क्या बड़े विद्रोहों को आमंत्रण देगा बड़कागांव गोलीकांड?



जिस प्रकार पूरे देश में खनिजों के उत्खनन और जमीन पर कब्जे के लिए सरकार और कारपोरेट घरानों के गठजोड़ द्वारा आदिवासी बहुल क्षेत्रों में सारे कानूनों को ताक पर रखकर जमीनों पर कब्जा करने की कोशिश की जा रही है, उसी का विस्तारित रूप झारखंड के हजारीबाग जिला के बड़कागांव का क्षेत्र भी है। जमीन की लूट रोज ब रोज बढ़ रही है। किसानों से जबरदस्ती जमीन छीना जा रहा है। विरोध में उतरी जनता के उपर दमन बढ़ रहा है और लगातार ऐसे इलाकों का सैन्यकरण हो रहा है। इसलिए आज वक्त की जरूरत है कि जल-जंगल-जमीन को बचाने की लड़ाई लड़ रहे असली ताकतें एकजुट होकर इस भ्रष्ट राजसत्ता, कॉरपोरेट व सैन्य बलों के नापाक गठजोड़ को ध्वस्त कर अपना राज्य कायम करने की ओर आगे बढ़ें। बड़कागांव गोलीकांड जल-जंगल-जमीन को बचाने की लड़ाई में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है, बशर्ते यह अपनी ताकतों की पहचान कर व भ्रष्ट राजनेताओं के अवसरवादी चरित्र को उजागर करते हुए उसका भी भंडाफोड़ करे। 
स्वतंत्र पत्रकार रूपेश कुमार सिंह 

झारखंड के हजारीबाग जिलान्तर्गत बड़कागांव थाना के चीरूडीह में ‘‘कफन सत्याग्रह’’ पर बैठे सत्याग्रहियों पर 30 सितंबर की रात 2 बजे से कहर टूट पड़ी। 15 सितंबर की रात 2 बजे से सत्याग्रह पर बैठे सत्याग्रहियों का नेतृत्व कर रही कांग्रेस की निवर्तमान विधायक निर्मला देवी को 30 सितंबर की रात दो बजे पुलिस गिरफ्तार करने पहुंची थी। काफी तनातानी के माहौल में पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार तो कर लिया लेकिन बड़कागांव जाने के क्रम में सुबह छः बजे के आस-पास यानी की 1 अक्टूबर की सुबह छः बजे के आस-पास डाड़ीकला के पास ग्रामीणों ने पुलिस की गाड़ी रोक दी और फिर तो ‘‘बहादूर’’ पुलिस को गुस्सा आ गया। और चला दी उन्होनों अंधाधुंध गोलियां। जिसमें चार की लाश तो बरामद हुई, जिसमें कोई ट्यूशन पढ़ने जा रहा था तो कोई शौच करने। लगभग दो दर्जन लोग घायल हुए और कई लापता। ग्रामीणों के आक्रोश में पुलिस रिपोर्ट के अनुसार उनके भी 17 लोग घायल हुए। मालूम हो कि मारे गये लोगों में से कोई भी आंदोलन में शामिल नहीं था। वे लोग अपने विभिन्न काम में जाने के क्रम में या भीड़ में खड़े रहने के कारण मारे गए। क्योंकि गोली जब चलती है तो वह चेहरे को पहचानती तो है नहीं और वो भी भीड़ में चलाई गयी अंधाधुंध गोलियां।

इस घटना के बाद पूरे इलाके में लोगों का आक्रोश चरम पर है। जगह-जगह लोग सड़क पर ऊतर रहे हैं। हम सबों के जेहन में बस एक ही सवाल हलचल पैदा कर रही थी, क्या बड़कागांव गोलीकांड एक बड़े विद्रोह के शुरुआत का काम करेगी? या फिर झारखंड के ही गोला, देवघर, दुमका व लातेहार गोलीकांड की तरह इस खून का भी सौदा कर लिया जाएगा? क्योंकि बड़कागांव में गोली पहली बार ही नहीं चली है बल्कि पहले भी यहां की माटी अपने ही बेटों के खून से लहुलुहान हुई है। इससे पहले भी कई बार पुलिसिया गुंडागर्दी का तांडव बड़कागांव के विस्थापित देख चुके हैं। एक बार 24 जुलाई 2013 को, दूसरी बार 2015 में और तीसरी बार 17 मई 2016 को। लेकिन बार-बार इनकी बेइज्जती और शरीर पर बरसते हुए डंडे का और शरीर से बहते लहू का सौदा ही तो किया कुछ खद्दरधारियों ने। आखिर क्या हुआ कि राजनीतिक दलों के नेता कूदे तो जरूर आंदोलन में लेकिन एक-एक कर पीछे भी हटते गये। यह लिखने का मतलब ये कत्तई नहीं है कि हम इस आंदोलन के खिलाफ हैं, लेकिन आंदोलन कर रहे नेताआंें की पहचान जरूरी है। घड़ियाली आंसू बहाने वालों से सावधान रहने की जरूरत है, जो सिर्फ इसलिए आंदोलन कर रहे हैं कि उन्हें कम्पनी में कुछ शेयर मिल जाए, ऐसों की ओर अंगुली उठाना जरूरी है।

हम यह कत्तई नहीं भूल सकते हैं कि जो लोग आंदोलन में एकता की बात कर रहे हैं, उनके हाथ भी खून से सने हैं। केरेडारी और कोयलकारो के खून को क्या भूल पाएंगे हम? भाजपा, आजसू, कांग्रेस, झाविमो, झामुमो, राजद, जदयू, सपा और छद्म कम्युनिस्टों के सांठ-गांठ का भी पर्दाफाश जरूरी है। हम कैसे भूल सकते हैं कि तथाकथित विपक्ष ने भी अपने शासन काल में अपने राज्य में किसानों के खून की होली खेली है। जबरन भूमि अधिग्रहण से इनका भी नाता रहा है और क्या भरोसा कि कल जब ये फिर सत्ता में आएगें, तो ऐसे ही गोलीकांड नहीं रचाएगें और आज गोलीकांड रचानेवाले भाजपा-आजसू कल सड़क पर उतरकर विरोध नहीं कर रहे होंगे? हमें जरूर इन तल्ख सच्चाईयों से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए और आने वाले कल के लिए यानी कि एक बड़े आंदोलन के लिए तैयार होते समय हमें अपनी ताकत का सही आकलन करना चाहिए।

ड़ेढ दशक से पनप रहा है आक्रोश

झारखंड राज्य अलग बनने के बाद ही एनटीपीसी का एक बिजली घर चतरा जिला में बनना प्रस्तावित हुआ था और स्वाभाविक बात है कि बिजली घर बनेगा तो उसे कोयला चाहिए ही। तो कोल खनन के लिए चतरा, कोडरमा व हजारीबाग जिला के लगभग सत्तरह हजार एकड़ जमीन को अधिग्रहित करने की मंजूरी भी सरकार से मिल गयी, जिसमें कि लगभग पच्चीस सौ एकड़ जमीन वन भूमि है। जिस जमीन का कोल खनन के लिए अधिग्रहण होना तय हुआ वह लगभग सारी जमीन बहुफसली थी। इसलिए किसानों का विरोध लाजिमी था क्योंकि किसानों के पास अपनी जमीन के अलावा जीवीका का कोई भी साधन नहीं था, इसलिए यहां के प्रभावित ग्रामीणों ने जन्म भूमि रक्षा समिति व कर्णपूरा बचाओ संघर्ष समिति बनाकर 2004 से ही शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू कर दिया।

एनटीपीसी ने भी कर्णपूरा (पकरी-बड़वाडीह) कोल परियोजना के तहत किसानों की जमीन को जबरन छीनने के लिए कमर कस ली। मालूम हो कि कोल ब्लॉक आबंटन के समय एनटीपीसी ने अंडरटेकिंग दी थी कि उनके सब लीज में कोई दूसरी कम्पनी शामिल नहीं होगी यानी कि वो खुद माइनिंग काम करेगी। लेकिन बाद में आस्ट्रेलियन कम्पनी टीसमाइंस को कोल खनन का सब लीज दे दिया गया। जिसे सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद रद्द किया गया लेकिन बाद में गैरकानूनी तौर पर खनन कार्य का ठेका त्रिवेणी अर्थमूवर व त्रिवेणी सैनिक माइनिंग नाम की दो कम्पनियों को दे दिया गया। मालूम हो कि ये वही त्रिवेणी कम्पनी है जिसपर शाह कमीशन की रिपोर्ट में ओडिसा में अवैध खनन का आरोप लगाया गया है। खैर, जमीन अधिग्रहण के शुरूआत के साथ ही साथ आंदोलन भी अपने तेवर से आगे बढ़ रहा था।

बड़कागांव विधानसभा के लगभग छत्तीस गांव इस अधिग्रहण से प्रभावित होंगे और लगभग तीन हजार परिवार अपने घर से बेदखल हो जाएंगे। इसलिए सबसे अधिक विरोध भी यहीं हो रहा है और सबसे अधिक दमन भी इन्हें ही झेलना पड़ रहा है। कहा जाता है कि ये इलाका कोईरी, कुर्मी, और तेली बहुल इलाका है। इसलिए जब आंदोलन ने अपनी रफ्तार पकड़ी तो विभिन्न दलों के नेताओं ने भी अपनी दिलचस्पी बढ़ा दी और अपनी जातिगत चश्मे से आंदोलन को देखने लगे। इसका परिणाम यह निकला कि आंदोलनकारी अलग-थलग पड़ने लगे। नेता आंदोलन में आते तो थे अपने तेवर से  लेकिन एनटीपीसी प्रबंधन के जरिये जल्दी ही इनके मुंह को बंद करवा दिया जाता था। फलस्वरूप धीरे-धीरे इन राजनीतिक नेताओं का पर्दाफाश भी होने लगा।

हां, ये बात जरूर थी कि जब भी आंदोलन पर पुलिसिया हमले हुए, ग्रामीण एकजुट हो गये। चाहे वह 24 जुलाई 2013 के केरेडारी ब्लॉक के पगरा गांव में पुलिस द्वारा गोली चलाकर एक व्यक्ति की मौत और चार के घायल होने का मामला हो या 2015 में पुलिस द्वारा गोली चलाकर कई लोगों को घायल करने की घटना या फिर 17 मई 2016 को बड़कागांव के चिरूडीह, सोनबरसा, सींदुआरी, चूरचू, डाड़ीकला आदि गांवों में खनन का विरोध करने पर पुलिस द्वारा गांव में घुस कर लोगों को मारने-पीटने, यहां तक कि बच्चों बूढ़ों व गर्भवती महिलाओं को भी पीटने का मामला हो। इन बर्बर दमन अभियान के बाद भी फिर से सभी संगठीत हो जाते थे लेकिन इसका फायदा भी हर बार तीसरा पक्ष ही उठाता था। 17 मई के हमले के बाद भी यही हुआ था। जब 25 मई से 12 जून तक पूर्व भाजपा विधायक व वर्तमान आजसू नेता लोकनाथ महतो के नेतृत्व में ‘‘चिता सत्याग्रह’’ किया गया लेकिन डीडीसी के ठोस आश्वासन (2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के अनूसार जमीन अधिग्रहण करने के लिए 30 सदस्यीय कमिटी बनाना, जिसमें कि एम.पी, एम.एल.ए मुखिया, सरपंच व ब्लॉक एवं जिला स्तर के अधिकारी को भी शामिल किया गया और ग्रामीणों पर लाठी चार्ज की उच्चस्तरीय जांच टीम जिला मजिस्ट्रेट के नेतृत्व में बनाना) के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हो सका, क्योंकि आंदोलनकारी नेता व प्रशासन में अंदर-अंदर तालमेल हो गया।

जमीन का जबरन अधिग्रहण जारी रहा और आंदोलन भी अपने मंथर गति से आगे बढ़ रहा था। अब तक लगभग 9 सौ एकड़ जमीन का अधिग्रहण हो चुका है। जिसमें कि सही जमीन मालिकों तक (जो भी मुआवजा दिया जा रहा है) कम ही मुआवजा पहुंच सका है। वहां का आलम ये है कि जमीन किसी की, नोटिस किसी को ओर मुआवजा किसी को। पूरा लूट चल रहा है। लेकिन आंदोलनकारियों की मांग जस की तस है। जैसे- 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के अनुसार बाजार भाव से 4 गुणा कीमत बढ़ाकर मुआवजा, प्रभावितों को 26 प्रतिशत हिस्सेदारी, लीज का समय पूरा होने पर जमीन की वापसी, ग्राम सभा केे निर्णय के बाद जमीन अधिग्रहण, सीएनटी व एसपीटी एक्ट के अनुसार जमीन का अधिग्रहण। संविधान की धारा 39 बी भी स्पष्ट करता है कि किसी भी प्राकृतिक संसाधन पर वहां की ग्राम सभा का अधिकार है। यहां तक कि 8 जुलाई 2013 को जनरल अपील संख्या 4550/2000 की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी फैसला सुनाया है कि जमीन के नीचे जो भी खनिज है, उसपर जमीन मालिक का अधिकार है। इस सबके बावजूद भी भाजपा सरकार व पुलिस प्रशासन बड़ी बेशर्मी के साथ एनटीपीसी के द्वारा किये जा रहे जबरन भूमि अधिग्रहण के पक्ष में खड़ी है।

1 अक्टूबर का गोलीकांड और उसके बाद 

आंदोलनकारियों की पुरानी मांग को लेकर ही ‘‘बु़िद्धजीवी मंच’’ के बैनर तले निवर्तमान कांग्रेस विधायक निर्मला देवी 15 सितंबर से ‘‘कफन सत्याग्रह’’ पर बैठी थी और इसके 16वें दिन क्या हुआ आप शुरूआत में ही पढ़ चुके हैं। 1 अक्टूबर को जब पूरा देश दुर्गा पूजा की खुशियों में सराबोर होने को तैयार था, वहीं झारखंड के हजारीबाग जिले के बड़कागांव के डाड़ीकला, सोनबरसा, कनकीडाड़ी, चीरूडीह, नगड़ी, सींदुआरी, चेपाखुर्द आदि गांवों में चूल्हे तक नहीं जले। मृतक अभिषेक राय (17 साल) एवं पवन साव (16 साल) सोनबरसा गांव के थे। रंजन कुमार (17 साल) सींदुआरी गांव के थे और मेहताब अंसारी (30 साल) चेपाखुर्द गांव के थे। जहां अभिषेक राय, पवन साव व रंजन कुमार छात्र थे और ट्यूशन पढ़ने जा रहे थे। वहीं मेहताब अंसारी दैनिक मजदूर था, जो कि शौच करने जा रहा था। इनमें से कोई भी आंदोलन में शामिल नहीं था।

इस बर्बर गोलीकांड ने पूरे इलाके को सन्न कर दिया। गोलीकांड के दूसरे दिन पूरा इलाका पुलिस छावनी में तब्दील हो गया। प्रशासनिक खानापूर्ति के नाम पर मुख्य सचिव राजबाला वर्मा, डीजीपी डीके पांडे, गृह सचिव एन.एन पाण्डे सहित कई पुलिस अधिकारी 2 अक्टूबर को घटना स्थल पर पहुंचे तो जरूर लेकिन पीड़ित परिवार से मिलने के बजाय पुलिस अधिकारियों से मिलकर ही वापस लौट गये और उनके जाते ही रैफ (रैपिड एक्शन फोर्स) के आठ कम्पनी व सैकड़ों झारखंड पुलिस ने अपने पचास अधिकारियों के साथ प्रभावित गांवों पर हमला बोल दिया। लोगों को घर से निकाल-निकाल कर पीटा जाने लगा। कांग्रस के प्रदेश अध्यक्ष समेत कई नेताओं को घटनास्थल पर जाने से रोक दिया गया। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं व वाम दलों के नेताओं को जरूर जाने दिया गया ताकि आक्रोश ज्यादा ना बढ़े। 4 अक्टूबर को पूर्व मुख्यमंत्राी हेमंत सोरेन व बाबूलाल मरांडी को भी घटनास्थल पर धारा 144 का बहाना बनाकर जाने से रोक दिया गया।

इधर पूरे झारखंड में 5 अक्टूबर को कई राजनीतिक दलों ने बर्बर गोलीकांड के खिलाफ न्याय मार्च व जेल भरो आंदोलन की घोषणा की लेकिन मार्च में वाम दलों को छोड़कर किसी ने भी पूरी ताकत नहीं लगाई। विपक्ष की ओर से 19 अक्टूबर को बड़कागांव में संकल्प सभा व 24 अक्टूबर को झाारखंड बंद की घोषणा की गयी है। आदिवासी-मूलवासी संगठनों ने भी 12 नवंबर को झारखंड बंद की घोषणा की है।

इधर सरकार के तरफ से आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। कहा जा रहा है कि निवर्तमान विधायक के पति व पूर्व कृषि मंत्री ने अपने बेटे के कम्पनी को त्रिवेणी अर्थमूवर्स से ट्रांसपोर्टिंग एवं लोडिंग का कार्य दिलाने के लिए पत्र लिखा था लेकिन कम्पनी ने कोई जवाब नहीं दिया। फलस्वरूप विधायक अपने सहयोगियों के साथ ‘‘कफन सत्याग्रह’’ पर बैठ गयी। विधायक के पति व पूर्व कृषि मंत्री योगेद्र साव का विवादों से पूराना नाता रहा है। इनका मंत्री पद भी हथियारबंद संगठन खड़ा करके लेवी वसूलने के कारण ही गया था (ये हथियारबंद संगठन झारखंड टाइगर ग्रुप के निर्माणकर्ता भी है, जिसपर 7 अक्टूबर को प्रतिबंध लगाया गया)। इसलिए बेटे को ठेका दिलाने के आरोप से इंकार भी नहीं किया जा सकता है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि जिस प्रकार पूरे देश में खनिजों के उत्खनन और जमीन पर कब्जे के लिए सरकार और कारपोरेट घरानों के गठजोड़ द्वारा आदिवासी बहुल क्षेत्रों में सारे कानूनों को ताक पर रखकर जमीनों पर कब्जा करने की कोशिश की जा रही है, उसी का विस्तारित रूप झारखंड के हजारीबाग जिला के बड़कागांव का क्षेत्र भी है। जमीन की लूट रोज ब रोज बढ़ रही है। किसानों से जबरदस्ती जमीन छीना जा रहा है। विरोध में उतरी जनता के उपर दमन बढ़ रहा है और लगातार ऐसे इलाकों का सैन्यकरण हो रहा है। इसलिए आज वक्त की जरूरत है कि जल-जंगल-जमीन को बचाने की लड़ाई लड़ रहे असली ताकतें एकजुट होकर इस भ्रष्ट राजसत्ता, कॉरपोरेट व सैन्य बलों के नापाक गठजोड़ को ध्वस्त कर अपना राज्य कायम करने की ओर आगे बढ़ें। बड़कागांव गोलीकांड जल-जंगल-जमीन को बचाने की लड़ाई में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है, बशर्ते यह अपनी ताकतों की पहचान कर व भ्रष्ट राजनेताओं के अवसरवादी चरित्र को उजागर करते हुए उसका भी भंडाफोड़ करे।

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