मोदीजी, ये ज़मीन की नीलामी नहीं किसानों की लाशों का कारोबार है !


"बहुत हुआ किसानों पर अत्याचार अबकी बार मोदी सरकार" के नारे के साथ 2014 में केंद्र में आ मोदी सरकार के नारों और वायदों का खोखलापन ढाई साल में खुलकर सामने आ चुका है। 2015 में करीब 3000 किसानों ने आत्महत्या की थी जो कि अब तक की सबसे बड़ी संख्या है। इन बीते ढाई सालों में 3200 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। नवंबर के महीन में जब पूरा देश नोटबंदी से त्रस्त था ठीक उसी समय बड़ी ही बेशर्मी के साथ सरकार ने 63 उद्योगपतियों का 7016 करोड़ रुपए का ऋण एक झटके में माफ कर दिया जबकि हमारे देश के किसान 2-3 लाख का लोन भी न चुका पाने की हालत में आत्महत्या कर ले रहे हैं।

इसी सिलसिले में सबसे हालिया खबर आई है राजस्थान के झुन्झुनू जिले के सौंथली गांव के दलित किसान नागर मल मेघवाल की जिन्होंने 21 फरवरी को खेती के लिए बैंक से लिये कर्ज को नहीं चुकाने की वजह से फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली। नागर मल मेघवाल की लाश अभी दफन ही नहीं हुई कि कि 22 फरवरी को सुलतान हरिजन की खेती के लिये कर्ज की वजह से जमीन नीलम करने के लिये सीकर जिले की नीमकाथाना तहसील के गांवली गांव मे सरकारी अमला पहुंच चुका है।  नीलामी के भय से सुलतान गांव से पलायन कर गया है।

राजस्थान के झुंन्झुनु जिले की इन दो घटनाओं ने सरकार की कॉर्पोरेट पक्षधर तथा जनविरोधी चरित्र को स्पष्ट रूप से हमारे सामने रख दिया है। सरकार एक तरफ तो विजय माल्या जैसे भगोड़े उद्योगपतियों को कर्ज बिना किसी शर्त माफ कर रही है वहीं दूसरी तरफ पहले से ही तबाह कमजोर किसानों की जमीनों को नीलाम करने के लिए बकायदा सरकारी अमला पूरे लाव-लश्कर के साथ पहुंच रहा है।

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