19 तथ्य जैतापुर परमाणु ऊर्जा प्लांट पर आपत्ति दर्ज करते है


महाराष्ट्र के रत्नागिरी शहर से 60 किमी. दूर स्थित जैतापुर गांव में विश्व की सबसे बड़ी परमाणु ऊर्जा की परियोजना सन् 2005 से प्रस्तावित है। परियोजाना के खिलाफ स्थानीय निवासी शुरू से ही संघर्षरत है। लेकिन सरकार लाखों लोगों की सुरक्षा, रोजगार एवं जैव-विविधता को खतरे में डालकर 9900 मेगावाट बिजली पैदा करना चाहती है। यह जानते हुए कि ज्यादातर विकसित देश ‘परमाणु ऊर्जा’ को ना कह रहे हैं और वैकल्पिक ऊर्जा के नए विकल्प की तलाश में हैं। अगस्त के पहले सप्ताह में जन हक सेवा समिति ने देश की राजधानी दिल्ली में सांसदों को अपना ज्ञापन सौपा है. जिसे हम आपके साथ साझा कर रहे है;

जैतापूर अणु ऊर्जा प्रकल्प रद्द करण्यासाठी
जन हक्क सेवा समिति (भारत)
                                                                                                                   तारीख : 2 अगस्त 2016
प्रति,

विषय: जैतापूर न्यूक्लीयर पावर प्लांट क्यों रद्द करना चाहिए

महोदय/महोदया,

गाँव - माडबन, ता-राजपूरा जिला  रत्नागिरी, महाराष्ट्र में केंद्र सरकार द्वारा न्यूक्लीयर पावर प्लांट प्रस्तावित किया गया है। 1650 मेगा वांट के 6 संयंत्र, मतलब कुल 1100 मेगा वॅाट का प्रस्तावित प्लांट दुनिया का सबसे बडा न्यूक्लीयर प्लॉट है।

स्थानीय निवासी तथा सामाजिक कार्यकर्ता इस प्रकल्प का 2005 से, जबसे यह प्रस्तावित है तबसे इसका विरोध करते आये है। बहुत सारे आंदोलनों भी लोगोें ने किये है। इसके बावजूद सरकारें इस प्रकल्प का अंजाम देने के लिए जबरदस्ती प्रयत्न कर रही हैं, बजाय अपनी जनता की आवाज सुने।

हम आपसे प्रार्थना करते है की निम्नलिखित विरोध के कारणों का आप अध्ययन करे व इस प्लांट के खिलाफ की लड़ाई में जुट जाये।

  1. भूकंप का क्षेत्र  जैतापुर न्यूक्लीयर प्लांट जहॉ प्रस्तावित है वह जगह भूकंप प्रवण क्षेत्र 3 में आती है, एवं भूकंप प्रवण क्षेत्र 4 से बहोत ही नजदीक है। स्थान निश्रिती रिपोर्ट जो 2003 में सरकार द्वारा श्री. चतुर्वेदी की अध्यक्षता में बनाई गई थी उस रिर्पार्ट में माडबन टापू जहाँ न्यूक्लीयर संयत्र प्रस्तावित है उसके नीचे से सेसमीक फॉल्ट लाईन जा रही है, ऐसा स्पष्ट लिखा हैं, तथा नजदीकी 5 कि.मी. के अंदर और दोन फॉल्ट लाईन जा रही है। 1192 की सरकारी चक्रवर्ती समिती की रिपोर्ट जो न्यूक्लीयर प्लांट की स्थान निश्रिती के बारे में गाईड लाईन्स बताती है, उसमें यह स्पष्ट रूप् से लिखा है की, सेसमीक फॉल्ट लाईन के उपर या आस-पास न्यूक्लीयर संयत्र न लगाये।आर.टी.आय के तहत मिली जानकारी से पता चला की 20 सालों मंे जैतापुर के क्षेत्र में 15 भूकंप के धक्के महसूस हुये। इसलिए जैतापूर में न्यूक्लीयर संयत्र लगाना खतरे से खाली नही है। 
  2. जैतापुर प्रकल्प के संयंत्र ठंडा करने के लिए समुंदर से रोजाना 8200 करोड. लीटर पानी लिया जाएगा, और वह सामान्य तापमान से 9 डिग्री से भी अधिक गरम होकर समुंदर में फिर से छोड़ा जाएगा। इससे समुद्री जीवों को जान लेवा खतरा है। यह बात 1110 में रिपोर्ट में ही साफ कर दी थी। यहाँ के परिसर में हजारों मछुवारे अपना पेट समुंदर की मछवारी से ही भरते है।
  3. न्यूलीयर पावर प्लांट के परिसर में मछवारी प्रतिबंधित क्षेत्र कायदे से लागू होता है। मछवारे परिसर में मछली नहीं पकड सकेंगे। 
  4. इतनी बडी मात्रा में समुंदर तथा हवा में गर्मी प्रक्षेपित होने के कारण परिसर का तापमान बढ़कर उसका हापूस आम पर बुरा असर होगा। 
  5. जैतापुर प्रकल्प से सालाना 300 टन ( 3 लाख किलो ) न्यूक्लीयर वेस्ट तैयार होगा। उसका असर हजारो वर्षाैं तक वहॉ के सजीवों को भुगतना पड़ेगा। 
  6. चेर्नोबिल तथा फुकुशिमा न्यूक्लियर अपघात से हुए परिणाम इतने भयानक है, की कोई दुशमन सरकार ही होगी जो अपनी जनता को इस नरक में ढकेलेगी। कही हजारो सालों तक चेर्नोबिल व फुकुशिमा का कई हजार स्क्वेअर किलोमीटर परिसर सजीव आवास के काबिल नहीं रहेगा।। 
  7. नियमित रूप से चलता हुआ प्लांट भी एक दुर्घटना ही होता है। किरणोत्सार संयत्र के बाहर नियमित रूप से फेंका जाता है। न्यूक्लियर प्लांट के परिसर में बांझपन, कैन्सर, त्वचा रोग, मतिमंद बच्चे पैदा होना जैसी गंभीर समस्यायें होती है। भारत में तारापूर , रावतभाटा, कल्पकम तथा जादूगोडा के परिसर में यह तथ्य सामने आया है। 
  8. जैतापुर न्यूक्लियर प्लांट जहाँ प्रस्तावित है, वो माडबन प्लेटो लटेराईट पथ्थर का बना है। लेकिन नींव के लिए काले बसाल्ट तक जाना जरूरी है। समंदर की लेवल तक तो बसाल्ट यह परिसर में है ही नही। इसलिए यह पूरा प्लॅटो तोडना पडेगा। प्रकल्प स्थल त्युनामी के हमले से सुरक्षित है, वैज्ञानिकों का यह कथन सरासर झूठ है।
  9. भारत- अमरिका परमाणु डील के बाद फ्रांस की अरेवा कंपनीसे 6 न्यूक्लीयर संयत्र लगाने का समझौता हुआ। यह अरेवा कंपनी 2015 में बँरकट हो गयी है। उसकी जगह अपनी सरकार ने घुटने टेकते हुअे फ्रांस की दी हुअी इडीएफ कंपनीसे मार्च 2026 में फिर से समझौता किया। अरेवा क्यों गयी, इडीएफ क्यों आयी इसका खुलासा आजतक सरकार ने किया नही।
  10. डॉ. काकोडकर से लेकर सभी का कहना है की जैतापूुर प्रकल्प आंतररारष्ट्रीय कंपनीयों को बिजनेस देने के लिए आ रहा है। मतलब बिजली की जरूरत से इसका कोई लेन देन नही हैै।
  11. अरेवा कंपनी जो जैतापूर के लिए इपीआर टेक्नोलॉजीका संयत्र लगानेका प्रस्ताव रखती है, वैसा आज तक कोई भी परमाणु संयत्र पुरे विश्व में ऑपरेशन में नही है। फ्लमंविल्लें - फ्रांस में एसेही प्रकल्प में फ्रांसके अणु नियामक संस्थाने बहुत गंभीर दोष पाये है। यह 7 अप्रैल 2015 को उनके प्रेस रीलीज में उन्होंने बताया। लेकीन फिर भी हमारे पंत्रपधानमंत्रीने 10 अपै्रल 2015 को पॅरीस दौरे के दरम्यान जैतापूर के बारेमें और समझौते किये। इस से यह स्पष्ट होत है सरकारको अपनी जनता की चिंता नही है। 
  12. फिनलंड और चायना में बांधे जा रहे ऐसे ही प्रकल्प टेक्नोलॉजी के दोष के कारण देरी से चल रहे है, एवं महंगे हो गयें है। 
  13. जैतापूर प्लांट की कॅपीटल किमंत अंदाजन साडे छह लाख करोड के भी उपर हेै। मतलब 65 कोटी प्रती मेगा वैट। सोलर प्लांट की कॅपीटल किमंत 6.5 करोड तक नीचे आ गयी है। जैतापुर प्रकल्प से मिलने वाली बिजली भी अगर कोई सब्सिडी न दि जाए तो कीमत रू. 20/- प्रती युनिट के भी होगी। 
  14. अणु उर्जा को ग्रीन कहना सरासर झूठ है। युरेनियम मायनिंग, उस पर प्रक्रिया करके इंधन में रूपांतरित करना, ट्रान्सपोर्ट, प्रकल्प का कंस्ट्रक्शन आदी चीजो मों फॉसिल इंध नही उपयोग मे लाया जाता है। तथा उर्जा-प्रक्रिया में बहोत सारी गर्मी वातावरण में फैलती है। न्यूक्लियर वेस्ट का प्रबंध करना भी उर्जा खर्चो करता है। 40-50 साल जो प्रकल्प की आयु होती है, उसके बाद उसका डी-कमिशनींग करना बहुत खर्चीला तथा इंधन खपत वाला होता है। इसलिए यह ग्रीन उर्जा नही है। पुरे अणु-चक्र में कार्बन किसी भी अन्य उर्जा प्रक्रिया से होनेवाली उत्सर्जन से ज्यादा होता है। 
  15. अगर प्रकल्प में आघात हुआ तो उसकी जिम्मेदारी प्रकल्प बनानेवाली विदेशाी कंपनीया लेने को तैयार नही है। उनके लिए 1500 करोड का उत्तर दायित्व् भी महंगा लग रहा है। बल्कि फुकुशिमा दुर्घटना जो अब भी चल रही है, उसका खर्चा 1.5 लाख करोड के भी ऊपर पहुंच गया है। यह उत्तर दायित्व भारत सरकार, स्टेट बैक, नॅशनल इन्शुरन्स आदि कंपनिओं का पैसा लगा के इंश्योरेंस पूल बना रही है। मतलब सभी खर्चा भारतीय करदाताओं के सर पे रहेगा। 
  16. भारतीय न्यूक्लियर प्रोग्राम बहुत ही सीेक्रेटीव है। यह सीधा पीएमओ पंत प्रधान कार्यालय के तहत आता है। सामान्य जनता को जानकारी पूरी तरह से मिलती नही है। 
  17. जैतापूर आंदोलन का ब्योरा जो हमने इस पत्र के साथ जोडा है, उससे साफ जाहिर होता है की यह प्रकल्प खडा करने के लिए विदेशी कंपनीयों के हित के लिए अपनी जनता इपे गोली चलाना, झुठे दाखिल करना ऐसे पैंतरे सरकारें अपना रही है। 
  18. पूरे विश्व मंे न्यूक्लीयर लॉबी का दबाव लाके बहोत सारे देश , नवीनतम उर्जा सोलर, विंउ के माध्यम से स्वावलंबन साध रहे है। जर्मनी ,स्वीटझरलैड, इटली, ऑस्ट्रेलिया, हंगेरी, तैवान आदी देशो ने ऐसा एलान  कर दिया है।
  19. प्रकल्प की जनसुनवाई तथा पर्यावरणीय परिणामों की रिपोर्ट (इआयए) यह सभी फार्स था। जबरन झूटे जवाब देके इस प्रकल्पों को 29.11.2010 को क्लिअरन्स दिया गया है। बल्कि आज तक कौनसा भी डिझाईन, न्यूक्लीअर वेस्ट मैनेजमेन्ट, प्रकल्प तथा बिजली की किमत, बिजली बाहर कैसे ले जाएंगे उसका कुछ भी प्लान तैयार नही है। 5.5 साल बाद भी सब अंधेरे में है।

और बहोत सारे प्रश्न जैतापूर प्रकल्प के बारे में उपस्थित होते है। यह प्रकल्प रद्द करवाना सभी भारतीय नागरिकों का कर्तब्य है।

हम आप से आवाहन करते है की सच्चाई जान के जैतापूर प्रकल्प विरोधी  लड़ाई  में हमारे साथ जुट जाएं।

जन हक्क सेवा समिती

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