राजस्थान के आदिवासियों ने किया दावा : जंगल हमारे हक हमारा


राजस्थान के जयपुर में एक जून से शहीद स्मारक पर ‘जवाब दो’ धरना जारी है. धरने में विभिन्न मुद्दों पर जन सुनवाईयां आयोजित कर सरकार से जवाबदेही की मांग की जा रही है. इसी कड़ी में 11 जून 2016 को आदिवासी एवं वन अधिकार के मुद्दों पर एक जनसुनवाई हुई.

राज्य में व्यक्तिगत वन अधिकार के अधिकार पत्रों में ज़मीन लोगों के किये गए दावों के अनुरूप दी जाये. जहाँ अधिकार पत्र दिए गए हैं वहां नरेगा सहित अन्य सरकारी योजनाओं के तहत भूमि सुधार और भूमि विकास के कार्य किये जायें. जो दावे निरस्त किये गए उन्हें निरस्त करने के कारणों की स्पष्ट सूचना दी जाये. साथ ही जिन जिलों में अभी तक वन अधिकार की प्रक्रिया ही शुरू ही नहीं की गयी है जैसे टोंक, बूंदी, कोटा, सवाई माधोपुर, अलवर, भीलवाड़ा, दौसा, आदि वहां इसे शुरू किया जाये. वन अधिकार मान्यता कानून के तहत जिन दावेदारों के दावे अभी प्रक्रिया में हैं उन्हें प्रक्रिया ख़त्म होने से पहले बेदखल न किया जाये. यह मांगें आज आदिवासी अधिकारों पर हुई जनसुनवाई में दक्षिणी एवं दक्षिणी पूर्व राजस्थान से आये आदिवासी समुदाय के लोगों ने की.

जल जंगल जमीन आन्दोलन के आर डी व्यास ने कहा कि प्रदेश में हजारों व्यक्तिगत दावे बिना कारण बताये वन विभाग की अनावश्यक दखल और वन्य जीव अभ्यारण्य का हवाला देकर निरस्त किये गए हैं, जो गैर कानूनी है. जो व्यक्तिगत दावे मिले भी हैं उनमें भी दावे के अनुरूप काफी कम ज़मीन के अधिकारों को मान्य किया गया है. सामुदायिक दावों की प्रक्रिया को तो शुरू भी नहीं किया गया है. आदिवासियों की कृषि भूमि को गैर आदिवासियों द्वारा नियमों का दुरुपयोग कर हडपा जा रहा है. आदिवासियों की ज़मीनें खनन के लिए आवंटित करने पर पिछली सरकार द्वारा लगाई रोक जो इस सरकार ने हटा ली है जिससे आदिवासियों से उनकी ज़मीनें छीनी जा रही है. इस जनसुनवाई में हेल्प एज इंडिया के मुख्य कार्यकारी मैथ्यू चेरियन ने भी धरने में पहुंचकर अपना समर्थन दिया.

पेसा कानून लागू करे सरकार

जनसुनवाई में आदिवासी समुदाय के लोगों का कहना था कि कहने को तो पेसा कानून में ग्राम सभा को गाँव में ही निर्णय लेने की शक्तियां दी गयी हैं लेकिन जमीनी स्तर पर सरकार इस कानून को पूरी ईमानदारी से लागू नहीं कर रही है. बड़े दुःख की बात है कि एक अच्छे और महत्त्वपूर्ण कानून का राजस्थान में सही क्रियान्वयन नहीं हो रहा है. हमारी मांग है कि सरकार राज्य में पेसा कानून के तहत जो अधिकार आदिवासियों को दिए गए हैं उन्हें उनका वह हक दे.

कब मिलेगा हमारे दावों का अधिकार

राज्य में हजारों की संख्या में गैर-आदिवासी वनों पर आश्रित हैं. उन्होंने दावे भी पेश किये हुए हैं लेकिन अभी तक भी सभी दावेदारों को सरकार ने अधिकार पत्र नहीं दिए हैं. राज्य में अब तक 34848 अधिकार पत्र जारी किये गए हैं लेकिन इनमें एक भी अधिकार-पत्र किसी गैर-आदिवासी को नहीं दिया गया है. उदयपुर जिले की खैरवाडा तहसील के 82  दावे विगत तीन सालों से लंबित पड़े हैं जबकि वल्लभनगर तहसील के 568 दावों को उपखंड स्तरीय समिति ने निरस्त कर दिया. कोटड़ा में 4800 दावे प्रस्तुत किये जिनमें से 1456 दावे ही स्वीकृत किये गए और अन्य दावों के बारे में कोई भी सूचना दावेदारों को नहीं दी गयी है. इसी तरह टोंक जिले की देवली तहसील के देवड़ावास व कनवाडा पंचायतों में कुल 76 दावे प्रस्तुत किये गए पिछले तीन साल से ये दावे लंबित पड़े हैं.

वन अधिकार और पेसा के मुद्दे पर सरकार से हुई चर्चा

आदिवासी मुद्दों पर सरकार के साथ चर्चा करने के लिए एक प्रतिनिधि मंडल संयुक्त सचिव जनजाति विकास विभाग श्री एस पी जैमन से मिला. इस संवाद में वन विभाग के संयुक्त श्री एस आर मीणा और अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक श्री ओ पी सिंह भी मौजूद थे.

चर्चा में निम्न बिन्दुओं पर सहमति बनी -
  1. प्रत्येक दावे की प्रगति जांचनें के लिए एक एमआईएस बनाने पर सहमति बनी और हमें सरकार की तरफ से आष्वस्त किया कि 20 जुन 2016 तक इसका प्रारूप बना लिया जाएगा और इस बारे में हमारी राय भी ली जाएगी।
  2. निरस्त दावों की सूचना निरस्ती के कारण सहित प्रतयेक दावेदार को लिखित में उपलब्ध करवाई जाएगी एवं उसे वेबसाईट पर भी डाली जाएगी।
  3. वास्तविक कब्जे से कम भूमि वाले अधिकार पत्र प्राप्त दावेदारों को उनकी बकाया भूमि का अधिकार मान्य करने के लिए उनसे दुबारा दावे पेष करवाने का अभियान चलाएगी।
  4. भौतिक सत्यापन करने में वन विभाग और राजस्व विभाग वन अधिकार समितियों को सहयोग करे इसके लिए उन्हें निर्देषित किया जाएगा।
  5. बेदखली नहीं हो इसके लिए वन विभाग के निचले स्तर के कर्मचारियों को वन विभाग की ओर से एक आदेष दिया जाएगा।
  6. क्लोजर में आए दावेदारों को बेदखल नहीं किया जाएगा।
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