झारखण्ड : आजादी के सत्तर सालों बाद भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है सबर आदिवासी समुदाय


भारत का इतिहास बताता है कि जब अंग्रेज भारत पर कब्जा कर रहे थे तो उन्हें सबसे ज्यादा विरोध अगर कहीं से झेलना पड़ा तो वह थे आदिवासी इलाके। बिरसा मुंडा सरीखे कई ऐसे आदिवासी वीर थे जिन्होंने मात्र अपने तीर कमानों के बल पर अंग्रेजी हुकूमत को कड़ी टक्कर दी। किंतु आज आजाद और आत्मनिर्भर भारत में यदि कोई तबका सबसे ज्यादा वंचित और कमजोर है तो वह यही आदिवासी हैं। भारत को भले ही आजादी मिले हुए सत्तर बरस हो गए हों लेकिन भारत के आदिवासी समुदाय आज अंग्रेजी शासन से भी ज्यादा बदतर हालत में जी रहा है। ऐसे ही एक आदिवासी समुदाय सबर जनजाति की जीवन परिस्थितियों को करीब से देखने के लिए एक संघर्ष वाहिनी की तरफ से एक टीम झारखंड के पोटका प्रखंड के ग्वालकाटा पंचायत के सबरनगर गांव में पहुंची। हम यहां पर आपके साथ उस टीम के  सदस्य दीपक रणजीत के अनुभव साझा कर रहे है;

जमशेदपुर, दिनांक 19.8.2017 को पीयुसीएल सिंहभूम की एक टीम पोटका प्रखंड के ग्वालकाटा पंचायत के सबरनगर गांव में बसे आदिम जनजाति सबरों की स्थिति का निरीक्षण करने पहुँची.

यह गांव लगभग हैरान करने वाला था. यह टोला एक पहाड़ी के उपरांत बसा हुआ है जो समुद्र तल से लगभग 5000 फुट उचांई पर बसा हुआ है. चारों तरफ पहाड़ी और जंगल. बीच में फैला लैंडस्केप. टीम का नेतृत्व संघर्ष वाहिनी के पुराने साथी कुमार चंद्र मार्डी जी कर रहे थे. जो कभी यहाँ के मुखिया रहे थे. उनकी मेहनत यहाँ दिख रही थी. इस टोले को 1954  के आसपास 104 सबर परिवारों को सरकारी जमीन पर दखल देकर बसाया गया था. अब सिर्फ 84 बचे हैं. इस गाँव के लगभग सभी परिवारों को 2.5 एकड़ जमीन दी गयी है. ज्ञात हो कि इन्हें सिर्फ रहने और खेती करने के लिए जमीन दिया गया था. मालिकाना हक नहीं दिया गया था. जमीन का पट्टा उन्हें आज भी नहीं मिला है. जमीन का मालिक आज भी सरकार ही है. अपने नाम से जमीन का टुकड़ा न होने के कारण उन्हें जाति वह आवासीय प्रमाण पत्र बनाने के लिए काफी जद्दोजहद करना पड़ता है.

खेती के नाम पर मिले ज़मीनों पर मकई लगाए है. गाँव में आम, कटहल, सरीफ जैसे फलदार बृक्ष भी मिले.
गाँव के लोग आलसी मालूम पड़े. एक युवक ने कहा कि वह कुछ नहीं करता सब उसके पिता जी करते हैं.
गांव के एक घर में 7-8 महिला पुरूष मिलकर सबर भाषा में सामूहिक गीत गाते हुए एवं एक घर में एक वयस्क व्यक्ति लेटे - लेटे सेरेंग बजाते हुए मिला.

गांव में 2 देशी शराब का एवं हड़िया का भट्टी भी दिखा. गांव में जितने लोगों से हम मिले उनमे से ज्यादातर लोग नशे में थे.

पानी के लिए तीन कुएँ है जिसमें एक में पानी कभी नहीं सूखता. एक तालाब भी है जो बारिश के दो महीनों को छोड़ कर बाकी दिन सूखा ही रहता है. नहाने के लिए यही इन्ही तीन कुँए ही सहारा है. एक बोरिंग और उससे जुड़ा नल भी है जो सौर ऊर्जा से चलता है.

गाँव में लगभग सारे घर बिरसा आवास के तहत बने हुए हैं।. सबी घरों का आकार लगभग घर 20×15 फुट के आस-पास है. सारे घर पुराने और मरम्मत की बाट जोहते.

टोले के बाहर 250 लड़कों की क्षमता का दसवीं तक पढ़ाने के लिए एक जनजातीय आवासीय सरकारी विद्यालय है. यहाँ बच्चों को निःशुल्क पढ़ाई और भोजन की व्यवस्था है. विद्यालय के अहाते के मैदान में लगभग 100 लड़के फुटबॉल खेलते नजर आये. अभी इस विद्यालय के बच्चों ने 113 ऐसे आवासीय विद्यालयों की फुटबॉल प्रतियोगिता में दुसरे स्थान पर आये थे. पांचवी तक पढ़ाने के लिए भारत सेवाश्रम का एक विधालय. यहाँ लड़कियाँ भी शिक्षा ग्रहण करती हैं. पाँचवीं के बाद लड़कियों को पढ़ने के लिए बाहर जाना पड़ता है. कुछ लड़कियाँ पढ़ने जाती ही नहीं हैं. सरकारी आवासीय विधालय में सौर ऊर्जा संचालित बिजली के बल्ब लगे हैं. स्कूल एवं छात्रावास की ज्यादातर खिड़कियां टूटीं हुई है. इस गाँव में बिजली भी है. मोबाइल का केवल जीओ का नेटवर्क पकड़ता है जो हैरान करने वाला था.

भारत सेवाश्रम संघ यहाँ काफी पहले से काम कर रही है. 15 सालों से यहां काम कर रहे रोबिन महाराज ने बताया कि सरकार नहीं चाहती है कि यहाँ के सबरों का विकास हो. सरकार जरूरत मंद लोगों को सिंचाई के लिए 90% सब्सिडी पर ड्रीप एरिगेशन लगा रही है. लेकिन यहाँ के लोगों के नाम से जमीन न होने के इन फेसिलिटियों को लागू नहीं कर पाते है.

उन्होंने आगे बताया कि सभी सरकार आदिम जनजातियों को मेट्रिक पास करने वालों को नौकरी देने का वादा करती है. लेकिन पूर्वी सिंहभूम में इसे लागू नहीं किया गया. इसके लिए यहां के लोगों ने कई दिनों तक उपायुक्त कार्यालय के समक्ष धरना प्रदर्शन भी।किया था. लेकिन शासन-प्रशासन के उदाशीनता के वजह से कोई साकारात्मक रिजल्ट नहीं निकला.

स्वास्थ्य के बारे में बताया कि दस साल पहले तक इनलोगों का आवादी ठीक ठाक बढ़ रही थी. लेकिन हाल के दिनों में इनका आबादी घट रही है. छोटे - छोटे बीमारियीं में मर जाते है. बीमारी का इलाज शुरुआती दिनों से नहीं करते है. बीमारी गंभीर हो जाने पर इलाज के लिए जाते हैं. तब मरने के अलावे और कोई रास्ता नहीं रहता.
उन्होंने यह भी बताया कि कैसे मोदी जी प्रधानमंत्री बनने के बाद से उनके संस्था को निरन्त फण्ड की किल्लतों का सामना करना पड़ रहा है. जिसके बजह से पिछले तीन सालों से उन्हें दिया जाने वाला अनुदान नहीं मिल रही है. जिसके वजह से तीन सालों से उनका वेतन नहीं मिला है. इधर उधर से जुगाड़ करके चल रहा है. लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि किस बजह से भारत सेवाश्रम की और से चलने वाली चलंत चिकिस्तालय बंद हो गया है.

गाँव में एक से सात क्लास तक के तीस बच्चें पढ़ते है. आधे दर्जन से अधिक दसवीं और बारहवीं पास लड़के हैं. उनमें से कुछ पहले दर्जे में उतीर्ण. पर किसी को सरकारी नौकरी नहीं. यह उस सरकारी उदघोषणा का हश्र बताता है जिसमें आदिम जनजातियों के बच्चों के दसवीं पास करते ही सीधे सरकारी नौकरी हासिल कर लेने की बात हर सरकार करती है.

गाँव के लड़कियों की ठीक से शिक्षित करना एक चुनौती है। लड़कों को काम करने के लिए प्रेरित करता दूसरी चुनौती. सबसे बड़ी चुनौती है शायद जीने के लिए पर्याप्त संसाधनों के होने के बाद भी युवकों को शराबखोरी की लत से बचाना.

आसायीय विधालय में खिड़कियों और दरवाजों के साथ दूसरी मरम्मत बेहद जरूरी नहीं तो जाड़े के दिनों में बच्चे ठंड से ठिठुरेंगे.11 शिक्षकों और एक deputation पर बहाल शिक्षक 250 बच्चों को लगभग ठीक ठाक संभाल रहे हैं. इन शिक्षकों के अपने परिवार पर यहाँ नहीं रहते. staff quarters नहीं है.

सबसे बड़ी समस्या जो दिखी वह है किसी अस्पताल का न होना और डाॅक्टर का न आना. विधालय में भी डाॅक्टर महीने में एक बार ही आते हैं. पहाड़ी से नीचे एक आयुर्वेद का छोटा अस्पताल जरूर है.

टीम में कुमार चंद्र मार्डी, अरविंद अंजुम, अंकित, विकास, आलोक, दीपक रंजीत और निशांत अखिलेश शामिल थे।

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