बस्तर में टाटा ने 11 साल लगाए टाटा बोलने में : स्टील प्लांट बंद परंतु हजारों आदिवासियों को बेघर कर गया टाटा


छत्तीसगढ़ के बस्तर में टाटा ने अपने 11 साल पुराने स्टील प्लांट को बंद करने की घोषणा कर कार्यालय पर ताला बंद कर दिया है। टाटा ने 2005 से बस्तर जिले के लोहण्डीगुड़ा क्षेत्र में संयंत्र हेतु आदिवासियों की 2500 हेक्टेयर जमीन पर कब्जा किया लोहाणीगुडा और आसपास के दस गाँव को उजाड़ा ,घरबार, स्कूल, अस्पताल खत्म कर दिये गये. टाटा के साथ जिस दिन अनुबंध हुआ उसी दिन सलवाजुडूम की भी शुरुआत हुई. छत्तीसगढ़ से डॉ लाखन सिंह की रिपोर्ट;

बस्तर में टाटा के सभी अधिकारी कर्मचारी को कंपनी ने पहले ही वापस बुला लिया था। अब संभाग मुख्यालय जगदलपुर स्थित टाटा स्टील के दफ्तर में भी कंपनी ने ताला लगा दिया है। दफ्तर की चाबी कलेक्टर को सौंपकर कंपनी ने यहां से रवानगी की तैयारी कर ली है। टाटा स्टील से जुड़े आनंद सिन्हा ने भी इस बात की पुष्टि कर दी है कि कंपनी ने बस्तर में टाटा स्टील प्लांट प्रोजेक्ट को बंद कर दिया है।

जो टाटा के सामान समेटने पर सियापा कर रहे है और विकास की दुहाई दे रहे है उन्हें एनएमडीसी  के आसपास के गाँव और दही सा बन गये लालपानी को देख लेना चाहिए उनकी सारी विकास की अवधारणा की हवा निकल जायेगी.

टाटा के प्रवक्ता ने कहा कि माओवादी हिंसा के कारण वह बस्तर से जा रहे है.

जाते जाते बड़ा झूठ बोल गया टाटा .

यह झूठ जनतांत्रिक आन्दोलन के खिलाफ हिंसा को जस्टिफाई करने के लिये दिया गया है .
टाटा और उसके  लठैत के रूप में काम कर रहे स्थानीय प्रशासन ने हर गैर कानूनी काम किये.
कलेक्टर जगदलपुर ने कैसे फोर्स के बल पर जबरदस्ती  ग्राम सभायें कराई ,एक कमरे में बारी बारी से ग्रमीणों को बुलाकर अंगूठे लगवाये गये कौन नहीं जानता.

तीनों ने मिलकर आदिवासियों की 2500 हेक्टेयर जमीन पर कब्जा किया .
लोहाणीगुडा और आसपास के दस गाँव को उजाड़ा गया ,घरबार स्कूल अस्पताल खतम कर दिये गये.
और हां यही टाटा है इसके साथ जिस दिन अनुबंध हुआ उसी दिन से सलवाजुडूम की शुरुआत हुई ,यह माना जाता है कि सलवाजुडूम के लिये टाटा ने ही महेंद्र कर्मा और योजना को वित्तीय यहायता पहुचाने का काम किया.

बृह्मदेव शर्मा  ने सबसे पहले टाटा के खतरे से सबको आगाह किया और उन्हें इसका खामियाजा भी भुगतना  पड़ा. जगदलपुर की सडकों पर व्यापारियों भाजपाई और हां कांग्रेसियों ने उनको अपमानित करते हुये प्रोसेशन निकाला ,यह अपमान टाटा को बहुत मंहगा पडने वाला था.

इसके बाद प्रतिरोध फूट पडा ,आदिवासी महासभा और मनीष कुंजाम ने लंबी लडाई लडी ,आदिवासी संगठन भी सडक पर उतरे और एक बडा जन आंदोलन खड़ा हो गया. लोगों ने ग्राम सभा और जनसुनवाई का बहिष्कार किया ,अपनी जमीन से कब्ज़ा छोडने से इंकार कर दिया .

भारी फोजफांटा और टाटा के लिये प्रतिबद्ध शासन भी टाटा को मर्सिया पढने से रोक नहीं पाया.
9500 करोड़ 2000 हेक्टेयर जमीन और  2500 हेक्टर  बेलाडीला से आयरन ओर का आवंटन भी  टाटा को बस्तर में अपनी लूट को कायम नहीं रहने दिया.

अब वो जाते जाते कह रहे है कि माओवादी हिंसा के  कारण वे वापस जा रहे है .
उनका यह रणनीतिक बयान  लोकतांत्रिक आंदोलन के खिलाफ और माओवादी हिंसा को ज़ायज बताने के लिए ही है .

चलो मान लेते है कि टाटा को भगाने में  उनकी भी महत्वपूर्ण भूमिका है, यदि एसा है तो उनका यह काम प्रशंसा के योग्य ही कहा जायेगा .

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