सरदार सरोवर बांध : हजारों जानों की बलि देने को तैयार मोदी सरकार


दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सरदार सरोवर बांध की वर्तमान ऊंचाई के मुताबिक मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के कुल मिलाकर 245 गांव और ढाई लाख लोग पुनर्वास के अभाव में बाढ़ व तबाही का सामना करेंगे, जिसमें ज्यादातर आबादी आदिवासी समुदाय की है। इससे 20,882 हेक्टेयर उपजाऊ जमीन, वन क्षेत्र, नदी क्षेत्र डूबेगा .आंदोलन कर रहे लोगों का कहना है कि अभी तक तो नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (एनवीडीए) ने विस्थापित होने वाले लोगों की अंतिम सूची ही तय नहीं की है तो फिर काहे का पुनर्वास और काहे की पुनर्बसाहट। लेकिन नर्मदा का विकास करने को आतुर एनवीडीए लोगों की खातिर बाँध में पानी भरना स्थगित नहीं करना चाहता। चाहे लोग डूबें या जान लेकर बदहवास भागें, विकास होकर रहेगा। हम यहां आपके साथ नर्मदा बांध परियोजना तथा उसके विरुद्ध चल रहे जनांदोलन पर विनीत तिवारी का एक विस्तृत लेख साझा कर रहे है;

सरदार सरोवर बाँध के मामले में अलग-अलग मौकों पर राज्य सरकारें ये हलफनामा दायर कर चुकी हैं और झूठी साबित हो चुकी हैं कि नियम के मुताबिक सबका पुनर्वास हो गया, सबको ज़मीन के बदले ज़मीन मिल गयी और अब डूब में आनेवाले सैकड़ों गाँव डुबोने में कोई समस्या नहीं है। खुद सरकार की भी अनेक समितियों ने ऐसे हलफनामों को झूठा पाया है। और इस बार भी उनका कहना यही है कि नियमानुसार सबका पुनर्वास हो चुका है, सभी विस्थापित इतने अच्छे सर्व सुविधायुक्त पुनर्वासस्थलों पर बसाये जाने से बेहद प्रसन्न हैं और धन्य महसूस कर रहे हैं।  इस बारिश में फिर सरकार आमादा है कि सरदार सरोवर बाँध को पूरी ऊंचाई तक भरा जाए।

विकास के नाम पर वर्षों से स्थानीय ग्रामीणों-आदिवासियों के जीवन को उजाड़ा जाता रहा है। हम इस विनाश के खिलाफ लोगों के हक़-अधिकारों के संघर्षों में साथ रहे हैं। सांगठनिक तौर पर भी हमारे अनेक वरिष्ठ लेखकों ने इस लड़ाई में वक़्त-वक़्त पर अपना किरदार निभाया है चाहे वो बरगी बाँध का मसला रहा हो या महेश्वर, इंदिरा सागर, मान, या अन्य बाँधों का।  मैंने व्यक्तिगत तौर पर भी नर्मदा बचाओ आंदोलन और नर्मदा घाटी के लोगों से बहुत कुछ सीखा है। जन आन्दोलनों में संयम, दृढ़ता और सांगठनिक ताक़त तो सब सीखते ही हैं लेकिन विश्व स्तर पर पर्यावरण की, प्राकृतिक संसाधनों की लूट की भूमंडलीकृत राजनीति का जो नया दौर आया है, उसके बारे में भी जाना-समझा। कुछ ज़िंदगी भर के बेहतरीन तजुर्बे, बेहतरीन दोस्त, बेहतरीन प्रेरणाएँ मुझे भी नर्मदा घाटी ने तोहफ़े में दीं।

कोई ज़्यादा पेचीदा सवाल भी नहीं रहे हमारे। चलिए, मान लेते हैं कि ५ लाख साल पुरानी नर्मदा घाटी में जीवन विज्ञानं के उपयोग के अनेक सूत्र बाँध में डूब जाएंगे तो कोई नुक्सान नहीं होगा। ये भी मान लेते हैं कि पहाड़ों, जंगलों, वनस्पतियों, आदिवासियों, वन्य जीवों पर भी बाँध का बुरा असर पड़े तो पड़े, आखिर बदलना तो सबको ही पड़ता है। और ये भी मान लेते हैं कि वाकई जो हो रहा है, वो विकास ही है, भले कुछ लोगों के लिए हो। तो भी इतना तो सवाल फिर भी उठता ही है कि जिनका सबकुछ छीना जा रहा है, उनके लिए जीने के क्या इंतजाम किये हैं। और अगर नहीं किये तो इसके लिए क्या उन लोगों को ही अपराधी कहा जा सकता है जो इस अन्याय के खिलाफ और अपने हक़ के लिए आंदोलन का रास्ता चुनते हैं? फिलहाल स्थिति ये है कि अगर आप सरदार सरोवर परियोजना से प्रभावित या विस्थापित हैं तो जो मिल रहा है वो लीजिये और अगर कुछ भी नहीं मिल रहा है तो भी अपना सामान समेटकर भागते बनिए और ख़ैर मनाइये कि ज़िंदगी के इस मोड़ पर आपको इन दो मुहावरों का जीवन के यथार्थ वाक्यों में प्रयोग करना आ गया कि भागते भूत की लंगोटी ही सही और जान बची तो लाखों पाए।

विस्थापितों और प्रभावितों के साथ सरकार ये रवैय्या है कि सर्वोच्च न्यायायलय के निर्देशों और फैसले को पूरी तरह ताक पर रखकर बिना मुनासिब पुनर्वास व्यवस्थाएँ किये ही, बिना मुआवजों का निपटारा किये ही बाँध के गेट बंद कर दिए जाएँ और लोग मजबूर होकर अपने गाँव और ज़मीन छोड़ दें। सरकार के मुताबिक अकेले मध्य प्रदेश में ऐसे परिवारों की संख्या 15000 से ज़्यादा है जबकि नर्मदा बचाओ आंदोलन के मुताबिक अगर महाराष्ट्र और गुजरात के भी प्रभावितों को जोड़ा जाए तो ये संख्या करीब 40 हज़ार है। सर्वोच्च न्यायलय का आदेश है कि सरकार 8 मई, 2017 तक पुनर्वास का काम पूरा कर ले, लेकिन अभी तक मुआवजे, पुनर्वास के हज़ारों मामले अटके पड़े हैं। आदेश ये भी है कि अगर समुचित मुआवजे और पुनर्बसाहट की प्रक्रिया के  बाद भी कोई अगर डूब क्षेत्र से न हटे तो उन्हें 31 जुलाई, 2017 के बाद सरकार पुलिस के मार्फ़त बलपूर्वक हटाया जाएगा। आंदोलन कर रहे लोगों का कहना है कि अभी तक तो नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (एनवीडीए) ने विस्थापित होने वाले लोगों की अंतिम सूची ही तय नहीं की है तो फिर काहे का पुनर्वास और काहे की पुनर्बसाहट। लेकिन नर्मदा का विकास करने को आतुर एनवीडीए लोगों की खातिर  बाँध में पानी भरना स्थगित नहीं करना चाहता। चाहे लोग डूबें या जान लेकर बदहवास भागें, विकास होकर रहेगा।

हमने किश्तों-किश्तों में नर्मदा घाटी को उजड़ते देखा। सिर्फ देखा नहीं, रोकने की कोशिश भी की। इस उजाड़ने की प्रक्रिया के खिलाफ बनते कोशिश लड़े भी और लड़ेंगे भी। बल्कि कहना चाहिए कि जो लोग लड़ रहे हैं, हम उनके संघर्ष में साथ रहे भी और रहेंगे भी । लेकिन इस तीस साल से ज़्यादा उम्र की हो चली लड़ाई में हमने अनेक पहाड़ियां खो दीं, कितनी ही पगडंडियाँ और पेड़ डूब गए और सबसे ज़्यादा ख़तरनाक तो ये कि नर्मदा घाटी के तमाम विस्थापित लोगों ने अपने किसान होने की, खेतों में मज़दूर होने, मछुआरा होने की पहचानें खो दीं। अब उनमें से बहुत सारे महानगरों में बेरोज़गार मज़दूरों की फ़ौज का एक सांवला सा बिन पहचान वाला हिस्सा भर बचे हैं। ये लोकतंत्र की आड़ में छिपा कौन सा तंत्र है जिसने बारिश तक को लोगों का दुश्मन बना दिया। इस बार की बारिश भी कुछ पहाड़ों को, पहाड़ियों पर बसे घरों को, पेड़ों को और डुबोना चाहेगी, और लीलना चाहेगी लेकिन फिर भी कुछ लोग हैं जो घुटने नहीं टेकेंगे, जो इस आवाज़ को थकने नहीं देंगे कि 'चालू छे भई चालू छे, अमरी लड़ाई चालू छे।'

बेशक लोगों के लड़ने का हौसला और जज़्बा कम नहीं है। तीस साल में तीन पीढ़ियों ने लड़ाई को आगे बढ़ाया है। और उस हौसले ने, हर लड़ाई ने, हर पेड़, पहाड़, खेत ने अपने होने के निशान वहाँ के लोगों के चेहरों पर, उनकी आवाज़ में दर्ज किये हैं। उन्हें देखने, उनसे मिलने और उनके हौसलों को सलाम करने जाना चाहिए।  5 जून से 7 जून 2017 तक की नर्मदा घाटी की यात्रा का आह्वान है और इसमें जो साथी जा सकते हों, ज़रूर जाएँ और अपने अन्य साथियों को भी प्रेरित करें।

मैं समझता हूँ कि ये यात्राएँ उनके लिए ज़रूरी हैं जो "दुनिया को बदला जा सकता है", इस वाक्य में अपना भरोसा बचाए रखना चाहते हैं। नर्मदा घाटी आपको अनेक चीज़ें सिखाती है। अव्वल तो ये कि क़ुदरत, प्रकृति वहाँ रहने वाले लोगों से कोई अलग चीज़ नहीं है। कोई सोचे कि वो नदी का पानी बचा लेगा और नदी किनारे के इंसान मर जाने देगा तो गलत सोचता है। एक पूरा पारिस्थितिकी तंत्र विकसित होता है पता नहीं सैकड़ों या हज़ारों या लाखों वर्षों में। दूसरी चीज़ ये कि दुनिया में इंसान से ज़्यादा समझदार और परोपकारी कोई नहीं तो इंसान से बड़ा शातिर अपराधी भी कोई और नहीं। तीसरी बात ये कि देर कभी भी नहीं होती, हक़ के लिए लड़ना एक लगातार बहती नदी है फिलहाल तो (जब तक समाजवाद न आ जाये), उसमें आप चाहे जब शामिल हो सकते हैं। और चौथी बात ये कि दुनिया में कोई ऐसा बाँध नहीं जो लोगों पर होने वाले ज़ुल्म के खिलाफ उठने वाले गुस्से को ज़्यादा वक़्त तक रोके रख सके। और ये भी कि अगर दुनिया को बदशक्ल बनाने की कोशिशों में कुछ लोग दुनिया भर में हैं तो सबके लिए एक सुन्दर दुनिया का ख़्वाब हकीकत में बदलने की कोशिशें करने वाले लोग भी दुनिया भर में हैं और उनसे कई गुना ज़्यादा हैं। मीडिया की साज़िशों की वजह से वे अक्सर या तो दीखते ही नहीं हैं और अगर कभी - कभार ख़ुदकुशी करते किसानों, उजाड़ी जाती बस्तियों में, दंगों में मारे या घायल होने वालों में या सीरिया की जंगआलूदा ज़मीन पर या बस्तर के ज़ुल्म के ख़िलाफ़ चीखने या ख़ामोशी से सब कुछ कह डालने वाले आदिवासियों में या देश-दुनिया के हर कोने और हर हिस्से में कुचले जाते और शोषण का शिकार बनते आम लोगों, मज़दूर, मेहनतकशों की भीड़ में वो दिख भी जाएं तो ज़्यादातर अखबारों, चैनलों में वे विकास की राह में रोड़े बनाकर ही दिखाए जाते हैं।

नर्मदा घाटी हो या अफ्रीका या दुनिया के दूसरे छोर पर मौजूद क्यूबा, यहां हमें अदम्य जिजीविषा से भरे लोग मिलते हैं, जिनसे मिलकर हम भी थोड़े और मानवीय, थोड़े और मज़बूत इंसान हो जाते हैं।

ये रूस में हुई क्रांति की सौवीं सालगिरह का वर्ष भी है। उस क्रान्ति ने दुनिया को ये सीख दी थी कि दुनिया जैसी है, वो वैसी ही नहीं बनी रहती। कुछ लोग उसे अपने फायदे के लिए बदलने की कोशिश में लगे रहते हैं बाकी लोगों की ज़िंदगियों को दाँव पर लगाकर। और जिन लोगों की ज़िंदगी दाँव पर लगाई जाती है, वो भी उसे बदल सकते हैं -  सारी दुनिया की बेहतरी के लिए। उस क्रांति को सलाम कहने के अनेक मौकों में से एक मौका ये भी है कि हम ऐसी लड़ाइयों का जितना संभव हो सके, हिस्सा बन सकें। हिस्सा बनना या न बनना भी बाद में तय करें, थोड़ा नज़दीक से जान ही सकें।

तो कोशिश कीजिये कि इस यात्रा में शामिल हों और अपने आसपास हो रहे इस भयंकर विनाश के खिलाफ जो लड़ाई चल रही है, उसमे अपना भी सहभाग करें।
विनीत तिवारी
 9893192740

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