विकास के बोझ से डूबती नर्मदा नदी


मानसून की आहट आते ही नर्मदा घाटी के निवासियों के चेहरे पर डर झलकने लगता है। बिना पुनर्वास के उन्हें विस्थापित होने को मजबूर किया जाता है। वहीं दूसरी ओर सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि निमाड़ के डूब प्रभावित शत प्रतिशत गांवों का पुनर्वास हो चुका है। जबकि जमीनी हकीकत इसके एकदम विपरीत है। देवेन्द्र सिंह तोमर का महत्वपूर्ण आलेख जिसे हम सप्रेस से साभार साझा कर रहे है;

नर्मदा नदी का उद्गम अमरकंटक से होता है और यहां से निकलकर 1312 कि. मी. का सफर तय कर यह भरूच (गुजरात) में अरब सागर में समाहित होती है। इसमें से यह मध्यप्रदेश में 1077 कि.मी. में बहती है और मात्र 235 कि.मी. गुजरात के (उत्तर तट) व महाराष्ट्र के (दक्षिण तट) के बीच बहती हैं। समुद्र तक की अपनी यात्रा के दौरान यह अधिकतर मध्यप्रदेश में ही बहती है।

नर्मदा घाटी के विकास के नाम पर नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण बनाया गया। नर्मदा में पानी की गणना की गई। इसमें आने वाले लगभग 28 लाख एकड़ फुट पानी का बंटवारा किया गया। इसमें से साढ़े 17 लाख एकड़ फुट मध्यप्रदेश को, 9 लाख एकड़ फुट गुजरात को व 1.5 लाख एकड़ फुट महाराष्ट्र को दिया गया। नदी घाटी विकास योजना के अन्तर्गत पूरी नर्मदा नदी पर 3165 बांध बनाने का निर्णय लिया गया। इसमें से 3000 छोटे नालों पर, 135 बड़े नालों पर, 23 सहायक नदियों पर व 7 नर्मदा नदी पर जिसमें 6 बांध मध्यप्रदेश में व एकमात्र गुजरात में है के निर्माण का निश्चय किया गया।

ऐसे ही बिजली का उत्पादन मुख्य रूप से मध्यप्रदेश में 4 बांधों से व गुजरात में सरदार सरोवर बांध से बनाने का निर्णय हुआ। नर्मदा नदी पर बांधों से पूरी बिजली मात्र वर्षाकाल में पूरे दिन व शेष माह में कुछ घंटों के लिए उपलब्ध रहती है। मध्यप्रदेश में सिंचाई के लिए सहायक नदियों व नर्मदा पर बने बांधों से पानी दिसम्बर से फरवरी के मध्य सिंचाई के लिये किसानों को उपलब्ध होता है। म.प्र. के कुछ जिलों खण्डवा, खरगोन, बड़वानी व धार में गन्ना, केला, पपीता, नींबू, संतरा जैसी व अन्य बागवानी फसलों के लिए इन बांधों से किसानों को पानी देने की कोई योजना अभी तक बन नहीं पाई है। कपास भी एक नगदी फसल है। जो मई माह में बोई जाती है। सिंचाई मुख्य रूप से नहरों के निर्माण के द्वारा ही होना संभव है। परंतु किसी भी बांध से, फिर चाहे वह बड़ा हो या सहायक नदी का छोटा बांध हो,अभी तक पूर्ण रूप से नहरों के निर्माण व गुणवत्ता पर सफलता देखने में नहीं आई है। न ही नहरों के कमान्ड क्षेत्र में नहरोें के जाल को प्राथामिकता से पूरा किया गया है।

नर्मदा व सहायक नदियों पर अब तक कुल 30 बने बांधों से करीब 1125 गांव प्रभावित एवं विस्थापित हुए हैं। विस्थापन का कोई मूल्य नहीं होता और ना ही विस्थपितों का जीवनस्तर बेहतर होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार नर्मदा को जीवनदायनी कहा गया है। नर्मदा घाटी में इसके दोनों किनारों पर बसने वाले किसान, आदिवासी व अन्य जातियों के लोेग पीढ़ियों से रह रहे हैं।

पर्यावरणीय कारणों को देखें तो बड़ी बांध परियोजनाएं पेड़-पौधों से लगाकर वहां की संस्कृति तक को डुबोती हैं। इस वजह से ओजोन परत की कमी के कारण वायुमण्डल गर्म एवं दूषित होता है। परिणामस्वरूप मौसम अनुकूल न होते हुए विपरीत होता चला जाता है, और वर्षा आधारित फसलें भी प्रभावित होकर उत्पादन देने में असमर्थ हो जाती हैं।

भारत एक प्राकृतिक सम्पदा वाला देश है, यहां नदियां एवं पर्वत-श्रृंखला एक दूसरे के पूरक हैं। ’’विकास की अवधारणा’’ में प्राकृतिक सम्पदाओं का दोहन एवं नदियों के प्रवाह को रोकना तथा सदियों से चली आ रही व्यवस्था (परम्परा) को नष्ट करना कितना तर्क-संगत  है? विकास के इस मॉडल पर पुनर्विचार होना चाहिए।
 यूँ तो देश का विकास योजनाओं पर ही आधारित है, परंतु  बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं की क्षमता पर सवाल उठते हैं। लाभ की गणना में कई बातें छूट जाती हैं। या तो उनमें गाद भर जाती हैं या पूरी परियोजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है। ये सारी बातें हमें समाचारपत्रों के माध्यम से पढ़ने में आती हैं।

 ऐसी तमाम बातों को देखते हुए ’’विकास की अवधारणा’’ नर्मदा और उसकी सहायक नदियों पर बनने वाले बांधों के दुष्परिणामों को हमें समझना होगा एवं नर्मदा घाटी की पवित्रता एवं आस्था को जीवित रखने का संकल्प हम सभी को लेना होगा।

(श्री देवेन्द्र सिंह तोमर नर्मदा बांध डूब प्रभावित गांव के निवासी हैं व नर्मदा बचाओ आंदोलनके कार्यकर्ता हैं।) 

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