कोयला बिजली घरों में मजदूरों की सुरक्षा से खिलवाड़



राजेश कुमार/राजकुमार सिन्हा

मध्य प्रदेश में हाल ही में हिन्दुस्तान पावर प्राइवेट लीमिटेड (एम.बी.पावर) जैतहरी की परियोजना में कोयले के बायलर की सफाई के दौरान विस्फोट हो गया। यह हादसा सफाई  करने से पहले प्लांट बंद न करने के कारण हुआ। जिसमे घटनास्थल पर ही तीन लोगो की मृत्यु हो गई और दो दर्जन से भी अधिक श्रमिक घायल हो गये। कपंनी ने कहा की केवल एक व्यक्ति की मृत्यु और 11 लोगो के घायल होने की खबर ही बहार दी है। यह केवल कोई एक घटना नही है ऐसे अनगिनत हादसे केवल न्यूज पेपर की खबर बन कर ही रह गये। उन पर ना तो मिडीया ने आगेकोई खोजबीन की ना ही प्रषासन ने कपंनियो से सवाल पुछे।

ऐसे ही दो और हादसे भारत की दो बडी पावर कम्पनियों मे इसी साल हुये जिनकी खबर मिली। एक रिलायंस के सासन (सिंगरौली) अल्ट्रा मेगा पॉवर प्रोजेक्ट में निर्माण के दौरान 19 श्रमिकों की मौत व सैकड़ों के घायल होने के मामले की पुष्टि परियोजना को वित्तीय सहायता देने वाली यूएस की एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट (एग्जिम) बैंक के इंस्पेक्टर जनरल ने की। श्रमिकों की मौतों का आंकड़ा 19 से ज्यादा होने की आशंका भी जताई गई है। ओआईजी की रिपोर्ट के मुताबिक- यहां ज्यादातर श्रमिक दैनिक वेतनभोगी ही हैं, जिनका सही तरीके से दस्तावेजीकरण नहीं किया जाता। इस परियोजना मे मृत्यु के अलावा भी ऐसी कई दुर्घटनाएं हुई हैं जिसमें श्रमिक बुरी तरह घायल हुए हैं और कुछ तो पूरे जीवन के लिए ही विकलांग हो चुके हैं। दुसरा आदानी की कोयला बिजली परियोजना मुन्द्रा, कच्छ गुजरात मे बायलर से छोडे गये गरम पानी से सात लोगो की मृत्यु हो गई और 21 से ज्यादा लोगो बुरी तरह घायल हो गये। इन घटनाओ पर देष का प्रषासन तो चुप है पर मिडीया ने भी इन हादसो को खबर बना कर छोड दिया है। ये घअनाये क्यो हो रही है और कौन इसका जिम्मेदार है इस पर प्रषासन और मिडीया ने कोई सवाल नही पुछा।

खासकर निजी बिजली परियोजनओ मे श्रमिको की सुरक्षा नियमो और उनके अधिकारो को ताक पर रखकर आपनी मनमानी चला रही है। बिजली कपंनियॉ ज्यादातर कामो के लिये देनिक वेतन भोगी मजदूर ही हायर करती है जो कि कोई एक ठेकेदार को ठेका देकर मजदूरी पर काम देती है जिसका कोई भी दस्तावेजीकरण ने तो कंपनी रखती ना ही ठेकेदार। ठेकेदार कंपनी मे बिचोलिये की भूमिका निभाता है जो कंपनी से अधिक मजदूरी लेकर मजदूरो को कम देता है साथ ही काम पर लगवाने का कमीषन मजदूरो से बसूलता है। कंपनी जो स्थाई मजदूरो को मजदूरी देती है  उससे कम मजदूरी पर दैनिकवेतन भोगी मजदूर काम करने को तैयार हो जाते है उसके आलावा जो सुविधा स्थाई मजदूर को मिलती है उससे भी कपंनी बच जाती है। अगर इस तरह के कोई हादसे होते है तो कपनी कानूनी जिम्मेदारी से आसानी से बच निकलती है।

निजी बिजली कंपनियॉ में दैनिकवेतन भोगी मजदूर ही होते है लगभग सभी मजदूर दुसरे राज्यो से लाये जाते है इनकी कई समस्या है लेकिन उस पर कोई कार्यवाही न के बराबर हुई है। प्रवासी मजदूर मजदूरी निर्धारित नही कर पाते है जितना कपंनी या ठेकेदार देता उसी मजदूरी पर उनको काम करने को मजबूर होना पडता है। दुसरा प्रवासी होने के कारण एक तरफ वे परिवार से दूर तो रहते ही समाज से पूरी तरह कट जाते है। प्रवासी मजदूर होने के कारण कपंनिया या ठेकेदार काम के निर्धारित घंटो से अधिक काम करवाता है। उसके आलवा वहा बुनियादि सुविधाओ जैसे स्कूल, आस्पताल, पानी और बिजली यादि समस्याओ उसे और उसके परिवार को झूझंना पडता है। प्रवासी और असंगठित होने की वजह से स्थानिय प्रषासन भी उनकी बुनियादी सुविधाओ को नजरअदांज करता है।  प्रवासी मजदूर जहॉ भी प्रवास करता है वहा के लोगो की मजदूरी के निर्धारण पावर और बाजार पर भी असर डालता है। इन सभी का फायदा कपंनी उठाती है। आखिर प्रषासन इन कपंनियों से इन लापरवाही और श्रमिको के अधिकारो से खिलवाड करने पर सवाल क्याक नही कर रही है। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेद्रमोदी विदेष मे भारतीय प्रवासी मजदूरो के साथ खाना खाकर उनका हौसाला आफजाई करते है दूसरी तरफ देष मे ही उन्ही मजदूरो की सुरक्षा और अधिकारो के साथ खिलवाड करने वाली कपंनियो का साथ दे रहे है। यह दुयम दर्जे को व्यवहार देष के बनाने वाले कामगार के साथ क्यो?


पिछले एक दषक मे भारत के कोयला बिजली क्षेत्र मे निजी कंपनियों की एक बाढ आगई हैं। न्यूज कंपनी, सीडी, फोन जैसे संत्रत्रों को बनाने वाली कंपनियॉ बिजली बनाने मे कुद पडी है। एक तरफ भारत सरकार इनको ऑख बंद कर हजारो एकड जमीन पर लोगो की बिना अनुमति के, खुद आगे आकर साथ दे रही है। उन्ही के कदमो पर राज्य सरकारे भी वनअधिकार कानून मे बदलाव कर भारी मात्रा मे वनभूमि का परिर्वतन कर इन निजी कोेयला बिजली कंपनियो को सौप रही है। हजारो सालों से जगंल पर निर्भर समुदाय को उजाडं कर निजी हाथो मे सौप रही है। सरकारी आकडों के अनुसार पिछले 30 वर्षो मे करीब 14000 वर्ग किमी जगंल केवल 23716 कपंनी की परियोजनों ने ही हडप ली है। हर साल 250 वर्ग किमी से भी ज्यादा जगंल की जमीन को बिना वन निर्माण कार्यो के लिये  जैसे बिजली कंपनियॉ, माइनिग, बाध, और कारखानो को सौपी दी जाती है। उसमे भी माइनिग के लिये सबसे अधिक जमीन पर अतिक्रमण हुआ है। जिन जमीनो पर कंपनियो का अतिक्रमण बडा है वह अधिकतर किसान आदिवासी समुदायो की जमीने है। यह एक विडंबना है इन कपंनियो के आने से स्थानीय जनता को स्वास्थ समस्याऐं, प्रदुषण और विस्थापन से ज्यादा कुछ हासिल नही हुआ।

बिजली परियरेजना भारी मात्रा मे पानी का उपयोग करती है जिसके लिये देष की लगभग सभी नदियों के किनारो पर इन्हाने कब्जा कर रखा है वहा से ये आने लिये पानी की आपूर्ति करते है। एक तरफ देष मे पानी को लेकर हाहाकार मचा है जानवर बिना पानी के मर रहे, किसान पानी नही मिलने से आत्महात्या कर रहे है। दुसरी ओर इन बिजली परियोजनाओ ने पानी की लुट मचा रखी है। विषेष तौर बिजली कपंनियो को कोयला धोने और बायलर को ठण्डा करने मे प्रतिदिन हाजारो लिटर पानी की आवष्यकता होती है।

नदियो से पानी लेकर उसमे जहर बहाया जा रहा है बिजली कंपनियो से निकलने वाले जहरीले पदार्थ सारे नियम और कानून को ताक पर रख नदियो मे बहाये जा रहे है। उस पानी को पीने से जानवर मर रहे है, खेती मे उपयोग करने खेती की उर्वरा षक्ति खत्म हो रही है। यह प्रदुषित पानी जिन नदियो और तालाबो मे बहाया गया है वहा पानी मे पलने वाले जीवजन्तु की प्रजातिया लगभग खत्म हेाती नजर आ रही है। बिजली परियोजनाओ द्धारा छोडे गये इस जहरीले पानी से आसपास अन्य जल स्त्रोतों मे भी प्रदुषित कर रहा है। इसका सिगंरौली एक अहम उदाहरण है जो देष मे बहुत ही प्रदुषित जिलो मे  आता है। वहा जनता प्रदुषित पानी का उपयोग करने के लिये मजबूर है। कपंनियो के लाभ की किमत वहा के लोगो को सास, केंसर टीबी जैसी भयानक बीमारियो से चुकानी पड रही है। सरकार धीरे धीरे सभी समुदायिक अधिकार मे आने वाले प्राकृतिक संसाधनो को कुछ लोगो तक ही सीमित कर रही है।

पिछले पचॉस सालो से सरकार सबको बिजली पहुचाने के नाम पर हर साल कई बिजली परियोजनाओ को मंजूरी देती है। लेकिन बिजली फिर भी लोगो तक नही पहुच पा रही है। आज भी कई गॉवो के लिये बिजली एक सपना है। सिंगरौली देश की 10 प्रतिशत बिजली उत्पादन करता है लेकिन फिर भी वहा के सैकडों गॉव आज भी बिजली आने का रास्ता देख रहे है। इस एक आंकडे से हम समझ सकते हैं कि 2001 मे 101660 मेगावॉट के संयन्त्र मौजूद थे और 38 प्रतिशत लोागांे के पास बिजली नहीं थी और आज 2015-16 में देश मंे बिजली उत्पादन क्षमता 284303 मेगावॉट तक पहंुच गयी जो की पद्रह  साल पहले के मुकाबले ढेड गुना अधिक है, लेकिन फिर भी 20 प्रतिशत लोगो के लिये बिजली नही है। जिसमें भी 18 प्रतिशत के पास बिजली खरीदने की क्षमता ही नहीं है। हालाकि वर्तमान सरकार सबको 2019 तक बिजली देने का वादा कर रही है जो कि पिछली कई सरकारो ने भी किया था पूरा नही कर पायी। और मौजुदा क्षमता के अतिरिक्त 200000 मेगाबॉट बिजली उत्पादन की बात कह रही है जिसका ज्यादातर उत्पादन कोयले ही आयेगा।

विकास और हर घर मे बिजली पहंुचाने के नाम रिलायंस, आदानी और मोजर बियर जैसे बिजली कंपनियो के हवाले देष के प्राकृतिक संसाधनों को किया जा रहा और सरकार परियोजना से जुडे पर्यावरण और श्रम कानूनो मे बदलाव कर बिजली कंपनियो हेतु सरल बना रही है ताकि इन बडे कारर्पोरेटस को आसानी से और जल्द परियोजनाओ की मंजूरी मिल सके और सस्ते और बिनाषर्तो के मजदूर उपलब्ध हो सके। मोदी सरकार इन्ही बदलावो को इज आफ डुईग बिजनेष कह रही है। इस मिषन को पूरा करने के लिये भारी मात्रा मे बिजली की आवष्यकता होगी जो की मोजर बियर, आदानी और रिलायस जैसे कपेनियो से खरीद की पूरी की जावेगी।

भारत के कोयला बिजली घरो निर्माण व उत्पादन के दौरान हादसे मे मजदूरो की मृत्यू होना आम बात हो गई है। विषेषकर निजी बिजली घरो के हादसो मे मरने एव जख्मी होने वालो की संख्या का कोई सही आकलन आज तक बाहर नही आया। सरकार ने जब से कोयला बिजली घरो को निजी हाथो मे सौपा है तब से कोयला बिजली घरो मे श्रमिकों की सुरक्षा मे कोताही व उनके अधिकारो से खिलवाड एक आम बात हो गई है। रिलांयस, टाटा या आदानी को बिजली कपंनियों मे घाटा जा रहा है इस पर भारत सरकार और उसका प्रषासन चिंतित लेकिन उनकी परियोजनाओ मे मजदूरो की सुरक्षा मे कोताही और अधिकारो से खिलवाड खिलाफ कपंनियो से सरकार और उसका प्रषासन ने आज तक कोई सवाल नही पुछा क्यो? मिडीया भी इन सवालो को नही पुछ पा रही क्यो ? मिडीया इन घटनाओ को एक खबर बना कर क्यो छोड देती है।

हिन्दुस्तान पावर प्राइवेट लीमिटेड (एम.बी.पावर) जैतहरी की परियोजना में हुई घटना मे अनुपपुर के स्थानीय लोगो का कहना है कि मोजर बीयर के कोयला बिजली घर मे हुये हादसे मे कई मजदूर एवं कर्मचारी 90 प्रतिषत से अधिक जलने गये और मरने वालो की संख्या तीन से अधिक है जो कपंनी केवल तीन आफीसर स्तर के स्थाई कर्मचारीयो के मरने की बात कर रही है लेकिन सफाई जैसे कार्यो मे मजदूर  ही काम करते है और यह एक बडा ब्लास्ट जिसमे आसपास मे काम करने वाले मजदूर भी चपेअ मे आये होगे। इस पुरी घटना मे कही भी मजदूरो के मरने की बात ना तो मिडीया ने उठाई ना कपंनी ने बताया है।

स्थानीय लोगो ने बताया कि बायलर की सफाई करने के दौरान यह हादसा हुआ। इसमे दो बायलर है  जिसमे से उन्होने एक बायलर को चालु रखकर दुसरे की सफाई करनी चाही, लेकिन नियम आनुसार दोनो को ही बंद कर सफाई की जानी चाहिए। नही तो यह खतरनाक होता है। इस बात को  पहले भी जिन कर्मचारी की मृत्यु हुई है उन्होने कंपनी प्रबधंन को चेताया था कि दोनो बायलर को बंद कर ही सफाई की जानी चाहिये। लेकिन सीनियर प्रबंधन ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया। उनकी नजरअदांज की किमत कई लोगो को आपनी जान देकर चुकानी पडी। अगर एक काफी गरम बायलर चल रहा है तो उसी के एक दम बाजु मे दुसरा ठण्डा बायलर नही चलाया जा सकता या फिर उससे सुरक्षा हेतु रेत की बोरी की दिवार दोनो बायलर के बीच बनानी चाहिये।  लेकिन ऐसा नही किया गया था। सफाई मजदूरो को बायलर की सफाई करने दौरान आग से बचाब हेतु जो वर्दी दी जाती है वह उनको नही दी गई थी।

यह वही कपंनी है जिसने किसान आदिवासी समुदाय की जमीन लोगो और ग्रामसभा की अनुमति के बिना ही हडप ली थी और किसानो ने 2012 मे आनदोलन किया था और मध्यप्रदेष सरकार ने उन्हे जेल मे डाल दिया था। और आज कई लोगो पर केस चल रहे है।

इन बडी बिजली परियोजनाओ ने आदिवासी किसान और मजदूर हेतु दरबदर भटकने के आलाबा कोई विक्लप नही छोडा। दोनो ही ओर से मजदूर को ही मार झेलनी पड रही है सरकार इन कपंनियो को सस्ते मजदूर उपलब्ध हो इस हेतु श्रम कानून मे बदलाव कर रही है तो दूसरी ओर कपंनियो मजदूरों की सुरक्षा और अधिकारो के साथ खिलवाड कर रही है। एक ओर पानी का हाहाकार मचा है तो दूसरी ओर बिजली कपंनिया पानी लुट मचा रखी है। यह एक दुखद विडंबना है कि प्राकृतिक और खनिज संसाधनों को कुछ सीमित निजी हाथो मे सौपने हेतु सरकार हाजारो सालो से बसे बसाये लोगो को उजाड कर रही है। और इतिहास इसका गवाह है कि विकास प्रेरित विस्थापन के नाम पर कारर्पोरेट जगंत ने सभी समुदायो, चाहे आदिवासी किसान हो या मजदूर, उनके अधिकारो के साथ खिलवाड कर उनका शोषण ही किया है।


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