झारखण्ड में आदिवासी आक्रोश महारैली पर पुलिस फायरिंग : एक आदिवासी की मौत, दर्जनों घायल


खूंटी, 22 अक्टूबर 2016; एनटी-एसपीटी एक्ट के संशोधन प्रस्ताव के विरोध में विभिन्न आदिवासी संगठनों की ओर से रांची के मोरहाबादी मैदान में आहूत आक्रोश महारैली को रोकने के लिए प्रशासनिक तैयारियों का असर उल्टा पड़ गया। जिले में कई जगहों पर हिंसक झड़पें हुईं और आम जीवन अस्त-व्यस्त हो गया। मुरहू थाना के सैको में पुलिस को फायरिंग करनी पड़ी जिसमें मुरहू थाना के कोलचे निवासी अब्राहम सोय की मौत घटनास्थल पर ही हो गयी और दो महिलाओं सहित चार लोग गंभीर रूप से घायल हो गये। पेश है फजल अनुराग की रिपोर्ट;

झारखण्ड की राजधानी रांची में झारखंड आदिवासी संघर्ष मोर्चा के बैनर तले आदिवासी आक्रोश महारैली मोरहाबादी मैदान में आयोजन किया गया है. रैली में हजारों की संख्या में लोग उपस्थित हुए है. मोहराबादी में आयोजित इस रैली में 40 आदिवासी संगठनों ने हिस्सा लिया है. रैली में पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी भी मौजूद हैं. हमारे संवाददाता के अनुसार रैली में शामिल होने के लिए राज्य के विभिन्न जिलों से आने वाली कई गाड़ियों को प्रशासन ने रोक दिया है.

लोधमा में पुलिस द्वारा रोके जाने पर 1,000 लोग धरना पर बैठ गये हैं. वहीं खूंटी से करीब 150 गाड़ियां, रामपुर से 40 गाड़ियां, ओरमांझी से रैली में शामिल होने आ रहे 70 गाडियां, गेतलसूद से 30 गाड़ियां, चंदवा से 40 गाड़ियां को पुलिस ने रोक दिया. लोहरदगा से भी भारी संख्या में लोग रैली में शामिल होने रांची आ रहे थे लेकिन पुलिस ने रोक दिया है.खूंटी में पुलिस से प्रदर्शनकारियों ने मारपीट की है. इस मारपीट में एक सिपाही का सिर फट गया है. वहीं बिरसा चौक में बैरिकेट तोड़ा गया है. वाहनों को रोके जाने के मामले में प्रशासन ने बताया कि सिर्फ बड़े वाहनों को शहर के बाहर रोका गया है. पैदल आने वाले को प्रदर्शन के लिए रोका नहीं जा रहा है.

रैली के दौरान आठ बिंदुओं पर आधारित मांगपत्र सरकार के समक्ष रखा जायेगा 

इनमें, सीएनटी-एसपीटी एक्ट संशोधन अध्यादेश 2016 को वापस लेने, सरकार द्वारा जारी स्थानीय नीति में संशोधन करने, जमाबंदी रद्द करने का आदेश वापस लेने, दखल-दिहानी से संबंधित न्यायालय के आदेशों का अनुपालन सुनिश्चित करने, वन अधिकार के लिए दावेदारों द्वारा किये दावे के अनुसार पट्टा निर्गत करने, पेसा कानून 1996 को अक्षरश: लागू करने, सरना धर्म कोड लागू करने और अनुसूचित जाति एवं जनजाति आवासीय विद्यालयों को गैर सरकारी संस्थाओं को देने का फैसला वापस लेने की मांग शामिल है.





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