जनसंघर्षों के राष्ट्रीय सम्मेलन के तीसरे और अंतिम दिन सुबह 10 बजे से खुला सत्र


भूमि अधिकार आंदोलन के बैनर तले अहमदाबाद के गुजरात विद्यापीठ में आयोजित हो रहे जनसंघर्षों के राष्ट्रीय सम्मेलन का कल तीसरा और अंतिम दिन है। सम्मेलन में आए विभिन्न जनसंघर्षों के प्रतिनिधियों ने जल-जंगल-जमीन और जनतंत्र की लूट के राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य तथा आंदोलनों की वस्तुगत स्थिति पर बात-चीत की। सम्मेलन में निकल कर आई जनसंघर्षों की चुनौतियों  और आगे की रणनीति पर चर्चा के लिए कल,18जुलाई 2016 को, सम्मेलन के तीसरे दिन  सुबह 10 बजे से 1:30 बजे तक एक खुले सत्र का आयोजन किया गया है। आप सभी इस खुले सत्र की चर्चा में भाग लेने के लिए आमंत्रित हैं।

जनसंघर्षों का राष्ट्रीय सम्मेलन  
भूमि अधिकार आंदोलन तमाम अन्य जनवादी संगठनों तथा जनता के हकों के लिए लड़ रहे जनसंघर्षों के साथ मिलकर एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन कर रहा है।

खुला सत्र
18 जुलाई को सुबह 10 बजे से 1.30
स्थान : गुजरात विद्यापीठ
निकट- इनकम टैक्स सर्किल,
आश्रम रोड अहमदाबाद-380014, गुजरात
स्थानीय संपर्क
मुजाहिद 09328416230
हिरेन गाँधी 09426181334

साथियो,

मौजूदा दौर देश के मजदूरों, किसानों और समस्त मेहनतकश जनता के लिए एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण दौर है। भारतीय राजसत्ता बहुत ही मुखर रूप से तमाम पूंजीवादी कॉर्पोरेट घरानों के साथ मिलकर मेहनतकश जनता का शोषण-उत्पीड़न कर रही है। देशी-विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए आम जनता के जल-जंगल-जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को अत्यंत ही सस्ते और सुलभ तरीके से उन्हें उपलब्ध करवाया जा रहा है।

देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनिया देश के कोने-कोने में जाकर वहां निहित प्राकृतिक संसाधनों, कोयला, यूरेनियम इत्यादि, पर अपना कब्जा जमा रही हैं। ज्यादातर खनन के क्षेत्र आदिवासी बहुल इलाकों में पड़ते हैं। इन आदिवासियों का अपने जंगल और जमीन पर सार्वभौमिक अधिकार है, लेकिन उन्हें अपनी विरासत से वंचित कर अब बहुराष्ट्रीय कंपनियां उन पर अपना कब्जा जमा रही हैं और इसमें मदद कर रही हैं देश की केंद्र तथा राज्य सरकारें।

केंद्र में भाजपा नीत मोदी सरकार के आने के बाद से स्थिति बद से बदतर ही हुई है। जहां एक तरफ इस सरकार ने इन तमाम नीतियों के क्रियान्वयन में तेजी दिखाई है तो वहीं दूसरी तरफ इस उत्पीड़न और लूट का विरोध करने वाले जनवादी-क्रांतिकारी संगठनों और उनके कार्यकर्ताओं का देश-द्रोह के नाम पर बर्बर दमन किया है।

मोदी सरकार जमीन की लूट को और सुलभ बनाने के लिए भूमि अधिग्रहण विधेयक, 2015 लेकर आई। किंतु जब केंद्र सरकार व्यापक जन विरोध के बाद संशोधनों को अमल में नहीं ला सकी तो उसने राज्यों को अपने हिसाब से कानून बनाने का अधिकार दे दिया। यह राज्य के कानून ठीक वही हैं जो कि अध्यादेश लाकर पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए मोदी सरकार ने प्रयास किया था। गुजरात में पिछले विधानसभा सत्र में कानून पास कर पूंजीपतियों को जनता की जमीन देने के लिए कानूनी जामा पहना दिया गया है और इसी गुजरात के विकास मॉडल को पूरे देश में लागू करने के पुरजोर प्रयास किए जा रहे हैं।
सरकार कॉर्पोरेट पक्षधर नीतियों को बनाने व लागू करने में जिस तरह की तेजी दिखा रही है उससे उनके अच्छे दिन के नारे व लोगों की अपेक्षाएं पूरी न होना स्पष्ट दिख रहा है। यह सरकार खुदरा क्षेत्र में ही नहीं बल्कि रक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी देकर पूंजीपतियों के लिए इन क्षेत्रों के दरवाजे भी खोल रही है। पूंजीपतियों को कोई सामाजिक जिम्मेदारी न उठानी पड़े उसके लिए श्रम कानूनों में सुधार, पर्यावरणीय कानूनों को खत्म करना और किसी भी कीमत पर भूमि देने के लिए कानून बनाना, इस सरकार का मुख्य एजेंडा हो गया है।

प्रधानमंत्री और उनकी सरकार सांप्रदायिक दंगों पर तो खामोश रहती है लेकिन जमीन की लूट को कानूनी जामा पहनाने में सबसे आगे रहती है। प्राकृतिक संसाधनों की कॉर्पोरेट लूट इस देश के लोकतंत्र के लिए व इन पर निर्भर समुदायों के लिए गंभीर खतरा है। समुदायों द्वारा समय-समय पर आंदोलनों के जरिए इस अन्याय का कड़ा प्रतिरोध किया है।

गुजरात देश के सबसे बड़े समुद्र तटीय क्षेत्र वाले राज्यों में से एक है। इस पूरे तटीय क्षेत्र में थर्मल पावर प्लांट व रसायनिक संयंत्र को मंजूरी देकर इस क्षेत्र के पर्यावरण व मछुआरा समुदाय की आजीविका को समाप्त कर दिया गया है। वनाधिकार अधिनियम के तहत राज्य में सामुदायिक वनाधिकार दावों की स्थिति शून्य जैसी ही है। गुजरात में देश के दो बड़े कॉरिडोर के नाम पर लाखों हेक्टेयर भूमि को जबरन छीनने का प्रयास जारी है।

देश के तमाम मेहनतकश किसान, मजदूर, कर्मचारी, लघुउद्यमी, छोटे व्यापारी, दस्तकारों, मछुवारे, रेहड़ी-पटरी वाले और इनके समर्थक प्रगतिशील तबकों के लिए यह अत्यंत चुनौतीपूर्ण दौर है। अब शासकीय कुचक्रो के खिलाफ संघर्ष के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। जनसंघर्षों से लंबे समय से जुड़े हुए संगठन ऐसी परिस्थिति में स्वाभाविक रूप से करीब आ रहे हैं, और सामूहिक चर्चा की प्रक्रिया शुरु हो गई है। इसी क्रम में 16, 17, 18 जुलाई को गुजरात के अहमदाबाद शहर में भूमि अधिकार आंदोलन तमाम अन्य जनवादी संगठनों तथा जनता के हकों के लिए लड़ रहे जनसंघर्षों के साथ मिलकर एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन हो रहा है जिसमे देश के 14 राज्यों से 300 प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं|

हम सभी जनवाद पसंद ताकतों से अपील करते हैं कि वे तीन दिवसीय सम्मेलन के अंतिम दिन होने वाले खुले सत्र में भाग लें
18 जुलाई को सुबह 10 बजे से 1.30
स्थान- हीरक महोत्सव हाल, गुजरात विद्यापीठ, आश्रम रोड, अहमदाबाद, गुजरात

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एक दूसरे के संघर्षों से सीखना और संवाद कायम करना आज के दौर में जनांदोलनों को एक सफल मुकाम तक पहुंचाने के लिए जरूरी है। आप अपने या अपने इलाके में चल रहे जनसंघर्षों की रिपोर्ट संघर्ष संवाद से sangharshsamvad@gmail.com पर साझा करें। के आंदोलन के बारे में जानकारियाँ मिलती रहें।