तीन दशक लंबे संघर्ष का नाम है नर्मदा बचाओ आंदोलन

ओडिशा के संबलपुर की रहने वाली गार्गी शतपथी पिछली 29 से 31 जुलाई तक नर्मदा बांध विस्थापितों के साथ बड़वानी में रही। लौटकर गार्गी ने अपने अनुभवों  की दास्ताँ भेजी जिसे हम आप से साझा कर रहे है;

महानदी को लेकर आमने-सामने ओडिशा और छत्तीसगढ़ की सरकार । ओडिशा सरकार के आरोप के अनुसार, महानदी के ऊपरी भाग में छत्तीसगढ द्वारा छोटे-बडे बांध बनाए जाने के चलते राज्य में पानी की समस्या पैदा हो रही है । इसी टार की स्थति से नर्मदा नदी गुजर रही है, नर्मदा की हालत भी अच्छी नहीं है । पुनर्वास के बिना ही नर्मदा में सरदार सरोवर का हाइट बढाने के खिलाफ लडाई का बिगुल बजा दिया गया है । जून में बांध का गेट खोलने पर अनेक गांव डूब में आनेकी स्थिति में थे । इसे लेकर एनबीए (नर्मदा बचाओ आंदोलन) ओर से रीले अनशन शुरू हो गया था। आंदोलन को और जोरदार करने के लिए नर्मदा की घाटी में राष्ट्रीय स्तर का सम्मेलन किए जाने का निर्णय लिया गया । ऐसे में इस सम्मेलन में भाग लेने का मौका मुझे मिला। नर्मदा आन्दोलन एक ऐसा नाम था जिसे हम बचपन से सुनते आ रहे थे। हमारे किताबों मे जब कभी विकास व विस्थापन की चर्चा होती, उसमे नर्मदा आंदोलन और मेधा पाटेकर का उल्लेख रहता। बडे बांध से किस तरह विस्थापन, पर्यावरण, संस्कृति की जो तबाही मचती है यह मैरे लिए नई बात नही थी। मैं ओडिशा के संबलपुर जिले की हूं। जहां पर आजाद भारत का सबसे पहला विस्थापन हुआ था। नेहरू जी द्वारा विकास का आधारशीला महानदी में हीराकुद बांध के जरिए रखा गया था। विश्व का यह  सबसे लंबा बांध होने के चलते  22 हजार परिवार विस्थापित एवं 150,000 परिवार प्रभावित हुए थे। उस वक्त लोगों को जिस तरह घर से खदेड कर जंगल मैं फेंका गया था, उस पर हो रही चर्चा मैं बचपन से सुनती आ रही थी। स्कूलों के दिनों से जब कभी किसी लेख में नर्मदा और मेधा जी के आंदोलन को पढती थी, उनका मौन समर्थक बन गयी थी। इसके चलते जब इस सम्मेलन में सामिल होने का मौका मिला तो मैं उसको खोना नही चाहती थी।

नर्मदा के सफर में अनेकों से मुलाकात 

अंत में वह दिन आभी आ गया जब मैं मैरी दोस्त शांती और दूसरे साथियों के साथ दिल्ली से नर्मदा की यात्रा शुरू की । यह यात्रा मैरे लिए नर्मदा आंदोलन के साथ भारत के दूसरे प्रांतो में चल रहे जल, जमीन व जंगल की लडाइ के बारे में जानने के अवसर भी था। इस में दिल्ली के झुग्गी-झोपड़ियों के आंदोलन से लेकर झारखण्ड के खान विरोधी आंदोलन, उत्तराखंड का बांध विरोधी आंदोलन आदि सामिल था। ट्रेन में इन सभी प्रसंगों पर चर्चा करते  कब हम लोग इंदोर पहुँच गए पता नही लगा। यहाँ हां पर सभी प्रतिभागिओं को स्वागत करने मेधा जी पहुंची थी।

इस के बाद कार्यक्रम के अनुसार सभी को प्रभावित गांव होते हुए बडवानी पहुंचना था। लेकिन मैरी दोस्त की हालत बिगडने के चलते हम सभी के साथ जा नही सके। मैरी दोस्त का हालत बिगड जाना हमारे लिए एक सुनहेरा मौका लेकर आया था। जहां पर हमें अपने जीवन का 31 साल आंदोलन को देने वाली एक महिला का साथ मिला। बडबानी  के पाच घंटे की यात्रा हम ने मेधा जी के साथ किये ।  इतने साल आंदोलन करने के बाद एक महिला का व्यक्तित्व कैसे हो जाती है यह  देखना भी मैरे लिए महत्वपूर्ण बात थी। यात्रा  के दौरान कभी नर्मदा बांध में हो रहे विस्थापन तो कभी लोक समस्याओं के बारे में बताती रहती, तो कभी अगले दिन  होने वाले सम्मेलन पर फोन के जरिए साथियों से जाएजा लेती रही। लंबे यात्रा के बाद हम बडवानी पहुंच गए थे। बडवानी मध्य प्रदेश का  एक महत्वपूर्ण जिला है । जहां उतरने के बाद व्यसत माहोल व कामकाज के दौरान भी मेधा जी हमें यह बताना नही भूलिकी उन्होनें हमारे लिए बडे किसान परिवार में रहने की व्य्वस्था की है। मै एक  पत्र्कार हूं, गांव आना मैरे लिए नई बात नही थी। लेकिन अंजान जगह पर रात गुजारना एक नई बात थी।इसके लिए मैं परेशान नहीं थी। मैरे परेशानी का कारण था शौचालय।

तीन दिन का कार्यक्रम था, तो जहां पर रहने की  व्य्वस्था होगी वहां पर शौचालय कैसा होगा, खूले में जाने की शंका से त्र्ास्त थी। सहर से आइ एक  महिला की सोच को सायद मेधा जी ने जान लिया था। या फीर वह इस सोच के बारे में जानती थी इस लिए अमीर शब्द का उपयोग किया। ताकी हम डर न जाए। लेकिन कार्यक्रम के अंतिम दिनों में मेधा जी सभी विधार्थियों से अनुरोध किया कि वे गांव का असली तसवीर देखने के लिए अपनी कैरियर शुरूवात से पहले कम से कम एक साल किसी आंदोलन में जुडकर किसी गांव में रहे। बडवानी में हम जिस घर में रूके हुए थे वहां पर हमारे आराम का पूरा ध्यान रखा गया था। अतिथि की तरह हमारी चर्चा हुई। दाल-ढोगली जो मै कभी नहीं खाई थी, वह खाने का मौका मिला।  हमारे गृहकर्त्त्ता के घर में चार भाइ, भाबी और बच्चे थे। वे भी विस्थापित थे। बडवानी में शिक्षा की इतनी अच्छी व्य्वस्था न होने के चलते अधिकांश बच्चे बाहर ही पढ रहे थे। भाबीया  ऐसे बात कर रही थी, जैसे वे हमे बरसों से जानती हों। सभी का यह स्नेह और अपनापन हमारे लिए नहीं बल्की मेधा जी के लिए था। एक भाबी बोली, जब मेधा जी हमारे लिए अपनी पूरी जवानी दे सकती हैं हम उनके मैहेमानों को कुछ दिन रख नही सकते? यह आंदोलन तो हमारे लिए है। अगले दिन मूझे पता चला, आराम का यह सुविधा केवल हम दोनों को नही बल्की सम्मेलन में भाग लेने आए सभी साथियों को मिला था। नर्मदा बचाव आंदोलन की ओर से जब कभी कोई कार्यक्रम का आयोजन किया  जाता हैं, बाहर से आए लोग गांव के विभिन्न घरों में रहते हैं। इसी से ही आंदोलन के साथ गांव लोगों का जुडाव का पता चलता है।

31 साल के आंदोलन में सामिल होने का मौका 

दूसरा दिन सम्मेलन का दिन था, जहां पर 31 साल पुराने इस आंदोलन को और नजदीक से देखने का अवसर था। मैरे लिए यह अवसर एनबीए के कार्यलय से शुरू हुआ। गुंडिया, भगवती, धंडोरा, पेमाल के साथ । भगवती  एक मजदूर हैं और सालों से इस आंदोलन में जुडी हुई हैं। भगवती बताती हैं, पहले उनका घर व जमीन डूब क्षेत्र में आता था, अब सरकार द्वारा जारी दूसरे सर्वे में उनकी जमीन को बाहर कर दिया गया है। उनकी जमीन डूब क्षेत्र में तो नही आता, लेकिन गेट खुलने के बाद जमीन के चारो ओर पानी भर जाएगा। घर और जमीन एक टापू की तरह हो जाएगा। ऐसे में वहां रहना कैसे संभव होगा। अगर सरकार क्षतिपूर्त्त्ती और जमीन नहीं देगी। तो क्य करेंगे। इस आंदोलन से लाभ मिलने की आशा है। वहीं दूसरी ओर धंदोरे से आई पैमाल का कहना था कि घरके बदले उनको 20 हजार क्षतिपूर्त्त्ताी मिली है।  वे जमीन की भी हकदार हैं। लेकिन भ्रष्टाचार के चलते वह उनको नही मिल पा रहा है। जमीन के लिए वे कितनी बार भाग दौड कर चूकी हैं इसका कोई ठिकाना नहीं। प्लट करवाने के लिए पटवारी ने पांच हजार रूपय्ो रिस्वत की मांग की थी। उन्होंने रिश्वत तो नही दिया रिश्वत की मांग को रिकर्ड करके जिलाधीश को सूनवा दिया । इसका परिणाम स्वरूप पटवारी निलंबित हो गया है। पेमाल, भगवती केवल एक उदाहरण थी। आगे मूझे नर्मदा विस्थापितों की जर्जर स्थिति को और भी नजदीक से देखना बाकी था। इस दौरान हमैं एक वरिष्ठ महिला पत्रकार से मिलने का मौका मिला। वे तीस सालों से पत्रकारिता कर देश में चल रहे विभिन्न आंदोलन क्षेत्र जा चुंकी हैं। थोडी सी चिडचिडि थीं, लेकिन अनेक महत्वपूर्ण बातों की जानकारी भी दे रही थी।

उन्होनें ने ही मेधा जी के सबसे करीबी एक बहन के बारे में बताया। एक साधारण गृहिणी किस तरह आंदोलनकारी बनी वह बताया। साथ ही उनके किसान पति उनके अनुपस्थिति में बच्चे संभाले य्ाह कहना नही भूली।एक आंदोलन को एक महिला का नेतृत्व देने का यह परिणाम था की इस आंदोलन में ज्यादा से ज्यादा महिलाएं जूडी थी। नर्मदा घाट के निकट सम्मेलन स्थल में भी भारी संख्य में महिलाओं की उपस्थिति उसका प्रमाण था। सम्मेलन में केवल स्थानीय लोग नही बल्की गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, ओडिशा, छत्तीसगड, झ्ाारखंड समेत लगभग 12 राज्यों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। यह सभी आंदोलनकारी एक जूट होकर केवल नर्मदा की लडाई नहीं बल्की अपनी सभी की लडाई को मझबूत कर रहे थे। जहां प्रतिपक्ष केवल पुंजिपती या दलाल नही था बल्की सत्ताधारी भी थे, तो उनके खिलाफ लडने के लिए शक्ति भी इतनी ताकदबर और एकजूट होने की आवश्यकता है यह संदेश दिया जा रहा था।

इस दौरान मुझे बिमल भाई से मुलाकात करने का मैका मिला। उन्होनें टिहरी बांध के बारे में जानकारी दी। साथ ही बांध क्यों नामक एक किताब भी दिया । पहला दिन का सम्मेलन एवं नर्मदा कीनारे वाला शपथ कायर््ाक्रम समाप्त होते होते लगभग रात हो गय्ाा था। लेकिन मेधा जी का काम समाप्त नही हुआ, लोगों के लिए खाने और रहेनी का व्य्ावस्था वह प्रत्य्ाक्ष रूप से देख रही थी। यह  अनेक छात्र्ााओं प्रभावित कर रहा था। बांगालोर से आई समाज सेवा की छात्र्ाा बोली, पुस्तक की इस महिला का बास्तविक रूप देख मैं अभीभूत हो रही हूं।। इस छात्र्ाा से बात करते वक्त जर्नालीजम पढने के दौरान गुजरात से आई मैरी एक सहपाठी जिस तरह मेधा जी को गाली करती थी वह य्ााद आरहा था। आंदोलनकारी हो य्ाा आम महिला सब के लिए अच्छी या बूरी नही हो सकती हैं। सभी अपने अपने चसमों से उसे देखते हैं।

कलाकार से विद्यार्थी तक 

नर्मदा बचाव की इस आंदोलन में  कलाकार से लेकर विद्र्थी, पत्र्कार, अधिवक्ता, डक्य्ाुमेंटरी फील्म निर्मता सभी सामिल हो कर इसे मझबूत कर रहे थे। आंदोलनों मे सांस्कृतिक दलों की एक महत्वपूर्ण योगदान है। इससे पहले में ओडिशा के किसान आंदोलन में भी इस योगदान को देख चुकी थी। इस लिए यह मैरे लिए नया नहीं था। आंदोलनात्मक गीत व संगीत जैसे शरीर मे एक ऊर्जा पैदा कर देता था। विशेषकर सम्मेलन से पेहेले केरल के बच्चों के गानों की अगुवाई में रैली शुरू हुआ यह सडकों पर सभी का ध्यन खींच रहा था। इनके अलावा दिली से आई सुसान भाभी से मिलने का अनुभव अच्छा रहा। उनके पति शंकर महानंद आंदोलनात्मक गीत लिखते हैं और सुसान भाभी गाती थी। उनका गान सम्मेलन में आए अनेक विद्यार्थियों को भी छूं लिया था।

दिल्ली विश्विवद्यालय की अनेक छात्र्ााएं उनकी सांस्कृतिक दल में सामिल होने की इच्छा जाहीर कर रही थी। केरल की सुसान का विवाह छत्तीसगड के शंकर के साथ हुआ था। सुसान का कहना था कि पहले तो दोनों को एक दूसरे का भाषा भी ठीक से समझ नही आरहा था, उनकी प्रेम गाथा शूनते वक्त मूझे एक दूजे के लिए फील्म याद आरहा था। सुसान केरल, छत्तीसगड, ओडिशा होते हुए दिली पहुंचीथी। इस लिए जब उनको आप कहां से आए हो पूछा जाता, वे चार राज्यों का नाम लेती थी। इस दौरान झ्ाारखंड के दीपक दास जी का गाना ऐ दादा जागरेञ मूझ्ो इतना अच्छा लगा की, घर आने के बाद तुरंत इसको फेसबूक में सेय्ाार कर लिया । जेएनयू, दिली विश्वविद्यालय्ा, बेंगलुरू, पुणे और ओडिशा से आए विद्यार्थिय्ाों को देखने का  एक अलग अनुभव रहा।

नर्मदा का डूब कहां ले जाएगा

सम्मेलन समाप्त हो चूका था। अधिकांश चले गए थे। लेकिन हम लोग रह गए। शराब के पावंदी की मांग पर दूसरा दिन का सम्मेलन बुलाया गया था। लेकिन हम में से कुछ पहुंच गए थे संभावित विस्थापित गांव पिपलोद। पिप्पल मुन्नी य्ाहां पर जन्म व तपस्या  के बाद ज्ञान प्राप्त होने के चलते गांव का नाम पिपलोद पडा यह बताते हैं 60 साल के भागीराम यादव। नर्मदा बांध के बारे में कुछ कहने के लिए अनुरोध पर वे इतिहास के पन्हों में चले गए। भागीराम के अनुसार नर्मदा में बांध होगी यह चर्चा तो थी। लेकिन पहली बार बांध बनने की पुक्ता जानकारी रेडिओ से उन्हे मिली थी। तब मोरारजी देसाई प्रधानमंत्र्ाी थे। नेहरू  के समय पर 210 मीटर का बांध का फैसला था, लेकिन मोरारजी देसाई के घोषणा में 460 मीटर बांध बनाने की जानकारी दी गई। यह बात जैसे इलाके में एक आंतक का माहौल पैदा कर दिया था। भागीराम के अनुसार, तब लोगों को लगा जैसे वे सभी बरवाद हो जाएंगे। ऐसे में 25-30 साल की एक युवती द्वारा गांव में बैठक बुलाकर चर्चा किया । बांध का विरोध करने का फैसला लिया गया । गांव के किसान, आदिवासी सभी उस महिला के साथ जूड गए। पिपलोद जहां कूल 700 परिवार के लोग रहते हैं। उन में से 55 परिवार अनुसूचित जनजाती व 50 परिवार अनुसूचित जाती के हैं। अनुसूचित जनजाती के सभी लोग गांव छोड कर चले गए हैं। य्हापर 50 परिवार मछवारों का है।

लेकिन पिछले दो सालों से मछवारों के परिवार कों य्ाहां पर मछली पकडने पर पाबंदी लगाई गई है। य्ाहां तक की 2012 में बाढ के चलते घरो में पानी आगया था। दूसरी ओर सरदार सरोवर बांध पर गुजरात सरकार अपना कब्जा जमा रही है। इस के चलते यह पाबंदी है। मछली पालकों की समिति बनाने पर भी मध्य प्रदेश सरकार की ओर से महत्व नहीं दिए जाने की शिकाय्ात स्थानीय लोगो ने की। किशोर मानठाकुर कहते हैं, बांध के निकट वे क्षेती कर रहे थे। लेकिन आज यह पूरा इलाका बालु हो जाने के चलते क्षेती करना संभव नही हो रहा है। प्लट के साथ 5 लाख क्षतिपूर्त्त्ती दिए जाने का वादा था। लेकिन अबतक 24 हजार मिला है। गीता बाई विवाह के बाद पारिवारीक कारणों के चलते अपने मां घर चली आई हैं, उन्हें क्षतिपूर्त्त्ताी के हिस्से से बाहर कर दिया  गया  है। पिपलोद गांव में पहले डूब से कुछ लोगों को जमीन के बदले जमीन एवं मुआवजा मिलने का निर्देश था। इस पर भागीराम बताते हैं कि 2001 में डूब में उनका तीन एकर की जमीन गई थी। उससे उन्हे 4 लाख 95 हजार मिला था। साथ ही उन्हे प्लट मिला था। लेकिन वह सभी प्लट अतिक्रमण बाला था। इसके खिलाफ उन्होनें अदालत में मामला दायार किया है। जो आज तक चल रहा है। य्ाहां के अनेक आदिवासी बसाड में रहने चले गए हैं। य्ाहां जहां वे बडे क्षेत्र्ा में रहते थे, उन्हें छोटे-छोटे घर में रहना पडा रहा है। प्लट के नाम पर अनेक लोगों को गुजरात में प्लट मिली है। कुछ लोगों ने उसको मंजूर कर  वहा चले गए हैं तो अन्य्ा कुछ इसके खिलाफ लडाई लड रहे हैं। कुछ आदिवासी परिवारों को प्लट के साथ सीर्फ एक चरण की क्षतिपूर्त्त्ती मिली है। दूसरा चरण नहीं मिला है। क्षतिपूर्त्त्ती पैसा पाने के लिए रिश्वत देना पड रहा है यह कहते हैं रघुराम य्ाादव। दूसरी ओर सभी विस्थापितों को जमीन के बदले जमीन नही मिली है। अनेक लोंगों को सीर्फ पैसा मिला है। उस अर्थ का व्य्ावहार मोटर साइकल और शराब पर किए जाने का उदाहरण कम नही था। गांव घुमते वक्त एक शराबी हमारे पीछे पीछे आरहा था, उसके बारे में पुछताछ करने पर क्षतिपूर्त्त्ताी राशि मिलने के बाद वह इस तरह शराबी होने के बारे में जानकारी दी गई। विस्थापित गांव की यह कहानी मैरे लिए नई नही थी।

ऐसी कहानी में पहले भी शून चूकी थी, अंतर केवल जगह व बांध या कारखाने का था। पिपलोद के बाद हम पिपरी गांव गए। डिसंबर माह में गेट खुलने के बाद इस गांव में पानी भर जाएगा। डिसंबर होने में कुछ ही माह होने के बावजूत कुछ लोग अभी भी गांव छोडे नही हैं। जमीन के बदले जमीन की मांग में लोग पैसे को हाथ भी नही लगा रहे हैं। विस्थापन विरोधी स्लोगान के साथ ही गांव ने हमें स्वागत किया । गांव के दीवार, घर का दरवाजा हर जगह पर बडे बांध विरोधी, विस्थापन विरोधी स्लोगान लिखा था। यहां तक की पंचायत कार्यालय में इस गांव का एक भी लोग ”मुआवजा नही लेने की बात लिखी गई थीञ कार्यालय  के बरंदा में बैठे गांव के 54 साल के बालाराम नारायण जी यादव ने बताया,  सरदार सरोवर बांध के खिलाफ मेधा जी जुडने से बहत पहले वे इस आंदोलन में सामिल थे। 1977 में बांध की घोषणा की गई । इस के खिलाफ 1979-80 में 200 गांव के लोग बस में जाकर विधानसभा का घेराव किया था। नर्मदा बचाव, निमाड बचाव का नारा हर तरह गूंज रहा था। आंदोलन का नेतृत्व भाजपा के एक नेता नर्मदा प्रसाद जी तिवारी ने लिया था। आज सभी राजनैतिक दल बांध के पक्ष में हैं। लेकिन तब कांग्रेस, भाजपा सब आंदोलन में सामिल थे। लेकिन वह एक दीशाहीन आंदोलन था। मेधा जी जूडने के बाद आंदोलन को दीशा मिली। बांध जनीत आक्रोश के कारण ही उस वक्त के चुनाव में कांग्रेस चुनाव जीत गई। लेकिन इस का फाय्ादा नही हुआ। भाजपा सरकार आने के बाद स्थिति और भी खराब हो रहा है। उसी दिन शाम को नदी पार कर हम चिगलदा गए। लेकिन अगले दिन हमै पहाड उपर का आदिवासी गांव जाना था। जहां पहुंच कर लगा जैसे जीवन में अनुभव का एक नया आयम जूड गया है। सायद इस क्षेत्र के बारे में मै शब्द से बयन ना कर सकूं।

आधा घंटे की बातचीत में इन लोगों का समस्या, मानसिकता या मांग के बारे में जानना इतना सहज नहीं। यहां पर पहाडों मे अनेक गांव बसे हैं। जीन में से बादल एवं बिताडा यह दो गांव हम गए थे। महाराष्ट्र और मधîप्रदेश के बीचों बीच यह सभी गांव के लिए सडक मार्ग नही है। जल मार्ग के जरिए बीमार अस्पताल, किसान अपना उत्पाद लेता है, गर्भवती महिला प्रसव के लिए जाती हैं। ओडिशा में ऐसा इलाका देख चुकी थी। मध्यप्रदेश की स्थिति वैसा तो नही ज्य्दा खराब था। नाव और फीर पहाड चढ कर हम सभी बादल गांव पहुंच गए। हर तरफ हरियली और पहाड। यह पहाड जैसे बादल को चुमने के लिए बेताव भी। यहां पर घरों की दूरी काफी ज्यदा थी।

घर के पास सब क्षेती करते हैं। गांव के लोगों ने बताया, वे बहत कम ही बाजार जाते हैं। अपने जरूरत के हिसाब से उत्पाद कर लेते हैं। आवश्यकता भी कम होती है। शिक्षा और स्वास्थ्य्ा मूल समस्य बनी हुई है। कुछ साल पहले एक जिलाधीश अनेक ताम-झ्ाम के साथ य्ाहां आए थे। लोगों को आशा थी कुछ होगा, लेकिन वह आश आज भी पूरे होने की इंतजार में है। यहां पर स्कूल था, लेकिन शिक्षक नहीं थे। ऐसे में नर्मदा बचाव संगठन द्वारा 2001 में जीवन शाला की शुरूवात हुई। लडाई-पढाई साथ-साथ नीति को लेकर जीवनशाला विद्यालय का आरंभ हुआ। स्कूलों मे 8 दूनी 16 और भगत सिंह दोनो पढाबो जाता है। यह सुंदर गांव भी सरदार सरोवर का आक्रोश का शिकार होगा। यह मुझ्ो बेचेन कर रहा था। आदिवासी प्रभावित बादल गांव के सखाराम बताते हैं कि इस गांव में गैर आदिवासिओं को आने पर पावंदी है। डिसंबर में यह पूरा गांव पानी में भर जाएगा।

इस के लिए सरकार की ओर से मुआवजा दिया जा रहा है। लेकिन लोग जमीन की मांग कर रहे हैं। कुछ लोग जमीन पाकर गुजरात भी चले गए है। यहां के आदिवासी जो गैर आदिवासिओं के कुचक्र से बचने के लिए उन्हें अपने गांव में रखने के लिए डरते हैं, वे कैसे बाहर जाकर बसेंगे। फीर जमीन भी उन्हें मध्य्ाप्रदेश में न देकर गुजरात में दिया जा रहा है। अपना जमीन खोकर क्य काम करेंगे। फीर सभी को तो प्लट नही मिलेगा, मुआवजा का कितना रकम उनको मिल पाएगा, उसका कितना सही इस्तमाल होगा। बादल गांव के अनेक लोग यहां पर पुरखों से हैं लेकिन उनमे से 42 लोगों के पास जंगल जमीन का पट्टा है। बाकी लोगों को क्या मूआवजा मिल पाएगा। यह सब प्रश्न था लेकिन जवाब भविष्य की गोद में छुपी हुई थी। बादल के बाद हम बिशाडा गांव गए। जहां नर्मदा बचाव आंदोलन की ओर से जीवन शाला बनाया गया था। महाराष्ट्र का एक शिक्षक को यहां पर निय्ाुक्ति मिली थी। बिशाडा समेत निकटस्थ गांव के बेरखडी, रिंजडी गांव 3-4 बार विस्थापित हो चुके हैं। सरदार सरोवर बांध की उंचाई के साथ उन्हें ऊपर से ऊपर जाना पड रहा है। यह लोग और कितने ऊपर जाएंगे या  नीचे जा कर दिहाडी मजदूर बन जाएंगे। यह सारे सबालों का जवाब मैरे पास नहीं था, जवाब खोजना वक्त भी नही था, क्योंकि शाम होने से पहले हमें  लौटना भी था।



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