पंचेश्वर बांध : एक नहीं दो बांध परियोजनायें है


माटू जनसंगठन ने 5 नवम्बर 2017 को विज्ञप्ति जारी कर बताया है कि उत्तराखण्ड की भाजपा सरकार द्वारा पंचेश्वर बांध के लिए की गई जनसुनवाईयों में धोखें से चम्पावत जिले में प्रस्तावित रुपालीगाड बांध के लिए भी औपचारिकता पूरी कर ली गई जोकि कानूनन अव्यवहारिक व अनैतिक है। इन जनसुनवाईयों में बांध पर कोई जानकारी नहीं दि गई। रुपालीगाड बांध एक बड़ा बांध है जो कि अपने आप में स्वंय एक अलग परियोजना है। इस तरह दो परियोजनाओं को एक बताकर स्थानीय लोगों के अधिकारों को सीमित किया गया है। पढ़े माटू जनसंगठन का विज्ञप्ति;

प्रभावित जनता को अंधेरे में रखकर पर्यावरण और वन स्वीकृतियंा लेने की प्रक्रियंा पूरी की जा रही है वह यह बताता है कि सरकारों की मंशा किसी तरह के विकास की नही वरन् मात्र ठेकेदारों की भरण पूर्ति का साधन तैयार किया जा रहा है। पंचेश्वर बहुद्देशीय नही बहुधोखीय परियोजना है। कैसे और कौन से सर्वे के तहत एक पूर्व मुख्यमंत्री ब्यान दे जाते है कि 99 प्रतिशत जनता बांध के पक्ष में है? इससे मालूम होता है कि सरकार फर्जी आकड़ों के आधार पर ही बांध को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। बांध के पक्ष में बिना किसी अध्ययन के दावे और वादे बताते है कि सत्ताधारी दल बांध को चुनाव की तरह से देख रहा है। बस किसी भी तरह से बांध को कानूनी जामा पहनाया जाये और वादे-दावे तो टिहरी बांध की तरह लटके रहेंगे।

प्रशासन के पास तो मोदी जी के सपने को पूरा करने का दवाब है इसलिये वो अब ‘‘बांध विरोधी संगठनों पर खास नजर रखी जायेगीं‘‘, इस तरह के सरकारी ब्यानों से प्रभावितों को और जनपक्षीय संगठनों को डराने की कोशिश कर रहा है। उत्तराखंड के कुमांउ क्षेत्र की दूरस्थ महाकाली व सरयू घाटी के अतुलनीय सौंदर्य, सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक आस्थाओं, आक्सीजन के भंडार, स्वावलंबी गांव के लोगों को जिन्हे आजादी के बाद से ही सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा व् विकास अन्य लाभों से महरूम रखा गया है उनपर बर्बादी के ये बांध थोपे जा रहे है। हमारा इन दोनो बांधों का पूरी तरह से विरोध है।

हम मात्र भावना ही नही वरन् तार्किक रुप और कानूनी पहलुओं से भी सिद्ध करने में सक्षम है कि यह बांध क्यों गलत है।

चम्पावत जिले में जल्दबाजी

पंचेश्वर और रुपालीगाड बांध चम्पावत जिले में प्रस्तावित है इसलिये इस जिले में इन बांधों से जुड़ी सभी तरह की कानूनी औपचारिकतायें औपचारिक रुप से ही पूरी की जा रही है। जिसका प्रभावितों या पर्यावरण से कोई मतलब नही। सामाजिक आकलन रिर्पोट के आकड़े पुराने और गलत है। गांव वालो को पता तक नही की कब कौन सर्वे करने आया? नये जमाने में गूगल बाबा से जमीनी सर्वे हो गये। इसलिये चम्पावत जिले के सिमलखेत, बौतड़ी, निडिल आदि गांवों में जो सामाजिक आकलन रिर्पोट और तथाकथित पुनर्वास नीति पर बैठके हो रही है उसमें लोग विरोध कर रहे है।

एक नहीं दो बांध परियोजनायें है

दो बांधों को एक ही परियोजना मान कर 25 अप्रैल 2015 में बांधों के अध्ययन कागजात बनाने के लिये पर्यावरण आकलन समिति ने अनुमति दी। फिर जनसुनवाई भी धोखे से एक में ही करवाई गई। चम्पावत जिले में ही प्रस्तावित, पंचेश्वर बांध से 27 किलोमीटर नीचे 95 मीटर उंचे कंक्रीट के 240 मेगावाट के रूपालिगाड बांध की जनसुनवाई अलग से होनी चाहिये थी। इसे पंचेश्वर बहुद्देशीय जलविद्युत परियोजना का एक हिस्सा बताकर गलत किया गया है। यह एक बड़ा बांध है जो कि अपने आप में स्वंय एक अलग परियोजना है। इस तरह लोगो के अधिकारो को सीमित किया गया है। यह अपने आप मे एक सबूत है कि पंचेश्वर बहुद्देशीय परियोजना की नींव ही धोखे की है।

बिना जानकारी की धोखे वाली जनसुनवाईयां

9 अगस्त 2017 को चम्पवात, 11 अगस्त 2017 को पिथौरागढ़ और 17 अगस्त 2017 को अल्मोड़ा जिले में हुई जनसुनवाईयंा कानूनी, व्यवहारिक व नैतिक तरह से गलत थी। ये जनसुनवाईयां बिना जानकारी दिये भय, दवाब और भ्रम में पूरी की गई थी।

‘सामाजिक आंकलन रिर्पोट‘ को रद्द मानों, पुनर्वास के दावे झूठे

पुनर्वास के जो दावे किये जा रहे है वो सच्चाई से परे है। आंकड़े कब कैसे कहां से इकटठे किये गये इसका भी कोई जिक्र नही है। बांध के लोगो पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में बनी ‘सामाजिक आंकलन रिर्पोट‘ में एक स्थान पर 2011 का जिक्र है किन्तु प्रत्येक सूची के नीचे सन का कोई जिक्र नही है।  रिपोर्ट में खेती की स्थिति, महिलाओं का अनुपात और उनकी आर्थिक समाजिक स्थिति पर गलत आंकड़े दिये गयंे है। जौलजीबी व झूलाघाट जैसे दो बड़े बाज़ारों व व्यापारियों का भी कोई जिक्र नही है। जबकि यह भारत-नेपाल के बड़े व्यवसायिक केन्द्र है जिन पर हजारों परिवार बरसों से आश्रित है। एक सांस्कृतिक आदान-प्रदान के केन्द्र भी है।

134 गांवों के 29,400 परिवार पंचेश्वर बांध में व रुपालीगाड बांध में 1,587 परिवार में प्रभावित हो रहे है। ये संख्या बहुत धोखे वाली है। चूंकि जिसके नाम पर जमीन है उसे परिवार माना है। यानि 75 साल के वृद्ध के 4 बेटे और 8 व्यस्क पौत्र है तो भी उनको एक ही परिवार माना गया है। जमीन देने का वादा भी साफ नही है। किसको क्या मिलेगा? कब मिलेगा?

वन अधिकार कानून 2006 कानून का उलंघन

बिना वन अधिकार कानून 2006 के अंर्तगत गांव वासियों को वन अधिकार दिये उनसे वन संबधी अनापत्ति ली जा रही है। चम्पावत मे तो यह कार्य 9 अगस्त से पहले ही कर लिया गया। प्रभावितों को मालूम तक नही की  वन अधिकार कानून 2006 उनको पास के जगंल पर अधिकार देता है। आज तक उत्तराखंड में कही पर भी लोगो को वन अधिकार कानून 2006 के तहत मान्यता नही दी गई है।

द बायोलोजिकल डायवसिटी एक्ट 2002 यानि जैविक विविधता कानून 2002 का पालन हो

द जैविक विविधता कानून 2002 के अनुसार प्रत्येक शहर व  ग्राम, ब्लाक व जिला स्तर पर लोक जैव विविधता रजिस्टर बनाना जरुरी है जिसमें वहंा की जैविक विविधता का पूरा आकड़ा होता है। ताकि गांव की जैव विविधता के पूरे आंकड़े आ सके। 

हमारी मांग है कि
  • माना जाये कि यह एक नहीं दो बांध परियोजनायें थी। जो अब बंद हो रही है।
  • ये जनसुनवाईयंा ही गैर कानूनी मानी जानी जाये।
  • ‘सामाजिक आंकलन रिर्पोट‘ को रद्द मानों।
  • वन अधिकार कानून 2006 के तहत गांवों को अधिकार दिये जाये।
  • लोक जैव विविधता रजिस्टर ग्राम, ब्लाक व जिला स्तर और नगरपालिका व नगर निगम स्तर पर बनाया जाये।

सुरेन्द्र आर्य, विप्लव भटट्, पी. सी. तिवारी, अजंनी कुमारी, हरिवल्लभ भटट्, सुमित महर, प्रकाश भंडारी,  विमलभाई,  हरेन्द्र कुमार अवस्थी

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