नर्मदा बचाओ आंदोलन : विस्थापन और मुआवजे की मांग को लेकर डूब प्रभावितों ने निकाली चुनौती रैली


भोपाल, मध्य प्रदेश | 4 मई 2017; नर्मदा नदी को अब गंगा, यमुना जैसे ही मानवी रूप में देखना जब म.प्र. के राजनेता भी घोषित कर रहे हैं तब मॉ नर्मदा की गोद में पले लाखों मानवों को, उसी के बेटे-बेटीयों को मात्र कीड़े-मकोड़े जैसे जबरन् हटाने की व ध्वस्त करने की बात राज्य और केन्द्र शासन मिलकर आगे बढ़ा रही है। कितना विरोधाभास कि हर सप्ताह में एक या दो दिन, लाखो रूपये खर्चकर मुख्यमंत्री, अपने कर्मचारी, अधिकारी, प्रशासन के और सार्वजनिक वित्तीय संसाधनों के भी निवेश के बलपर, नर्मदा यात्रा कर रहे हैं, तब घाटी के ही हजारों लोगों को अपने जीने-मरने की हकीकत को लेकर भोपाल पहुंचना पड़ा है।

नर्मदा यात्रा के दौरान बडवानी तहसील की आमसभा में सवाल करने वालों की गिरफ्तारी तथा कुक्षी तहसील में, हेलिपेड पर मात्र 5 से 10 मिनट बात करके, विस्तृत बातचीत करने का आश्वासन देने वाले मुख्यमंत्री जी से अब हमारे यहां पधारने पर कोई प्रतिसाद नहीं। पिछले 15 सालों में कभी भी संवाद न करने वाले मुख्यमंत्री जी आज भी भोपाल से बाहर हो गये है।

9 मई के दिन नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण की बैठक में सरदार सरोवर गेटस् बंद करके, 138.68 मीटर तक पानी भरने का सोचने वाली शासन को घाटी से आये लोग आज अपनी “संकल्प सभा” द्वारा चुनौती और चेतावनी देगे जरूर।

सर्वोच्च अदालत के आदेश में भूमिहीनों के लिए तथा पूर्व में 5.5 लाख रू. का अनुदान लिये किसानों के लिए कोई लाभ नहीं।

जब सरदार सरोवर डूब क्षेत्र के म.प्र. के 192 गाँव व 1 नगर में 60 प्रतिशत जनसँख्या भूमिहीनों की है, उन्हें वैकल्पिक आजीविका का पूर्ण आश्वासन एक्शन प्लान द्वारा म.प्र. शासन व नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण सुप्रीम कोर्ट में 1993 से दे चुका है आज तक मात्र 33,000/-  या 49,000/-  रू. में, उसमें भी भ्रष्टाचार के साथ, देकर उन्हें फंसाया गया है। मछुआरों का मछली पर, कुम्हारों का जलाशय के किनारे मिट्टी पर मजदूरों का रोजगार निर्मिती पर आग्रह है, अधिकार है।

जिन्हें पूरा अनुदान देकर जमीन का हक छोड़ने के लिए मजबूर किया, एनवीडीए, म.प्र. के राजनेता और शिकायत निवारण प्राधिकरण के द्वारा दबाव डाला गया, उन्हें भी नहीं बक्शा और अब भाजपा के ही नेता उन्हें लेकर सुप्रीम कोर्ट गये है।

सबसे गंभीर बात है भरे पूरे गाँवों की। 31 जुलाई 2017 के पहले हजारों घर, सैकडों मंदिर-मस्जिद, लाखों पेड़, शालाएं, धर्मशालाएं......... सब कुछ हटना या बलपूर्वक हटाना न्याय नहीं हो सकता है। “बिना पुनर्वास डूब नहीं” यही सिद्धांत, नीति और कानून है - यही संवैधानिक और न्यायपूर्ण होगा।

सरदार सरोवर क्षेत्र की नर्मदा घाटी की, जनता विकास की अघोरी, अमानवीय अवधारणा के खिलाफ है। जीविका और जीने का अधिकार चाहती है। किसानों के साथ भूमिहीनों को न्याय और करोड़ों के भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए संघर्षरत् है।

सर्वोच्च अदालत के आदेश से क्या खोया, क्या पायाः वक्त तय करेगा।

फरवरी 8, 2017 के सर्वोच्च अदालत के आदेश से 681 किसानों को 2 हेक्टेयर जमीन के लिए 60 लाख (शासन के 5.5 लाख के 2005 से चलते आये अनुदान के बदले) और फर्जी रजिस्ट्री घोटाले में फंसाये गये 1358 किसान परिवारों को, प्राप्त अनुदान की कटौती के साथ 15 लाख रू. प्राप्त होने हैं का सिलसिला शुरू हो चुका है। अपने दावे, आवेदनों के साथ विस्थापितों को शिकायत निवारण प्राधिकरण के समक्ष पेश होने के लिए बडवानी, धार के घाटी की जनता को हर तहसील से चक्कर काटने पड़ रहे हैं। आदेश के बाद नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के कोर्ट में पेश किये “अंदाजित संख्या” की सूची उपलब्ध नहीं थी। सूचना के अधिकार के तहत भी “अंदाज सूची-परिवर्तन संभव” लिखकर ही प्राप्त हुई। फर्जी घोटाले में फंसाये लोगों की संख्या, झा आयोग के सामने पेश की रजिस्ट्रयों की संख्या में गड़बड़ी है और पुनर्वास नीति तथा ट्रिब्यूनल फैसले (कानून) और सर्वोच्च अदालत के तमाम फैसलों का पालन पूर्णतः करने की न.घा.वि.प्रा / म.प्र. शासन की मंशा ही नहीं है। शि.नि.प्रा. उन्हीं पर अधिक निर्भर है।

विस्थापितों के हकों के लिए 31 सालों से संघर्षरत आन्दोलन ने ही शि.नि.प्रा. को “शपथपत्र” का नमूना बदलवाने, कोर्ट के आदेश अनुसार मिलने की राशि से वर्षों पहले प्राप्त भू-अर्जन के मुआवजे की रकम की कटौती करने से रोकने में कामयाबी पायी। आज भी पूर्व अनुदान की एक किश्त लेने वालों को पूरे 60 लाख मिलेंगे या नहीं, 2 हेक्टेयर से अधिक 4, 6 या 8 हेक्टर्स तक जमीन डूब में आने वाले किसानों की पात्रता कितनी? आदि मुद्दों पर जवाब बाकी है। हजारों आवेदन शि.नि.प्रा. के समक्ष प्रलंबित आहेत शि.नि.प्रा. ने पारित किये वर्ष 2000 से लेकर आज तक 17000 आदेशों में से कई सारे अमल में नहीं आये है।

पुनर्वास स्थलों पर निर्माण कार्य में पहले हुए करोड़ों के भ्रष्टाचार की पोलखोल झा आयोग ने करवायी, व IIT, मुंबई व MANIT, भोपाल के जांच रिपोर्ट से हुई। अब सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि पुनर्वास स्थल निर्माण में शि.नि.प्रा. के आदेश के बाद उच्च न्यायालय में जाने की सर्वोच्च न्यायालय ने छूट विस्थापितों को ही दी है, शासन को नहीं। लेकिन अभी अभी नए कार्य के लिए टेंडर्स निकल रहे है....

क्या इस स्थिति में 40,000 से अधिक परिवार डूबाये जा सकते है?
सरदार सरोवर बाँध से मध्यप्रदेश का कैसा हित?

जाहिर है कि म.प्र. के हजारों करोड़ (कम से कम 6000 करोड़) के पूंजीनिवेश के बावजूद एक बूंद पानी राज्य को सरदार सरोवर बाँध से नहीं मिलने वाला।मध्यप्रदेश को आज बिजली की जरूरत नहीं है, इसलिए तो कई जलविद्युत योजनाएं,  “बिजली की खपत नहीं” कहकर बंद रखी गयी है।

मध्यप्रदेश की अतिउपजाउ कृषि भूमि और एक अभूत, अनोखी संस्कृति, पुरातत्व भी डूबाकर, हरेभरे गावों को उजाड़कर आखिर पानी तो गुजरात में कोकाकोला, कार फैक्ट्री को देना क्या राज्य की जनता, किसान, मजदूर, आदिवासियों की अवमानना नहीं?

“नर्मदा सेवा यात्रा”  में पर्यावरण, प्रदूषण की बात करते हुए, क्या मुख्यमंत्रीजी इतने अनभिज्ञ है,  कि बडे बांधों से हो जलप्रदूषण, जंगल और कृषि विनाश के साथ बाँध के नीचे नर्मदा खत्म होकर समुंदर का अंदर घूसना वे नहीं जानते? क्या वे नर्मदा को बांधकर, मानवी ही नहीं माता के रूप में आजतक जीवित इस सबसे पुरानी व पवित्र नदी की हत्या, अवैध अंधाधुध रेतखनन से नदी को नौंचना और जलचक्र बरबाद करना विनाशकारी नहीं मानते?

पुनर्वास और पर्यावरणीय कार्य पूरे होने के पहले अगर बाँध के गेट्स लगाने का निर्णय केंन्द्र-राज्य सरकारों ने लिया तो हम चुनौती लेंगे और देंगे भी, यही संकल्प है हमारा।



संपर्क: राहुल यादव 9179617513






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