टिहरी बांध विस्थापित बेहाल : 37 सालों में सरकारें पुनर्वास स्थलों पर पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, यातायात जैसी सुविधायें भी नहीं दे पायी



उत्तराखण्ड में टिहरी बांध से उजड़े हजारों लोग 37 साल बाद आज भी अपने बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अभी तक 415 स्थानीय विस्थापितों का भूमि आधारित पुनर्वास नहीं हो पाया है। विस्थापितों के लिए बने पुनर्वास स्थलों पर पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, यातायात जैसी सुविधायें भी सरकारें नहीं दे पायी हैं। 11 साल हो गए बांध बने फिर भी विस्थापितों को 100 यूनिट बिजली प्रति परिवार प्रति माह नहीं दी जा रही और न बिजली के लाभ का 12 प्रतिशत विस्थापितों की सुविधाओं पर खर्च किया जा रहा है। इन सभी मुद्दों पर सरकार को एक बार फिर से अवगत कराते हुए 12 अक्टूबर 2017 को माटू जनसंगठन ने उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री को भेजे ज्ञापन में सवाल उठाया है कि पंचेश्वर जैसे भीमकाय बांध को आगे बढ़ाने में व्यस्त सरकार इन सवालों को गंभीरता से हल करें;

Ref: Matu16/ 12 October, 2017

सेवा में,
श्रीमान त्रिवेंद्र रावत जी
माननीय मुख्यमंत्री,
उत्तराखण्ड सचिवालय,
देहरादून, उत्तराखण्ड-248001
फोन न.-0135-2650433, 2655177 फैक्स-2712827 ईमेल-cm-uk@nic.in

श्री आर. रामास्वामी, मुख्य सचिव,उत्तराखण्ड,cs-uttarakhand@nic.in
श्रीमति सोनिका, पुनर्वास निदेशक, टिहरी बांध परियोजना, पुनर्वास निदेशालय, नई टिहरी, dm-teh-ua@nic.in
श्री एम. पी. पाण्डे, एस सी ऋषिकेश सर्किल, ई सी रोड, देहरादून, उत्तराखण्ड
श्री डी. वी. सिंह,  मुख्य प्रबंधक, टिहरी जल विकास निगम इंडिया लिमिटेड,cmd@thdc.com

संदर्भ : टिहरी बांध से हुये विस्थापितों व प्रभावितों की समस्याओं का समयबद्ध निराकरण हो।

मान्यवर,

टिहरी बांध के पुनर्वास की समस्याआंे का समाधान अभी तक नहीं हो पाया है। हमारा निवेदन है कि राज्य सरकार भी अपने स्तर पर हमारी समस्याओं का कुछ समाधान कर ही सकती है। माननीय मुख्यमंत्री जी आपने पुनर्वास की समस्याओं को देखते हुये जून 2017 में केन्द्रीय बिजली मंत्री के साथ एक बैठक में टिहरी झील का पानी 825 मीटर तक ही रखने के फैसला किया था। टिहरी बांध से हुए विस्थापन की समस्यायें ही कई स्तर पर है-

टिहरी बांध विस्थापितों के ग्रामीण पुनर्वास स्थलों की समस्यायें

1. पथरी भाग 1, 2, 3 व 4 की विस्थापित क्षेत्र की समस्यायें

टिहरी बांध के विस्थापितों को हरिद्वार के पथरी भाग 1, 2, 3 व 4 के ग्रामीण क्षेत्र में पुनर्वास के नाम पर 1979 से भेजा जा रहा है। हमने इस ग्रामीण क्षेत्र को रहने लायक बनाया है। यहाँ लगभग 40 गांवों के लोगों को पुनर्वासित किया गया है किंतु हमे जो मूलभूत सामुदायिक सुविधायें अधिकार रुप में पुनर्वास के साथ ही मिलनी चाहिये थी उनको हम आज 37 वर्षों बाद भी सरकार से मांग रहे है। किंतु इस बारे में आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई है। जिसके कारण हमारा जीवन दुष्कर हो गया है।

भूमिधर अधिकार : यहाँ के विस्थापितों को भूमिधर अधिकार भी नहीं मिल पाया है। जिसके बिना हमें कृषि संबधी कोई सुविधा जैसे- किसान क्रेडिट कार्ड, उर्वरकों में छूट आदि नहीं मिल पाती है। हम बैंक लोन आदि किसी प्रकार की जमानत भी नहीं ले सकते। कोई गारंटी नहीं दे सकते। हमें यहाँ के निवासी होने का प्रमाण तक नहीं है।

स्वास्थय : लगभग 24,000 विस्थापितों की आबादी के लिये निम्नतम सुविधा तक नहीं है। प्राथमिक चिकित्सा, जच्चा-बच्चा केन्द्र आदि भी नहीं है।

शिक्षा : बहुत ही कठिनाई से 10वीं कक्षा तक के स्कूल की व्यवस्था हो पाई। किंतु इसके बाद की शिक्षा का कोई प्रबंध है ही नहीं।

बैंक : मात्र भाग एक में को-आपरेटिव सोसाईटी का बैंक है तथा इतने सालों के बाद दिसंबर 2013 में भाग एक में ही अब इंडियन ओवरसीज़ बैंक खुल पाया है।

यातायात : इसकी कोई सरकारी व्यवस्था तक नहीं है।

जंगली जानवरों से सुरक्षा :  इस हेतु सुरक्षा दिवार का काम भी अभी रुका हुआ है। जिससे जानवर हमारी फसलों को लगातार नुकसान पहुंचा रहे है।

बिजली : नीति के अनुसार हमें बिजली मुफ्त मिलनी चाहिये थी। किंतु दाम देने पर भी बिजली की सुचारु व्यवस्था नहीं है। जब श्री सुशील कुमार शिदें ऊर्जा मंत्री थे तो उन्होंने टिहरी के एक कार्यक्रम में प्रति विस्थापित व प्रभावित परिवारों को 100 यूनिट बिजली देने की घोषणा की थी।

पेयजल व सिंचाई : इसके लिये विस्थापितों ने ज्यादातर अपनी व्यवस्था की है। सिंचाई के लिये बरसों की मांग के बावजूद हमें पास बहती गंगनहर से सिंचाई का पानी नहीं मिल पाया है। जबकि हमारे गांवों को डुबोकर ही पानी आ रहा है। मंदिर, पितृकुटटी, सड़क, गुल आदि की सुविधायें भी हमें सालों बाद व्यवस्थित रुप में नहीं मिल पाई है।

2. रोशनाबाद विस्थापित क्षेत्र की समस्यायें 

इस क्षेत्र में टिहरी जिले के खांड-बिडकोट, सरोट, छाम, सयांसू आदि गांवों के लगभग 400 परिवार सन 2005-2006 से आये है। यहाँ पीने का पानी 300 फुट पर है जिसे लोगों ने स्वंय अपने प्रयासों से निकाला है। किंतु अभी प्रापर्टी डीलरों की एक समिति इस पानी का इंतजाम देखती है। जिसकी अनियमितताओं के बारे में बहुत शिकायत करने पर सीडीओ हरिद्वार ने जांच की। जिसकी रिर्पोट में इस समिति के चुनाव को गलत बताया गया है तथा वित्तीय लेने-देन में बहुत अनियमितता पाई गई है। पीने का पानी विस्थापितों का पुनर्वास नीति के अनुसार हक है। सामुदायिक भवन, प्राथमिक स्कूल इमारत पर किसी नवोदय नगर विकास समिति का कब्जा है। यहाँ भी सड़क नहीं, सिंचाई व पीने के पानी की व्यवस्था, स्वास्थ्य केन्द्र, स्कूल व गन्दे नाले यानि डेनेज की व्यवस्था नहीं है।

3. सुमननगर विस्थापित क्षेत्र की समस्यायें

यहाँ पर भी सिंचाई व पीने के पानी की भयंकर समस्या है। जबकि मात्र 1 किलामीटर के दायरे में टिहरी बांध से दिल्ली व उत्तर प्रदेश को पानी जाता है।

टिहरी बांध विस्थापितों के शहरी पुनर्वास स्थल नई टिहरी की समस्यायें

पीने के पानी की समस्या अभी भी गंभीर है। प्लाट, दुकान, मकान से लेकर पात्रता की समस्यायें भी अनसुलझी है। हजारों केस अनेक न्यायालयों में लंबित है। इन सबके लिये एक मानवीय दृष्टिकोण वाली समिति बना कर उसको हल करने की जरुरत है।

टिहरी बांध की झील के किनारे के गांवों की समस्यायें-

लगभग 40 गांवों में जमीन-मकान धसकने की स्थिति है। झील के आर-पार जाने-आने के लिये सभी पुल अभी तक पूरे नहीं बने है। जिस कारण बरसात में ग्रामीणों को आर्थिक बोझ तो हुआ ही है साथ में उनके सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन पर भी बुरा असर आया है। जीवन का खतरा तो बढ़ा ही है। मजबूरी में लोग आधे डूबे चिन्याली सौड़ वाले पुल से आवाजाही करते है। सुप्रीम कोर्ट में जिनको मान्य किया था ऐसे 400 से ज्यादा परिवारों का भी पुनर्वास अभी तक नहीं हो पाया है। टिहरी झील में जमा हो रही रेत किनारे के गांवों में उड़कर जाने से लोगों के दैनिक जीवन में कठिनाई पैदा कर रही है। स्वास्थ्य की भी समस्यायें हुई है जिसका कोई मूल्याकंन तक नहीं हो रहा है। हमने इस समस्या के समाधान के लिये पहले भी राज्य सरकार को पत्र भेजा था। इस पत्र के साथ पुनः राज्य,केन्द्र व बांध कंपनी को पत्र भेज रहे है। ग्रामीण व्यापारियों की समस्याओं का भी निराकरण बाकि है। जिस सम्पाशर्विक नीति को सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार ने मान्य किया था उसका भी पालन नहीं हो रहा है।

टिहरी बांध विस्थापितों की समस्याओं का समाधान निम्न प्रकार से संभव है-

1. टिहरी जलविद्युत निगम को साफ निर्देश है। कि केन्द्रीय ऊर्जा मंत्रालय के निर्देशानुसार {Office Memorandum dated 2 January, 2001 sign by Joint Secretary Mr. Ajay Shankar} टिहरी बांध के पुनर्वास संबंधी जब भी पैसे की आवश्यकता होगी ‘टिहरी जलविद्युत विकास निगम’ पैसा उपलब्ध करायेगा।

2. टिहरी बांध से हो रहे 12 प्रतिशत मुफ्त बिजली के लाभ से प्रभावितों की समस्यायों का समाधान संभव है। टिहरी बांध से बिजली का उत्पादन भी हो रहा है जिससे राज्य सरकार को प्रतिदिन आमदनी भी हो रही है। जो आज तक करीबन् अढाई हजार करोड़ से ज्यादा होगी।

राज्य सरकार को टिहरी बांध से मिलने वाली मुफ्त बिजली से जो आमदनी हो रही है उसे टिहरी बांध विस्थापितों के लिये खर्च करना चाहिये। ऊर्जा मंत्रालय की  "Guidelines for development of Hydro Electric Projects Sites"  23 मई 2006 के अनुरूप है जिसमें पेज न. 10 पर लिखा है कि बांध से दी जाने वाली मुफ्त बिजली की आमदनी को बांध विस्थापितों पर खर्च किया जाये। नीति का संबधित हिस्सा-
2.3 Provision of 12% free power to the home state Government of India, vide its O.M. dated 17th May, 1989 have approved that “since the Home States are increasingly finding it difficult to locate alternative land and resources for rehabilitation of the oustees in hydro-electric projects. They, need to be suitably assisted by giving incentives, such as the (proposed) 12% free power, to enable them to take care of the problems of rehabilitation in the areas affected by the hydro-electric projects.
Without such assistance and incentives, considerable hydel potential of the country would remain unutilized. Accordingly, the State Government shall be entitled to realize 12% free power from the project for local area development and mitigation of Guidelines for development of Hydro Electric Projects Sites hardships to the project affected people in line with the Govt. of India policy”.

3. टिहरी बांध से ‘स्थानीय विकास कोष’ के लिये मिल रही 1 प्रतिशत मुफ्त बिजली के लाभ का प्रभावितों में बंटवारा होना चाहिये।

ऊर्जा मंत्रालय की जलविद्युत नीति 2008 के पेज नम्बर 35, अध्याय 10. 1. एच के अनुसार 1 प्रतिशत मुफ्त बिजली ‘‘स्थानीय क्षेत्र विकास कोष‘‘ में इस उद्देश्य से दी जाये ताकि अतिरिक्त ढ़ंाचा और सामूहिक सुविधाओं के लिये लगातार आय होती रहे।

In its Chapter 10.1(h) Hydro Power Policy 2008 of Ministry of Power, GOI
says.....
an additional 1% free power from the project would be provided and earmarked for a local Area Devlopment Fund, aimed at providing a regular stream of revenue for income gereration and welfare schemes ceation of additional infrastructure and common facilities etc. on a sustained and continued basis over the life of the project. It is recommended that the host state governments would also provide a matching 1% from their share of 12% free power towards this corpus. This fund could be operated by a standing committee headed by an officer of the State Government, not lower than a district magistrate to be designated by the State Government, male and female representatives of the project head nominated by the developer. This fund would be available in the form of an annuity over the entire life of the project.

ऊर्जा मंत्रालय की जलविद्युत नीति 2008 के पेज नम्बर 36 अध्याय 10.1. आई अनुसार विस्थापितों को 10 साल तक100 यूनिट मुफ्त बिजली या नकद दिये जाने के प्रावधान को लागू करें।
In its Chapter 10.1(I) Hydro Power Policy 2008 of Ministry of Power, GOI
says.....
For a period of 10 years from the date of commissioning of the project, 100 units of electricity per month would be provided by the project developer to each Project Affected Family through the relevant distribution company. It is expected that the PAF will consume at least the minimum lifeline consumption of one unit per day and the cost of balance unused electricity, if any, could be made available to PAF in cash or kind or a combinations of both, at rates to be determined by the State Electricity Regulatory Commission.

हम लगातार सरकारों से यह मांगे विभिन्न समयों में उठाते आ रहे है-

  • विस्थापितों को मूलगांव जैसा ‘‘संक्रमणी जैड ए श्रेणी क‘‘ स्तर वाला भूमिधर अधिकार तुरंत दिये जाये। जिसके लिये सभी ग्रामीण पुनर्वास स्थलों को राजस्व ग्राम भी घोषित करने की प्रक्रिया में तेजी लाई जाये। जिसके लिये अलग से कर्मचारी नियुक्त किये जाये।
  • हरिद्वार के ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले टिहरी बांध विस्थापितों की शिक्षा, स्वाथ्यय, यातायात, सिंचाई व पेयजल और अन्य मूलभूत सुविधायें तुरंत पूरी की जाये। इन कार्यो के लिये टिहरी बांध परियोजना से, जिसमें कोटेश्वर बांध भी आता है, मिलने वाली 12 प्रतिशत मुफ्त बिजली के पैसे का उपयोग किया जा सकता है।
  • टिहरी बांध से दिल्ली व उत्तर प्रदेश जाने वाली नहरों से बांध प्रभावितों को पानी मिलना चाहिये।
  • पुनर्वास के लिये इंतजार कर रहे प्रभावितों का तुरंत पुनर्वास किया जाये।
  • पुलों के निमार्ण कार्य मंय आ रही रुकावटों को दूर किया जाये।
  • ऊर्जा मंत्रालय की नीति के अनुसार विस्थापितों को 100 यूनिट मुफ्त बिजली दिये जाने के प्रावधान को लागू करें।
  • सभी कार्यों के लिये विस्थापितों की ही समितियां बनाकर काम दिया जाये ताकि कार्य की गुणवत्ता बने और सही निगरानी भी हो सके।
  • चूंकि विस्थापन और पिछले तीन दशको से ज्यादा इन सुविधाओं के ना मिलने के कारण हम सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षिक रुप बहुत पिछड़ गये है। इसलिये टिहरी बांध के ग्रामीण  पुनर्वास स्थलों पथरी भाग 1, 2, 3 व 4 हरिद्वार को पिछड़ा क्षेत्र घोषित किया जाये।
  • इन सब कामों के लिये समयबद्ध कार्यक्रम लिया जाये।

इस समय केन्द्र, उत्तराखण्ड व उत्तरप्रदेश राज्यों में एक ही दल की सरकारें है। यह एक सुनहरा मौका है कि टिहरी बांध विस्थापितों की समस्याओं का समाधान आसानी से किया जा सके। इसके लिये मजबूत इच्छा शक्ति व कर्मठ सरकारी महकमें की जरुरत है। जिसकी आपकी सरकार से अपेक्षा है।

जिस तरह से पंचेश्वर बांध की शुरुआत के लिये बहुत ही तेजी से कार्यवाही हो रही है। ऐसे समय में टिहरी बांध विस्थापितों की समस्याओं का निदान पहली प्राथमिकता होनी चाहिये। उत्तराखण्ड में प्रस्तावित नये बांधों को बनाने से पहले कार्यरत बांधों के विस्थापन-पर्यावरण की समस्याओं का निदान आवश्यक व न्याय की मांग है।

अपेक्षा में 

पूरण सिंह राणा, सोहन सिंह गुंसाई, राघवानंद जोशी, जयकिशन न्यूली, अतोल सिंह गुंसाई, महिपाल गुंसाई, कंवर सिंह बिष्ट,  विमल भाई

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