बफर जोन के नाम पर आदिवासियों का जल-जंगल-जमीन छीनने का अधिकार किसी को नहीं : डॉ. सुनीलम


पाथरी, 6 जून 2016 : मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के बिछुआ ब्लाक के ग्राम पाथरी में मछुआरा संघर्ष समिति के तत्वाधान में एक तीन दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया। 4-6 जून 2016 तक चले इस तीन दिवसीय शिविऱ में आस-पास के दर्जनों गांवों के मछुआरा समुदाय तथा बफर जोन से प्रभावित किसानों तथा आदिवासियों ने भाग लिया। शिविर में मौजूदा विकास की अवधारणा तथा उससे प्रभावित हो रहे किसानों, आदिवासियों तथा मछुआरा समुदाय के लोगों के अधिकारों के संदर्भ में बात-चीत की गई। शिविर के अंतिम दिन 6 जून 2016 को शिविर के समापन समारोह में किसान संघर्ष समिति के संस्थापक अध्यक्ष तथा जनादोंलनों के राष्ट्रीय समन्वय के राष्ट्रीय संयोजक, पूर्व विधायक, डा. सुनीलम, बालाघाट से आए सामाजिक कार्यकर्ता नागेश्वर तथा नागपुर में कोयला खदान मजदूर यूनियन के नेता दीपक चौधरी, छिंदवाड़़ा की पहली महिला अधिवक्ता तथा सामाजिक कार्यकर्ता एडवोकेट आराधना भार्गव, अन्य जनादोलनों के कार्यकर्ताओं ने भागीदारी की।

समारोह के दौरान बोलते हुए पाथरी गांव के निवासी सुरेश सलामे ने शिविर के दो दिनों में हुई बात-चीत पर रोशनी डालते हुए कहा कि सरकार बांधों तथा बफर जोन के नाम पर हमसे हमारी जमीनें जबरन छीन रही है। हमसे हमारे वन और लकड़ी के साथ-साथ रोजगार का अधिकार भी छीन कर उसे शक्तिशाली लोगों को सौंपा जा रहा है। उन्होंने कहा कि हम अपने उपर हो रहे इस अत्याचार का एकजुटता के साथ मुकाबला करेंगे।

तोतलाडोह बांध से विस्थापित होकर पुलपुलडोह में आकर बसे मछुआरा समुदाय से आईं इंदिरा कहार ने बताया कि बांध में तीन मछुआरों को वनाधिकारी मार चुके हैं। हमें भी वहां पर रोजगार नहीं करने दिया जाता है जबकि इन जंगलों को हमारे ही पूर्वजों ने सहेज कर रखा है।

पोनिया गांव के मछुआरा समुदाय से तथा मछुआरा संघर्ष समिति के युवा कार्यकर्ता मंशा राम ने सभा में आए लोगों से कहा कि यदि हमें अपनी जमीनों को बचाना है तो हमें एकजुट होकर अपनी मांगों को उठाना होगा और हर गांव में संगठन को मजबूत करना होगा।

बालाघाट के सामाजिक कार्यकर्ता नागेश्वर जी ने कहा कि हमारी तथाकथित लोकतांत्रिक सरकार इस देश की जनता से उसका संवैधानिक रोजगार का अधिकार छीन रही है। बफर जोन के संबंध में बात करते हुए नागेश्वर ने कहा कि सरकार बफर जोन के जरिए गांववालों से उनकी जमीनें छीनने का साजिश रच रही है। बालाघाट में 47 गांवों के  विस्थापित आदिवासियों के लिए विस्थापन के बाद कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई। उन्होंने बताया कि सरकार मुआवजे के झूठे आश्वासन देती है। जो थोड़ा बहुत मुआवजा आता भी है वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। उन्होंने सभा में उपस्थित बफर जोन से प्रभावित किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि यदि हमनें अपनी जमीनें छोड़ दीं तो हम दुबारा पुनर्स्थापित नहीं हो पाएंगे।

कोयला खदान मजदूर यूनियन के नेता दीपक चौधरी ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि मोदी सरकार सिर्फ अडानी और अंबानी के मुनाफे के लिए काम कर रही है और इसकी भेंट चढ़ रही है इस इलाके की आम जनता। उन्होंने कहा कि हमें झूठे आश्वासनों में फंसने के बजाए संगठन बनाकर अपनी समस्याओं का हल निकालना होगा।

दिल्ली से आए संघर्ष संवाद के संपादक जितेंद्र चाहर ने देश भर में चल रहे विस्थापन और भूमि अधिकार के लिए आंदोलनों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़़ीसा इत्यादि राज्यों में बॉक्साइट के खनन के लिए राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा लोगों को उनके जल-जंगल-जमीन से विस्थापित किया जा रहा है। किंतु सभी जगहों पर किसान-मजदूर-आदिवासी इनके खिलाफ न केवल संघर्ष कर रहे हैं बल्कि अपने अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ रहे इन आंदोलनों को जीत भी रहे हैं। नियामगिरी, पॉस्को तथा प्राचीमाढ़ा के ग्रामवासियों की जीत के संबंध में उन्होंने विस्तृत जानकारी दी।

एडवोकेट आराधना भार्गव ने अपनी बात रखते हुए कहा कि सदियों से नदी और मछली पर मछुआरों का अधिकार रहा है किंतु कॉर्पोरेट समर्थक सरकारों ने मछुआरों को पानी और मछली से अलग कर दिया है। उन्होंने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय ने तोतलाढोह बांध के 325 परिवारों को बांध में मछली पकड़ने का अधिकार दिया किंतु प्रशासन ने मछुआरों को जबरन अलग-अलग मुआवजा देकर सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश की अवहेलना की जो कि सरासर गैर-कानूनी है। उन्होंने कहा कि इस पूरे इलाके में कुल 407 तलाब हैं जिन पर मछली मारने का असली हक इस क्षेत्र के मछुआरों का है न कि बाहरी ठेकेदारों का। मछुआरा संघर्ष समिति इन जलाशयों को ठेकेदारों से मुक्त करवाकर मछुआरों को सौंपेगी। उन्होंने बफर जोन के संदर्भ में बात रखते हुए कहा कि पेंच नेशनल पार्क देश का सबसे बड़ा टाइगर रिजर्व पार्क है जिसे मध्य प्रदेश सरकार अंबानी को बेचने की कोशिश कर रही है। यहां से लोगों को विस्थापित कर अंबानी को मुनाफा कमाने के लिए जगह दी जा रही है। उन्होंने कहा कि हमें मछुआरा संघर्ष समिति और किसान संघर्ष समिति को मजबूत कर अपनी लड़ाई को मुक्कमल करना होगा।

शिविर का समापन करते हुए डा. सुनीलम ने कहा कि जिस जंगल का मालिक आदिवासी था जो भारत का मूल निवासी है आज उस जंगल पर शासन का कब्जा हो गया है और आदिवासियों को उन्हीं के जंगल में तथाकथित चोर बना दिया गया है। सभी सरकारें संसाधनों को लूटकर पूंजीपतियों के हवाले कर रही हैं। आज जहां एक तरफ जनता तबाही बर्बादी का शिकार हो रही है वहीं पूंजीपतियों के हाथ में संपदा केंद्रित होती जा रही है। डॉ. सुनीलम ने इस बात पर जोर दिया कि इस देश की संपदा 125 करोड़ लोगों के बीच बंटनी चाहिए। हाल ही में सूखाग्रस्त इलाकों में की गई अपनी पदयात्रा के अनुभव को बांटते हुए उन्होंने बताया कि लातूर और बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में एक महीने में एक बार ग्रामवासियों को पानी मिल रहा है तथा पशु बिना पानी के मर रहे हैं और सरकारें सर्वोच्च न्यायलय के निर्देशों का पालन नहीं कर रही हैं। आम जनता के साथ सरकार द्वारा किए जा रहे भेद-भाव पर रोशनी डालते हुए उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार के कर्मचारी का न्यूनतम वेतन प्रतिदिन 1000 रु. है जबकि मनरेगा के एक मजदूर की प्रतिदिन की मजदूरी 168 रु. है जो कि कभी पूरी नहीं मिलती है। समर्थन मूल्य तय करते समय किसानों की प्रतिदिन की मजदूरी मूल्य आयोग 60 रु. प्रतिदिन लगा रहा है। किसानों-मजदूरों के श्रम की इसी लूट के खिलाफ हमारी लड़ाई है। इस देश की समस्त संपदा के हम बराबर के अधिकारी हैं और इस अधिकार को हम लेकर रहेंगे।

सभा में ग्रामवासियों ने अपने गांव में संघर्ष समिति का गठन किया तथा बफर जोन के सभी गांवों में समितियां गठित कर अक्टूबर माह में किसान-मजदूर-आदिवासी जन सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय लिया गया। सभा की अध्यक्षता सुरेश सलामे ने की तथा संचालन आशाराम उइके ने किया।
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