्थापित किया जाना यह बताता है कि मंदसौर के किसान गोलीचालन से डरे नही हैं, बल्कि उनका किसान आंदोलन तेज करने का उनका संकल्प बढ़ा है। मंदसौर के साथ-साथ डेहलनपुर (रतलाम) के किसानों पर दमनात्मक कर्यवाही करने तथा सैकड़ों किसानों पर फर्जी मुकदमें लगाने की सम्मेलन निंदा करता है तथा गत 6 माह से रतलाम जेल में बंद किसान भगवती लाल पाटीदार को तत्काल रिहा करने की मांग करता है। सम्मेलन म प्र के सभी जिलों में किसान आंदोलनों के दौरान किसानों पर लगाये गये फर्जी मुकदमें सरकार से वापस लेने की मांग करता है।

5.    मंदसौर गोलीचालन के बाद किसान संगठनों ने नई दिल्ली में बैठक कर अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति का गठन किया है, जो किसान आंदोलन और राष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ में एक ऐतिहासिक घटना है। शहीद किसान स्मृति सम्मेलन किसानों के इस मंच को तैयार करने वाले सभी किसान नेताओं और संगठनों को हार्दिक बधाई देता है तथा यह मानता है कि मंदसौर के शहीद किसानों की प्रेरणा  से शुरू हुई 187 किसान संगठनों की किसान मुक्ति यात्रा ने देश के किसानों ने नई चेतना पैदा की है। 19 राज्यों की 10 हजार किलोमीटर की यात्रा के बाद दिल्ली में आयोजित किसान मुक्ति संसद में लाखों किसानों की भागीदारी ने यह साबित कर दिया है कि संपूर्ण कर्जा मुक्ति तथा लागत से डेढ़ गुना समर्थन मूल्य प्राप्त होने तक किसानों का संघर्ष सतत रूप से पूरी ऊर्जा के साथ जारी रहने वाला है।

6.    सम्मेलन किसान मुक्ति संसद में प्रस्तावित किसान ऋण मुक्ति बिल तथा किसान (कृषि उत्पाद लाभकारी मूल्य गारंटी) अधिकार बिल, 2017 का समर्थन करता है। सम्मेलन यह विश्वास व्यक्त करता है कि देशभर में 500 किसान मुक्ति सम्मेलन किए जाने के बाद किसानों से प्राप्त संशोधनों के आधार पर अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति द्वारा तैयार किए जाने वाले बिल को लेकर राष्ट्रव्यापी किसान आंदोलन खड़ा होगा, जो केंद्र सरकार को दोनों बिल को संसद में पारित करने के लिए मजबूर करेगा।

7.    सम्मेलन, महाराष्ट्र में स्वाभिमानी शेतकारी संगठन तथा महाराष्ट्र के किसान संगठनों की सुकाणों समिति के नेतृत्व में चलाये गये प्रभावशाली किसान आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए सांसद राजू शेट्टी एवं सुकाणो समिति के नेताओं को बधाई देता है। इसी तरह राजस्थान में अखिल भारतीय किसान सभा द्वारा पूर्व विधायक अमरारामजी के नेतृत्व में चलाये गये शानदार संघर्ष के लिए सम्मेलन उन्हें बधाई देता है। पंजाब और छत्तीसगढ़ के किसान सरकारों द्वारा दमन के बावजूद संघर्ष चलाने के लिए उन्हें सलाम करता है। सम्मेलन नर्मदा बचाओ आंदोलन द्वारा 40 हजार परिवारों के संपूर्ण पुनर्वास के लिए जनआंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय की नेत्री सुश्री मेधा पाटकर के नेतृत्व में गत 32 वर्षों से चलाये गये शानदार संघर्ष के लिए नर्मदा के आंदोलनकारियों को मुबारकबाद देता है तथा एकजुटता प्रदर्शित करता है।

8. सम्मेलन म. प्र. में विभिन्न कृषि उत्पादों के लगातार गिरते दामों पर चिंता व्यक्त करता है। प्रधानमंत्री द्वारा किसानों की आय दुगुना करने तथा मुख्यमंत्री द्वारा 14 वर्षों से खेती को लाभ का पेषा बनाने के तमाम दावों के बावजुद किसानों की वास्तविक आय आधी रह गयी है। पिछले 3 वर्षों से सोयाबीन की 80 प्रतिशत से अधिक फसल नष्ट हुई है। 5 हजार रुपये की लागत लगाने के बाद मुश्किल से बीज ही वापस आ पाया है। 2001 में इसी प्रदेश में सोयाबीन 4500 से 5000 रुपये क्विंटल बिका था। इस वर्ष सरकार ने 3050 रुपये का समर्थन मूल्य घोषित किया है लेकिन किसानों को 1500 रुपये से 2500 रुपये तक के रेट में व्यापारियों को सोयाबीन बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा है। दुनिया में भारत ही ऐसा देश है जहां किसानों की आमदनी घट रही है तथा बाकी सबकी बढ़ रही है। प्रदेश में 1 हेक्टेयर में 60 क्विंटल तक मक्का पकी है। लेकिन 1425 रुपये समर्थन मूल्य होने के बावजूद व्यापारी 600 से 800 रुपये प्रति क्विंटल पर मक्का खरीद रहे हैं। सरकार ने समर्थन मूल्य पर खरीद सुनिश्चित करने की बजाय किसानों के साथ छलावा करते हुए भावांतर योजना लागू की है। लेकिन हवा यह बनायी है कि जो किसान अच्छा उत्पादन दिखाएंगे, उन्हें फसल बीमा नहीं मिलेगा। जबकि फसलें अलग-अलग हैं। पंजीयन के समय 1 हेक्टेयर पर औसत 19 क्विंटल 54 किलो मक्का मंडी में खरीदी जा रही है। अर्थात 40 क्विंटल मक्का भावांतर योजना के तहत ही व्यापारियों को 600 से 800 रुपये क्विंटल बेचने के लिए मजबूर किया जा रहा है। क्षेत्र में पानी का नितांत अभाव है। पहले बिजली विभाग एक महीने के 1 हार्स पावर का भी अस्थाई कनेक्शन देता था लेकिन अब बिजली कंपनी तीन माह से कम का कनेक्शन किसानों को देने को तैयार नहीं हैं जबकि कुओं में 15 दिन का भी पानी नहीं है। केवल मुलताई क्षेत्र में 72 जलाशय ऐसे हैं जिनमें बहुत कम पानी रह गया है फिर भी किसानों से स्थाई कनेक्षन की भारीभरकम राशि वसूल की जा रही है। सम्मेलन लगातार बढ़ती महंगाई के अनुपात में समर्थन मूल्य बढ़ाने की मांग करता है। जिस तरह कर्मचारियों को हर 6 महीने बाद महंगाई भत्ता दिया जाता है उसी तरह किसानों का समर्थन मूल्य भी लागत एवं कीमत आयोग द्वारा बढ़ाया जाय।

9. सरकार द्वारा घोषित की गयी भावांतर योजना खोखली साबित हुई है। प्रदेश के 54 लाख किसान परिवारों में से गिने-चुने कुछ हजार परिवारों को भावांतर योजना का लाभ मिलना है। किसानों की इस बदतर हालत के बावजूद प्रदेश सरकार लगातार केंद्र सरकार से कृषि क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए लगातार कृषि कर्मण्यता पुरस्कार हासिल कर रही है तथा अखबारों में विज्ञापन दे रही है कि म प्र में कृषि विकास दर दुनिया में सर्वाधिक 20 प्रतिशत है, जबकि वास्तविक स्थिति यह है कि किसानों की आात्महत्याएं दिन-प्रतिदिन बढ़ रही हैं तथा किसानों की वास्तविक आय आधी रह गयी है। सम्मेलन मानता है कि किसानों की वास्तविक स्थिति के बावजूद विकास दर को बढ़ा हुआ बताना यह साबित करता है कि वर्तमान विकास दर के आंकलन करने के तौर तरीकों का आम किसान के जीवन से कोई संबंध नहीं है।

10.  सोयाबीन की फसल 4 वर्षों से लगातार खराब होने के वावजूद फसल बीमा नहीं मिलने, मक्का की समर्थन मूल्य पर खरीद नहीं होने के कारण किसान रोजमर्या का खर्चा चलाने के लिए दूध पर आश्रित हो गया है लेकिन भोपाल दुग्ध संघ ने प्रति लीटर फैट का रेट 6 रुपये 40 पैसे से घटाकर 5 रुपये 25 पैसे कर दिया है जिससे 10 रुपये लीटर की कमी होने से दुग्ध पालकों की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है ।मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के बेटे का सुधा अमृत दूध 65 रुपये लीटर बिक रहा है लेकिन मुलताई के किसान का दूध 15 से 20 रुपये लीटर खरीदा जा रहा है ,सम्मेलन रेट के इस भेदभाव को खत्म करने की मांग करता है।

11.  केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा को लेकर लगातार ढिंढोरा पीटा है लेकिन लाखों किसानों को म. प्र. में लगातार 3 वर्ष तक फसलें खराब होने के बावजूद मुआवजा नहीं मिला है। 28 दिसंबर से 12 जनवरी के बीच की गयी 100 गांवों की किसान मुक्ति यात्रा में एक भी गांव में एक भी किसान ऐसा नहीं मिला जिसे 2014 के बाद एक भी पैसा फसल बीमा का प्राप्त हुआ हो, जबकि फसल बीमा का प्रीमियम किसानों से लगातार वसूल किया जा रहा है। कुल प्रीमियम से 24 हजार करोड़ की राशि एकत्र हुई है, जिसमें से 8 हजार करोड़ ही किसानों को देशभर में मुआवजे के तौर पर बांटा गया है। अर्थात फसल बीमा योजना किसानों की लूट की योजना बनकर रह गयी है। सम्मेलन अनावारी का आंकलन करने का अधिकार ग्रामसभाओं को देने का प्रस्ताव करता है तथा भ्रष्ट पटवारी व्यवस्था को आंकलन के कार्य से खत्म करने की मांग करता है।

12.  केंद्र और राज्य सरकारें, सुनियोजित तौर पर किसान, किसानी और गांव को षडयंत्रपूर्वक नष्ट करने पर आमादा हैं। उनकी दृष्टि में विकास का एकमात्र रास्ता किसान, किसानी और गांव को खत्म करना है। जीडीपी में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी देश के आजाद होने के बाद 65 प्रतिशत थी, जो अब घटाकर 15 प्रतिशत कर दी गयी है। देश की 65 प्रतिशत ग्रामीण एवं खेती पर आधारित आबादी को कुल बजट का सालाना केवल 3 प्रतिशत बजट आबंटित कर सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था एवं जनजीवन को बरबाद करने में कोई कोर-कसर बाकी नही छोड़ी है। अब भारत सरकार दावा कर रही है कि केवल 48 प्रतिशत देश की आबादी कृषि क्षेत्र से जुड़ी रह गयी है, जिसका वास्तविक अर्थ यह है कि 20 प्रतिशत आबादी को आजादी के बाद कृषि क्षेत्र से अलग कर दिया गया है। 2010-11 की कृषि जनगणना के मुताबिक देश में कुल 87 प्रतिशत ऐसे किसान हैं जिनके पास कुल 1 हेक्टेयर से कम की जमीन है। सरकार किसानों को खेती से अलग करने के तमाम उपाय कर रही है। वह इसे खेती-किसानी पर दबाव कम करने की नीति बतलाती है। आजादी के बाद 10 करोड़ व्यक्ति अब तक अपनी जमीनों से उजाड़े जा चुके हैं जिनमें सरदार सरोवर डूब क्षेत्र के 40 हजार परिवार भी शा मिल हैं जिनका संपूर्ण पुनर्वास नहीं हुआ है। 5 लाख किसानों ने मजबूरी में आत्महत्या की है। सरकार खेती को इतना अधिक घाटे का पेशा बना देना चाहती है कि नई पीढ़ी खेती छोड़ने को मजबूर हो जाए। केंद्र सरकार के स्टार्ट-अप इंडिया, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, केशलेस इंडिया और न्यू इंडिया में भारत के किसानों का कोई स्थान दिखलाई नहीं पड़ता। सम्मेलन केंद्र सरकार की किसान विरोधी नीतियों को बदलने के लिए राष्ट्रव्यापी संघर्ष करने का संकल्प लेता है।

13.  आर्थिक सर्वे 2016 के मुताबिक औसत किसान परिवार की आय देश में 1700 रुपये प्रति माह से भी कम है, जबकि सातवें वेतन समझौते के अंतर्गत कर्मचारियों के न्यूनतम वेतन 25 हजार रुपये प्रतिमाह है। सम्मेलन, इसी तरह हर किसान परिवार की आय 25 हजार रुपये सुनश्चित करने के लिए केंद्र सरकार से नीतियां बनाने की मांग करता है, ताकि कर्मचारियों की तरह किसानों की भी न्यूनतम आय सुनिश्चित की जा सके। सम्मेलन राष्ट्रीय कृषक आय आयोग तत्काल गठित करने की केंद्र सरकार से मांग करता है। बैंक कार्य विनियम अधिनियम की धारा 21क को भूतलक्षीय प्रभाव से समाप्त करने की मांग करता है। सम्मेलन कृषि क्षेत्र को विकास प्रक्रिया के केंद्र में रख कर उसमें सार्वजनिक विनिवेश बढ़ाये जाने तथा उद्योगों की भूमिका कृषि कार्यों में सहायक के रूप में तय किये जाने की नीति बनाने की मांग करता है।

14.  प्रधानमंत्री द्वारा 2017-18 के बजट में किसानों की आय दुगुना करने की घोषणा की गयी थी जिसके तहत भारत सरकार ने एक कमेटी बनायी, जिसने 23 दिसंबर 2017 को माडल कांट्रेक्ट फार्मिंग एक्ट 2018 (ठेके पर खेती) को वेबसाइट पर डालकर 15 दिन में सुझाव मांगे थे। सरकार वास्तव में किसानों की प्रतिक्रिया जानना चाहती तो वह पंचायतों में इसे भेज कर ग्रामसभा की बैठक करवा कर सुझाव मांग सकती थी। लेकिन सरकार ने कंपनियों का हित साधने के लिए अब तक हुए भूमि सुधारों को पूरी तरह से समाप्त करने के लिए तथा कंपनियों के रूप में फिर से नये जमीदार पैदा करने के उद्देश्य से देश के किसानों को अंधेरे में रख कर ठेके पर खेती कराने का षडयंत्र रचा है। सम्मेलन किसानों की जमीन छीनने तथा उन्हें कंपनियों का नौकर बनाने के उद्देश्य से भारत सरकार द्वारा बनाये जा रहे एक्ट को रद्द करने की मांग करता है (सरकार से इस एक्ट को संसद में पेश नहीं करने की मांग करता है)। माडल कांट्रेक्ट फार्मिंग एक्ट का उद्देश्य किसानों की आय दुगुना करना बताया गया है। एक्ट बनाने के लिए यह तर्क दिया गया है कि देश में 86 प्रतिशत किसान छोटे किसान हैं जिनके पास लगभग 1 हेक्टेयर भूमि है। कम जमीन होने के कारण इन्हें खेती में घाटा हो रहा है। इसलिए ऐसा इंतजाम करने की जरूरत है जिससे किसान कंपनी के साथ समझौता कर ले, वही उसकी लागत का इंतजाम करे तथा कृषि उत्पाद को बेचे, उसे तकनीक प्रदान करे। ठेके पर खेती के अब तक के अनुभव यह बताते हैं कि पहले कंपनी किसानों को कुछ पैसा उपलब्ध कराती है बाद में कृषि उत्पाद का दाम कम होने के कारण घाटे के चलते किसान की जमीन खरीद लेती है तथा किसान अपनी ही जमीन पर मजदूर के तौर पर कार्य करने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। सम्मेलन की मान्यता है कि कम जोत वाले किसान अधिक मेहनत करते हैं जिससे अधिक उत्पादन प्राप्त करते हैं। यदि कम रकवा ही खेती में घाटे का कारण है तो सरकार को सहकारिता खेती के लिए कानून बनाना चाहिए तथा किसानों को लागत तो उपलब्ध करानी ही चाहिए, साथ में समर्थन मूल्य पर संपूर्ण कृषि उत्पाद की खरीद सुनिश्चित कर किसानों की आर्थिक हालत सुधारनी चाहिए। सम्मेलन सहकारी कृषि को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता मानता है। जिस तरह अमूल ने सहकारी समितियां बनाकर दुग्ध उत्पादक किसानों को लाभ पहुंचाया उसी तरह सब्जी और फल पैदा करने वाले किसानों को भी सहकारी समितियां बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

15.  सम्मेलन खेती-किसानी की लागत कम करने, जहरीले खाद्य पदार्थों से आम नगरिकों को मुक्ति दिलाने, मिट्टी की हालत में सुधार करने के उद्देश्य से जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की नीति बनाने की शासन से मांग करता है तथा किसानों से रसायन मुक्त खेती पद्धतियां अपनाने की अपील करता है। आंध्र प्रदेश में 35 लाख एकड़ भूमि पर रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग तथा 20 लाख हेक्टेयर पर रासायनिक खाद का इस्तेमाल बंद कर दिया है। इसके बावजूद वहां उत्पादन भी बढ़ा है। कीटों के हमले भी कम हुए हैं। किसानों की आय में 45 प्रतिशत का इजाफा हुआ है तथा स्वास्थ्य पर खर्चे भी कम हुए हैं। किसी किसान ने आत्महत्या भी नहीं की है। इस तरह का माॅडल पूरे देश में लागू करने की जरूरत सम्मेलन मानता है। रासायनिक खाद और कीटनाशक का प्रयोग कम करने से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में भी कमी आएगी, जो मौसम में हो रहे बदलावों को रोकने के लिए आवश्यक है। सम्मेलन जिन इलाकों में पानी की कमी है वहां गन्ना, कपास और चावल जैसी अधिक पानी की जरूरत वाली फसलों का उत्पादन ना करने की किसानों से अपील करता है।

16.  राज्य सरकार द्वारा डीजल और पेट्रोल के दामों में वृद्धि की जा रही है जिसका सम्मेलन पुरजोर विरोध करता है तथा किसानों को आधे दामों पर डीजल उपलब्ध कराने की मांग करता है।

17.  सम्मेलन केंद्र सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने के षडयंत्र के प्रति किसानों को आगाह करता है, राज्य सभा में बहुमत के अभाव में तथा भूमि अधिकार आंदोलन सहित देशभर के जनसंगठनों द्वारा भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ चलाये गये अभियान के चलते सरकार बिल पारित नहीं करा सकी थी। लेकिन उसने राज्य सरकारों के माध्यम से अपनी मंशा पूरी करने का रास्ता निकाल लिया था। बदली हुई राजनैतिक परिस्थिति में जब राज्यसभा में भाजपा का बहुमत होगा, तब फिर से केंद्र सरकार भूमि अधिग्रहण बिल को पारित कराने का प्रयास करेगी, ताकि विभिन्न परियोजनाओं के लिए देश की 20 प्रतिशत से अधिक भूमि का अधिग्रहण किया जा सके। इसे रोकने के लिए भूमि अधिकार आंदोलन को तेज करने की जरूरत होगी, तथा देशभर में चल रहे भू-अधिकारों के संघर्ष को प्रभावकारी बनाना होगा। सम्मेलन वर्तमान भू-अधिग्रहण कानून में किसानों की सहमति की अनिवार्यता का प्रावधान समाप्त किये जाने, सोशल इम्पेक्ट अध्ययन की अनिवार्यता समाप्त किये जाने, न्यूनतम बहुफसली खेती की जमीन के अधिग्रहण के प्रावधान को समाप्त करने, धारा 24(2) के अंतर्गत 5 वर्ष की समय सीमा समाप्त करने के सरकार के प्रयासों को विफल करने का संकल्प लेता है। सम्मेलन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ देशभर में चल रहे संघर्षों का समर्थन करता है तथा केंद्र सरकार से मांग करता है कि वह कृषि योग्य भूमि के अधिग्रहण तथा बिना ग्रामसभा की सहमति के अधिग्रहण पर कानूनी रोक लगाये। सम्मेलन केंद्र सरकार से आजादी के बाद अब तक देशभर में हुए भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास को लेकर श्वेतपत्र जारी करने की मांग करता है।

18.  छिंदवाडा जिले के चौरई ब्लाक में माचागोरा बांध बनाया गया है जिसमें 31 गांव प्रभावित हुए हैं। 8 गांव डूबे हैं। लगभग 50 हजार लोगों का जीवन प्रभावित हुआ है। माचागोरा बांध में मछली पकडने का ठेका सिवनी के ठेकेदार को दिया गया है। सम्मेलन ठेका निरस्त करने एवं प्रभावित किसानों को मछली पकड़ने का अधिकार देने की मांग करता है। सम्मेलन माचागोरा बांध प्रभावित किसानों का अब तक संपूर्ण पुनर्वास नहीं किऐ जाने की निंदा करता है, तथा सरदार सरोवर बांध के प्रभावितों को सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर प्रति हेक्टेयर 60 लाख रुपये के मुआवजे के बराबर मुआवजा देने की मांग करता है।

19.  छिंदवाडा में चौसरा गांव में पेंच थर्मल पावर प्लांट बनाने हेतु 5 गांवों के किसानों की जमीनें 1987 में अधिग्रहित की गयी थीं। उस समय मुख्यमंत्री ने हर परिवार से एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की थी, किंतु गैरकानूनी तरीके से 2010 में अडानी पावर प्रोजेक्ट हेतु जमीन सरकार द्वारा बेच दी गयी। आज तक पावर प्रोजेक्ट का निर्माण कार्य शुरू नहीं किया गया है। देश में इस समय लागू भू-अधिग्रहण कानून की धारा 24(2) कहती है कि यदि को्ई प्रोजेक्ट अवार्ड पारित होने के 5 वर्ष के भीतर पूरा नहीं होता, तो किसानों की जमीनें उन्हें लौटानी चाहिए। लेकिन सरकार ने अब तक किसानों की जमीनें उन्हें वापस लौटाने की कार्यवाही नहीं की है और ना ही प्रोजेक्ट निरस्त किया है। सम्मेलन म प्र सरकार से 24(2) की धारा को लागू कर किसानों की जमीनें वापस करने की मांग करता है।

20.  छिंदवाडा जिले के सौंसर ब्लाक में सातनूर गांव के आसपास लगभग 8 गांवों की जमीनें विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के अंतर्गत अधिग्रहित की गयी थीं। लेकिन अभी तक कोई भी उद्योग या कारखाना शुरू नहीं किया गया है। सम्मेलन किसानों को भू-अधिग्रहण कानून की धारा 24(2) के तहत वापस करने की मांग करता है।

21.  छिंदवाडा जिले में पेंच नेशनल पार्क हेतु 65 गांवों की जमीनें बफर जोन के नाम पर छीनी जा रही हैं। सम्मेलन प्रदेश सरकार की इस कार्यवाही का पुरजोर विरोध करता है।

22.  सम्मेलन मानता है कि केंद्र और राज्य सरकारें पूंजीपति को छूट और किसानों की लूट के सिद्धांत पर चल रही हैं। केंद्र सरकार ने गत तीन वर्षों में अडानी-अम्बानी जैसे 100 औद्योगिक घरानों को 14 लाख करोड़ की छूट दी है। एक सप्ताह पहले बैंकों को 80 हजार करोड़ रुपये तथा 2017 में 2 लाख, 40 हजार करोड़ बैंकों की सेहत सुधारने के लिए मदद के तौर पर सरकार द्वारा दिया जा चुका है। बैंकों का पैसा बड़ी कंपनियों से वसूल नहीं हो रहा है। अडानी-अंबानी पर कुल मिला कर 2 लाख करोड़ की राशि बकाया है। सरकार उनकी संपत्ति नीलाम और कुर्क करने की बजाय उन्हें लगातार पूंजी उपलब्ध कराने का उपक्रम कर रही है। प्रधानमंत्री अपने हर विदेशी दौरे में अडानी-अंबानी की कंपनियों के प्रतिनिधियों को साथ ले जाकर उनके दुनिया भर में व्यापारिक सौदे करवा रहे हैं। दूसरी ओर किसानों पर कर्ज लगातार बढ़ता चला जा रहा है जिसके चलते किसान आत्महत्या के लिए मजबूर हो रहे हैं। नई आर्थिक नीति के लागू होने के बाद से 1992 से अब तक 5 लाख किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं। अब पहली बार पति-पत्नी किसानों के आत्महत्या करने की खबरें आ रही हैं। कई जगहों पर किसानों के बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं ताकि उनके पिता को बच्चों का खर्चा न होने के कारण आत्महत्या नहीं करनी पड़े। इस स्थिति को बदलकर सम्मेलन किसानों की आत्महत्या से मुक्त भारत निर्माण का संकल्प लेता है।

23.  सम्मेलन पंजाब और तेलंगाना की तरह सभी किसानों को म. प्र. में निःशुल्क बिजली उपलब्ध कराने की मांग करता है।

24.  सम्मेलन मानता है कि सुदृढ राष्ट्र निर्माण के लिए सुदृढ गांव निर्माण जरूरी है। सम्मेलन गांव को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कार्य करना जरूरी मानता है, ताकि स्थानीय उत्पादन, स्थानीय खरीद-फरोख्त और स्थानीय वितरण हो सके। बाजार का न्यूनतम हस्तक्षेप हो। यह गांव को खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से भी आत्मनिर्भर बनाने के लिए जरूरी है।

25.  सम्मेलन मानता है कि भोजन आयात करने का अर्थ बेरेाजगारी आयात करना होता है। इसलिए सम्मेलन केंद्र सरकार से मांग करता है कि वह खाद्य पदार्थों का आयात तत्काल प्रभाव से बंद करे, सरकार विश्व व्यापार संगठन तथा अन्य राष्ट्रों से किये गये दोपक्षीय समझौतों से बाहर आये।

26.  सम्मेलन देश में शराब एवं अन्य नशीले पदार्थों के सेवन से लगातार हो रही मौतों के प्रति चिंता व्यक्त करता है। इस कारण हर वर्ष 10 लाख से अधिक मौतें हो रही हैं। अधिकतर सड़क दुर्घटनाएं शराब पीकर वाहन चलाने से हो रही हैं। अधिक शराब पीने से किडनी और लीवर खराब हो रहा है। शराब पीकर किये जाने वाले अपराधों में हत्याएं हो रही हैं। महिला हिंसा का प्रमुख कारण पति का शराब पीना है। शराब पर लगातार खर्च होने के कारण गरीबों की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चरमरा जाती है जिसके कारण लगातार आत्महत्याएं हो रही हैं। इन मौतों को शराबबन्दी-नशाबन्दी का कानून बनाकर रोका जा सकता है। म प्र के मुख्यमंत्री द्वारा बार-बार शराब बंदी घोषणाएं की गयी हैं लेकिन आज तक उन पर अमल नहीं किया गया। मुख्यमंत्री ने प्रदेश में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार हाइवे पर शराब बिक्री रोकने के आदेश का भी पालन नहीं कराया है और ना ही घोषणा के मुताबिक नर्मदा के किनारे शराब बिक्री बंद हुई है। सम्मेलन प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से देश और प्रदेश में शराबबंदी-नशाबंदी कानूनी तौर पर लागू करने की मांग करता है। सम्मेलन की मान्यता है कि लोकतंत्र को सार्थक बनाने के लिए शराबबंदी आवश्यक है। क्योंकि देशभर में चुनाव प्रक्रिया शराब माफिया द्वारा प्रभावित की जा रही है। सम्मेलन मुलतापी, बैतूल, म प्र और देश में नशा मुक्त आंदोलन का नेतृत्व कर रही महिलाओं को बधाई देता है तथा सरकार से इन महिलाओं को नशाबंदी के प्रयासों में हर संभव सहयोग देने की अपील करता है। सम्मेलन नशा मुक्त भारत आंदोलन द्वारा चलाये जा रहे राष्ट्रीय अभियान का समर्थन करता है तथा 29-30 जनवरी 2018 को भुवनेश्वर (उडीसा) में बड़ी संख्या में शामिल होने की नशाबंदी कार्यकर्ताओं से अपील करता है।

27.  नागपुर से आगरा तक जाने वाली पैसेंजर ट्रेन गत दो माह से बिना कोई कारण बताये बंद कर दी गयी है, सम्मेलन मानता है कि पैसेंजर ट्रेन का इस्तेमाल ग्रामीण क्षेत्र के किसानों, मजदूरों और गरीबों द्वारा किया जाता है, इस कारण पैसेंजर ट्रेन बंद कर दी गयी है, जबकि बाकी सभी ट्रेनें उसी ट्रेक पर नियमित चल रही हैं। यह रेल मंत्रालय की भेदभावपूर्ण नीति का परिचायक है। ट्रेन बंद होने के परिणामस्वरूप रोजाना हजारों नागपुर, मुलतापी, आमला, बैतूल, घोडाडोंगरी के बीच पड़ने वाले स्टेशनों से आना-जाना करने वाले ग्रामीण यात्रियों पर विपरीत असर पड़ा है। सैकड़ो छात्राएं ग्रामीण क्षेत्र से मुलताई और आमला पढ़ने जाती हैं तथा हजारों किसान सब्जियां एवं अन्य दुग्ध उत्पाद लेकर नागपुर जाते हैं। पैसेंजर बंद होने से इनका आर्थिक कमाई का स्रोत बंद हो गया है। सम्मेलन रेल मंत्रालय से अविलम्ब नागपुर से बैतूल के बीच चलने वाली पैसेंजर पुनः शुरू करने की मांग करता है।
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