राजस्थान : जबरन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ सामूहिक समाधि लेने उतारे किसान


जयपुर सीकर हाइवे स्थित नींदड गाँव में किसान पिछले 72 घंटों से  भूमि समाधि ले कर बैठे हुए हैं। किसानों की मांगों के सामने नगरीय विकास मंत्री श्रीचंद कृपलानी ने हाथ खड़े कर दिए है उन्होंने इस भूमि अधिग्रहण के  मामले को जेडीसी पर छोड़ दिया है। संघर्ष समिति ने चेतावनी दी है कि सरकार ने आज शाम तक सकारात्मक हल नहीं निकाला तो समाधि सत्याग्रह में बच्चे भी शामिल हो जायेगे। पढ़े रिपोर्ट;

जयपुर के नजदीक नींदड गांव के किसानों ने अपनी जमीन बचाने के लिए भूमि समाधि ले ली। आंदोलन स्थल पर टेंट लगा है जहाँ नींदड़ और आस-पास की ढाणियों के किसान धरने पर बैठे है। धरने के बीच में गांव के 55 किसान जमीन में गड्ढे खोद कर उसमें बैठ हुए है। किसानों का कहना है कि सरकार ने हमारी बात नहीं सुनी तो गढ्ढों को मिट्टी से भर कर हम इन्हीं में समाधि ले लेंगे।

सीकर आंदोलन की भांति यहाँ भी महिलाओं की भागेदारी शानदार है आंदोलन में शामिल सबसे बुजर्ग महिला न्याति बाई की उम्र 80 साल है पिछले दो दिन से धरती पर खोदा गड्ढा ही उसका घर है। भूमि समाधि सत्याग्रह चार दिन से जारी है। 3 अक्टूबर से 23 महिलाएं भी इस सत्याग्रह में शामिल हो गई हैं।
गड्ढे में बैठे मांगीलाल कुमावत ने गुस्से में कहा, ''एक इंच जमीन भी नहीं देंगे, चाहे मेरी जान चली जाये, सरकार विकास नहीं जमीन का कारोबार करना चाहती है।''

भूमि समाधि सत्याग्रह के दूसरे दिन राज्य सरकार सक्रिय हुई। 3 अक्टूबर को किसानों का प्रतिनिधि मंडल नगरीय विकास मंत्री श्रीचंद कृपलानी से मिला तो उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए। मंत्री जी के पास किसानों को देने के लिए आश्वाशन भी नहीं था। उन्होंने जयपुर विकास प्राधिकरण के जेडीसी वैभव गालरिया को निर्देश दिया की किसानों की बात सुन कर कोई हल निकाला जाये। 4 अक्टूबर को जेडीसी के साथ काश्तकारों की वार्ता हुई। घंटेभर चली वार्ता किसी नतीजे पर नहीं पहुंची लेकिन काश्तकारों की दोबारा सर्वे की मांग पर (जयपुर विकास प्राधिकरण) जेडीए ने मंथन जरूर शुरू कर दिया है। उधर, काश्तकारों के प्रतिनिधि मण्डल ने साफ कर दिया है कि भूमि अधिग्रहण  निरस्त होना चाहिए, क्योंकि जेडीए अफसरों ने गलत तरीके से सर्वे कर काश्तकारों के साथ अन्याय किया है। दोबारा सर्वे होगा तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। किसानों के प्रतिनिधि मंडल ने 10 सदस्य कमेटी की मांग की है जिसमे पांच किसान प्रतिनिधि तथा पांच सरकार के प्रतिनिधि हो जो निम्न बिन्दुओं पर रिपोर्ट तैयार करे-
  • हर ढाणी, हर कॉलोनी का सर्वे दोबारा हो।
  • सर्वे के लिए समन्वय समिति गठित हो, जिसमें जेडीए के प्रतिनिधियों के साथ संघर्ष समिति के पदाधिकारियों को भी शामिल किया जाए।
  • एक व्यक्ति या एक परिवार की न्यूनतम जमीन आवश्यकता की रिपोर्ट भी बनाई जाए।
  • मकानों की स्थिति क्या है और कितना नुकसान होगा, उसका पूरा सर्वे हो।
  • निवासियों की आर्थिक स्थिति और अवाप्ति के बाद जीवन पर पडऩे वाले प्रभाव का आकलन किया जाए।
  • रोजगार की व्यवस्था भी देखी जाए कि अवाप्ति के बाद मुआवजा के तौर पर मिलने वाली जमीन उसके उपयोगी होगी या नहीं।
आंदोलन की अगुवाई करने वाले नींदड बचाओ युवा संघर्ष समिति के संयोजक नगेन्द्र सिंह शेखावत ने बताया कि सरकार और जेडीए ने उनकी रोजी-रोटी का एकमात्र जरिया छीनने की ठान ली है। उन्होंने ने आरोप लगाया कि जयपुर विकास प्राधिकरण नियम-कायदों को ताक में रखकर यहां भूमि अधिग्रहण कर रहा है। जो लोग यहां दशकों से रह रहे है उन्हें इस योजना के नाम पर उजाड़ा जा रहा है। 2010 में जो सर्वे हुआ वह झूठ पर आधारित है हर खेत में किसान का घर है, खेत में पेड़ है, जमीन बहुफसली है लेकिन सरकार की रिपोर्ट कहती है कि यह क्षेत्र बारानी है, खेतों में पेड़ और घरों का भी उल्लेख नहीं है। इसलिए हमारी मांग है की सरकार दुबारा से सर्वे करवाए।

किसान इसलिए भी नाराज है-
  • झूठे सर्वे की वजह से किसानों को उचित लाभ नहीं मिल पा रहा था।
  • मुआवजे का निर्धारण 2009 की डीएलसी के आधार पर किया गया जो 30 लाख से 52 लाख प्रति बीघा ही बनता है जबकि अभी इस क्षेत्र में 1 से 3 करोड़ प्रति बिघा की रेट है।
  • 1894 के कानून के तहत हो रहा था अधिग्रहण जबकि किसान 2013 के कानून की प्रक्रिया के तहत कार्यवाही चाह रहे थे।
7 सालों से भूमि अधिग्रहण के खिलाफ जारी है संघर्ष 

2010 में कांग्रेस सरकार के समय जयपुर विकास प्राधिकरण ने नींदड़ आवासीय योजना की अधिसूचना अख़बारों के माध्यम से जारी की थी। अधिसूचना के समय से ही किसान भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे है।
इस योजना में नींदड़ गाँव और आस-पास की 19 ढाणियों के 5 हजार परिवारों के लगभग 20 हजार लोग प्रभावित हो रहे है। योजना में 1350 बीघा भूमि का अधिग्रहण प्रस्तावित है। 2013 में अवार्ड जारी हुआ किसानों ने विरोध स्वरूप मुआवजा राशि नहीं ली तो सरकार ने मुआवजा कोर्ट में जमा करवा दिया। लेकिन किसानों के भारी विरोध के चलते जेडीए जमीन का कब्जा नहीं ले पा रहा था। 2014 में राज्य में चुनाव आये तो पूर्व उप राष्ट्रपति भैरो सिंह के दामाद वर्तमान बीजेपी विधायक नरपत सिंह राजवी ने किसानों से भूमि अधिग्रहण निरस्त करवाने का वादा किया। किसानों से चुनाव में वोट भी लिए और जीत भी गए, लेकिन फिर कभी किसानों के बिच नहीं आये।

16 सितम्बर 2017 को नींदड़ आवासीय योजना के लिए जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) दस्ते ने भारी पुलिसबल की मौजूदगी में किसानों की जमीन पर जबरन कब्जा करना शुरू किया। किसानों ने जबरन भूमि अधिग्रहण के विरोध में एकजूट हो कर जेडीए को कब्ज़ा करने से रोक दिया और उसी जमीन पर 18 सितम्बर से एक मात्र मांग भूमि अधिग्रहण को निरस्त करो को लेकर अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया। 15 दिन के अनिश्चितकालीन धरना से जब सरकार के कान में जू तक नही रेंगी तो किसानों ने 2 अक्टूबर से भूमि समाधि सत्याग्रह शुरू कर दिया।

जेडीए की निगाह 1000 करोड़ पर 

इस योजना में जेडीए प्रभावित किसानों को मुआवजा देने व जनसुविधाओं पर जो राशि खर्च करेगा। उसकी लागत करीब साढ़े तीन हजार रूपए प्रति वर्गमीटर आएगी, जबकि यहां जेडीए छह हजार रूपए प्रति वर्ग मीटर में प्लाट काटे तो भी आसानी से बिक सकते हैं और जेडीए को 1000 करोड़ मिल सकते हैं। जानकारों के मुताबिक प्रस्तावित इस योजना से आगे के क्षेत्र में ही लोग छह हजार रूपए में प्लाट बेच रहे हैं, जबकि जेडीए के प्लाटों की कीमत हमेशा और अधिक रहती है। यह योजना जेडीए की दरों के मामले में अब तक की सबसे मंहगी योजना होगी।

साभार : जनचौक

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