जबरन भूमि अधिग्रहण, कार्पोरेट लूट और फासीवाद के खिलाफ निर्णायक जंग का एलान :देश भर के जनसंघर्षों ने अहमदाबाद में लिया संकल्प


देश में वैश्विक पूंजी के हमले की वजह से बढ़ते निरंकुश कॉर्पोरेटीकरण तथा महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के खोल देने का परिणाम हुआ है बढ़ती कीमतें, महंगाई और कॉर्पोरेट द्वारा प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट । और इन सबको आसान बना रही है केंद्र सरकार और चंद राज्य सरकारों की नीतियां। इन्हीं हालातों में भूमि अधिकार आंदोलन ने गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद 16-17-18 जुलाई 2016 तक तीन दिवसीय जनसंघर्षों का राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में देश के 15 राज्यों से 500 से ज्यादा जन जनसंघर्षों के प्रतिनिधियों ने भागीदारी की। सम्मेलन में समन्वय स्थापित करने, केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा अधिसूचनाएं जारी करके तथा कानूनों में परिवर्तन करके लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को बाधित करने के प्रयासों तथा मौजूदा राजनीतिक तबके का सकल घरेलू उत्पाद आधारित विकास के मॉडल पर चर्चा की गई। सम्मेलन में प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित समुदायों की बढ़ती बदहाली और दिन-ब-दिन मजदूर-मेहनतकश जनता की खराब होती जीवन दशा के बारे में भी चर्चा की गई। सम्मेलन ने आर्थिक सुधारों के पिछले 25 वर्षों के प्रभाव की वजह से समाज में बढ़ रही सर्वव्यापी असमानता जो कि अब अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच चुकी है पर भी विचार-विमर्श किया गया।

सम्मेलन में समाज खासकर दलितों, आदिवासियों तथा हाशिए पर खड़े समुदायों द्वारा झेली जा रही आर्थिक कठिनाईयों की वजह से समाज में व्याप्त हो रहे भारी असंतोष पर भी गौर किया गया। देश में अल्पसंख्यकों की बढ़ती असुरक्षा तथा उनपर हो रहे हमले, देश के चंद भागों में कुछ खास जातियों को आरक्षण देने की मांग को लेकर चल रही भारी राजनीतिक अशांति, और विवाद के क्षेत्रों में भारी सैन्यीकरण तथा गैर-राज्यीय भागीदारों के सरकार को भड़काने की वजह से राज्य द्वारा कोई भी राजनीतिक हल ढूंढ पाने, लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने तथा शांति स्थापित कर सकने के प्रयासों में असफलता के सबंध में भी चर्चा की गई।

सम्मेलन में इस बात पर सहमति थी कि एक लंबे संघर्ष तथा बलिदानों के बाद भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 को रद्द करके संसद द्वारा नया भूमि अधिग्रहण कानून 2013 पारित किया गया था। हालांकि नया अधिनियम अपने आप में बहुत सी कमियां लिए हुए था तथापि उसमें बहुत से सकारात्मक प्रावधान भी थे जिनमें पूर्व सूचना आधारित सहमति, सामाजिक प्रभाव आकलन, खाद्य सुरक्षा के लिए उपाय, बढ़ी हुई मुआवजा राशि इत्यादि जैसे प्रावधान शामिल हैं। यह प्रावधान भूमि से वंचित होने वाले तथा भूमि पर निर्भर तबके को कुछ हद तक सुरक्षा प्रदान करते हैं। हालांकि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में आई भाजपा सरकार भूमि अधिग्रहण संशोधन का एक निरंकुश अध्यादेश लेकर आई जिसने पूर्व सहमति, सामाजिक प्रभाव का आकलन करने या फिर खाद्य सुरक्षा के सुरक्षा प्रावधानों से बच निकलने तथा बेलगाम भूमि अधिग्रहण का रास्ता निकाला।

भाजपा सरकार के इस निरकुंश अध्यादेश (तीन बार प्रस्तावित) के विरुद्ध बने एक मुद्दा आधारित एकीकृत विपक्ष ने सरकार को कम से कम स्थाई रुप से वापस लेने को मजबूर किया।  भूमि अधिकार आंदोलन ने अध्यादेशों के विरुद्ध एक आंदोलन तथा सार्वजनिक राय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। सरकार को अध्यादेश को चौथी बार न प्रस्तुत करने के रूप में अपनी हार को स्वीकार करना पड़ा। हालांकि अभी इस बिल का संसद से वापस लिया जाना लंबित है और हमें इस संबंध में सतर्क रहने की जरूरत है।

 इस राजनीतिक जीत को आधार बनाते हुए सम्मलेन ने देश की आम जनता द्वारा झेली जा रही असंख्य दुश्वारियों पर विचार किया और निम्न राय बनाई जिन्हें हम सरकार और अपने-अपने क्षेत्रों के समक्ष मांगों के रूप में रखते हैं-

1. जबरन भूमि अधिग्रहण और विस्थापन बंद करोः  भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 को ढीला करने और उसकी सभी प्रगतिशील तत्वों तथा सुरक्षा प्रावधानों को खत्म करने के अपने प्रयासों के विरुद्ध देश भर में बनते प्रतिरोध को देखते हुए भाजपा सरकार ने अपनी रणनीति में परिवर्तन कर दिया। उसने ऐसे आंदोलनों और एकताबद्ध  प्रतिरोधों को  किनारे लगाने और बच निकलने के लिए उसने राज्य सरकारों को ऐसे भूमि अधिग्रहण के प्रावधानों को लागू करने के लिए कहा जो भूमि अधिग्रहण को सुगम बना सके। गुजरात सरकार पहले ही विशेष निवेश क्षेत्र अधिनियम जैसे बहुत से कानून बना चुकी है जिससे कि भूमि सुधार संबंधी विधायिकाओं को तरल किया जा सके और भूमि अधिग्रहण को सुगम बनाया जा सके। ओडिशा, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडू, कर्नाटक और अन्य राज्यों की सरकारें भी ऐसे ही प्रयासों की तैयारी कर रही हैं। ओडिशा में भी अब आदिवासी भूमि का गैर-आदिवासियों द्वारा खरीद को अनुमति देने की तैयारी हो रही है। जबकि वहीं दूसरी तरफ यह पारंपरिक वन्य उत्पादकों और आदिवासियों को जमीन हड़पने वालों के रूप में घोषित किया जा रहा है।
दिसंबर 2014 से अगस्त 2015 के अंतरिम समयकाल में जब भूमि अधिग्रहण अध्यादेश वापस नहीं हुआ था उसी समय आंध्र प्रदेश सरकार राज्य राजधानी और कई अन्य परियोजनों के लिए लैंड पूलिंग के नाम पर हजारों एकड़ जमीन अधिग्रहित करने में कामयाब रही। किसानों तथा भूमि पर निर्भर तबकों के अधिकारों को देश भर में अनदेखा किया जा रहा है। इन सभी विधायिकाओं में दलितों और आदिवासियों के अधिकारों को दबाया जा रहा है। नर्मदा बांध तथा अन्य बहुत सी परियोजनाओं से विस्थापित हो रहे सैकड़ों परिवारों के अधिकारों को छीना जा रहा है और उनके पुनर्वास तथा पुनर्स्थापन के लिए कोई प्रभावी प्रावधान नहीं है।

 औद्योगिक गलियारों, आर्थिक गलियारों, स्मार्ट सिटी, राष्ट्रीय निवेश तथा उत्पादन जोन, विशेष आर्थिक जोन, उद्योगों और ढांचागत विकास के लिए भूमि के बड़े-बड़े हिस्से को कब्जाया जा रहा है। लाखों एकड़ जमीन डीएमआईसी, बीएमआईसी आर्थिक गलियारे, बैंगलोर-चेन्नई आर्थिक गलियारे, विशाखापट्टनम-चेन्नई तटीय गलियारे और ऐसी कई परियोजनाओं के लिए अधिग्रहण के संभावित खतरे के तहत आती है। कॉर्पोरेट और भू-माफियाओं को स्वछंदता प्रदान कर देने से भूमि, खनिज तथा वन्य संसाधनों के साथ सामुदायिक संपत्ति संसाधनों की लूट मची हुई है।

हम जनता के बिना पूर्व सूचित सहमति के अधिग्रहण से भूमि की सुरक्षा और जनतांत्रिक सामाजिक प्रभाव आकलन की मांग करते हैं। वन तथा खनिज संसाधनों की लूट का प्रतिरोध किया जाएगा। हम बेकार पड़ी जमीनों पर आधिपत्य तथा जमीन वापसी के नारे के तहत भूमिहीनों को भूमि के पुनर्वितरण की मांग करते हैं।

2. स्थानीय स्वशासी संस्थाओं और विकास नियोजन, वन अधिकार अधिनियम और पेसा लागू करने में उनकी भूमिका को सशक्त करो और संविधान की पांचवी और छठी अनुसूची के अनुसार संवैधानिक अधिकारों को सुनिश्चित करेः हम यह मानते हैं कि वनाधिकार अधिनियम और पेसा के प्रावधान का बेहतर क्रियान्वयन ग्राम सभाओं और पंचायतों को 73वें और 74वें संशोधन के अनुसार विकास नियोजन में उनकी संवैधानिक भूमिका को अदा करने सकने के लिए सशक्त करेगा और समुदायों को प्राकृतिक संसाधनों के उपर उनका नियंत्रण स्थापित करने और आजीविका प्राप्त करने में मदद करेगा। इन अधिनियमों को निष्प्रभावी करने का कोई भी प्रयास लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के महत्व को कम करेगा और जनांदोलन इसका किसी भी कीमत पर प्रतिरोध करेंगे। 10 दिसंबर 2016 को वनाधिकार अधिनियम की 10वीं वर्षगांठ है। भूमि अधिकार आंदोलन इस अवसर पर जंतर-मंतर, दिल्ली में एक विशाल रैली का आयोजन करेगा और इस अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन का मांग करेगा और इस अधिनियम में किसी भी प्रकार के संशोधन के प्रयास को चुनौती देगा।

3. जोतों को बड़े स्तर पर गैर-कृषि कामों के लिए जैसे कि उद्योग और ढांचागत संरचना के लिए इस्तेमाल होने से रोकने के लिए भूमि उपयोग नीति लाई जाए और साथ ही शहरी भूमि में गरीबों के लिए आवसीय योजना के लिए इस्तेमाल करने पर प्राथमकिता दी जाए, स्मार्ट सिटी के लिए नहीः  एक ऐसी सुगठित भूमि उपयोग नीति बनाई जाए जो स्पष्ट नियमन तथा जन-भागीदारी के जरिए जोतों की बड़े स्तर पर गैर-कृषि कार्यों के इस्तेमाल पर रोक लगाए। खाद्य सुरक्षा और रोजगार सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जिसमें न केवल बहु-फसलीय सिंचित भूमि पर ध्यान दिया जाए बल्कि वर्षा सिंचित एकल-फसल भूमि, जो कि जोते जाने वाले क्षेत्र का 60 प्रतिशत हिस्सा है, पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। सार्वजनिक भूमि पर, जो चारागाह जैसे सामूहिक कामों में इस्तेमाल होता हो, ग्राम सभा और पंचायतों का पूरा नियंत्रण होना चाहिए। पंचायतों और ग्राम सभाओं में यह स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए कि इन जमीनों पर दलितों और आदिवासियों जैसे सबसे ज्यादा जरूरतमंद समुदायों की पहुंच सुनिश्चित हो।
      बंजर भूमि समेत किसी भी सामुदायिक भूमि को ग्राम तथा बस्ती सभा की सहमति के बिना औद्योगिक प्रायोजनों के लिए न दिया जाए। अक्सर ऐसी भूमि पर वर्चस्वकारी जातियों और पूंजीपतियों का कब्जा हो जाता है और सरकारें इस तरफ से आंखे मूंद लेती हैं। यदि कोई कार्यवाही की भी जाती है तो वह गरीबों, दलितों और आदिवासियों के खिलाफ।
बंजर भूमि को सुधार कर कृषि भूमि में परिवर्तित करने, भू-क्षरण को रोकने के लिए हरित कवर की सुरक्षा, भू-जल के क्षरण को रोकने और कृषि भूमि में सुधार लाने तथा प्रभावी उत्पादन के लिए ज्यादा उपर्युक्त बनाने के लिए स्पष्ट प्रावधान होने चाहिए। तटीय भूमि तथा पश्चिमी घाटों जैसे नाजुक क्षेत्रों की पर्यावरण कानून तथा नियमों को लागू कर सुरक्षा की जानी चाहिए।
शहरी भूमि के इस्तेमाल की योजना बननी चाहिए जिसमें गरीबों के लिए आवास, सुविधाएं और रोजगार को प्राथमिकता दी जानी चाहिए तथा गरीब क्षेत्रों के आस-पास आवासीय परियोजनाएं बनाई जानी चाहिए। आवास के अधिकार के लिए कोई अंतिम तारीख नहीं होनी चाहिए जबकि मध्यम वर्गीय समेत सरकारी आवंटित सस्ते आवासों के लिए अंतिम तारीखें तय की जा सकती हैं। शहरी भूमि सीलिंग एक्ट को पुनः लागू किया जाना चाहिए। भूमि-उपयोग नियोजन भागीदारी आधारित होना चाहिए जिसमें 3000 परिवारों से अधिक समुदायों में जन-सुनवाइयां होनी चाहिए।

4. पर्यावरण कानून में परिवर्तन कत्तई मंजूर नहीं हैः टीएसआर सुब्रह्मनियम आयोग की सिफारिशों के आधार पर पर्यावरणीय कानूनों में ऐसे परिवर्तन किए जा रहे हैं जो कॉर्पोरेट जगत के हितों के अनुकूल हैं और जनता तथा स्थानीय स्वशासी संस्थाओं के अधिकारों को छीन रहे हैं। झोपड़पट्टियों को जबरन साफ किया जा रहा है तथा तटीय भूमि तक पर कब्जा किया जा रहा है। इस सबका परिणाम भारी संख्या में विस्थापन तथा भूमिहीनों को उनके भूमि अधिकार से वंचित करने में निकलेगा। औद्योगिकीकरण और विषेश आर्थिक क्षेत्रों के नाम पर अधिग्रहित की गई लाखों एकड़ जमीन बेकार पड़ी है।

5. अवैध खनन को बंद करो, संसाधनों की उपयोगिता में पीढियों को हस्तांतरण सुनश्चित करो और गोआ फाउंडेशन केस में सर्वोच्च न्यायलय की निर्देशिकाओं को लागू करोः अवैध खनन का दुष्प्रभाव कृषि भूमि के साथ-साथ नदी के किनारों तथा समुद्र तटों को नष्ट कर रहा है, जल स्रोतों, जल धाराओं को दूषित कर रहा है तथा पारिस्थितिकी और अर्थव्यवस्था दोनों को नष्ट कर रहा है।  बेलगाम खनन तथा आर्थिक विकास का मॉडल प्रकृति जलवायु परिवर्तन में योगदान करते हुए प्रकृति तथा धरती को तबाह कर रहा है। अंत पहुंच से बाहर (तथा इसी पैमाने पर बने) के क्षेत्रों, घने जंगलों और जलवायु संवेदी वन क्षेत्रों में खनन को बंद करने की जरूरत है।


6. कृषि संकट को संबोधित करो, सूखे से निपटने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को लागू करो, प्रत्येक किसान परिवार के लिए आय सुरक्षा सुनिश्चित करो, तथा एक स्थाई किसान आय आयोग की स्थापना करोः 1995 से अब तक लगभग 3.2 लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के अनुसार किसान आत्महत्या की दर हर घंटे पर एक किसान आत्महत्या की है। वास्तव में यह एक ऐसी मानवीय त्रासदी है जिसका उल्लेख समूचे मानव इतिहास में नहीं मिलता है। सरकार कृषि तथा ग्रामीण विकास में निवेश में भारी कटौती कर रही है, ग्रामीण ऋण गरीब तथा सीमांत किसानों की पहुंच से उत्तरोत्तर दूर होता जा रहा है, ऋणग्रस्तता तथा भूमिहीनता बढ़ती जा रही है, मनरेगा के आवंटन में भारी कटौती की जा रही है। उत्पादन लागत में वृद्धि के बावजूद किसानों को उनके उत्पादन का उचित भुगतान मूल्य नहीं मिल रहा है। कॉर्पोरेट शुगर लॉबी के पास गन्ना किसानों की लगभग 21,000 करोड़ रु. की राशि बकाया है। व्यापार में उदारवाद तथा मुक्त व्यापार अनुबंधों में असमान प्रवेश की वजह से दुग्ध उत्पादों समेत सस्ते कृषि उत्पादों की बिक्री संभव नहीं हो पा रही जिसकी वजह से हमारे किसान और ज्यादा संकट में फंसते जा रहे हैं। खरीद सुविधाओं में कटौती की जा रही है, विस्तार सेवाओं को सुनियोजित रूप से खत्म किया जा रहा है और किसानों को अपने उत्पादन लागत का बहुत कम मूल्य मिल रहा है।
पलायन की वजह से खेत मजदूरों में आ रही कमी से निपटने का एक तरीका कृषि कार्यों को मनरेगा के तहत लाना हो सकता है। इस तरह मजदूरों तथा किसानों दोनों को फायदा होगा। इसके साथ ही देश में सूखे की स्थिति से प्रभावकारी तरीके से निपटने के लिए  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्देशिकाएं जारी की गई हैं। दुर्भाग्यवश केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा इन निर्देशिकाओं के क्रियान्वयन की स्थिति बेहद खराब और धीमी रही है।

7. न्यूनतम समर्थन मूल्य कृषि लागत से 50 प्रतिशत ज्यादा घोषित होना चाहिए। खरीद, बाजार में हस्तक्षेप तथा कीमत की गारंटी के जरिए किसानों को सभी 25 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य प्राप्त हो यह सुनिश्चित होना चाहिएः भाजपा सरकार चुनावों के दौरान किए गए अपने वायदे, जिसके अनुसार स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के हिसाब से उत्पादन के लागत से 50 प्रतिशत अधिक का न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाना था, से पीछे हट गई है। उसने ऐसे राज्यों से खरीद पर भी रोक लगा दी है जो बोनस अथवा न्यूनतम समर्थन मूल्य से ज्यादा देते हैं। सरकार विश्व व्यापार संगठन में अमेरिका, यूरोपियन यूनियन तथा अन्य देशों के फरमानों की अनुपालना करते हुए खाद्य तथा कृषि छूटों में कटौती कर रही है। समूची कृषि नीति जनता के खर्चे पर बीज एकाधिकारियों तथा कृषि व्यवसायियों के मुनाफे को बढ़ाने में मदद करती है। भूमि अधिकार आंदोलन ऐसी सभी नीतियों का विरोध करता है तथा यह ऐसी वैकल्पिक नीतियां बनाने की कोशिश करेगा जो सभी के लिए भोजन तथा रोजगार के साथ-साथ आवास, स्वास्थ्य तथा शिक्षा सुनिश्चित करेगा। भूमि अधिकार आंदोलन असमान मुक्त व्यापार अनुबंधों, विश्व व्यापार संगठन के फरमानों, व्यापार उदारीकरण तथा एकाधिकारों के विरुद्ध दृढ़ता से खड़ा है।

8. भूमि सुधार लागू किया जाए; भूमि, भूमिहीन खेत मजदूरों की दी जाए न कि कॉर्पोरेट कोः भूमि सुधार पर पुनः ध्यान केंद्रित किया जाए जिससे कि वंचित तबकों जैसे कि दलित, महिलाओं, परियोजना की वजह से विस्थापित परिवारों इत्यादि को भूमि पर मालिकाना हक मिल सके। सीलिंग सीमाओं को उचित तरीके से लागू किया जाए। इसमें ऐसे अपवादों और कमियों को रोका जाए जो कुछ व्यक्तियों और कॉर्पोरेट के हाथों में हजारों एकड़ जमीन केंद्रित कर देती हैं। अतिरिक्त भूमि को वितरण के लिए उपलब्ध किया जाए।

9. खाद्य पर प्रभुत्व तथा खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जाए खाद्य वितरण प्रणाली में भारी भ्रष्टाचार को खत्म किया जाएः  खाद्य सुरक्षा का मतलब सिर्फ कम कीमत पर भोजन देना नहीं बल्कि समुदायों को अपना खाद्य खुद पैदा कर सकने के योग्य सशक्त करना तथा भूमि अधिकार को सुरक्षित करना है जो उन्हें आत्मनिर्भर बनाएगा। इस संबंध में यह भी जरूरी है कि किसानों का बीज के ऊपर तथा उत्पादन प्रणाली के उपर नियंत्रण हो और उन्हें बौद्धिक संपत्ति का अधिकार करने का दावा करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों का गुलाम नहीं बनाना चाहिए। किसी भी कंपनी को बीजों के उपर बौद्धिक संपत्ति का अधिकार नहीं मिलना चाहिए।

हालांकि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के बेहतर क्रियान्वयन की भी आवश्यकता है, जो बहुत से राज्य नहीं कर रहे हैं। भ्रष्टाचार उन्मूलन के नाम पर राशन को आधार कार्ड तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक पहचान कार्यक्रमों से जोड़ा जा रहा है जिसकी वजह से एक बड़ी आबादी इससे बाहर हो रही है। सरकारी प्रणालियों की अप्रभाविकता एक बड़ी संख्या में गरीब तथा कमजोर आबादी को उनकी हकदारियों से वंचित कर देती है।

10. काश्तकारों, बटाईदारों, महिला किसानों के अधिकारों को कायम करना होगा। वास्तविक किसानों को पूर्ण मान्यता तथा समर्थन प्रणाली के सभी लाभ मिलने चाहिएः देश के कई हिस्सों में काश्तकार, बटाईदार और महिला किसान कृषि संकट से सबसे बुरी तरह से प्रभावित हैं क्योंकि उन्हें कम ब्याज पर बैंकों से ऋण, आपातकाल मुआवजा, फसल बीमा, छूटें इत्यादि समेत सरकारी समर्थन प्रणाली के समस्त फायदों में बचा-खुचा ही मिलता है। वे ही वह असली उत्पादक हैं जो कि न सिर्फ कठिन परिश्रम करते हैं बल्कि उत्पादन के तमाम खतरें भी लेते हैं। काश्तकार तथा बटाईदार कुल क्षेत्र की 30 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से पर खेती करते हैं और महिलाएं कृषि कार्य का 70 प्रतिशत से ज्यादा काम करती हैं। उनके अधिकारों की सुरक्षा होनी चाहिए। काश्तकार, बटाईदार तथा महिला किसानों समेत वास्तिवक उत्पादकों को पहचानने और उनका रिकॉर्ड रखने के लिए एक परिपूर्ण व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे कि उन्हें सरकारी समर्थन प्रणाली के सभी फायदे तथा भूमि अधिग्रहण की सूरत में सभी प्रावधानों के लिए पात्रता मिल सके। नीति आयोग द्वारा लागू मॉडल काश्तकारी अधिनियम वापस होना चाहिए।

11. उच्च निविष्टियों वाली रासायनिक कृषि से लघु-बाहरी निविष्टियों के साथ पारिस्थितिक रूप से स्थाई कृषि की तरफ जाने के लिए सघन सहयोगः कृषि में संकट के बड़े कारणों में से एक वह उच्च निविष्टियों वाला  रासायनिक कृषि मॉडल है जिसे पिछले कुछ दशकों में प्रोत्साहित किया गया है। इस मॉडल की वजह से ऋणग्रस्तता, मिट्टी की ऊर्वरता को नुकसान, उत्पादकता में कमी, पानी का क्षरण तथा भोजन एवं जल प्रणाली को जहरीला बनाना प्रभावी हुआ है। उत्पादन तथा उत्पादकता के महत्व को स्वीकार करते हुए स्थाई उत्पादाकता पर जोर दिया जाना चाहिए। नीतियों तथा समर्थन प्रणाली को इस तरह पुनर्भिविन्यासित करना चाहिए जिससे की एक निश्चित समय सीमा में लघु-बाहरी निविष्टियों के साथ पारिस्थितिक रूप से स्थाई कृषि की तरफ जाएं। इसके लिए बहुत से व्यवहार्य मॉडलों का इस्तेमाल किया जा सकता है जिन्हें भारत भर में पिछले दो दशकों में स्थापित किया गया है।

12. वर्षा पर निर्भर कृषि के साथ हुई नाइंसाफी को खत्म करोः भारतीय कृषि का 60 प्रतिशत हिस्सा वर्षा द्वारा सिंचित होने के बावजूद इस क्षेत्र को सिंचित कृषि की तुलना में उपेक्षित रखा जाता है। जिसकी वजह से कृषि का ज्यादा संकट तथा किसान आत्महत्याओं की ज्यादातर घटनाएं वर्षा से सिंचित क्षेत्रों में ही होती हैं। हम मांग करते हैं कि वर्षा से सिंचित कृषि को पुनर्जीवित करने के लिए एक सघन अभियान लिया जाए। इसके तहत शुष्क भूमि की फसलों, पशुपालन और चारा पैदा करने को प्रोत्साहन दिया जाए, लघु सिंचाई को पुनःविकसित किया जाए और लक्षित सहयोग प्रदान किया जाए। वर्षा से सिंचित क्षेत्रों में पहली फसल को सुरक्षित सिचांई उपलब्ध कराना चाहिए बनस्पत दूसरी तथा तीसरी फसल के लिए सिंचाई के।

13. जल के स्रोतों का निजीकरण नहीं होना चाहिए, पीने, घरेलू इस्तेमाल और कृषि को प्राथमिकता दी जानी चाहिएः जल का मानव जीवन और खाद्य उत्पादन के लिए एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन के रूप में सम्मान किया जाना चाहिए तथा जल स्रोतों के निजीकरण तथा इस पर कॉर्पोरेट का नियंत्रण स्थापित करने के प्रयासों को तत्काल रोका जाना चाहिए। पानी के पीने, घरेलू इस्तेमाल और कृषि को अन्य उपयोगों के उपर प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके बाद खाद्य फसलों तथा शुष्क क्षेत्रों में एक फसल सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। भूमिहीन परिवारों को भी जल पर अधिकार दिया जाना चाहिए। इससे पानी का ज्यादा समानतापूर्ण इस्तेमाल सुनिश्चित होगा तथा भू-स्वामित्व में गैर-बराबरी खत्म करने में मदद मिलेगी।

14. जनता में फूट डालने वाली तथा फासीवादी राजनीति का विरोधः केंद्र और राज्यों में भाजपा सरकार की नीतियों के प्रति बढ़ते प्रतिरोध और जनता की अभूतपूर्व एकता को देखते हुए भाजपा-आरएसएस और उसके लघुए-भगुए जानबूझकर सांप्रदायिकता का सहारा लेकर जनता के बीच फूट डालने की कोशिश कर रहे हैं। तार्किक तरीके से सोचने वालों पर हमला किया जा रहा और उनकी हत्या की जा रही है। असहमति को क्रूरतापूर्वक कुचला जा रहा है। गौ-रक्षा के नाम पर अल्पसंख्यकों और दलितों को निशाना बनाया जा रहा है। देश के विभिन्न भागों में सचेतन सांप्रदायिक तथा जातिवादी हिंसा फैलाई जा रही है। ऐसे प्रयासों के विरुद्ध त्वरित प्रतिरोध विकसित हो रहा है। भूमि अधिकार आंदोलन ऐसे फूट डालने वाले प्रयासों का प्रतिरोध करेगा और सांप्रदायिक सद्भावना के निर्माण और मेहनतकश जनता की एकता को सशक्त करने के लिए काम करेगा।

15. विश्वविद्यालयों की स्वायत्ता पर हमलों , शिक्षा के कॉर्पोरेटीकरण और विश्वविद्यालयों के भीतर अंसतोष के स्वर को दबाए जाने पर रोक लगाओ तथा रोहिथ एक्ट लागू करोः देश भर में विश्वविद्यालयों में उथल-पुथल मची हुई है। छात्रों के उपर हमले बढ़ते जा रहे हैं और किसी भी तरह के अंसतोष, मुक्त चिंतन और विचारों के मुक्त प्रवाह को तुरंत दबाने का प्रयास किया जाता है। शिक्षा का कॉर्पोरेट एजेंडा और उनका बाजार की मांग के हिसाब से उसका परिवर्तित होना पूरी तरह से शिक्षा नीति को नियंत्रित कर रहा है जिसकी वजह से शिक्षा से जनतांत्रिक सिद्धांत और मूल्य पूरी तरह से गायब हो रहे हैं जो कि किसी भी सशक्त जनवाद के लिए बेहद जरूरी है।
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