सूखा, अकाल और सरकारी उपेक्षा से मरते बुंदेलखंड के लोग : भाग एक

कॉपी में लिखी गई बातें

स्वतंत्र पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव ने  सूखा, पलायन, भूखमरी और किसानों की आत्महत्या से पस्त बुंदेलखंड से लोट कर यह लम्बी रिपोर्ट लिखी है जिसे हम चार किस्तों में आपसे साझा करेगे. पेश है बुंदेलखंड की जमीनी हालत पर लिखी रिपोर्ट  का पहला भाग;

जियो तो ऐसे जियो कि जिंदगी निखर उठे, मरो तो ऐसे मरो कि मौत चमक उठे''. ये पंक्तियां बुंदेलखंड के ललितपुर जिले स्थित गोगरवारा गांव के सुखलाल की छोटी सी नोटबुक में दर्ज मिली हैं. हाथ से लिखी इस नोटबुक में जिंदगी के रूहानी और जिस्‍मानी दोनों ही किस्‍म के हिसाब दर्ज हैं.

कहीं कुछ धर्मोपदेश हैं, कुछ श्‍लोक, कुछ कबीर भजन, कुछ शेर; तो किसी और पन्‍ने पर किसी नारायण के नाम से 1720 रुपये का उधार, 100 दिन के दूध का हिसाब, एक घंटा 20 मिनट ग्‍वार की बुवाई में महेंद्र से लिया गया 200 रुपये नकद उधार, आदि.

जिंदगी के इन दोनों पलड़ों को साधने में सुखलाल का दम टूट गया. शुक्रवार 6 मई को उनकी लाश ललितपुर शहर में बरामद हुई. उनकी जेब से मिले हैं एक अदद सूखी हुई रोटी के कुछ टुकड़े. जीते जी उनकी जिंदगी तो कभी निखर न सकी, लेकिन इस शख्‍स की भूख से हुई मौत बुंदेलखंड की क्षत-विक्षत और सूखी देह पर ताज़ा घाव की तरह चमक रही है.

बुंदेलखंड में कहने को तो सूखा पड़ा है, लेकिन यहां मौत का सबब भूख बन रही है. सुखलाल रायकवार के आंगन में एक छोटा सा चूल्‍हा है जिसमें पड़ी हुई राख पांच दिन पुरानी है. उनकी पत्‍नी तेजा बताती है कि घर में पांच-छह दिन पहले खाना बना था. राशन अप्रैल में आया था जो कब का खत्‍म हो गया. आंगन के ताखे में एक सूखी रोटी पड़ी हुई है. तीन छोटे बच्‍चों का जीवन मिड डे मील के सहारे चल रहा है.

एक बड़ा लड़का काशीराम है जिसके चेहरे पर हवा उड़ रही है. उसकी बहू घर के भीतर दुबकी हुई है. एक ब्‍याही बिटिया है जो पिता की मौत की खबर सुनकर शुक्रवार को ही मायके पहुंची है. काशीराम कहता है, ''मेरे और बहन की शादी के चक्‍कर में उनके ऊपर साठ हजार का कर्जा हो गया था. तीन साल से पानी नहीं बरस रहा था. कुल लाख डेढ़ लाख का कर्जा रहा होगा. उसी को लेकर वे तनाव में थे.''

सुखलाल चार मई को गांव के बाहर एक दुकान पर बताकर निकले थे कि वे उज्‍जैन के सिंहस्‍थ जा रहे हैं. घर-परिवार में किसी को इसकी खबर उन्‍होंने नहीं दी थी. दो दिन बाद ललितपुर में जब सूखी रोटी के टुकड़ों के साथ उनकी लाश बरामद हुई, तो अब नई-नई कहानियां गढ़ी जा रही हैं. प्रशासन ने इसे भूख से हुई मौत अब तक नहीं माना है.
पुलिस के सामने पड़ा शव

ग्राम प्रधान कन्‍हाई रजक मौत के कारणों पर पूछे जाने के जवाब में कहते हैं, ''वो साधु हो गए थे. पूजा-पाठ खूब करते थे.'' पूजा-पाठ करने का मौत से क्‍या ताल्‍लुक? सुखलाल के भतीजे इसे समझाते हैं, ''उनके ऊपर काफी कर्ज चढ़ गया था. उनकी शारीरिक हालत काम करने की थी नहीं, बाकी परिवार मजदूरी करने दिल्‍ली चला गया तो वे धार्मिक हो गए. उन्‍हें लगा कि कर्ज-वर्ज से बचने का यही एक तरीका है.''

सुखलाल के बड़े भाई लच्‍छू इतनी तल्‍खी से नतीजा नहीं सुनाते. वे कहते हैं, ''मरा तो वो भूख-प्‍यास से ही है, लेकिन कम से कम बताना तो चाहिए कि घर में क्‍या हालत है. किसी को ये लोग बताते नहीं थे कि क्‍या चल रहा है. हालत वाकई बहुत खराब थी. घर में खाने को कुछ नहीं था.''

गोगरवारा समेत आसपास के गांवों से लोगों के पलायन करने का पुराना चलन है. सुखलाल की पत्‍नी भी अपने चारों बच्‍चों को लेकर मेरठ चली गई थीं. वहां वे निर्माण मजदूर का काम करती थीं. यह सिलसिला लंबे समय से चला आ रहा था. अभी फागुन में वे मेरठ से लौटी थीं.

प्रधान बताते हैं कि इस दौरान सुखलाल का नाम अंत्‍योदय राशन योजना से भी कट गया था. वे कहते हैं, ''अब सारा काम ऑनलाइन हो गया है. सुखलाल ने ऑनलाइन नाम नहीं भरवाया होगा, इसलिए उसका नाम कट गया.'' उनके पास बीपीएल या एपीएल का कार्ड भी नहीं था. यह हाल गांव के कई पिछड़ी जाति के लोगों का है. परिवार के पलायन के दौरान ही सुखलाल हाइवे के किनारे बने खुटिया माई के चौरे के पास बैठने लगे. वहीं उनका दिन पूजा-पाठ करते गुज़रता था. आज भी चौरे के पास उनकी पानी की बोतल रखी हुई है.

उनकी मौत के अगले दिन शनिवार को पूरा गांव शोकाकुल था. पत्रकारों का आना-जाना लगा हुआ था. हाइवे के किनारे दो दुकानें शोक में बंद थीं. इनमें एक दुकान सुखलाल के भतीजे की है. ग्राम प्रधान और ग्राम पंचायत के सदस्‍य शनिवार को ही यहां पहुंची समाजवादी सामग्री के पैकेटों की पहली खेप के प्रबंधन में जुटे हुए थे.

उसी दिन पहली बार गांव में सुबह पानी का टैंकर भी पहुंचा था. आखिर तीन भाइयों के परिवार और करीब 1400 मतदाताओं के गांव का एक सदस्‍य इस तरह कैसे भूख से मर सकता है? पांच दिन से किसी के घर में चूल्‍हा नहीं जला, तो इसकी खबर लोगों को क्‍यों नहीं हुई? किसी ने कुछ किया क्‍यों नहीं?

सुखलाल के बड़े भाई तकरीबन डबडबाई आंखों से इसका जवाब देते हैं, ''क्‍या करें साहब? सबका तो यही हाल है. मदद वो करे जो करने के लायक हो. यहां तो कोई कुछ देने की हालत में ही नहीं है.''
सुखलाल की दुखी मां
गोगरवारा में हुई इस मौत के बाद लोगों की उम्‍मीदें बढ़ गई हैं. आनन-फानन में लेखपाल ने सुखलाल के घर गेहूं, चीनी, चावल की एक खेप भिजवाई है.

घरवाले बोरे खोलकर दिखाते हैं तो गेहूं काला और सड़ा हुआ निकलता है. बाकी लोग किसी चमत्‍कार की आस में हर आने वाले के पीछे हुजूम बनाकर चलते हैं कि सुखलाल के बहाने उनकी शायद कोई मदद हो जाए.

उधर सुखलाल की बूढ़ी मां और बड़ी बहन का रो-रो कर बुरा हाल है. घर की ड्योढ़ी पर बैठी उसकी मां बार-बार अपने बेटे का नाम ले रही है. बच्‍चों को बहुत कुछ समझ में नहीं आ रहा. सुखलाल की नोटबुक में नीली स्‍याही से सुंदर लिखावट देखने के बाद जब हमने पूछा कि वे कहां तक पढ़े थे, तो किसी ने जवाब दिया कि वे पांचवीं पास थे.

वहीं खड़ी पांचवीं में पढ़ने वाली उनकी छोटी बिटिया ने तपाक से उसे काटते हुए कहा, ''आठवीं पास''. बिलकुल सपाट चेहरे से उसने नोटबुक से गिरे कुछ पन्‍नों को समेटा और भीतर खड़ी बड़ी बहन के हवाले कर दिया.

साभार : catch हिंदी 
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