जैतापुर न्यक्लियर पॉवर प्लांट : कथा विकास की या विनाश की ? (भाग दो )


कल हमने आपके साथ जैतापुर न्यूक्लिर पावर पार्क की जमीनी स्थिति पर लिखी गई अभिषेक रंजन सिंह की ग्राउंड रिपोर्ट का पहला भाग साझा किया था। प्रस्तुत है उस रिपोर्ट का दूसरा और अंतिम भाग;


महाराष्ट्र के रत्नागिरी शहर से 60 किमी. दूर स्थित जैतापुर गांव में विश्व की सबसे बड़ी परियोजना सन् 2005 में न्यूक्लियर पॉवर पार्क नाम से प्रस्तावित की गई। गांव वालों को पहले समझ ही नहीं आया कि हो क्या रहा है ? कुछ समय बात उन्हें यह बात समझ आई कि यह परियोजना किस तरह का विनाश अपने साथ लेकर आई है। तब से ही इस परियोजाना के खिलाफ जैतापुर के निवासी संघर्षरत है। इस संघर्ष की शुरुआत से ही यहां के मछुआरे -किसान विभिन्न तरीको से राज्य दमन के शिकार हो रहे हैं। 

पहला भाग यहाँ पढ़े 

जैतापुर न्यूक्लियर पॉवर प्लांट के लिए वर्ष 2006 में अधिसूचना जारी हुई थी। साल 2007-08 तक भू-सर्वेक्षण का काम पूरा हुआ और साल के अंत तक भूमि अधिग्रहण का काम भी लगभग पूरा हो गया। वर्ष 2010 में अधिकांश जमीनों की सुपुर्दगी के दस्तावेज राज्य सरकार ने भारत परमाणु ऊर्जा विभाग को सौंप दिए। सरकारी भू-अभिलेखों के मुताबिक, नब्बे फीसद किसानों ने मुआवजा लेकर उक्त जमीनों पर अपना दावा छोड़ दिया है।

भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया तेज करने के लिए तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार में मुख्यमंत्री प़थ्वीराज चव्हाण ने रत्नागिरी में सर्किल रेट से कई गुना ज्यादा मुआवजा देने का ऐलान कर किसानों को खुश करने का प्रयास किया। इस तरह फरवरी 2013 में न्यूक्लियर पॉवर प्लांट के लिए किसानों की अधिग्रहीत की जाने वाली जमीन का मुआवजा 22.50 लाख प्रति हेक्टेयर देने की घोषणा की गई है। इस अतिरिक्त मुआवजा के लिए सरकार ने 211 करोड़ की धनराशि निर्गत की। तत्कालीन राज्य सरकार ने भूमि अधिग्रहण से प्रभावित होने वाले सभी किसान परिवारों के एक वयस्क सदस्य को नौकरी देने का भी ऐलान किया था।

इसके अलावा, न्यूक्लियर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनपीसीआईएल) की ओर से माड़बन, मिठगवाणे, निवेली, करेल और वरिलवाड़ा गांवों के विकास के लिए दो-दो करोड़ रुपये देने की घोषणा की गई थी। प्लांट के तहत आने वाले हर ग्राम पंचायतों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने के लिए सालाना 25 लाख रुपये (हर तीन साल में 10 फीसद इजाफे के साथ) देने की बात कही गई थी। लेकिन इन गांवों की तरक्की के नाम पर न तो एक रुपया खर्च हुआ और न ही ग्रामीणों की जिंदगी में कोई बदलाव दिख रहा है। इसके बरअक्स यहां के ग्रामीण पिछले कई वर्षों से एक अदृश्य खौफ के साए में जी रहे हैं।

यहां एक बड़ा मामला विवादित जमीनों के अधिग्रहण का भी है। जिला प्रशासन न्यायिक आदेश की प्रतीक्षा किए बगैर उन जमीनों का भी अधिग्रहण कर रही है, जिन पर दो पक्षकारों या उससे अधिक लोगों के बीच वर्षों से मुकदमा चल रहा है। ऐसे सैकड़ों मामले जिला एवं सत्र न्यायालय, हाईकोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। जिला प्रशासन की इस नासमझी से इलाके में खून-खराबे की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

वहीं इस मुद्दे पर एसडीएम खांडेकर की दलील हास्यास्पद है। उनके मुताबिक, राज्य सरकार के आदेशानुसार भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 6 के तहत तकरारी जमीनों का भी अधिग्रहण किया जा रहै है। न्यायालय का अंतिम फैसला जिन पक्षकारों के हक में सुनाया जाएगा, उन्हें मौजूदा दर से उचित मुआवजा दिया जाएगा। स्थानीय किसान प्रशासन की इस कार्यवाही को न्यायिक अवमानना बता रहे हैं। उनके अनुसार, “मुकदमे का फैसला कब आएगा पता नहीं, फैसले के बाद असंतुष्ट पक्षकार सक्षम न्यायालय में अपील करने को स्वतंत्र है, लेकिन इस तरह के नियम बनाकर सरकार ने किसानों को दोहरी मुसीबत में डाल दिया है।“

रत्नागिरी-सिंधुदुर्ग संसदीय क्षेत्र से शिवसेना के सांसद विनायक राउत ने दो टूक शब्दों में बताया कि उनकी पार्टी प्रारंभ से ही जैतापुर न्यूक्लियर पॉवर प्लांट के विरोध में है, क्योंकि यह प्रकल्प कोंकण क्षेत्र के लिए विनाशकारी है। इससे न सिर्फ यहां की जैव-विविधता खतरे में पड़ेगी, बल्कि विश्व प्रसिद्ध आल्फांसो आम का यह क्षेत्र पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा। उनके मुताबिक, जैतापुर भूकंप के लिहाज से काफी संवेदनशील है, क्योंकि यह इलाका जोन चार में स्थित है। यह जानते हुए भी केंद्र और राज्य सरकारें कोंकण को तबाही के रास्ते पर ले जाना चाहती हैं। उन्होंने अरेवा कंपनी (अब ईडीएफ) पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिन देशों में इस कंपनी ने न्यूक्लियर रिएक्टर लगाए हैं, उनकी सुरक्षा पर गंभीर सवाल भी खड़े हुए हैं। इतना ही नहीं भविष्य में होने वाली परमाणु हादसे पर न तो कोई बीमा राशि का प्रावधान है और न ही किसी क्षतिपूर्ति की कोई शर्त। ऐसे में लाजिमी है कि भोपाल गैस त्रासदी के लिए जिम्मेदार कंपनी की तरह अरेवा भी मानवीय त्रासदी पैदा कर फरार हो जाएगी।

जिला परिषद सदस्य अजीत जयवंत नारकर परमाणु ऊर्जा के पक्ष में दिए जाने वाले सभी तर्कों के सख्त खिलाफ हैं। उनका कहना है, ‘ भारत जैसे देश में जहां सड़कों की सफाई नियमित ढंग से नहीं हो पाती, वहां परमाणु कचरे की सफाई और उससे सुरक्षा की की बात करना बेमानी है। परमाणु कचरा सैकड़ों साल बेद भी नष्ट नहीं होते, बावजूद इसके केंद्र सरकार भारत को परमाणु कचरे के ढेर पर बिठाना चाहती है। रत्नागिरी कोंकण क्षेत्र का बेहद खूबसूरत जिला है, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारें यहां प्राकृतिक सुंदरता और जैव-विविधता को परमाणु भट्टी में झोंकने पर आमादा हैं।

राजापुर विधानसभा क्षेत्र से शिवसेना विधायक राजन साल्वी का कहना है कि उनकी पार्टी जैतापुर न्यूक्लियर पॉवर प्लांट का विरोध वर्ष 2000 से कर रही है। शुरुआत में भारतीय जनता पार्टी भी इस मुद्दे पर उनके साथ थी, लेकिन केंद्र में एनडीए की सरकार बनने के बाद भाजपा इस मुद्दे पर खामोश है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा, जिस समय यहां की जनता जैतापुर अणु प्रकल्प के विरोध में नारे लगा रही थी, उस वक्त प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस के राष्ट्रपति के साथ न्यूक्लियर रिएक्टरों की सौदेबाजी कर रहे थे। बकौल साल्वी शिवसेना किसी भी कीमत पर प्लांट नहीं लगने देगी।

न्यूक्लियर प्लांट और कोंकण की राजनीति

शिवसेना जैतापुर न्यूक्लियर पॉवर प्लांट का विरोध शुरूआती दिनों से कर रही है। इस मुद्दे पर शिवसैनिकों मुखर होना स्वाभाविक है, लेकिन काफी हद तक उसकी सियासी मजबूरियां भी। कोंकण क्षेत्र शिवसेना का मजबूत गढ़ रहा है। कोंकण रीजन में रत्नागिरि, सिंधुदुर्ग, पालघर, रायगढ़ और ठाणे जिले आते हैं। यहां की करीब साठ फीसद विधानसभा सीटों पर शिवसेना का कब्जा है। हालांकि, रत्नागिरी की राजनीति में एक समय समाजवादी नेता मधु दंडवते का खास असर था। उन दिनों रत्नागिरी-सिंधुदुर्ग लोकसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि राजापुर संसदीय क्षेत्र था। राजापुर से कई बार सांसद चुने गए मधु दंडवते को आखिरी बार शिवसेना के तत्कालीन उम्मीदवार सांसद सुरेश प्रभु ने शिकस्त दी। उसके बाद कोंकण की राजनीति में समाजवाद का अध्याय समाप्त हो गया, बल्कि परिसीमन के बाद राजापुर संसदीय क्षेत्र का भूगोल भी। मधु दंडवते अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन भारतीय रेलवे की जटिल परियोजनाओं में से एक कोंकण रेलवे को जमीनी हकीकत बनाने के लिए कोंकणवासी की समृतियों में वे आज भी जिंदा हैं।

जैतापुर न्यूक्लियर पॉवर प्लांट का सबसे ज्यादा विरोध साखरी नाटे और माडबन में हो रहा है। साखरी नाटे की 95 फीसद आबादी मुसलमानों की है। अपनी जिंदगी और रोजगार बचाने की खातिर यहां के मुसलमान शिवसेना के साथ खड़ी है। विधानसभा चुनाव में राजापुर से शिवसेना उम्मीदवार राजन साल्वी को साखरी नाटे, माड़बन, निवेली, करेल और मिठगवाणे के मतदाताओं ने एकमुश्त वोट दिया था। इसकी वजह अप्रैल 2011 में जैतापुर न्यूक्लियर पॉवर प्लांट के विरोध में घटित वह हिंसक प्रदर्शन था, जिसमें तबरेज सायेकर नामक युवक की पुलिस फायरिंग में मौत हो गई। तबरेज की मौत के बाद साखरी नाटे और माडबन कई दिनों तक अशांत रहा। राजन साल्वी समेत 51 प्रदर्शनकारी कई दिनों तक जेल में बंद रहे।

कभी शिवसेना के कद्दावर नेता रहे नारायण राणे ने जब साल 2006 में कांग्रेस में शामिल हुए तो कोंकण की राजनीति में सरगर्मी पैदा हो गई। मीडिया के समक्ष नारायण राणे ने शिवसेना छोड़ने की वजह चाहे जो बताईं हो, लेकिन यहां चर्चा है कि नारायण राणे जैतापुर न्यूक्लियर पॉवर प्लांट के पक्षधर रहे हैं। उनके इस मोह के पीछे जैतापुर इलाके में राणे एवं उनके करीबी रिश्तेदारों के नाम सैकड़ों एकड़ जमीन थी, जिसे उन्होंने सस्ती दरों पर खरीदी थी। उनकी मंशा थी कि किसी तरह उनकी जमीन भी अधिग्रहीत हो जाए, ताकि उन्हें अरबों रुपये का मुआवजा मिल सके। कहा तो यहां तक जाता है कि नारायण राणे को काफी पहले यह पता चल चुका था कि जैतापुर में न्यूक्लियर पॉवर प्लांट लगने वाला है। लिहाजा मूलतः सिंधुदुर्ग निवासी राणे बिना वक्त गवांए राजापुर तहसील के उन गांवों में जमीन खरीदी, जो प्लांट एरिया में शामिल होने वाला था। वैसे नारायण राणे महाराष्ट्र में रीयल इस्टेट के छुपे रुस्तम भी माने जाते हैं। ऐसी भी चर्चाएं हैं कि विवादास्पद फाइनेंस एवं रीयल इस्टेट कंपनी ‘इंडिया बुल्स’ में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता छगन भुजबल के साथ-साथ नारायण राणे ने भी करोड़ों रुपये का निवेश किया है।

शिवसेना बेशक जैतापुर प्लांट का विरोध कर रही है, जबकि रत्नागिरी और चिपलूण में केमिकल फैक्ट्रियों पर पाबंदी लगाने के सवाल पर वह मौन साध लेती है। रत्नागिरी जिले में करीब दो लाख मछुआरे हैं। जिले में सालाना 500 करोड़ रुपये का मछली व्यवसाय होता है। इन केमिकल फैक्ट्रियों से निकलने वाले जहरीले रसायनों से समुद्रीय जल प्रदूषित हो रहा है। कई अध्ययनों में भी इस बात की पुष्टि हो चुकी है। परंतु शिवसेना का इस मुद्दे पर कोई विरोध नहीं हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि मछुआरों और किसानों की लड़ाई लड़ने वाली शिवसेना केमिकल फैक्ट्रियों का विरोध क्यों नहीं करती?

साखरी नाटे के मछुआरों की एक चिंता प्रस्तावित मुसाकाजी बंदरगाह को लेकर भी है। जन हक सेवा समिति से जुड़े मंसूर भाई के मुताबिक, मुसाकाजी बंदरगाह बनाने की एकमात्र वजह है, फ्रांस से न्यूक्लियर रिएक्टरों की ढुलाई करना। इस बंदरगाह से मछुआरों को कोई फायदा नहीं होने वाला, बल्कि उनके लिए तो एक और नई मुसीबत पैदा हो जाएगी। अकरम सोलकर के अनुसार, जिस तरह प्लांट एरिया में मछुआरों को प्रवेश की अनुमति नहीं होगी, उसी तरह सुरक्षा के नाम पर मुसाकाजी बंदरगाह के आस-पास का क्षेत्र भी मछुआरों के लिए प्रतिबंधित घोषित कर दिया जाएगा। बहरहाल, कोंकण इलाके में लाखों लोगों की सुरक्षा, रोजगार एवं जैव-विविधता को खतरे में डालकर केंद्र व राज्य सरकार 9900 मेगावाट बिजली पैदा करना चाहती है। यह जानते हुए कि ज्यादातर विकसित देश ‘न्यूक्लियर एनर्जी’ को ना कह रहे हैं और वैकल्पिक ऊर्जा के नए विकल्प की तलाश में हैं।

साभार : समकालीन तीसरी दुनिया 
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