मोदी का विकास मॉडल : देश के पर्यावरण और आदिवासियों के लिए विनाश का मॉडल हैं


हसदेव अरण्य बचाओ सघर्ष समिति और छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन  के द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर   5 जून 2016 को छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के मदनपुर गाँव में एक दिवसीय ग्राम सभाओं  की भुमिकाओं और चुनोतियों पर सम्मलेन का आयोजन. इस सम्मलेन में हसदेव अरण्य क्षेत्र की ग्राम सभाओ और पंचायत  के प्रतिनिधियों सहित 1000 से अधिक ग्रामवासी उपस्थित थे .सम्मेलन में दलित आदिवासी मंच सोनाखान, गाँव गणराज्य अभियान, भारत जन आन्दोलन, मार्क्सवाद  कम्युनिस्ट पार्टी, किसान सभा, अखिल गोंडवाना महासंघ, छात्तिस्गढ़ बचाओ आन्दोलन से जुड़े हुए घटक संगठन के साथी भी शामिल हुए .

ब्लॉक पोड़ी  उपरोड़ा के जनपद सदस्य श्री उमेश्वर सिंह अर्मो ने कहा कि एक तरफ प्रधानमंत्री अपने मन की बात में पर्यावरण के विनाश और वनों की कटाई की चिंता जाहिर करते हैं वही दूसरी और घने और पर्यावरणीय संवेदनशील वन क्षेत्रों में खनिजों के उत्खनन के लिए स्वीकृति प्रदान कर रहे हैं .

छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन के संयोजक  आलोक शुक्ला ने कहा की हसदेव अरण्य क्षेत्र जेसे कई महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों को खनन से मुक्त रखने के लिए नो गो क्षेत्र के प्रावधान को न सिर्फ ख़त्म किया जा रहा हैं बल्कि कोयला खदानों की नीलामी /आवंटन किया जा रहा हैं | कार्पोरेट पूंजी के विकास के लिए सभी सरकारें हमारे तमाम संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन करने से भी नहीं चूक रहीं हैं .

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव का. संजय पराते ने कहा की हम प्रधानमंत्री से पूछते हैं की 125 करोड़ लोगों में इस देश के 10 करोड़ आदिवासी उनके नागरिक हैं की नहीं, जिनके जल, जंगल, जमीन के अधिकारों की उन्हें रक्षा करनी हैं . उन्होंने कहा की सरकार की नीतियाँ आदिवासियों का सामूहिक शिकार कर रही हैं l मोदी का विकास मॉडल इस देश के पर्यावरण  आदिवासियों के विनाश का मॉडल हैं .

अखिल भारतीय किसान सभा के का. नन्द   कश्यप ने छत्तीसगढ़ में औद्योगीकरण के मॉडल से हो रहे पर्यावरण दुष्प्रभाव का उल्लेख कर कहा की यदि छत्तीसगढ़ के घने वनों का विनाश जारी रहा तो इसकी कीमत सिर्फ प्रदेश ही नही बल्कि पुरे देश के नागरिको को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी .

आप पार्टी के एडवोकेट अमरनाथ पाण्डेय ने कहा लगातार वनाधिकार मान्यता कानून के उल्लंघन और मानवाधिकारों के हनन पर चिंता जताते हुए कहा की सरकार ग्राम सभाओं के सशक्तिकरण की जगह उनको कमज़ोर बनाने की कोशिश कर रह  है और उनके पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों पर पानी फेरने का काम कर रही है.

दिल्ली  कम्युनिस्ट पार्टी की कोरबा इकाई  महासचिव का. सम्पूर्णानन्द  ने  कहा की कोरबा का विकास मॉडल ऐसा है की खदान के लिए विस्थापित लोग आज 30 साल बाद भी विस्थापन और मुआवज़े के लिए संघर्ष कर रहे हैं .

छत्तीसगढ़ के अन्य क्षेत्रों से आये विभिन्न जन संगठनों के साथियों ने भी अपनी बात रखी |.सोनाखान से आये श्रीमती राजेम केतवास और देवेन्द्र ने कहा की सोना खदान के लिए ग्राम सभा की स्वीकृति के विरुद्ध काम किया जा रहा है और कंपनी के लिए काम करते हुए उनके सामुदायिक वनाधिकारों को नज़रन्दाज़
किया जा रहा है .

भारत जन आन्दोलन के जन साय पोया ने माइनिंग परियोजना में फर्जी ग्राम सभा समेत अन्य गड़बड़ियों का व्याख्यान किया और कहा की गाँव वालों के विरोध करने पर उनपर पुलिस द्वारा अत्याचार किया जा रहा ह
हसदेव अरण्य क्षेत्र के विभिन्न जन प्रतिनिधियों, जिनमें पतुरिया डांड,खिरटी, गिद्मुडी और मदनपुर ग्राम पंचायतों के सरपंच भी शामिल थे, ने भी अपनी बात रखी .

उन्होंने बताया की पिछले वर्ष दिनांक 10.01.2015 को हसदेव अरण्य क्षेत्र के 18 ग्राम सभाओं ने प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को ग्राम सभा प्रस्तावों के साथ एक पत्र लिखा था जिसमें इस क्षेत्र में किसी भी कोयला खनन परियोजना को आवंटन ना किये जाने की मांग की थी ,साथ ही इस क्षेत्र में वन अधिकारों के सही क्रियान्वयन की मांग की थी .परन्तु पिछले वर्ष के सरकारी कार्यवाही और आदेशों से प्रतीत होता है कि शायद उनके पत्र पर ध्यान नहीं दिया गया .
सभा में विस्तृत परिचर्चा के उपरान्त  प्रधान मंत्री को उनकी मन की बात में पर्यावरण एवं वन संरक्षण के प्रति  चिंता को देखते हुए उन्हें पुनः एक पत्र लिखने का निर्णय लिया गया .

इस पत्र में प्रधान मंत्री का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की ,कि गत वर्ष में आपकी सरकार की कई नीतियाँ और कार्यवाही हसदेव अरण्य जैसे दुर्लभ वन के संरक्षण के विपरीत हैं जैसे –


  1. हसदेव अरण्य क्षेत्र जेसे कई महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों को खनन से मुक्त  रखने के लिए नो गो क्षेत्र के प्रावधान को न सिर्फ ख़त्म किया जा रहा है  ,बल्कि कोयला खदानों की नीलामी और आवंटन भी किया जा रहा है |
  2. हमारे क्षेत्र की 18 ग्राम सभाओं ने अपने पाँचवी सूची क्षेत्र तहत पेसा कानून 1996 तथा वनाधिकार मान्यता कानून 2006 से प्रदत्त अधिकारों के तहत कोयला खनन तथा कोयला ब्लॉक के आवंटन या नीलामी का पूर्व में ही विरोध दर्ज कराया था, परंतु इसके बावजूद यहाँ पर 5 कोयला खदानों का आवंटन किया  गया . गिद्मुडी, पतुरिया, पर्सा, पर्सा ईस्ट, केते बासन .
  3. वनाधिकार मान्यता कानून का घोर उल्लंघन किया जा रहा है | सन 2013 में दिए गए ग्राम घाटबर्रा के सामुदायिक वन अधिकारों को निरस्त किया गया है जो न सिर्फ गैरकानूनी है परन्तु कानून का मज़ाक है जिसमें किसी भी सामुदायिक वन अधिकार के निरस्तीकरण का कोई प्रावधान ही नहीं है |
  4. ग्रामवासियों के वनाधिकार मान्यता में भी भारी गड़बड़ियां हैं . हालांकि यहाँ 19 गाँव को लम्बे संघर्ष के बाद सामुदायिक वन अधिकार पत्र मिले हैं परन्तु यह अधिकार ग्रामसभाओं के दावे किये गए क्षेत्र से बहुत कम हैं और सामुदायिक वन संसाधन के अधिकार पत्रक अभी भी लंबित हैं |
  5. वन विभाग द्वारा अवैध रूप से कंपनियों के लिए जगह बनाने हेतु बड़े  पैमाने पर जंगल काटे जा रहे है
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