ब्रिक्स की जन विरोधी नीतियों को चुनौती देगा पीपल्स फोरम ऑन ब्रिक्स


गोआ, 14 अक्टूबर 2016; गोआ में 15-16 अक्टूबर 2016 को हो रहे ब्रिक्स देशों के राष्ट्राध्यक्षों के सम्मेलन के विरोध में आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन का 14 अक्टूबर को समापन हुआ। सम्मेलन इस नतीजे पर पहुंचा कि ब्रिक्स जिसका गठन दुनिया भर में साम्राज्यवादी शक्तियों के प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए हुआ था आज उन्हीं जनविरोधी नीतियों पर काम कर रहा है। ऐसे में ब्रिक्स देशों के जनांदोलनों की यह जिम्मेदारी बन जाती है कि वह न सिर्फ एक स्थाई विकास का वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत करें बल्कि एक राजनीतिक विकल्प भी तैयार करें जो कि ब्रिक्स जैसे मंचों पर जनहित में नीतियां बनाने के लिए दबाव बना सके।

गोआ में हुए पीपल्स फोरम ऑन ब्रिक्स ने ब्रिक्स के आठवें सम्मेलन में भाग ले रहे राष्ट्राध्यक्षों के लिए प्रस्ताव पारित किया।

गोआ, 14 अक्टूबर 2016: गोआ में 13 और 14 अक्टूबर को चल रहे पीपल्स फोरम ऑन ब्रिक्स में भाग लेने पहुंचे 10 देशों के विभिन्न जनसंगठनों तथा नागरिक समाज के 500 से अधिक प्रतिनिधियों ने गोआ में होने वाले आठवें ब्रिक्स सम्मिट के लिए प्रस्ताव पारित किया।

प्रस्ताव में ब्रिक्स देशों से सामाजिक आर्थिक और पर्यावर्णीय न्याय के मुद्दों की तरफ ध्यान देने की अपील की गई है और इसके साथ ही इन देशों की जनता द्वारा ब्रिक्स देशों की आम जनता द्वारा झेले जा रहे सामाजिक-आर्थिक-पर्यावर्णीय संकट की तरफ भी ध्यान दिलाया है।


फोरम ने दुनिया भर के देशों में साम्राज्यवादी तथा प्रतिक्रियावादी ताकतों द्वारा किए जा रहे लोकतंत्र पर हमले के बारे में चर्चा करते हुए ब्राजील में हाल ही में जनता द्वारा चुनी गई सरकार को हटाकर वहां पर कठपुतली सरकार बिठाने की घटना को संज्ञान में लिया गया। सम्मेलन में आए वक्ताओं ने ब्रिक्स देशों में चल रहे जनांदोलनों तथा छात्र संघर्षों पर हो रहे राज्य दमन पर विशेष जोर दिया। सम्मेलन में दुनिया भर में सरकारों के साथ मिलकर कॉर्पोरेट्स द्वारा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए जाने पर चर्चा की गई। गोआ, वह राज्य जहां ब्रिक्स का आठवां सम्मेलन हो रहा है खुद इसका सबसे बड़ा शिकार है।

फोरम में दुनिया भर में छाई आर्थिक मंदी की वजह से ब्रिक्स देशों द्वारा झेले जा रहे बाजार के संकट पर चर्चा की गई। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, घटते वैश्विक मुनाफे की दर तथा व्यापारिक निवेश में कमी पूंजीवाद के घनीभूत होते संकट को दर्शाता है खासकर की ब्रिक्स के उन तीन देशों में जहां की सकल घरेलू उत्पाद की दर ऋणात्मक रही है।

दुनिया भर में किसान-मजदूर अपने अधिकार लगातार खो रहे हैं। किसानों के आत्महत्या की दर में वृद्धि हो रही है जिसके परिणामस्वरूप ब्रिक्स देशों में मजदूरों और किसानों के संघर्षों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। भारत में 2 सितंबर को हुई राष्ट्रीय हड़ताल में 180 मिलियन मजदूरों की भागीदारी इसका जीता जागता उदाहरण है।
ब्रिक्स देशों के शासक वर्ग ने उन देशों में चल रहे जनांदोलनों के शांति, जनवाद, गरीबी उन्मूलन की मांगों को अपनी भाषा बना ली है किंतु उसके पीछे का दृष्टिकोण पूरी तरह से धूमिल कर दिया है। इन दो दिनों के सम्मेलन में हमने चर्चा द्वारा यह पाया कि ब्रिक्स के समर्थक विशेषज्ञों द्वारा गोआ में समावेशी और संयुक्त हल निकालने का दावा पूरी तरह से खोखला है।

ब्रिक्स, जिसका गठन दुनिया के प्रभुत्वकारी साम्राज्यवादी शक्तियों को चुनौती देने के लिए हुआ था, आज वह उन्हीं नीतीयों पर काम करता नजर आ रहा है जिस पर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व बैंक जैसी संस्थाएं काम कर रही हैं। ब्रिक्स् द्वारा स्थापित दो बैंक न्यू डेवलेपमेंट बैंक तथा एआईआईबी भी कॉर्पोरेट हितों को ध्यान में रखकर ही परियोजनाएं चला रही हैं। परियोजना के परिवर्णीय असर, सामाजिक दुष्प्रभावितों की आजीविका तथा प्रभावितों की सहमति को लेकर एनडीबी और एआईआईबी से जनमुखी नीति अपनाने की उम्मीद थी लेकिन ऐसा परियोजना क्षेत्र में दिखाई नहीं देता।

फोरम ने अपने सत्रों तथा कार्यशालाओं में चर्चा के दौरान ब्रिक्स की आलोचना की। किंतु विश्लेषण में यह भी निकल कर आया कि दुनिया में परिवर्तन सिर्फ और सिर्फ जनता की ताकत के दम पर ही आ सकता है। जनांदोलनों के सफल संघर्षों में कुछ मुख्य संघर्षों जैसे कि जीवन रक्षक दवाओं पर पेटेंट की समाप्ति- में अंतरराष्ट्रीय सहभागिता ने अपनी प्रमुख भूमिका अदा की। फोरम ने फिलस्तीन की जनता के साथ उनके उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष में एकजुटता व्यक्त की ।

गोआ के जेवियर सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल रिसर्च में एकत्रित हुए सामाजिक आंदोलनों तथा प्रगतिशील संगठनों ने अपनी सामाजिक, आर्थिक तथा पर्यावर्णीय न्याय की मांग की जीत का दावा किया। जनांदोलनों द्वारा बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा किए जा रहे उत्पीड़न, राज्य सुविधाओं को हासिल करने, अपनी जमीन की रक्षा तथा कृषि के कॉपरेटिव बनाने जैसे आंदोलनों की जीत ने फोरम में सकारात्मकता तथा जोश का संचार किया। 2017 के बाद ब्रिक्स पीपल्स फोरम ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका जैसे नए मिले सहभागियों के साथ अपने प्रयासों को पुनः सुदृढ़, तथा दुगना करेगा।

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