गडचिरौली में विस्थापन विरोधी संघर्ष को मजबूत बनाने का ऐलान



पिछले कही सालों से सरकार निजी कंपनियों द्वारा महाराष्ट्र के गडचिरोली के सुरजागड, आगरी-मसेली, बांडे, दमकोंडवाही आदि जगहों पर लौह खनन चालू करने के प्रयास कर रही है. जिसका स्थानिक जनता जोरदार विरोध कर रही है. लोगो को बहकाने की, उन्हें खरीदने की हर एक कोशिश विफल होती देख विरोध करती जनता पर दमन किया जा रहा है। स्थानीय जनता का मानना है कि गडचिरौली के इन पहाड़ों और नदियों में उनके देवताओं का वास है जिसकी वजह से उनका अस्तित्व है। इन इलाकों में खनन का मतलब है न सिर्फ यहां के पर्यावरण का विनाश है अपितु उनकी समूल संस्कृति नष्ट हो जाएगी। और इसी लिए इस इलाके की स्थानीय जनता ने यह प्रण लिया है कि वह अपने इलाके में खनन किसी भी कीमत पर नहीं होने देंगे। सुरजागढ़ पहाड़ क्षेत्र में खनन के विरोध में विस्थापन विरोधी जन विकास आन्दोलन के बैनर तले 5-8 जनवरी 2017 को ठाकुर देव यात्रा तथा अधिकार सम्मेलन आयोजित किया गया। हम यहां पर आपके साथ इस कार्यक्रम पर महेश राउत की एक विस्तृत रिपोर्ट साझा कर रहे है;

हमें खदान नहीं चाहिए.. खदान पहाड़ और नदियों का विनाश है, खदान संस्कृती का विनाश है, खदान जल-जंगल-जमीन का विनाश है, खदान आदिवासियों एवं अन्य समुदायों का विनाश है...... खदान रोजगार और विकास नहीं पैदा करता.. खदान दलित, आदिवासी, गरीब और मेहनतकश के फायदे के लिए नहीं है...बल्कि खदान, अमिर पूंजीपतियों, दलाल नेतायों, भ्रष्ट अधिकारियों के मुनाफे और फायदे के लिए है ..खदान लुट के लिए है.” सुरजागड़ पहाड़ क्षेत्र में आयोजित ठाकुर देव यात्रा और अधिकार सम्मेलन में "हमें खदान नहीं चाहिए" के नारे में विस्थापन विरोधी संघर्ष को मजबूत बनाने का हुआ ऐलान.

जल-जंगल-जमीन, डोंगर-पहाड, नदी-नाले ये ही हमारी असली संपदा है, इन्ही नदी-पहाड़ो में हमारे भगवान है, हमारे श्रद्धास्थल है. वन संसाधनों पर आधारित रोजगार और देवी-देवतायों के सहवास के वजह से ही यहाँ की संस्कृती और आदिवासींयों की संपन्नता टिकी हुई है. विकास के नाम पर पुरे गडचिरोली जिल्हे में अगर खदाने होती है तो भारी मात्र में वन नष्ट हो जायेंगे.स्थानिक आदिवासी एवं अन्य समुदायों को विस्थापन की मर जेलानी पड़ेगी. इसीलिये गडचिरोली जिल्हे में शुरू की गयी और प्रस्तावित सभी खदानों को तुरंत रद्द किया जाये ये ऐलान गडचिरोली जिल्हे के एटापल्ली तहसील में सुरजागड़ पहाड़ क्षेत्र मेंआयोजित "ठाकुर देव यात्रा, सुरजागड़ वार्षिक महोत्सव एवं अधिकार सम्मेलन" में किया गया. विस्थापन,जनविरोधी विकास नीतियों के खिलाफ जनतांत्रिक संघर्ष को और भी मजबुत बनाने का हुआ आगाज. संस्कृती की रक्षा के लिए, जल-जंगल-जमीन,संसाधनों पे अधिकार के लिए, जन केन्द्रित विकास के निर्माण के लिए, मुक्ति के संघर्ष को आगे ले जाने का संकल्प हजारों की तादात में जमा हुयी जनता द्वारा लिया गया.


गडचिरोली जिल्हे के एटापल्ली तहसील के सुरजागड़ क्षेत्र में सुरजागड़ की पहाड़िया स्थानिक आदिवासी एवं अन्य समुदायों के लिए महत्वपूर्ण पूजा स्थल है. इन्ह पहाडियों में मुख्य पहाड़ पर इस क्षेत्र के प्रमुख 'ठाकुर देव' का पूजा स्थल और अन्य प्राकृतिक पूजा स्थल है. कितने शताब्दीयों से स्थानिक आदिवासी एवं अन्य समुदाय यहाँ पर हर साल पूजा के लिए सम्मलित होते है. इस सुरजागड़ पहाड़ का यहाँ के स्थानिक समुदायों के परंपरा, संस्कृती, धार्मिक रचना में महत्वपूर्ण स्थान है. साथ ही १८५७ के अंग्रेज साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष के गडचिरोली क्षेत्र के महान शहीद वीर बाबुराव शेडमाके के गढ़ के रूप में 'सुरजागड़'पहाड़ की ऐतिहासिक पहचान है. उस समय के ऐतिहासिक अवशेष आज भी इस पहाड़ पर उपलब्ध है जो वीर बाबुराव शेडमाके के क्रांतिकारी इतिहास को आज भी बया करते है. लोगो के अस्तित्व का इस पहाड़ के अस्तित का सीधा संबंध है. पर अब इस पहाड़ का ही अस्तित्व ख़तम करने के लिए सरकार प्रयास कर रही है.

पिछले कही सालों से सरकार निजी कंपनियों द्वारा गडचिरोली के सुरजागड, आगरी-मसेली, बांडे, दमकोंडवाही आदि जगहों पर लोह खनन चालू करने के प्रयास कर रही है. जिसका स्थानिक जनता जोरदार विरोध कर रही है. लोगो को बहकाने की, उन्हें खरीदने की हर एक कोशिश विफल होती देख विरोध करती जनता पर दमन किया जा रहा है. लोग समझ के संगठित न हो पाए इसीलिए दलाल जनप्रतिनिधियों द्वारा लोगो को गुमराह किया जा रहा है. पर स्थानिक जनता अपनी संस्कृती, संसाधनों की रक्षा में मजबूती से संघर्ष कर रहे है.

जनविरोधी खनन प्रयासों और हिंसक विकास प्रक्रिया का पुरजोर विरोध कर रहे स्थानिक जनता के तरफ से सुरजागड़ पारंपरिक इलाखा गोटुल समिती, एटापल्ली तहसील के सभी ग्रामसभायों और जिल्हे के अन्य क्षेत्रों के सहयोग से हर साल के तरह इस साल भी "ठाकुर देव यात्रा, सुरजागड वार्षिक उत्सव एवं अधिकार सम्मेलन" का आयोजन ५,६,७,८ जनवरी २०१७ किया गया था. चार दिनों तक चली इस ऐतिहासिक संघर्षमयी यात्रा और सम्मलेन में सुरजागड़ क्षेत्र के ७० गावों के साथ-साथ गडचिरोली जिल्हे के तोड़सा, वेनहारा, झाड़ा-पापडा, भामरागड एवं अन्य विभिन्न इलाकों से लोग सम्मलित हुए. इस यात्रा एवं सम्मलेन में स्थानिक जनता के साथ-साथ अन्य जगहों के जन संगठनो, राजनैतिक दल, बुध्दिजीवी, संशोधक सहभागी हुए.

यात्रा के पहले दिन श्याम को पारंपरिक पूजा द्वारा शुरुवात की गयी. रात्रि में पारंपरिक नृत्य, सांकृतिक कार्यक्रम चले. दुसरे दिन'जल-जंगल-जमीन और संसाधनों पे अधिकार, विस्थापन के सवाल' पर मुख्य चर्चा एवं जाना सभा का आयोजन किया गया.जिसमे स्थानिक जनता के साथ-साथ विस्थापन विरोधी आन्दोलन कर्मियों, राजनैतिक दलों ने अपनी भूमिका रखी. सुरजागड़ एवं अन्य जगहों पर खदाने आवंटित करते वक्त पेसा और वन अधिकार कानूनों का उलंघन किया गया है. ग्रामसभायों के अधिकारों को नकारते हुए ये खदाने आवंटित किये गए. निजी कंपनियों को मुनाफा कमाने के लिए स्थानिक जनता के संसाधन कौड़ियो के दम पर बेचे जा रहे है. आदिवासियों के पूजा स्थल, पवित्र पहाड़ नष्ट किये जा रहे है. इसी कारन सुरजागड़ खदान के साथ-साथ गडचिरोली में प्रस्तावित सभी खदाने तुरंत रद्द किये जाये और सभी एम्.ओ.यु. निरस्त किये जाये ये भूमिका चर्चा में राखी गयी. मुख्य चर्चा सभा में प्रास्ताविक भूमिका विस्थापन विरोधी जन विकास आन्दोलन के केन्द्रीय समिति सदयस्य महेश राउत ने राखी. सभा में सुरजागड़ क्षेत्र के भूमिया और प्रमुख गायतायों ने अपनी भूमिका रखी. झाड़ा इलाका के प्रतिनिधि बावसु पावे, भामरागड क्षेत्र से लालसू नरोटे और राजश्री लेखामी, महाराष्ट्र ग्रामविकास जनांदोलन के और से जयश्री वेळदा, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अमोल मारकवार और डॉ. महेश कोपुलवार इन्होंने अपनी बात रखते वक्त आदिवासी क्षेत्र की संस्कृती, पारंपरिक व्यवस्था की रक्षा के लिए, जल-जंगल-जमीन और संसाधनों की रक्षा कर स्थानिक संसाधनों पर आधारित रोजगार निर्माण हेतु गडचिरोली जिल्हे में शुरू की गयी और प्रस्तावित सभी जन विरोधी खदाने तुरंत रद्द किये जाये ये मांग रखी. सभा का संचालन रामदास जराते और संपूर्ण क्षेत्र के और से आभार सैनु गोटा इन्होंने किया.

श्याम को ग्रामसभायों द्वारा जल-जंगल-जमीन पर अधिकार के संघर्ष पर गीतों और नृत्य प्रस्तुत किये गए. तीसरे दिन'ठाकुर देव','मराई छेड़ो', 'भीमा पेन' आदि प्राकृतिक पेनों की पूजा की गयी, और सुरजागड़ पहाड़ पर चढ़कर पहाड़ के चोटी पर स्थित 'ठाकुर देव' के मुख्य पूजा स्थल पर ठाकुर देव को बलि चढाकर पूजा की गयी. साथ में वीर बाबुराव शेडमाके के संघर्ष से जुड़े इस पहाड़ के ऐतिहासिक जगहों पर पूजा कर वीर बाबुराव शेडमाके के क्रन्तिकारी संघर्ष को याद किया गया. यात्रा के आखरी दिन सुबह पेसा-वनाधिकार और ग्रामसभा मजबूतीकरण के मुद्दों पर ग्रामसभायों की चर्चा सभा चली. फिर सुरजागड़ और अन्य क्षेत्र के सम्मलित हुए पारंपरिक प्रमुखों द्वारा सभा लेकर ठाकुर देव के सरक्षण में खदान विरोधी संघर्ष को मजबूत बनाने का ऐलान किया गया. फिर पारंपरिक आखरी पूजा द्वारा "ठाकुर देव यात्रा, सुरजागड़ वार्षिक महोत्सव एवं अधिकार सम्मलेन"का समापन किया गया.

आदिवासी एवं अन्य समुदायों की सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक प्रथा, परंपरा, बोलीभाषा, देवी-देवता, जल-जंगल-जमीन,संसाधन और वन आधारित शास्वत रोजगार और विकास के निर्मण के लिए गडचिरोली जिल्हे की सभी खदाने रद्द कर दी जाये,इस प्रमुख मांग के साथ साथ - आदिवासी क्षेत्र की संस्कृती-परंपरा रक्षण, -पेसा-वन अधिकार कानून का ओर प्रभावी अमल, -जनता के लोकतांत्रित आन्दोलन पर पुलिसि दमन का विरोध. और अन्य मुद्दों को लेकर सभा में भूमिकाये रखी गयी और विस्थापन के खिलाफ आन्दोलन को और भी मजबूत बनाने का आवाहन किया गया.

सम्पूर्ण यात्रा विस्थापन के विरोध, पूंजीवादी लुट खिलाफ संघर्ष, ग्रामसभायों के अधिकारों को लेकर सामूहिक संघर्ष को मजबूत बनाये एक ऐतिहासिक पहल के रूप में उभर कर आई.

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