हूल दिवस की 161वीं वर्षगांठ : हूल आज भी जारी है

 तस्वीर एकलव्य आदिवासी से साभार

30 जून 1855 को सिदो मुर्मू और कान्हु मुर्मू के नेतृव में 30 हजार से भी अधिक आदिवासी बरहेट,संताल परगना,झारखण्ड के भोगनाडीह ग्राम में एकित्र हुए.वे सभी अपने को स्वतंत्र घोषित किये और सिदो-कान्हु के नेतृव में महाजनों,अंग्रेज़ और अंग्रेज़ ऐजेंडो के विरुद्ध विद्रोह / लड़ने का सपथ लिया.इस गौरवपूर्ण इतिहास को हम सभी “संताल हुल” के नाम से जानते है.इस संताल हुल में एक ही परिवार के सिदो मुर्मू,कान्हु मुर्मू,फूलो मुर्मू,झानो मुर्मू,चाँद मुर्मू,भैरो मुर्मू के साथ-साथ असंख्या अनुनानियों ने अपना जीवन देश के नाम बलिदान कर दिया. पेश है हूल दिवस पर रुपेश कुमार सिंह का आलेख;

30 जून 1855 को प्रारंभ हुआ भारत में प्रथम सशस्त्र जनसंघर्ष, जो बाद में चलकर प्रथम छापामार युद्ध भी बना, 26 जुलाई 1855 को संथाल हूल के सृजनकर्ताओं में से प्रमुख व तत्कालीन संथाल राज के राजा सिद्धू और उनके सलाहकार व उनके सहोदर भाई कान्हू को वर्तमान झारखंड के साहबगंज जिला के भगनाडीह ग्राम में खुलेआम अंग्रेजों ने पेड़ पर लटकाकर यानी फांसी देकर हत्या करके भले ही ‘संथाल हूल’ को खत्म मान रहा था लेकिन हर तरह के शोषण के खिलाफ जल-जंगल-जमीन की रक्षा व समानता पर आधारित समाज बनाने के लिए सिद्धू-कान्हू, चांद-भैरव, फूलो-झानो के द्वारा शुरू किया गया हूल आज भी जारी है। यह हूल तब तक जारी रहेगी जबतक कि वास्तविक में समानता पर आधारित समाज की स्थापना न हो जाए।

संथाल हूल की पृष्ठभूमि-

30 जून 1855 को प्रारंभ किया गया ‘संथाल हूल’ कोई अकस्मात् घटना नहीं थी। वर्तमान संथाल परगना के जिन क्षेत्रों में उस समय हूल की चिन्गारी ने दावानल का रूप अख्तियार किया था, उन सभी क्षेत्रों पर एक समय में पहाड़िया आदिवासी का कब्जा था और पहाड़ियोें को वश में करना अंग्रेजों के बूते के बाहर था। लगभग 1780 ई0 तक राजमहल की पहाड़ियों के मालिक पहाड़िया ही थे।वे जंगल की उपज से गुजर बसर करते थे और झूम की खेती किया करते थे। वे जंगल के छोटे से हिस्से में झाड़ियों को काटकर और घास -फूस जलाकर जमीन साफ कर लेते थे और अपने खाने के लिए तरह-तरह की दालें और ज्वार-बाजरा उगा लेते थे। वे अपने कुदाल से जमीन को थोड़ा खुरच लेते थे। कुछ वर्षों तक उस साफ की गई जमीन पर खेती करते थे और उसे कुछ वर्षों के लिए परती छोड़कर नए इलाके में चले जाते थे, जिससे की उस जमीन में खोई हुई उर्वरता फिर से उत्पन्न हो जाती थी। उन जंगलों से पहाड़िया लोग खाने के लिए महुआ के फूल इकठ्ठा करते थे, बेचने के लिए रेशम के कोया और राल व काठकोयला बनाने के लिए लकड़ियां इकठ्ठा करते थे। जानवरों का शिकार करना तो प्रमुख था ही। वे बाहरी लोगों के प्रवेश का प्रतिरोध करते थे। उनके मुखिया लोग अपने समूह में एकता बनाए रखते थे व आपसी लड़ाई-झगड़े निपटाते थे।

अंग्रेजों की नजर जब इन इलाकों पर पड़ी तो इस आजाद कौम को गुलाम करने के लिए वो मचल पड़े क्योंकि पहाड़ियों ने कई बार अंग्रेजों के तलवाचाटू जमींदारों को लूट लिया था और जमींदारों को मजबूरन पहाड़िया मुखियाओं को रसद पहुंचाना पड़ता था। अंग्रेजों से पहाड़ियों का टकराव का एक कारण और भी था कि जहां पहाड़िया जंगल-पहाड़ों को भगवान की तरह पूजते थे वहीं अंग्रेज जंगलों को उजाड़ मानते थे। अंग्रेजों ने जंगलों की कटाई के काम को प्रोत्साहित किया और जमींदारों-जोतदारों ने परती भूमि केा धान के खेत में बदल दिया। परिणामस्वरूप अंग्रेजों व जमींदारों के साथ पहाड़ियों का टकराव शुरू हो गया लेकिन जंगल पहाड़ के पुत्रों-पुत्रियों यानी की पहाड़ियों ने अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी लेकिन आधुनिक हथियारों के सामने वे ज्यादा देर तक टिक नहीं पाये और काफी संख्या में पहाड़िया 1780 के दशक में हुए लड़ाई में शहीद हो गये। तब पहाड़िया लोग अपने  आप को बचाने व बाहरी लोगों से लड़ाई चालू रखने के लिए पहाड़ों के भीतरी भागों में चले गए।

1780 के दशक के आसपास से ही संथालों को जमींदार लोग खेती के लिए नयी भूमि तैयार करने और खेती का विस्तार करने के लिए भाड़े पर रखना शुरू किया। इनके साथ ही संथालों को धीरे धीरे राजमहल की तलहटी में बसने के लिए तैयार कर लिया गया। 1832 तक जमीन के एक काफी बड़े इलाके को दामिन-इ-कोह के रूप में सीमांकित कर दिया गया। सीमांकन के बाद संथालों की बस्तियां काफी तेजी से बढ़ी। संथालों के गांव की संख्या जो 1838 में 40 थी बढ़कर 1851 तक 1473 तक पहुंच गयी और जनसंख्या 3 हजार से बढ़कर 82 हजार हो गयी। संथालों ने जिस जमीन को हाड़तोड़ मेहनत केे जरिये साफ करके खेती शुरू की थी, धीरे-धीरे उसपर अंग्रेजों ने भारी कर लगा दिया। साहूकार और महाजन लोग उंची दर पर ब्याज लगा रहे थे और कर्ज अदा न किये जाने की सूरत में जमीन पर ही कब्जा कर रहे थे और जमींदार लोग दामिन इलाके पर अपने नियंत्रण का दावा कर रहे थे। अंग्रेज हुकूमत के अनुसार संथालों से 1836-37 में जहां मालगुजारी के रूप में 2617 रू0 वसूली किया जाता था वहीं 1854-55 में उनसे 58033 रू0 वसूल किये जाने लगे थे। मालगुजारी वसूल करने के लिए आने वाले सिपाही भी संथालों से काफी बुरा सलूक करते थे। फलस्वरूप 1850 के दशक तक संथाल लोग यह महसूस करने लगे थे कि अपने लिए एक आदर्श संसार का निर्माण करने के लिए जहां उनका अपना शाासन हो, जमींदारों, साहूकारों और औपनिवेशिक राज के विरूद्ध विद्रोह करने का समय आ गया है।

प्रथम सशस्त्र जनसंघर्ष ‘संथाल हूल’-

वर्तमान झारखंड राज्य के साहबगंज जिलान्तर्गत भगनाडीह ग्राम के ग्राम प्रधान चुन्नी मांझी के पुत्र सिद्धू के स्वप्न मेें बोंगा, जिनके हाथों में 20 अंगुलियां थी, ने बताया कि ‘‘जमींदार, महाजन, पुलिस और राजदेन आमला को गुजुक माड़’’ अर्थात् ‘‘जमींदार, पुलिस और सरकारी अमलों का नाश हो’’। यही वह समय था यानी 1855, जब संथाल आदिवासी ही नहीं बल्कि सभी लोग अंग्रेजों के शोषण तले कराह रहे थे और संथालों का तो जमींदार महाजन, जुल्मी सिपाही और सरकारी अमलो ने तो जीना दुभर कर दिया था। सिद्धू के स्वप्न में कही गयी बोंगा की बात जंगल में आग की तरह चारों तरफ फैलने लगी और इस समय को संथाल आदिवासियों ने हूल यानी विद्रोह के लिए उपयुक्त समझा ताकि अपना यानी संथाल राज स्थापित किया जा सके। फलस्वरूप साल वृक्ष की टहनी के जरिये  व डुगडुगी बजाकर संथाल गांवों में 30 जून 1855 को भगनाडीह गांव में एकत्रित होने के लिए आमंत्रण भेजा जाने लगा। इसकी खबर मिलते ही अंग्रेजों ने सिद्धू के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी कर दिया। ठीक 30 जून को भगनाडीह में 400 गांवों के 50 हजार परंपरागत हथियारों से लैस संथाल एकत्रित हुए और अपने आपको स्वतंत्र घोषित कर लिया। इस सभा में सिद्धू को संथाल राज का राजा ,कान्हू को उनका सहायक व राजा की भी उपाधि, चांद को प्रशासक व भैरव को सेनापति बनाया गया। सिद्धू ने घोषणा किया कि ‘‘अब हम स्वतंत्र है। हमारे उपर अब कोई सरकार नहीं है। इसलिए न कोई हाकिम है न कोई थानेदार। अब अपना और सिर्फ अपना संथाल राज स्थापित हो गया है।’’ उन्होंने कहा- ‘‘करो या मरो, अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो।’’ उनकी इस घोषणा को सुनते ही अंग्रेज बौखला गये और सिद्धू व कान्हू को गिरफ्तार करने गए दरोगा की गला काट कर हत्या कर देने के बाद तो अंग्रेज संथालो के खून के प्यासे ही हो गये।संथालो के 30 जून को ही यह भी घोषणा कर दी गयी कि अब हम अंग्रेजों को मालगुजारी नहीं देंगें। इसके बाद तो मानो भूचाल ही आ गया। जमींदारों, महाजनों, सिपाहियों व सरकारी कर्मचारियों को गांवों से खदेड़ दिया गया। परंपरागत हथियारों से लैस संथाल सेना गांव-गांव घूमने लगी। इधर अंग्रेजों ने भी क्षेत्र में सेना बुला ली, मार्शल लाॅ लगा दिया गया। फिर भी संथालों ने बड़ी ही बहादूरी के साथ अंग्रेजी सेना के आधुनिक हथियारों से अपने तीर-धनुष व परंपरागत हथियारों से मुकाबला किया। अंग्रेजों ने बड़ी ही नृशंसतापूर्वक संथाल महिलाओं-बच्चों व वृद्धों का कत्लेआम किया। गांव के गांव जला दिये गये। उनकी सारी संपत्ति बर्बाद कर दी गयी। फिर भी संथाल अपने नेता चारों सहोदर भाईयों सिद्धू-कान्हू-चांद-भैरव व जुड़वा बहनों फूलो व झानो के नेतृत्व में वीरतापूर्वक लड़ते रहे। 10 जुलाई को बहराईच की लड़ाई में चांद व भैरव शहीद हो गये। फिर भी संथालों का हूल जारी रहा लेकिन कुछ अपनों के ही गद्दारी के कारण अंततः सिद्धू व कान्हू को अंग्रेजों ने पकड़ लिया और 26 जुलाई को उनके ही ग्राम भगनाडीह में पेड़ पर लटकाकर फांसी दे दी और अन्ततः सिद्धू-कान्हू ने वीरतापूर्ण शहादत का वरण किया। अंग्रेजों ने सोचा था कि उनके हत्या के बाद संथाल हूल खत्म हो जाएगा। लेकिन इनके फांसी के बाद भी कई महीनों तक संथाल सेना अंग्रेजों से अपने खून के अंतिम बूंद तक लड़ती रही। प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहासकार हंटर ने अपने किताब ‘‘एनल्स आॅफ रूलर बंगाल’’ में लिखा है कि ‘‘संथालों को आत्मसमर्पण की जानकारी नहीं थी, जिस कारण डुगडुगी बजती रही और लोग लड़ते रहे। अंग्रेजों का कोई भी सिपाही ऐसा नहीं था, जो इस बलिदान को लेकर शर्मिंदा न हो।’’ अंग्रेजी दस्तावेज के अनुसार ही संथाल हूल में लगभग 20 हजार संथालों ने शहादत का वरण किया। वैसे इस हूल में संथालों की सर्वाधिक भूमिका थी लेकिन इनमें अन्य जातियों की भागीदारी से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। 28 जुलाई 1855 को भागलपुर कमिश्नर ने अपने पत्र में वायसराय को लिखा कि ‘‘संथाल विद्रोह में लोहार, चमार, ग्वाला, तेली, डोम आदि ने सिद्धू को सक्रिय सहयोग दिया था।’’ विद्रोह के बाद सजा पाने वालों की कुल संख्या 251 थी, वे 54 गांवों के निवास थे, उनमें 191 संथाल, 34 नापित, 5 डोम, 6 घांघर , 7 कोल, 6 भुईयां व एक रजवार थे। ये यही दर्शाता है कि इन सभी ने संथाल विद्रोह में ही अपनी मुक्ति देखी थी।

वर्तमान में हूल दिवस के मायने-

आज से 116 वर्ष पहले जिन सपने के खाातिर संथाल हूल की घोषणा हुई थी, क्या वे सपने पूरे हो गये? यह सवाल तो उठना लाजमी ही है क्योंकि जिन जमींदार, महाजन, पुलिस व सरकारी कर्मचारी के नाश के लिए संथाल हूल हुआ था, आज वही ताकतें ‘हूल दिवस’ मना रही है। झारखंड अलग हुये लगभग 16 वर्ष होने को है, राज्य ने संथाल मुख्यमंत्री भी देखा, कई संथाल सांसद भी देखे और आज गैरआदिवासी मुख्यमंत्री भी हूल दिवस पर सिद्धू-कान्हू-चांद-भैरव-फूलो-झानो के सपनों का समाज बनाने की बात कह रही है। क्या वास्तव में ये इनके सपनों का समाज बनाना चाहते हैं? क्या जंगलों की अंधाधुंध कटाई, पहाड़ों को पूंजिपतियों के पास बेचकर, आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन को जबरन छीनकर, उन्हें लाखों की संख्या में विस्थापित कर अमर शहीद सिद्धू-कान्हू-चांद-भैरव-फूलो-झानो का सपना पूरा होगा? हूल दिवस के 161 वीं वर्षगांठ पर जरूर ये सुनिश्चित करना होगा कि जल जंगल जमीन को पूंजिपतियों के पास बेचकर संथाल हूल के शहीदों का सपना पूरा होगा या फिर जल जंगल जमीन को बचाने के लिए लड़ाई लड़ने वाले आदिवासियों के पक्ष में खड़े होकर? जिस तरह से सिद्धू-कान्हू को उनके ही कुछ लोगों ने दुश्मनों के हाथों पकड़वा दिया था, ठीक आज भी उसी तरह अपनी जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिए लड रहे आदिवाासियों को भी उनके ही कुछ तथाकथित अपने धोखा दे रहे हैं, लेकिन फिर भी झारखंड के जंगलों से लेकर पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश आदि के जंगलों में उनका हूल जारी है और ये शोषणविहीन समाज की स्थापना तक जारी रहेगी।   
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