TOI का नागपुरिया इंटेलिजेंस: CPI, CPI(M), NAPM, NBA, NGO’s- सब नक्‍सलियों के ‘फ्रंटल संगठन’ हैं!


टाइम्‍स ऑफ इंडिया में आज यानी 8 जुलाई को नागपुर की डेटलाइन से एक भ्रामक ख़बर छपी है। खबर अहमदाबाद में ''जल, जंगल, ज़मीन'' पर अगले सप्‍ताह होने वाले एक राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन (जल-जंगल-जमीन-जनतंत्र की रक्षा में जनसंघर्षों का राष्ट्रीय सम्मेलन; गुजरात 16 से 18 जुलाई 2016) से जुड़ी है जिसे इंटेलिजेंस स्रोतों के आधार पर रिपोर्टर सौमित्र बोस ने नक्‍सलियों के ''फ्रंटल समूहों'' द्वारा आयोजित करार दिया है। दिलचस्‍प यह है कि इस सम्‍मेलन में शामिल तमाम समूह और संगठन दरअसल उस ''भूमि अधिकार आंदोलन'' का हिस्‍सा हैं जिसने दिल्‍ली समेत देश भर में भू-अधिग्रहण अध्‍यादेश का विरोध किया था जिसके चलते मोदी सरकार को यह अध्‍यादेश वापस लेने को मजबूर होना पड़ा था। इन संगठनों में भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी और मार्क्‍सवादी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के किसान संगठन, नर्मदा बचाओ आंदोलन, जनांदोलनों का राष्‍ट्रीय समन्‍वय (एनएपीएम), भारतीय किसान यूनियन, समाजवादी समागम समेत कई ऐसे एनजीओ शामिल हैं जो व्‍यावहारिक और सैद्धांतिक स्‍तर पर नक्‍सलियों की राजनीति से न केवल विरोध रखते हैं बल्कि कुछ ने तो अपने-अपने काम के इलाकों में नक्‍सलियों के खिलाफ़ सरकारी नीतियों तक का समर्थन किया है।

सौमित्र बोस द्वारा लिखी गई यह ख़बर इसलिए भी दिलचस्‍प है क्‍योंकि आयोजन अहमदाबाद में होना है जबकि ख़बर नागपुर से फाइल की गई है और महाराष्‍ट्र के गुप्‍तचर स्रोतों का इसमें हवाला दिया गया है। पढकर साफ़ दिख रहा है कि यह ख़बर प्‍लांटेड है। नीचे यह ख़बर देखें:



ख़बर कहती है कि ''गुप्‍तचर एजेंसियों के माध्‍यम से हाथ लगा एक दस्‍तावेज बताता है कि गुजरात स्थित एक संगठन ने देश भर के बिरादराना संगठनों से भूमि अधिग्रहण, एफडीआइ, कॉरपोरेट के हित कुदरती संसाधनों की लूट व वंचितों और मजदूरों की बदहाली के मसलों पर राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन में शामिल होने का न्‍योता दिया था…।'' दरअसल, इसके लिए किसी गुप्‍तचर एजेंसी के दस्‍तावेज़ की ज़रूरत ही नहीं थी क्‍योंकि इस सम्‍मेलन का आमंत्रण करीब दस दिन पहले से ही भूमि अधिकार आंदोलन'' की ओर से खुले में सर्कुलेट हो रहा है जिसे कुछ वेबसाइटों ने प्रकाशित भी किया है।

''जल-जंगल-ज़मीन-जनतंत्र की रक्षा में जनसंघर्षों का राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन'' जो 16 से 18 जुलाई के बीच अहमदाबाद के गुजरात विद्यापीठ में आयोजित होना है, उसके स्‍थानीय आयोजकों में प्रसिद्ध सामाजिक-सांस्‍कृतिक कार्यकर्ता हीरेन गांधी का नाम है जो शहर में दर्शन नामक एक सांस्‍कृतिक संगठन चलाते हैं। जनसंघर्षों की खबरें देने वाली वेबसाइट संघर्ष संवाद पर 30 जून को प्रकाशित भूमि अधिकार आंदोलन के आमंत्रण में शामिल सह-आयोजकों के नामों को टाइम्‍स ऑफ इंडिया द्वारा ''नक्‍सलियों के फ्रंटल संगठन'' करार दिया जाना ख़बर की असली मंशा पर सवाल उठाताा है। आयोजन के सह-आयोजक निम्‍न हैं:

जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम), अखिल भारतीय किसान सभा (36 केनिंग लेन), अखिल भारतीय वन श्रमजीवी यूनियन, अखिल भारतीय किसान सभा (अजॉय भवन), भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक असली), अखिल भारतीय कृषक खेत मजदूर संगठन, जन संघर्ष समन्वय समिति, इन्साफ, अखिल भारतीय खेत मजदूर यूनियन, नर्मदा बचाओ आन्दोलन, किसान संघर्ष समिति, छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन, माइन मिनरल एंड पीपुल्स (एमएमपी), मध्य प्रदेश आदिवासी एकता महासभा, समाजवादी समागम, किसान मंच, विन्ध्य जन आन्दोलन समर्थक समूह, लोक संघर्ष मोर्चा, संयुक्त किसान संघर्ष समिति, दर्शन, गुजरात सोशल वाच, पर्यावण मित्र, गुजरात किसान संगठन, आदिवासी एकता विकास आंदोलन, लोक कला मंच, स्वाभिमान आंदोलन, गुजरात लोक समिति, और अन्य जन संगठन

जनवादी राजनीति और एनजीओ के दायरे में परिचित कोई भी व्‍यक्ति दावे के साथ कह सकता है कि उपर्युक्‍त में से किसी भी संगठन का नक्‍सली राजनीति के साथ न अतीत में कोई लेना-देना रहा है और न अब है। इसके उलट, बंगाल में वाम मोर्चे की सरकार में शामिल सीपीएम और सीपीआइ ने तो बाकायदा नक्‍सलियों के खिलाफ अभियान चलाया था, जिनके अपने-अपने किसान संगठन ऊपर की सूची में दिखाई दे रहे हैं। नर्मदा बचाओ आंदोलन, एनएपीएम, समाजवादी समागम आदि समूह गांधीवादी और समाजवादी राजनीति से ताल्‍लुक रखते हैं।

ख़बर में लिखा गया है कि अहमदाबाद के संगठन द्वारा जो आमंत्रण बाकी संगठनों को भेजा गया है, उसकी प्रति टाइम्‍स ऑफ इंडिया के पास है। इससे ज्‍यादा हास्‍यास्‍पद बात और कुछ हो ही नहीं सकती क्‍योंकि न तो यह आयोजन गुप्‍त है और न ही इसका आमंत्रण कोई गोपनीय दस्‍तावेज़ है। ख़बर में आमंत्रण से जो 'एक्‍सक्‍लूसिव' पंक्ति उद्धृत की गई है, वह संघर्ष संवाद पर प्रकाशित आमंत्रण में हिंदी में यह है: ''गुजरात देश के सबसे बड़े समुद्र तटीय क्षेत्र वाले राज्यों में से एक है। इस पूरे तटीय क्षेत्र में थर्मल पावर प्लांट व रसायनिक संयंत्र को मंजूरी देकर इस क्षेत्र के पर्यावरण व मछुआरा समुदाय की आजीविका को समाप्त कर दिया गया है।'' ज़ाहिर है, गोपनीयता और इंटेलिजेंस स्रोत का इससे बड़ा मज़ाक और कुछ नहीं हो सकता कि जिस आयोजन के बारे में दस दिन से इंटरनेट पर सामग्री उपलब्‍ध है, उसे देश के सबसे बड़े अख़बार का प्रतिनिधि गुप्‍तचर स्रोत से हासिल बताकर दस दिन बाद छाप रहा है।

ज्‍यादा चिंताजनक हालांकि खबर की प्रस्‍तुति है जिसमें हाथ में बंदूक लिए हुए एक नकाबपोश की तस्‍वीर बीच में चिपका दी गई है जिसके पीछे हंसिया-हथौड़े का चिह्न दिख रहा है। ख़बर का शीर्षक कहता है, ''Naxal fronts bring their fight to Gujarat: To hold Meet against Modi Govt Policies". इसे पढ़ने पर एक नजर में ऐसा आभास होता है कि नक्‍सली अब गुजरात में घुस गए हैं और वहां कोई गोपनीय बैठक करने जा रहे हैं। भीतर पढने पर हालांकि ख़बर का फर्जीवाड़ा खुल जाता है।

सवाल उठता है कि टाइम्‍स ऑफ इंडिया द्वारा इस फर्जी ख़बर को कथित रूप से गुप्‍तचर स्रोतों से छापने का असली मकसद क्‍या है। क्‍या टाइम्‍स ऑफ इंडिया यह मानता है कि किसानों की, मज़दूरों की, मछुआरों की, गरीबों की, दलितों की बात करना नक्‍सलवाद है? क्‍या उसे गांधीवाद, समाजवाद, दलितवाद, आदि तमाम विचार नक्‍सलवाद के संस्‍करण लगते हैं? अगर नहीं, तो फिर सौमित्र बोस द्वारा लिखी गई यह ख़बर विशुद्ध दलाली है। संघ के नागपुर मुख्‍यालय और उसके इंटेलिजेंस की घुटनाटेक दलाली।

साभार : मिडिया विजिल 
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