नर्मदा बांध की ऊंचाई अवैध ढंग से बढ़ी, गुजरात में 30 किमी अंदर आया समुद्र : मेधा पाटकर


सरदार सरोवर बांध को लेकर बरती जा रही अनियमितताएं एवं तानाशाही रवैया अब अपने चरम पर पहुंच चुका है। इस वर्ष अवैध तरीके से गेट्स को बंद करके म.प्र. के निमाड़ और महाराष्ट्र के सैकड़ों गांवों के 50000 परिवारों को गैरकानूनी ढ़ंग से लादी जा रही डूब का शिकार बनाने की साजिश जारी है। गौरतलब है इस बांध की सच्चाई अब मध्यप्रदेश एवं महाराष्ट्र के बाद गुजरातवासियों को भी स्पष्ट दिखाई देने लगी है।

सरदार सरोवर जलाशय के कारण पर्यावरण पर पड़ रहे अनेक प्रतिकूल प्रभावों की बात नई नहीं है। वर्ष 1985 से ही नर्मदा बचाओ आंदोलन ने बांध संबंधित विविध मुद्दे उठाए हैं जिसमें विस्थापन व पुनर्वास, भूकम्प का खतरा, स्वास्थ्य पर असर, लाभ क्षेत्र में दलदलीकरण का असर आदि के साथ एक महत्व का मुद्दा था सरदार सरोवर बांध के निचले निवास स्थलों के 51 कि.मी. दूरी तक के क्षेत्र पर समुद्र के गंभीर असर का अध्ययन। बड़े बांध की वजह से इस समस्या का अध्ययन और वैज्ञानिक आकलन जरूरी था।

इसके बाद ही इससे संबंधित योजना बनाना कारगर होता। सन् 1987 में बांध को दी गई मंजूरी सशर्त थी लेकिन दुर्भाग्यवश उसमें इस मुद्दे का संज्ञान नहीं लिया गया था। इसके बाद नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण की हर बैठक में सन् 2013 तक इसकी मात्र चर्चा होती रही और कहा गया कि निचले निवास पर प्रभाव संबंधी अध्ययन जारी है लेकिन उसके अपूर्ण होने के कारण योजना नहीं बन पायी है। यही बात प्रत्येक वार्षिक रिपोर्टाें में लिखी जाती रही। सन् 2013 से तो यह मुद्दा रिपोर्टाें में से गायब ही हो गया।

पिछले कुछ सालों से सरदार सरोवर के नीचे के गांवों व शहरों पर भी बांध एवं समुद्र दोनों का असर आना शुरु हो गया है। जनता गर्मी में सूखा और बारिश के मौसम में बाढ़ का चक्र भुगतने को अभिशप्त हो गई है। एक से अधिक बार बड़े पैमाने पर मछलियां मरी एवं किनारे पर आकर इकट्ठा हो गई। समुद्र के नजदीक के गांवों में जमीन और खेती प्रयोग में आने वाले सतह जल के अलावा अब भूजल में भी खारापन आना शुरु हो गया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने जून 2014 के बाद सरोवर बांध की ऊंचाई 122 से 139 मी. तक बढ़ाने का निर्णय कानून,अदालत के आदेशों, पुनर्वास नीति, पर्यावरणीय समस्याएं, जांच रिपोटर््स की अनदेखी तथा मानव अधिकारों का उल्लंघन करते हुए ले लिया। विरोध के बावजूद इस कार्य को जल्दबाजी में पूरा किया गया। कई बार पत्र लिखने के बावजूद प्रधानमंत्री ने नर्मदा बचाओ आंदोलन से चर्चा करना गवारा नहीं किया।

बांध के गेट्स लगाने व मंजूरी न होते हुए बंद  रखे जाने से समुद्र गुजरात की जमीन और पानी पर अतिक्रमण करते हुए 30 कि.मी. तक अंदर आ गया है। भड़ूच औद्योगिक क्षेत्र में कई उद्योग बंद हो गये हैं। उन्होंने प्रतिनिधिमंडल के द्वारा मुख्यमंत्री को समस्या बतायी और मांग रखी कि उन्हें पर्याप्त मात्रा में शुद्ध पानी दिया जाए। कांग्रेस और भाजपा के निचले वास के नेताओं ने दल की कई सभाओं का बहिष्कार किया। कांग्रेस के अहमद पटेल ने पहली बार नर्मदा बचाने की मांग की। इसके बाद कुछ पानी छोड़ा गया। किन्तु आज भी समस्या कायम है। अब तक इसका संतोषजनक हल नहीं निकला है और न ही सरकार इसके प्रति गंभीर है। सरदार सरोवर जलाशय के गेट्स बंद करने की तैयारी  आज भी चल रही है।

हम सब जानते हैं कि इस मुद्दे पर विश्व बैंक की मोर्स कमेटी रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने गंभीर आपत्ति उठायी थी। फिर वॉलिंग फॉर्ड नामक अंतरराष्ट्रीय सलाहकार की नियुक्ति हुई और 600 क्यूसेक पानी छोड़ने का निर्णय हुआ। म.प्र. ने आपत्ति उठाई कि गुजरात और म.प्र. में से किसके हिस्से का पानी छोडे  इस पर विवाद भी खड़ा हुआ। आखिर में समझौता तो हुआ, लेकिन निर्णय का पूरा पालन नहीं हुआ और न ही किसी ने इस समस्या पर चिंता दिखाई दी। सन् 2005 से लेकर सन् 2013 तक की नर्मदा नियंत्रण  प्राधिकरण की रिपोटर््स तथा पर्यावरणीय उपदल की बैठकों का विवरण पढ़ने से मालूम होता है कि हर बार बस यही निष्कर्ष निकालकर कहा गया कि अध्ययन अधूरे हैं और इसी कारण योजना नहीं बनी है।

वर्ष 2013 के बाद तो अन्य पर्यावरणीय मुद्दों की तरह यह विषय भी चर्चा से बाहर हो गया। जबकि सन् 2001 में गठित केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की देवेन्द्र पाण्डे कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में अध्ययन और नियोजन के अभाव में बांध के गुजरात पर होने वाले गंभीर असरों के बारे में आगाह किया था। इसके बावजूद इन पर ध्यान न देते हुए बांध को आगे धकेलकर, विस्थापितों के साथ गुजरात के ही हजारों खेतीहर,मछुआरों, ग्राम व शहरवासी तथा परिक्रमा करने वालांे पर भी खतरा मंडरा रहा है। गुजरात की 18 ग्रामसभाओं ने इसकी भर्त्सना की है। 15 जुलाई से हजारों विस्थापित आदिवासी भी केवड़िया कॉलोनी स्थित बांध स्थल के पास धरना व उपवास शुरु कर चुके हैं।

साभार : सप्रेस
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