गुजरात मॉडल की सच्चाई : आंकड़ों के फर्जीवाड़े और पसंदीदा कार्पोरेटों की लूट का मॉडल


भूमि अधिकार आंदोलन के बैनर तले चल रहे तीन दिवसीय जनसंघर्षों के राष्ट्रीय सम्मेलन  के दूसरे दिन 17 जुलाई 2016 को गुजरात मॉडल की वास्तविकता पर चर्चा की गई। जिस गुजरात मॉडल को आज देश में बेचने की कोशिश की जारही है दरसल वह मॉडल आदिवासियों, दलितों और मजदूरों के हको के खून पर खड़ा है । इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गुजरात में जहां एक तरफ उद्योग और ऊर्जा के क्षेत्र में जीडीपी का 78 प्रतिशत खर्च किया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण का हिस्सा 2 प्रतिशत से भी कम है। जहां आम आदमी के लिए पीने का पानी नहीं है वहीं  उद्योगों को पानी 10 रु. प्रति 1000 लीटर की दर से दिया जा रहा है। श्रम और प्राकृतिक संसाधनों की लूट पर टिके गुजरात मॉडल की विस्तृत रिपोर्ट हम यहां आपके साथ साझा कर रहे हैं। इस पर आपके विचार आमंत्रित हैं;

अहमदाबाद, 17 जुलाई 2016;  गुजरात विद्यापीठ में हो रहे जनसंघर्षों के राष्ट्रीय सम्मेलन के आज दूसरे दिन गुजरात के प्रख्यात अर्थशास्त्री रोहित शुक्ला, समाजशात्री घनश्याम शाह और पर्यावरणविद रोहित प्रजापति ने गुजरात मॉडल से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्यों की जानकारी देते हुए सम्मेलन के प्रतिनिधियों को गुजरात के मॉडल की हकीकत से परिचित कराया। ज्ञात रहे कि इस सम्मेलन में देश के 15 राज्यों से आए जनसंघर्षों के 250 से ज्यादा प्रतिनिधि हिस्सेदारी कर रहे हैं।

सम्मेलन को संबोधित करते हुए अर्थशास्त्री रोहित शुक्ला ने बताया कि गुजरात मॉडल में मुख्यतः दो बातों का दावा किया जाता है पहला गुजरात सरकार द्वारा उद्योगपतियों के साथ साइन किए गए एमओयू और दूसरे गुजरात का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी)। उन्होंने कहा कि यदि हम थोड़ा गहराई में जाकर चीजों की छान-बीन करते हैं तो पता चलता है कि यह दोनों ही तथ्य कितने भ्रामक हैं। उद्योगपतियों के साथ साइन किए गए एमओयू में उद्योगपति यह तो बताते हैं कि वह कितना निवेश करेंगे किंतु कभी भी यह नहीं बताते हैं कि यह निवेश कब तक होगा। और कितने लोगों को रोजगार मिलेगा. जीडीपी के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा कि जीडीपी घटने या बढ़ने के पीछे कई कारक होते हैं। इसलिए जीडीपी के आंकड़े कभी भी विकास का पैमाना नहीं हो सकते हैं।

असल प्रश्न यह है कि इसमें जनता कहां हैं। रोहित ने विभिन्न राज्यों के दर का उल्लेख करते हुए कहा कि बिहार की जीडीपी की दर भी गुजरात की जीडीपी से कहीं ज्यादा है। उन्होंने कहा गुजरात सरकार का दावा है कि गुजरात की कृषि विकास की दर 14 प्रतिशत के करीब है जो कि समस्त भारत के कृषि विकास दर से भी ज्यादा है और इसका मुख्य कारण सिंचाई है। किंतु गहराई से देखने पर यह हकीकत सामने आती है कि कुछ अस्थाई कारकों की वजहों से यह दर कुछ अल्पकालिक अवधि के लिए बढ़ी थी जिसे सरकारी रिकॉर्डों में दर्ज कर प्रचारित-प्रसारित कर दिया गया जबकि यह आंकड़े स्थाई नहीं थे। इसी तरह से बीटी कॉटन की एक फसल के दम पर किसानों का मुनाफा दिखा दिया गया जबकि असलियत यह है कि आज गुजरात में कपास का किसान आत्महत्या करने पर मजबूर है। हकीकत यह है कि गुजरात के जीडीपी का शिक्षा के क्षेत्र में कुल खर्च 2 प्रतिशत, पोषण पर 0.25 प्रतिशत और स्वास्थ्य पर 0.26 प्रतिशत है जबकि वहीं ऊर्जा और उद्योग के क्षेत्र में 78 प्रतिशत खर्च किया जा रहा है।

गुजरात के विकास के दावों की असलियत वहीं सामने आ जाती है, जहाँ हम देखते है कि अधिकतर राज्यों में 15-17 आयु वर्ग की लड़कियों की स्कूल जाने का प्रतिशत 90 के आस-पास है वही गुजरात में यह मात्र 74 प्रतिशत है। राज्य में कुपोषण के हालात काफी विकराल हैं। राज्य में 0-6 आयु वर्ग के 47 प्रतिशत बच्चे कुपोषित है।

पयावर्णविद रोहति प्रजापति ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि गुजरात मॉडल में सभी कुछ मुख्यमंत्री कार्यालय से तय होता हैं अन्य विभागों की इसमें कोई भूमिका नहीं होती है और अब कमोबेश यही चीज पूरे देश में लागू हो रही है जहां पर सभी निर्णय एक ही कार्यालय-प्रधानमंत्री कार्यालय से लिए जाते हैं। उन्होंने ने लोकतंत्र के हालत का जिक्र करते हुए कहा कि गुजरात मॉडल में आपातकाल घोषित नहीं है किंतु वह लागू किया जाता है। यहां पर सामाजिक कार्यकर्ता सार्वजनिक स्थलों पर खुले-आम बैठक कर ही नहीं सकते हैं। उन्हें बैठक करने के लिए शमशान और रेलवे स्टेशनों जैसी जगहों का इस्तेमाल करना पड़ता है जहां पर धारा 144 लागू नहीं की जा सकती है।

प्रजापति ने राज्य में गुजरात मॉडल के तहत दिए जा रहे रोजगार के आंकड़ों की पोल खोलते हुए बताया कि गुजरात का विकास दरअसल रोजगार समाप्त करने का विकास है। यहां पर बड़े उद्योगों के आ जाने से छोटे उद्योगों के बंद हो जाने की वजह से रोजगार संकट की चर्चा नहीं हो रही हैं बल्कि जो पहले से स्थापित कंपनिया हैं वह भी लगातार अपने यहां रोजगार में कटौती कर रही हैं। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ऐलेम्बिक जैसी बड़ी फार्मा कंपनी जहां 4500 मजदूर काम करते थे वहां पर आज मात्र 350 मजदूर काम कर रहे हैं। यह कंपनियां न सिर्फ मजदूरों की संख्या कम कर रही हैं बल्कि उनकी न्यूनतम मजदूरी तथा उनको मिलने वाली सुविधाओं को भी लगातार खत्म किया जा रहा है। गुजरात में आज न्यूनतम मजदूरी, इएसआई, पीएफ जैसी कोई भी सुविधा नहीं दी जा रही इसलिए आज इन परिस्थितियों में उद्योगपति निवेश करने को लालायित हैं क्योंकि मजदूरी में होने वाली कटौती मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा बनती है।

राज्य में भूमि अधिग्रहण के लिए किस तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने आगे कहा कि मीठी वर्दी न्यूक्लियर पावर प्लांट में प्रशासन द्वारा पंचायतों को प्रस्ताव तैयार करके इन स्पष्ट निर्देशों के साथ भेजा गया कि यह प्रस्ताव पारित होना ही है। पंचायतों के पास कोई और विकल्प था ही नहीं। प्रस्ताव पास न होने की स्थिति में बुरा अंजाम होने की धमकी लिखित में पंचायतों को दी गई थी।

गुजरात विकास मॉडल में पानी की लूट स्पष्ट दिखती है जहां आम आदमी 20 रु. प्रति लीटर पानी खरीद कर पीता है वहीं गुजरात सरकार उद्योगों को 10 रु. में 1000 लीटर पानी दे रही है। इसमें गौरतलब है कि यह पानी नर्मदा नदी पर बने बांध से दिया जा रहा है। पर्यावरण प्रदूषण गुजरात में विकराल रूप लेता जा रहा है। 2006 में आई सीपीए की रिपोर्ट के अनुसार 88 औद्योगिक कलस्टरों का अध्ययन किया गया जिसमें गुजरात प्रदूषण के मामले देश में पहले नंबर पर पाया गया। प्रदूषण का आलम यह है कि राज्य में कई क्षेत्रों में भू-जल पूरी तरह से दूषित हो चुका है। पीने का पानी ज्यादातर जगहों पर लाल दिखता है। हालत यह है कि फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर तक लाल या हरे रंग के दिखते हैं। गुजरात के विकास का यह कुप्रभाव सिर्फ गुजरात की जनता ही नहीं झेल रही है बल्कि प्रदूषित जल क्षेत्र में उगने वाली सब्जियां, इन इलाकों के पशुओं से मिलने वाला दूध इत्यादि देश के कोने-कोने में जाकर सभी जगहों पर लोगों को प्रभावित कर रहा है।

राज्य के प्रख्यात समाजशास्त्री घनश्याम शाह ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि किसी भी राज्य के विकास का अपना कोई मॉडल नहीं होता है। विकास का मॉडल राष्ट्रीय सरकारें ही तय करती हैं। उद्योगपतियों द्वारा गुजरात मॉडल को प्रचारित प्रसारित करने की प्रमुख वजह यह है कि यहां पर सस्ता मजदूर और तकनीक उपलब्ध करवाई जाती है जिससे कि उद्योगपति अकूत मुनाफा कमा सके। यह विश्व बैंक तथा अंतराष्टीय मुद्रा कोष की नीतियों के अनुरूप बनाया गया मॉडल है. 60 के दशक में जब गुजरात राज्य का निर्माण हुआ तब देश में भूमि सुधार का दौर चल रहा था, लेकिन राज्य में भूमि सुधार का फायदा वर्चस्वकारी समूहों को ही मिला। आदिवासी, दलितों को कुछ हासिल नहीं हुआ। लैंड सीलिंग के समय दलित आदिवासियों ने संघर्ष करके कुछ भूमि हासिल की परंतु 1994 के आते-आते आदिवासियों और दलितों की जमीन सुरक्षा के लिए जो प्रावधान थे उनको खत्म कर दिया गया। अब एक आदिवासी की जमीन गैर-आदिवासी भी खरीद सकता था। इसका नतीजा यह हुआ कि गुजरात की एक-चौथाई कृषि भूमि औद्योगिक भूमि बन गई।

उन्होंने कहा कि गुजरात मॉडल के नाम पर सार्वजनिक पैसे से निर्मित सार्वजनिक उपयोग की जगहों को भी मुनाफे के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा चाहे वह कांकरिया का पार्क हो, रिवर-फ्रंट हो या फिर सूरत कॉर्पोरेशन का साइंस सेंटर हो। गुजरात के विकास मॉडल की वास्तविकता पर आधारित इस सत्र का संचालन माइन्स मिनरल एंड पीपल्स के अशोक श्रीमाली ने किया। आज सम्मेलन के दूसरे दिन के चौथे सत्र में अखिल भारतीय किसान सभा के वीजू कृष्णनन ने सम्मेलन का प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिस पर पच्चसी से अधिक संगठनों के साथियों ने अपने सुझाव एवं टिप्पणियां रखीं। प्रस्ताव को कल सम्मेलन के प्रतिनिधियों द्वारा पारित किया जाएगा। सत्र का संचालन किसान संघर्ष समिति से डॉ. सुनीलम ने किया।
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