अल्ट्राटेक सीमेंट फैक्ट्री की बलि चढ़ते आदिवासी


1992 में अल्ट्राट्रेक सीमेंट फैक्ट्री लगने के बाद से ही यहां पर लगातार खनन का कार्य चल रहा है जिससे स्थानीय लोगों के हाथ से जल, जंगल और ज़मीन भी निकल गई । इस क्षेत्र में 80 फीसदी चूने की खदानें हैं। सीमेंट बनाने वाली फ़ैक्टरी ने चट्टानों को खोदकर ज़मीन को ऐसा बर्बाद किया है कि बाँध में पानी कम पड़ गया और खेत और पशुओं को पानी पिलाना मुश्किल हो गया है। फ़ैक्टरी चालू करने से पहले पूरे गाँव को नौकरी और शिक्षा सुविधा देने का वादा किया था, जो कागजों तक ही सीमित है। 2006 में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत परसवानी-हिरमी मार्ग बनाने की मंजूरी मिलने के बावजूद फैक्टरी मालिकों की आपत्ति के चलते दस साल से ग्रामीण इस सड़क का इंतजार कर रहे हैं। यह दर्द छत्तीसगढ़ के रायपुर से करीब दो घंटे दूर बलौदाबाजार जिले के परसवानी गाँव के आदिवासियों का है। प्रस्तुत है शिरीष खरे की यह रिपोर्ट;

"मंजूरी मिले तो दस बरस गुजर गए साब, लेकिन प्रधानमंत्री सड़क योजना में इस रास्ते को पक्का बनाने के लिए एक पत्थर नहीं लगाया। सीमेंट फैक्टरी की ज्यादा से ज्यादा पत्थर खोदने की भूख अब हमारी जिंदगी के हर रास्ते में रुकावट बन रही है। ढाई किमी हिरमी का यही रास्ता तो हमारे लिए बाहर आने-जाने का इकलौता जरिया है, इस पर चलते हुए हमारी कई पीढ़ियां गुजर गईं। मगर अब कंपनी इसी पर कब्जा करके बड़े इलाके को खोदने की तैयारी कर रही है। हम अपना यह दुखड़ा कलक्टर से लेकर मुख्यमंत्री तक को सुना चुके हैं, सब कहते हैं सड़क तुम्हारी है, योजना जल्द पूरी होगी। मगर हर बार कंपनी की आपत्ति हमारी उम्मीदों पर भारी पड़ जाती है। कंपनी ने तो बारडीह जाने वाले दूसरे रास्ते पर भी खनन शुरू कर दिया है। बाकी तीन बड़ी खदानों ने पूरे गांव को घेर दिया है। हमारा गांव दोनों रास्तों से कटकर खदान में समाता जा रहा है। मुसीबत यह है साब कि हम जाएंगे कहां?"- यह पीड़ा रायपुर से करीब 75 किमी दूर परसवानी (बलौदा बाजार) गांव के सरपंच बलरामजी की है।


यहां के बाशिंदे गत कई सालों से सीमेंट फैक्ट्री की वजह से तकलीफ भोगने को मजबूर हैं। ग्रामीणों ने कई बार गुहार लगाई लेकिन उनकी सुनवाई नहीं है। यह पूरा सीमेंट फैक्ट्रियों का दंश झेल रहा है। 2006 में परसवानी से हिरनी मार्ग प्रधानमंत्री सड़क योजना में शामिल किया गया। इसके लिए शासन स्तर पर तीन बार सर्वे भी हुए। मगर 2011 में आला अधिकारियों ने लिखित जवाब देते हुए बताया कि रास्ते की कुछ जमीन को कंपनी ने खनन लीज क्षेत्र का अभिन्न हिस्सा बताने के कारण सड़क नहीं बन पा रही है।


लालजी गायकवाड़ सवाल करते हैं, विकास के लिए सरकार किसानों की जमीन कंपनी को दे सकती है तो यहां विकास का ही रास्ता बनाने के लिए वह अब हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठी है? वहीं, जो कंपनी औने-पौने दामों पर हमारी जमीन खरीदकर अरबों रुपए का कारोबार कर रही है, मौका पडऩे पर क्या हमें जीने का रास्ता नहीं दे सकती है? कामदेव साहू बताते हैं, "बीते साल रायपुर में मुख्यमंत्री से गुहार लगाने के बाद पहली बार जिला प्रशासन हरकत में जरूर आया था, इसके लिए शासन स्तर पर तीन बार सर्वे भी हुए। मगर 2011 में आला अधिकारियों ने लिखित जवाब देते हुए बताया कि रास्ते की कुछ जमीन को कंपनी ने खनन लीज क्षेत्र का अभिन्न हिस्सा बताने के कारण सड़क नहीं बन पा रही है। लालजी गायकवाड़ सवाल कहते हैं, "विकास के लिए सरकार किसानों की जमीन कंपनी को दे सकती है तो यहां विकास का ही रास्ता बनाने के लिए वह अब हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठी है?"

वहीं, जो कंपनी औने-पौने दामों पर हमारी जमीन खरीदकर अरबों रुपए का कारोबार कर रही है, मौका पडऩे पर क्या हमें जीने का रास्ता नहीं दे सकती है? कामदेव साहू बताते हैं, "बीते साल कलक्टर के निर्देश पर अधिकारियों ने मुआयना भी किया, मौखिक आश्वासन भी दिया, लेकिन हुआ कुछ नहीं।


आठ किमी घूम कर जाओ
ग्रामीण बताते हैं कि इस समस्या को हल करने की बजाय अधिकारी उन्हें सकलोर होकर आठ किमी लंबे रास्ते पर आने-जाने की नसीहत दे रहे हैं।" फुलुकराम वर्मा कहते हैं, "इस रास्ते पर दारू की दो दुकानों के अलावा कंपनी के दो मेन-गेट और दो रेल्वे क्रांसिग गेट भी हैं। बीमार पडऩे वाले मरीजों के अलावा रोजाना स्कूल जाने वालों बच्चों के लिए इस रास्ते से समय पर पहुंचना मुश्किल होगा।"

ग्रामीणों ने ग्रामसभा में प्रस्ताव पारित कर अपने लिए परसवानी से हिरमी मार्ग बनाने की इच्छा जताई है। सरपंच बलरामजी का आरोप है कि कंपनी कारर्पोरेट सामाजिक जवाबदेही (सीएसआर) की राशि का गलत इस्तेमाल कर रही है। कंपनी ने उत्खनन के लिए एक पक्की सड़क बनाकर लाखों रुपए की राशि सीएसआर मद में डाल दी है, जबकि ग्रामीण आज भी कच्चे रास्ते पर जाने के लिए मजबूर हैं।

बलौदा बाजार कलक्टर बसव राजू एस बताते हैं कि परीक्षण नए सिरे से किया जाएगा। वे कहते हैं, "मेरे कलक्टर बनने के बाद कोई शिकायत नहीं आई है। फिर भी इस प्रकरण में नए सिरे से परीक्षण कराने के लिए संबंधित विभाग के अधिकारियों को निर्देश दूंगा।"


परसवानी में सीमेंट फ़ैक्टरी पी गई पूरे गांव का पानी

चूना पत्थरों की खदानों ने हमारी जिन्दगी तबाह कर डाली। बीस बरस पहले इस गाँव में सीमेंट बनाने वाली फ़ैक्टरी लगने के बाद यहाँ की चट्टानों को खोदकर ज़मीन को ऐसा बर्बाद किया कि बाँध में पानी कम पड़ गया। इस साल सूखे में तो हमारे खेत और पशुओं को पानी पिलाना मुश्किल हो गया। फ़ैक्टरी चालू करने से पहले पूरे गाँव को नौकरी और शिक्षा सुविधा देने का वादा किया था, जो बस झाँसा बनकर रह गया। यह दर्द रायपुर से करीब दो घंटे दूर परसवानी (बलौदाबाजार) के रहवासियों का है।

इनके मुताबिक 1992 में निजी कम्पनी की सीमेंट फ़ैक्टरी लगने के साथ ही यहाँ चूना खदानों का विस्तार होता चला गया। लगातार खनन के चलते इन लोगों के हाथ से अब जल और ज़मीन भी निकलती जा रही है। सरपंच बलरामजी कहते हैं, "गाँव के नक्शे पर 80 फीसदी चूना खदानें हैं। पहले यहाँ 1007 एकड़ ज़मीन पर खेती होती थी, लेकिन अब 200 एकड़ खेत ही हैं। खेत खराब होने से ज्यादातर लोग बेकार हैं।"



लोकराम वर्मा के मुताबिक, "चूना पत्थरों की लगातार खुदाई के चलते मिट्टी की गुणवत्ता में आई कमी ने उपज की गुणवत्ता गिरा दी। साथ ही आबोहवा को भी जहरीला बना दिया। चारा तक खरीदने को मजबूर हैं किसान।"

सामाजिक कार्यकर्ता लालजी गायकवाड़ बताते हैं, "दो दशक पहले यहाँ ढाई हजार से ज्यादा पशु थे, लेकिन अब हजार से भी कम पशु बचे हैं। खनन गतिविधियों के कारण यहाँ न पानी बचा और न ही चारागाह। 75 पशु अकाल मौत मर गए। 1980 के पहले यहाँ चारागाह के लिये 200 एकड़ ज़मीन थी, लेकिन अब चूना पत्थरों के खनन के लिये सरकार ने चारागाह के नाम पर महज 2 एकड़ की ज़मीन छोड़ी है।"
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