काठीकुंड विस्थापन विरोधी आंदोलन : सात साल के लम्बे संघर्ष के बाद 12 आंदोलनकारी बरी


झारखण्ड के दुमका जिले के काठीकुंड में RPG कंपनी की झारखण्ड सरकार के साथ पॉवर प्लांट की योजना प्रस्तावित थी। लेकिन स्थानीय आदिवासी कंपनी को अपनी जमीन देने को राजी नहीं थे। जमीन अधिग्रहण के खिलाफ दिसम्बर 2008 में करीब ढाई-तीन हजार किसान शांति मार्च निकाल रहे थे, तभी पुलिस और आदिवासियों के बीच झड़प शुरू हो गई। पुलिस ने आदिवासियों के खिलाफ उपद्रव का केस दर्ज कर दिया था. सात साल के लम्बे संघर्ष के बाद 20 अगस्त 2016 को पुलिस पर कथित हमला करने के मामले में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश ब्रजेंद्र नाथ पांडेय ने फैसला सुनाया. 12 आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए रिहा कर दिया गया. रिहा होनेवालों में बंकु यादव, धनश्याम भगत, एनी टुडू, एमेलिया हांसदा, सुमित्रा बारला, सालगे मरांडी, सिद्धेश्वर सरदार, मेहरु हांसदा, निर्मल मरांडी, बुधराय हांसदा, राजकुमार एवं सतन बेसरा शामिल हैं.

आंदोलन के मार्गदर्शक घनश्याम कहते है कि काठीकुंड गोलीकांड का फैसला कई दृष्टिकोण से ऐतिहासिक है. पहला तो यह कि इससे उस प्रावधान पर मुहर लगी है जिसे संविधान ने ग्राम सभाओं को दिया है ,जिसमें कहा गया है कि ग्राम सभाओं की अनुमति को बिना विकास के कार्यों को कोपा नहीं जा सकता. दूसरा यह कि शांतिमय आंदोलन को नक्सली और माओवादी बताकर बदनाम नहीं किया जाना चाहिए.तीसरा यह कि लोकशक्ति किसी भी शक्ति से बड़ी शक्ति होती है और लोकतंत्र में इसका सम्मान किया ही जाना चाहिए. चौथा यह कि अगर आप धैर्य और लगन से कोई आंदोलन करते हैं तो इसमें जीत पक्की मानिए .और अंत में यह कि अपने मित्रों पर भरोसा बनाये रखिये ,मुकदमें के दौरान आपस में बिखराव न हो.विरोधी शक्तियाँ आपसी एकता तो तोड़ मुकदमें को कमजोर करने में अपनी पूरी ताकत और हुनर लगा देती हैं और धीरे धीरे हम बिखर ते चले जाते हैं. काठी कुंड में भी हुआ था .कुछ साथी बिखरे भी लेकिन बाद में सबों को समेट कर रखने में कामयाबी मिली और अंतत: जीत आंदोलन की हुई.जनता की हुई .अहिंसक और न्यायपूर्ण आंदोलन की हुई .उन तमाम साथियों की हुई जिन्हें जनशक्ति पर भरोसा है. एकबार फिर फरेब और झूठ को मुंह को खानी पड़ी.जन विरोधी सत्ता हार गयी.


इस कांड में ही गुरुवार को न्यायालय ने अपना फैसला सुनाते हुए नौ आरोपियों को रिहा किया था. पुलिस नौ के विरुद्ध पहले आरोप पत्र समर्पित कर चुकी थी. बाद में बंकु यादव सहित 12 लोगों के द्वारा उच्च न्यायालय से अग्रिम जमानत लेने के बाद पुलिस ने 31 अगस्त 2009 को न्यायालय में आरोप पत्र समर्पित किया था.

आरोप पत्र में 40 गवाहों का बयान पुलिस ने दर्ज किया, लेकिन ट्रायल के दौरान 11 गवाहों का ही परीक्षण हो पाया. अभियोजन पक्ष केस को साबित करने में सफल नहीं हो पाया. परीक्षण के दौरान किसी भी गवाह के द्वारा आरोपितों की पहचान नहीं की गयी. कोई आग्नेयास्त्र भी बरामद नहीं हुआ था और न ही पुलिस पर गोली चलने की बात गवाह द्वारा न्यायालय को बताया गया. एसआइ राकेश मोहन सिंह ने न्यायालय को बताया था कि 19 राउंड गोली भीड़ पर चली थी, जिनमें उनकी गोली से दो लोग मारे गये थे.

लुखीराम टुडू एवं सायगत मरांडी की इलाज के क्रम में मौत हो गयी थी. हवलदार सुरेश राम को सीने में तीर लगा था, जबकि इंस्पेक्टर राकेश मोहन सिन्हा को हाथ में. कई पुलिसकर्मी भी घायल हुए, जबकि ग्रामीणों में सागा मरांडी, संग्राम हांसदा, भोला पाल, शिवलाल सोरेन एवं लुखीराम सोरेन भी घायल हो गये थे. अभियोजन पक्ष की ओर से एपीपी अवध बिहारी सिंह एवं बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता सोमा गुप्ता ने केस की पैरवी की. 
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