हिमाचल सरकार ने ग्राम सभा को कहा उपद्रवी, भूमि अधिग्रहण पर राय मानने से किया इंकार


हिमाचल सरकार ने ग्राम सभा के लोगों को अकुशल, उपद्रवी मानते हुए वन भूमी अधिग्रहण पर उनकी राय मानने से इंकार कर दिया है। इस मुद्दे पर 7 सितम्बर 2016 को हिमालय निति अभियान ने विज्ञप्ति जारी कर सरकार के इस फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए प्रदेश में आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी है;

वन अधिकार कानून को हिमाचल प्रदेश सरकार ने सर्वोच्च न्यायलय में याचिका न0 8345 जो कि हिमाचल प्रदेश बिजली कॉर्पोरेशन लि0 व पर्यावरण संघर्ष समिति लिप्पा के बीच है और जिसमें नेशनल ग्रीन ट्रिव्यूनल में वन अधिकार कानून का हवाला देते हुये आदेश दिया था कि सबसे पहले ग्राम सभा का आयोजन करके लोगों की राय मागीं जाये और यदि ग्राम सभा परियोजना के लिये वन भूमी देना चाहती है तो वन अधिकार कानून के तहत कार्यवाही को अमल में लाया जाये। हिमाचल सरकार ने लोगों के हितों व वन अधिकारों को दरकिनार करते हुये माननीय सर्वोच्च न्यायलय में जाना उचित समझा और हिमाचल प्रदेश बिजली कॉर्पोरेशन लि0 जिसका अध्यक्ष मुख्य सचिव हि0 प्र0 है ने सरकार द्वारा डाली गयी याचिका में साफ तौर पर कहा है कि ग्राम सभा के लोग अकुशल़ हैं और उपद्रवी है इसलिये परियोजना के लिये भूमी के बारे मे गा्रम सभा की राय उचित नहीं हो सकती है जो कि सीधे सीधे वन अधिकार कानून की मूल भावना जिसमें आदिवासियों व अन्य परम्परागत वन निवासियों कों वनो व वन संसाधनो पर अधिकार को मान्यता देना व इनके अधिकारो की रक्षा करना है का उल्लघंन है।

एक तरफ जहाँ वन अधिकार कानून की प्रस्तावना में कहा गया है कि वन व वनों के आसपास रहने वाले लोगो के अधिकारों को आजादी के 6 दशकों वाद भी मान्यता ना देना एक एतिहासिक भूल है और इसी भूल को सुधारने के लिये वन अधिकार कानून लाया जा रहा है। लेकिन वन अधिकार कानून के लागू होने के 9 वर्षो बाद भी हिमाचल प्रदेश सरकार इस कानून को सिरे से खारिज करने में गुरेज नहीं कर रही है। जो कि ऐतिहासिक अन्याय को ही आगे बढ़ाने का काम कर रही है। सरकार ने समय समय पर विभिन्न दलीलों से कानून के प्रावधानो को खरिज करने की कोशिश की और हर बार अनुसूचित जनजाति मंत्रालय से सफाई दिये जाने के बाद सरकार द्वारा वन अधिकार कानून को लागू करने में मजबूरन कुछ कदम उठाये।

इससे पहले भी प्रदेश उच्च न्ययालय में वन भूमी पर लोगों द्वारा जीविका के लिये किये गये दखल के मामले में सरकार ने अपना पक्ष सही तरीके से नहीं रखा जिसका खामियाजा प्रदेश के भोले भाले लोगों को भुगतना पडा़ और अवैध कब्जों के नाम पर सेब के लगभग 20,000 पौधों को विभाग द्वारा काटा गया जिसे आर्थिक नुकसान प्रदेश के भोले भाले लोगों को उठाना पड़ा। पेड़ों के काटे जाने से पर्यावरणीय नुकसान कितना हुआ है व तो वैज्ञानिक अध्यन करने से ही पता चलेगा। सैंकड़ों घरों के बिजली व पानी के कनेक्शन काटे गये और लोगों को एक तरफ जहाँ आर्थिक नुकसान हुआ वहीं मूलभूत सुविधायों से भी महरूम होना पड़ा है।

2008 में भाजपा की सरकार जिसके मुख्यमंत्री प्रो0 पेम कुमार धूमल थे ने केन्द्र सरकार को लिखा था कि वन अधिकार कानून को हि0 प्र0 में लागू करने की आवश्यकता नहीें हैं और इसमें वनों के उपयोग पर सरकार द्वारा दी जा रही छूटों का हवाला दिया गया था। तत्पश्चात जनजातीय मंत्रालय भारत सरकार द्वारा इसके संदर्भ में विस्तार से निर्देश दिये गये थे और साफ कहा गया कि वन उपयोग में छूट देने से वन पर लोगों के अधिकारों को स्थापित नहीं किया जा सकता है अतः वन अधिकार कानून जो कि लोगों के वन उपयोग के अधिकारों को मान्यता देता है के अर्न्तगत दोबारा से अधिकारो को दर्ज करना पड़ेगा। लेकिन भाजपा सरकार ने भी इस कानून को लागू ना करते हुये प्रदेश के लोगों के साथ खिलवाड़ किया। जो कि भाजपा के जनजातीय व अन्य परम्परागत लोगों के अधिकारों के प्रति कितनी संवेदनशील है उनके नजरिये को दर्शाता है।

इस विषय में वन विभाग द्वारा भी आदिवासी व अन्य वन निवासियों के वनो के उपयोग व वन अधिकारों की मान्यता पर कई तरह का दुष्प्रचार करके भ्रमित करने का प्रयास किया गया है तथा लगातार ऐसा प्रचार किया जा रहा है। राज्य निगरानी समिति जो कि वन अधिकार कानून को सही तरीके से लागू करने के लिये बनाई गई है व भी अपनी जिम्मेदारी सही तरीके से निभाती नजर नहीं आती है। जो कि साफ तौर पर बताता है कि जनजातीय व अन्य परम्परागत लोगों के अधिकारों को लेकर राज्य सरकार और उसका तन्त्र कितना गम्भीर है।

सरकार का माननीय उच्चन्यायलय में एक बिजली की परियोजना को बचाने के लिये जनजातीय लोगों के बारे में अभद्र टिप्पणी करना, आदिवासियों को सरकारी वकील द्वारा माननीय सर्बोच्च न्यायलय में उपद्रवी कहना जनजातीय लोगों की तौहीन है। साथ ही वन अधिकार कानून को सिरे से खरिज करना व इसके साथ ही जनजातीय क्षेत्रों के विशेष कानून पेसा को दरकिनार करते हुये कानूनी मान्यता प्राप्त प्रावधानों का उल्लघंन करना सरकार को शक के दायरे में लाता है। इसी सरकार द्वारा एक अन्य केस में यह कहना है कि सरकार वन अधिकार कानून को प्रदेश में लागू कर रही है का हल्फनामा देना शक को और बढा़ता है कि कैसे एक सरकार दो अलग अलग न्यायलयों में एक ही कानून के बारे में दो विपरीत टिप्पणीयां दे रहा है।

एक तरफ जहां राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी भरतीय जनता पार्टी को वन अधिकार कानून को लागू नहीं करने व आदिवासियों व अन्य परम्परागत वन निवासियों के अधिकारों को सुनिश्चिित ना करने के लिये दोषी ठहरा रही है व इन्ही सब मुद्वों को लेकरे कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी देश भर में घूम रहे हैं वहीं हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार जनजातीय व अन्य परम्परागत वन निवासियों के अधिकारों को सिरे से नकार रहीे है इसे बिडम्वना ही कहा जा सकता है।

हिमालय नीती अभियान सरकार से आग्रह करती है सर्बोच्च न्यायलय से जनजातीय व अन्य परम्रपरागत वन निवासियों के वन अधिकारों की रक्षा के लिये अपनी अपील वापिस ले और सरकारी वकील द्वारा जनजातीय लोंगों के बारे में सर्वोच्च न्यायलय में की गई अभद्र दिप्पणी के बारे में माफी मांगे।
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