मध्य प्रदेश : बिजली का जाल, जनता बेहाल, कम्पनी मालामाल


एशियाई विकास बैंक  (एडीबी) ने मध्य प्रदेश सरकार एवम विधुत मंडल के साथ विस्तृत नीतिगत हस्तक्षेप करते हुए मध्य प्रदेश विधुत सुधार अधिनियम 2001 बनवाया था । जिसका उद्देश्य चरणबद्ध बिजली का निजीकरण कर विधुत मंडल का विखंडन, विधुत दरो का युक्ति युक्तकरण, विधुत नियामक आयोग का गठन आदि करना था । इस कानून के कारण जहां बिजली के दाम हर वर्ष बढ़ने लगे वही बिजली पर जनता और द्वारा चुनी गई संस्थाओ का कोई नियंत्रण नहीं  रह गया है । एक तरफ तो प्रदेश की आम जनता बिजली के मंहगे दरों से त्रस्त है वहीं दूसरी निजी पावर कंपनियां बिजली उत्पादन के लिए प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों को खाक कर रहे हैं। हम यहां आपके साथ 'नई शुरूआत'  मध्य प्रदेश द्वारा तैयार यह रिपोर्ट साझा कर रहे हैं;

बिजली का क्षेत्र एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। एक ओर इससे करोड़ो लोगो को रोशनी मिलती है तथा दूसरी ओर खेती, धंधे, उद्योग भी काफी हद तक बिजली पर निर्भर है। आजादी के बाद संविधान निर्माता डाक्टर भीम राव अम्बेडकर ने "इन्डियन इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 1948" की रचना की जिसका उद्देश्य था "सभी को उचित दर पर बिजली उपलब्ध कराना"। भारत मे आजादी के बाद बिजली की व्यवस्था के लिए विधुत मंडलो का गठन किया गया। सन् 2002 तक इन मंडलो ने ही बिजली के उत्पादन, पारेषण एवम वितरण की जिम्मेदारी संभालते हुए जनता को बिजली उपलब्ध कराई। निजीकरण और वैश्वीकरण के दौर मे सभी क्षेत्रो की भांति बिजली (उर्जा) क्षेत्र मे बहुत तेजी से बदलाव हुए। विश्व बैंक, आईएमएफ, एशियाई विकास बैंक तथा बहुराष्ट्रीय कंपनीयो के दबाव मे तथाकथित "उर्जा सुधारो" को आगे बढ़ाया गया।

बहुराष्ट्रीय कम्पनीयो के दबाव मे कानूनी बदलाव 

विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक के दबाव मे केन्द्र सरकार द्वारा विधुत अधिनियम 2003 बनाया गया। जिसमे विधुत नियामक आयोग का गठन के अलावा प्रमुख निम्न उद्देश्य थे -
  1. विधुत मंडलो का विखंडन कर उत्पादन, पारेषण एवम वितरण कम्पनीयो का निजीकरण 
  2. विधुत दरो मे लगातार वृद्धि 
  3. निजी व विदेशी निवेश को प्रोत्साहन।
जहाँ 1948 का कानून उद्देश्य था कि "सेवा क्षेत्र" मे रखकर सभी को उचित दर पर बिजली उपलब्ध कराना, वही इन कानूनों का उद्देश्य बिजली को "लाभ (लूट) का धंधा" बना कर रोशनी सिर्फ अमीरो के लिए रखना।

मध्यप्रदेश मे बिजली का निजीकरण 

एशियाई विकास बैंक ने मध्यप्रदेश सरकार एवम विधुत मंडल के साथ विस्तृत नीतिगत हस्तक्षेप करते हुए मध्यप्रदेश विधुत सुधार अधिनियम 2001 बनवाया। जिसका उद्देश्य विधुत मंडल का विखंडन, विधुत दरो का युक्ति युक्तकरण, विधुत नियामक आयोग का गठन आदि। इस कानून के कारण जहां बिजली के दाम हर वर्ष बढ़ाने होगे वही बिजली पर जनता और द्वारा चुनी गई संस्थाओ का कोई नियंत्रण नही होगा। इस कानून के प्रारूप पर विधानसभा मे भी कोई चर्चा अथवा सुझाव नही लिए गए।

उर्जा विभाग के अनुसार 2007 से 2011 के बीच राज्य सरकार ने 91160 मेगावाट विद्युत उत्पादन के 75 अनुबंध निजी क्षेत्र की बिजली कंपनियो से कर रखे हैं। योजनाकारो ने सरकार के सामने बिजली की मांग मे अभूतपूर्व वृद्धि के आंकड़े प्रस्तुत कर गुमराह किया है और उसे इतने अधिक करार करने की राह पर डाल दिया है कि सरकारी बिजली संयंत्रो का अस्तित्व खतरे मे पड़ गया है। मांग के फर्जी आंकड़ो की वजह से ही सरकार ने आँख बंद कर बिजली खरीदी के करार किये और बिजली की दरे व समझौता शर्ते भी मान्य की, जिसमे निजी थर्मल कंपनीयो का हित अधिक था। केन्द्र सरकार की टैरिफ पालिसी इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 2006 के अनुसार निजी कम्पनी के साथ प्रतिस्पर्धात्मक बोली के आधार पर बिजली खरीदी होगी तथा सरकारी कम्पनियो को इसमे पांच साल की छूट दी गई। परन्तु प्रदेश सरकार ने इस नियम के विरुद्ध 5 जनवरी 2011 को पांच निजी कम्पनियो से 1575 मेगावाट विधुत क्रय अनुबंध 25 साल के लिए किया जो पूरी तरह गैर कानूनी था। अनुबंध इन शर्तो के अधीन है कि बिजली खरीदे अथवा न खरीदे फिक्स चार्ज के रूप मे 2163 करोड़ रुपए देने ही होगे। बिजली की मांग नही होने के कारण बगैर बिजली खरीदे विगत तीन साल मे नवंबर 2016 तक 5513.03 करोड़ रुपए निजी कम्पनियो को भुगतान किया गया।

इसे हम निम्न उदाहरण से समझे 
  1. 2016-17 मे जेपी पावर से 14.2 करोड़ यूनिट बिजली के लिए 478.26 करोड़ रूपए का भुगतान हुआ यानि प्रति यूनिट 33.68 रूपए तथा झाबुआ पावर प्लांट से 2.54 करोड़ यूनिट के लिए 214.02 करोड़ रुपए का भुगतान हुआ यानि 84.33 रूपये प्रति यूनिट की कीमत आय।
  2. विधुत नियामक आयोग के विरुद्ध वितरण कम्पनियो (डिस्कॉम) ने 2013-14 मे बिजली खरीदी मद से जो 1903.69 करोड़ रुपए अधिक चुकाए, उसकी एक वजह निजी क्षेत्र की बिजली कम्पनीया लेंको, बीएलए, जेपी बीना व सुजान से प्रति यूनिट 3.12 से 9.56 रूपये की उंची दर पर 460.92 करोड़ यूनिट खरीदी कर महज 2.96 रूपये प्रति यूनिट की दर पर 262.8 करोड़ यूनिट बाहरी प्रदेशो को बेचा।
  3. जनवरी 2017 तक बीते दस महिनो मे प्रदेश के सभी बांधो मे पर्याप्त जलराशी उपलब्ध रहने के बावजूद अपेक्षित बिजली पैदा नही कर सके। गौरतलब है कि बांधो से बिजली उत्पादन 38 पैसे प्रति यूनिट आती है जबकि निजी थर्मल पावर कम्पनीयो से सरकार 3.68 रूपए प्रति यूनिट की दर से खरीदती है। बांधो से बिजली उत्पादन नही होने से सरकार ने निजी कम्पनीयो से जो बिजली खरीदी ,उसके लिए उन्हे 557 करोड़ का भुगतान करना पड़ा। इसी बिजली को यदि गांधीसागर, बरगी और बाणसागर से बनाया जाता तो इसकी लागत 57 करोड़ ही आती, यानि सरकार को 500 करोड़ रुपए की बचत होती।

बढ़ता घाटा, बढ़ती देनदारीयां 

मध्य प्रदेश पावर जनेरेटींग कम्पनी मे व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण अमरकंटक,संजय गांधी, सतपुड़ा एवम सिंगाजी पावर प्लांटो की कार्यक्षमता 40 प्रतिशत से भी कम हो गई है। कोयले की कीमत से ज्यादा परिवहन खर्च, काम की मूल लागत से कई गुना अधिक दर पर दिये गये ठेको, लाइजनिंग व कमीशन एजेंट के चलते कोयले के साथ आई करोड़ो रूपये की मिट्टी व पत्थर तथा अनाप-शनाप खर्च ने इनकी बिजली उत्पादन की प्रति यूनिट लागत अधिक होने के कारण मेरिट आर्डर डिमांड (सबसे कम बोली लगाने वाले) से बाहर हो गई है। पिछले चार साल मे मैनेजमेंट कम्पनी को 9288 करोड़ रुपए का घाटा हुआ है, जिसकी भरपाई बिजली दर बढाकर 1.35 करोड़ उपभोक्ताओ से की जा रही है। सरकार का यह निर्णय भी परेशान करता है कि प्रदेश के बाहर 2.60 रूपये की दर से बिजली बेच रही है तथा प्रदेश मे 3.10  से 6.60 रूपये की दर से घरेलू उपभोक्ताओ को बेच रही है। जबकी कृषि, उद्योग, गैर घरेलू, व्यावसायिक उपभोक्ताओ को आठ रूपये प्रति यूनिट की महंगी बिजली दे रही है। देश मे सबसे मंहगी बिजली प्रदेश की जनता को लेने के लिए बाध्य किया गया है।

दूसरी ओर मध्य प्रदेश सरकार द्वारा विधुत वितरण कंपनी को इस वर्ष के बजट मे 7 हजार 361 करोड़ देना प्रस्तावित है तथा कृषि उपभोक्ताओ को निशुल्क अथवा सस्ती बिजली प्रदाय हेतु अनुदान मद मे 8 हजार 736 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। जहां विधुत दर बढाई जा रही हो, वहीं कम्पनीयों को अनुदान देकर उपभोक्ताओं पर भार डाला जा रहा है। अनुदान की राशी भी कर्ज लेकर जुटाई जा रही है।

बिजली की उपलब्धता एवम मांग की सच्चाई -

मध्य प्रदेश मे बिजली की अधिकतम मांग 11501 मेगावाट तथा औसत मांग 8 से 9 हज़ार मेगावाट है।पारेषण क्षमता 14100  तथा उपलब्धता 17500 मेगावाट है। अगले दो साल मे प्रदेश के हिस्से की 4637 मेगावाट विद्युत मिलेगी तो क्षमता 20000 मेगावाट से अधिक हो जाएगी वो भी तब जब सरकारी प्लांट की 11 इकाई को अनुबंध की मजबूरी के कारण बंद रखा जा रहा है।

राख से खाख होते समुदाय और संसाधन 

उर्जा राजधानी के रूप मे प्रसिद्ध सिंगरौली के आसपास 21 हजार मेगावाट विद्युत उत्पादन हेतु करोड़ो टन कोयला जलाया जाता है। जिससे लगभग 35 लाख टन राख निकलता है। हरित न्यायाधिकरण की रिपोर्ट के मुताबिक 17 हजार टन सल्फर डायआकसाइड और नाइट्रोजन आक्साइड जैसी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक गैस हवा मे तैरने के साथ ही हर साल 8.4 हजार लीटर मर्करी भी पावर प्लांटो से निकल रहा है जो पानी के साथ मिलकर घातक रोगो का कारण बन रही है। थर्मल पावर प्लांट मे इस्तेमाल होने वाले कोयला के कारण आदिवासी क्षेत्र मे खनन हेतु जबरन बेदखली की जा रही है। प्रदेश सरकार निजी थर्मल कम्पनीयो के हित मे किसानो की उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण, जलाशय एवम नदियो से जल आबंटन तथा कोयला और अन्य संसाधन उपलब्ध कराने हेतु जनता को तबाह कर रही है। जेपी पावर प्लांट, निगरी, सिंगरौली ने गोपद नदी पर बिना मंजूरी के बांध बना कर पानी ले रहा है तथा प्लांट से निकलने वाले कचरे को नीचे की तरफ नदी मे छोड़ रहा है। इसी प्रकार मोजर बेयर (हिन्दुस्तान पावर प्लांट) जैतहरी, अनूपपुर में सोन नदी पर बांध बनाकर पानी का इस्तेमाल कर रहा है। इसी प्रकार नर्मदा नदी के किनारे चुटका परमाणु संयंत्र, झाबुआ पावर प्लांट, एस.एल.एस एनर्जी, एस.ई.डब्ल्यू, टुडे एनर्जी होम्स, एनटीपीसी (गाडरवारा), एनटीपीसी (खरगोन) एवम सिंगाजी पावर प्लांट लगाने का कार्यक्रम चल रहा है। ये सभी संयंत्र नर्मदा नदी से पानी लेकर नर्मदा को राख से खाख करने मे लगे हैं।

विकल्पो की संभावना 

अमेरिका के इंजीनियर किंग हर्बट ने 1956 मे दावा किया था कि कोयला, पेट्रोल, गैस आदि दूसरे जीवाश्म जैसे सभी प्राकृतिक संसाधन 150 साल बाद खत्म हो जाएगें। इन सभी संसाधनो से बिजली उत्पादन के कारण जलवायु परिवर्तन की समस्या विकराल रूप धारण कर लिया है। अतः हमे वैकल्पिक उर्जा स्रोत जैसे सौर, पवन तथा  बायोमास की तरफ जाना ही होगा। अभी नवकरणीय उर्जा का उत्पादन 12288 मेगावाट हो गया है। हमारे उर्जा  जरूरतो मे बिजली की हिस्सेदारी मात्र 15 प्रतिशत है। हमे शेष बचे उर्जा स्रोतो की ओर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए ।

हमारी मांगें 
  1. अधिक खर्च के कारण सलाना 30470 करोड़ कमाने के बाद भी पावर मैनेजमेंट कम्पनीयो को 1603 करोड़ के घाटे की जांच स्वतंत्र एजेंसी से कराया जाए।
  2. प्रदेश की जनता के हित मे निजी कम्पनियो से किए गए विधुत खरीदी अनुबंध तत्काल रद्द किया जाए।
  3. वितरण, ट्रांसमिशन, जनेरेटींग तथा मैनेजमेंट को विखंडित किया गया है, उसे फिर से एक किया जाए।
  4. सरकारी प्लांटो की कार्य क्षमता में सुधार तथा भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा कर उसे कारगर बनाया जाए।
  5. प्रदेश सरकार द्वारा पावर मैनेजमेंट कम्पनी को आम उपभोक्ताओ एवम किसानो को सस्ती बिजली देने हेतु अनुदान दिया जा रहा है, फिर भी मंहगी दर ली जा रही है। इस बढे दर को तत्काल प्रभाव से कम किया जाए।


नई शुरूआत
(जन आन्‍दोलनों का राष्‍ट्रीय समन्‍वय मध्‍य प्रदेश)

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