महाराष्ट्र : गड़चिरौली में ग्रामसभाओं का ऐलान जीवन और संस्कृती बचाने के लिए जान देंगे पर पहाड़ नहीं देंगे


महाराष्ट्र के गड़चिरौली जिले में जहां पर एक दर्जन से ज्यादा खदानें प्रस्तावित हैं। इन खदानों की वजह से उस इलाके के हजारों परिवारों पर बेघर होने का खतरा मंडरा रहा है साथ ही साथ वहां के पर्यावरण के नष्ट होने का खतरा भी है। इन खदानों का स्थानिक जनता जोरदार विरोध कर रही है। लोगो को बहकाने की, उन्हें खरीदने की हर एक कोशिश विफल होती देख विरोध करती जनता पर दमन किया जा रहा है। गड़चिरौली जिले के एटापल्ली में 4 और 5 दिसंबर, 2016 को तोडसा इलाका पारपरिक गोटूल समिति और एटापल्ली तालुका के सभी ग्रामसभाओ की ओर से "पारंपरिक सांस्कृतिक महोत्सव और ग्रामसभा सम्मलेन" का आयोजन किया गया। जिसमे कोरची, धानोरा, भामरागड, गडचिरोली, चमोर्शी, कुरखेडा, चमोर्शी, मुलचेरा तालुका के कई इलाको से ग्रामसभाओ के प्रतिनिधि भी सामिल हुए । इस सम्मलेन में ग्रामसभायों  ने एलान किया कि हम सभी लोग आज ये शपथ लेते है की अपना जीवन और संस्कृती बचाने के लिए हम अपनी जान देंगे पर पहाड़ नहीं देंगे. और ये ऐलान भी करते है की सुरजागड खदान के साथ साथ दमकोंडवाही, बांडे, मंगेर, आगरी मसेली खदानों को हम गैरकानूनंन घोषित करते है. और सरकार को ये सभी खदाने और अन्य प्रस्तावित खदाने रद्द करने का आवाहन करते है। हम यहां पर महेश राउत की विस्तृत रिपोर्ट साझा कर रहे हैं;



एटापल्ली में ४ और ५ दिसंबर, २०१६ को गडचिरोली जिले के एटापल्ली तालुका के सुरजागड, तोडसा इलाका पारपरिक गोटूल समिति और एटापल्ली तालुका के सभी ग्रामसभाओ की ओर से "पारंपरिक सांस्कृतिक महोत्सव और ग्रामसभा सम्मलेन" का आयोजन किया गया. जिसमे कोरची, धानोरा, भामरागड, गडचिरोली, चमोर्शी, कुरखेडा, चमोर्शी, मुलचेरा तालुका के कई इलाको से ग्रामसभाओ के प्रतिनिधि भी सामिल थे. इस सम्मलेन में ग्रामसभायों के निर्णयों पर अपना समर्थन घोषित कर विभिन्न जनसंगठनों , राजनैतिक दल सहभागी हुए.

ग्रामसभा सम्मलेन का उद्देश निसर्ग और आदिवासी संस्कृती का संबंध, उसकी भूमिका और महत्वपूर्णता को दर्शाना था. जल, जंगल, जमीन में आदिवासीओ के देव बसे हुवे हे और सदियोसे आदिवासी उनकी रक्षा करते आये है इसीलिये आज महाराष्ट्र में देखे तो अन्य जगहों की तुलना में सिर्फ गडचिरोली के आदिवासी इलाको में ही घना और फलों, फूलों, पंछी, प्राणियो से भरा जंगल दिखाई देता है. चूँकि जंगलो के इन्ही जल, पेड़, पहाड़, पंछी, प्राणी से आदिवासियो के टोटेम है जिससे उनके विश्वास और श्रद्धाये जुडी हवी है. इस निसर्ग को आदिवासियो ने अपने नृत्य, कला, गाने, पूजा में जिन्दा रखा है.

इस जंगल से सिर्फ यहाके आदिवासी ही नहीं बल्कि अन्य परंपरागत वननिवासीयोका भी संबंध रहा है. सिर्फ आदिवासियों की संस्कृती के अलावा सम्पूर्ण ग्रामसभाओ का रोजगार और आजीविका इसी जल, जंगल, जमीन पर निर्भर है. इसी निसर्ग में मौजूद संसाधनों से जुड़े हुवे संबंधो और रिश्तो पर हमारी भाषा और ज्ञान विकसित है. जिस पर सामाजिक और सांकृतिक संरचना के साथ आर्थिक और राजकीय व्यवस्था प्रकर्यशील है. इसी संरचना के ढाचे को देखते यहाकी ग्रामसभाये आदिवासी और अन्य समुदायों के विकास की परिभाषा प्रस्तुत करते है जिसमे मौजूदा संसाधनों पर आधारित आदिवासी और संस्कृती को बनाये रखने वाली शास्वत उपजीविका निश्चित है.

लेकिन पिडिओं से पूंजीपतियो की ये सरकार हमें लुटती आयी है और विकास के नामपर कई प्रकल्पो के लिए आदिवासियों को विस्थापित कर हमारी ही संस्कृती और जीवन को नष्ट कर रही है. इसी का प्रारूप गढ़चिरोली जिले में भी ये सरकार अमल करना चाहती है. विकास के नाम पर खदानों के कई प्रकल्प गडचिरोली में सरकार ने मंजूर किये है और अन्य स्थानों पर खदान प्रस्तावित है. जिससे हजारो लोगो का विस्थापन होने वाला है. इन खदान प्रकल्पो के लिए ग्रामसभाओ की अनुमति सरकार ने लिए बिनाही प्रकल्प मंजूर कर दिए है. सुरजागड खदान इसीका उदहारण है. आज इस सम्मलेन में इस पुरे क्षेत्र की जनता खुदका जाहीरनामा प्रस्तुत करती है. और सरकार, प्रशासन, गडचिरोली के पालकमंत्री को ये आवाहन कराती है की वोह स्थानिक जनता के भूमिका पे अमल करे.

1. सुरजागड, दमकोंडवाही, बांडे, मंगेर, आगरी मसेली खदानों को हम गैरकानूनंन घोषित करते है. और सरकार को ये सभी खदाने और अन्य प्रस्तावित खदाने रद्द करने का आवाहन करते है.

सुरजागड इलाका जिसमे ७० ग्रामसभाये सामिल है 'सुरजागड पट्टी' के नाम से जाना जाता है. यहा की सभी ग्रामसभाये सामाजिक और सांस्कृतिक संबंधो से बंधी हुयी है जहा उनकी एक विभिन्न राजकीय संरचना विकसित है. अपनी पारम्परिक व्यवस्था को बनाये हुवे ये सभी ग्रामसभाये पेसा और वनहक्क कानून की अंमल कर रहे है जिससे ग्रामसभाओ की आय में बढ़ोतरी हुवी है. लेकिन सरकार ने यहाँ 'लायड्स स्टील' को खदान को ग्रामसभाओ की अनुमती के बिना ही मंजूरी दे दी है. जिसका आधार लिए कंपनी खदान चालू कर संसाधनों का दोहन कर रही है. इस बिच रोजगार के नाम पर लोगो मे संभ्रम बनाने के लिए जूठी अफवाये फैला रही है जिसका लिखित रूप से कोई दस्तावेज नहीं है. आदिवासियों एवं स्थानियों की शैक्षणिक स्थितिको ध्यान में लिए देखते है की, उन्हें कोई महत्वपूर्ण रोजगार कम्पनीद्वारा मिलने वाला नहीं है. और रोजगार की मात्रा भी कम है. ऐसी स्थिति में ग्रामसभाओ की अनुमति लिए बिना खदान प्रकल्प को मंजूर कर लोगो का विस्थापन करके उनका जीवन नष्ट करना पेसा, वनहक्क कानून और संवैधानिक अधिकारो के खिलाफ है.

पेसा क्षेत्र में कोई भी नया प्रकल्प चालू करने के लिए ग्रामसभा की अनुमती लेना कानूनन जरुरी होता है. इसलिए इस प्रकल्प का काम बंद कर इसकी मान्यता रद्द की जाये. हम यहाँ उपस्थित सारी ग्रामसभाये और सभी इलाका के लोग इसका विरोध करते है. अगर काम बंद नहीं हुवा तो हम आन्दोलन को और भी मजबूत करेंगे. हम सभी लोग आज ये शपथ लेते है की अपना जीवन और संस्कृती बचाने के लिए हम अपनी जान देंगे पर पहाड़ नहीं देंगे. और ये ऐलान भी करते है की सुरजागड खदान के साथ साथ दमकोंडवाही, बांडे, मंगेर, आगरी मसेली खदानों को हम गैरकानूनंन घोषित करते है. और सरकार को ये सभी खदाने और अन्य प्रस्तावित खदाने रद्द करने का आवाहन करते है.

2.हम अपनी संस्कृती, परंपरा को ख़तम नहीं होने देंगे - हम अपने देव नहीं बेचेंगे.

दूसरी महत्वपूर्ण बात सुरजागड सिर्फ संसाधनों से भरा पहाड़ नहीं है जिसे बेच पैसा कमाना एकमात्र उद्देश हो. उस सुरजागड पहाड़ी में हमारा आदिवासियों का देव "ठाकुर देव" का पूजास्थल है. दमकोंडवाही में तलोर मोत्ते, बड़ा पेमोर, मराई छेड़ो और अन्य पेन के पूजास्थल है. जिससे पीडियो से स्थानिको की और इलाके के लोगो की श्रद्धाये और विश्वास जुड़े है. इसी पर आधारित उनकी धार्मिक-सांस्कृतिक संरचना विकसित हवी है. अगर इस खदान में ये सभी पूजास्थल नष्ट कर दिए जायेंगे तो ये आदिवासी और आदिवासी संस्कृती का नियोजित खून होगा. इसलिए इन सभी प्रकल्पो का हमसभी ग्रामसभाकी जनता विरोध करते है. नियमगिरी में भी जब प्रकल्प के लिए आदिवासियों को विस्थापित कर उनके पहाड़ नष्ट करने वाले थे तब सर्वोच्च न्यायलय ने ग्रामसभा की संस्कृती के बचाने के पक्ष में फैसला देकर कंपनीको ग्रामसभा की अनुमती के बिना काम करनेपर रोक लगाई थी. इसीलिये गडचिरोली में मंजूर और प्रलंबित सारी की सारी खदान प्रकल्प बंद किये जाये. अन्यथा सारे गडचिरोली जिले में इसके खिलाफ कड़ा आन्दोलन किया जायेगा और सारी परिस्थिति को सरकार जबाबदेही रहेगी. हम ये शपथ लेते है की हम अपनी संस्कृती, परंपरा को ख़तम नहीं होने देंगे - हम अपने देव नहीं बेचेंगे.

3. पेसा और वन अधिकार कानून का प्रभावी अमल होना ही चाहिए - ये भिक नहीं हमारे अधिकार है.

आज गडचिरोली जिले में सम्पूर्ण भारत में सबसे ज्यादा पेसा और वनहक्क कानून पर ग्रामसभाये अंमल कर रही है. जिस पर आधारित तेंदू, बाम्बू जैसे गौण वनोपजो के संकलन से ग्रामसभाओ की रोजगार में बढ़ोतरी हवी है. इसके अलावा महुवा, आवला, हीरडा, बेहड़ा, जामुन, इमली जैसे अन्य वनोपज भी आय में मदत करते है. अलग अलग दिनों में मिलने वाले फल, सब्जिया पोषण देने का काम करती है साथमे जंगल से मिलने वाली दवाईया बिमारी से बिना खर्चे में इलाज करने में मदत करती है. उपरी सभी चीजो का इस्तेमाल कर रोजगार को बढ़ावा दिया जाये तो खदान से सरकार को मिलने वाली लीज और रोजगार से कई ज्यादा लोगोको रोजगार उपलब्ध होगा. लेकिन हमसेही अलग अलग राजकीय पार्टियों अंतर्गत चुने हुवे दलाल नेता हमारीही नैसर्गिक संपदा को बेचने और हमारी संस्कृती को नष्ट करने में लगे है. हमारे चुने हुवे नेता लोगोके साथ में रहने का ढोंग दिखाकर कुछ लोगो को साथ में लिए पूंजीपतियों के लिए कम कर रहे है. ऐसे ढोंगी और दलाल नेताओ को हमने अभी पहचान लिया है. इनका नाटक सबके सामने आ गया है. इसलिए ऐसे राजकीय नेताओ इ फासे में ना आकर इस बार जो लोगोके प्रश्नों को, खदान के विरोध को, पेसा वनाधिकार की प्रावधानों को अंमल में लेन के लिए ग्रामसभाओ के साथ कम करेगा उसी लोगो को हम अपना नेता चुनेंगे.

वापिस मुद्दे की बात करते हुवे जो ढोंगी नेता प्रकल्प यहाँ करने के बात करते है और लोगोको भड़काते है हम उनसे दूर रहेंगे और उसका विरोध करेंगे. सभी खदान प्रकल्पो का हम यहाँ विरोध करते है. और हमारी आदिवासी क्षेत्र के विकास के लिए स्थानिक संसाधनों पर आधारित, गौण वनोपजो पर आधारित अपनी संस्कृती को संरक्षित रखनेवाली अपनी पारंपरिक अर्थव्यवस्था को पेसा और वनाधिकार की अंमल कर शास्वत बनायेंगे. और इसको हनी पहुचाने वाली सभी कृतियों का विरोध करेंगे.

4. जनता के लोकतान्त्रिक संघर्ष पर पुलिसि दमन का हम पुरजोर विरोध करते है.

महत्वपूर्ण बात कल जो हमा 'पारंपरिक सांस्कृतिक महोत्सव एवं ग्रामसभाओ का सम्मलेन" में जो लोग दुरदुर गावोसे लोग आ रहे थे उनको पुलिसों ने रोखे रखने के लिए अलग-अलग कारन दिए और कार्यक्रम में आने नहीं दिया. हर बार जब जब ग्रामसभाये अपनी संस्कृती और अधिकारों की बात करने, चर्चा करने इकठ्ठा होती है पुलिस दमन कर लोगोको डराने की कोशिश करती है, कार्यक्रमों में आनेसे रोकती है. कल हेन्ड्री पुलिस स्टेशन पर लोगोको आगे की पुलिया पर "आगे बॉम्ब है" बोल कर दिन भर रोके रखा जिससे कार्यक्रम के लिए आ रही जनता को परेशानियां झेलनी पड़ी.

ऐसी स्थिति में संघर्ष कर रहे लोगो पर क़ानूनी कारवाई की जाती है. कुछ चुनी हुयी धाराये लगाई जाती है और सामाजिक कार्यकर्त्ता और ग्रामसभाके लोगोको जानबुज कर परेशान किया जाता है. सरकार को डर लगने लगा है की अगर लोग इकठ्ठा होंगे और उनके षडयंत्रो को समजेंगे तो उसका विरोध कराकर अपने संविधानिक अधिकारों की मांग करेगी. इसलिए हमें अपनी ग्रामसभाओ को और भी मजबूत बनाना है. इसके बाद किसीभी ग्रामसभा के किसी आदमी को पुलिस बिनाकाम के बुलाती है तो उसके खिलाफ महामहिम राज्यपाल, आदिवासी मंत्रालय, मा. राष्ट्रपती को पुलिस के खिलाफ ग्रामसभा में ठराव पारित कर तक्रार करे. और ग्रामसभा, इलाका, जिला, राज्य, राष्ट्र और अन्तरराष्ट्र स्तर पर इस दमन के खिलाफ आवाज मजबूत करे. जनता के लोकतान्त्रिक संघर्ष पर पुलिसि दमन का हम पुरजोर विरोध करते है.
ऊपर लिखित सभी मुद्दों पर हम एकजुट होकर लढने की शपथ लेते है.

जय सेवा, जय जोहर, जय भीम, इन्कलाब जिंदाबाद.
जल, जंगल, जमीन हमारा है
मावा नाटे - नाटे सरकार
जान देंगे पर पहाड़ नहीं देंगे
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