सरसों सत्याग्रह : जीन सरसों के विरोध में जन संगठनों का विरोध प्रदर्शन

आप को याद होगा कि किस तरह 2010 में हम सब नागरिकों ने मिल कर गैर जरूरी, अनचाही और असुरक्षित संशोधित जीन वाले (जीएम) बीटी बैगन को अपनी भोजन की थाली और अपने खेतों में आने से रोका था। तब भारत सरकार ने संशोधित जीन वाली फसलों पर रोक लगाने के लिए बहुत से ठोस कारण सामने आए थे। अब पांच साल बाद फिर से एक संशोधित जीन वाले खाद्य पदार्थो में संशोधित जीन वाली फसलों पर रोक लगाने के लिए बहुत से ठोस कारण सामने आए थे। अब पांच साल बाद फिर से एक संशोधित जीन वाले खाद्य पदार्थ की खेती को अनुमति देने के प्रयास हो रहे हैं। जिसके विरोध में जन सगठनों ने 5 फ़रवरी को दिल्ली के पर्यावरण भवन पर विरोध प्रदर्शन किया। सह फसल है सरसों का नाम डीएचएम-11 (धारा सरसों संकर 11)। ऐसा क्यों नहीं होना चाहिए इस के पक्ष में कुछ महत्वपूर्ण कारण निम्नलिखित हैं।

  1. जीन संशोधित करने की तकनीक असुरक्षित: जीन संशोधित करने की तकनीक जीवित प्राणियों को पैदाा करने का एक अप्राकृतिक तरीका है जो सटीक भी नहीं है। इस के चलते हमारे भोजन और खेती में अस्थिर एंव अनिîित परन्तु बेलगाम और वापिस ना की जा सकने वाली फसलों का प्रवेश हो जाता है। इस का हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण पर गहरा और दूरगामी असर होता है। पर्यावरण में संशोधित जीन वाली फसलों का प्रवेश होने से खेती का जोखिम बढता है, किसानों और उपभोक्तओं के लिए संशोधित जीन रहित फसलों के विकल्प नहीं रहते, ऐसी फसलों के लिए बाजार सीमित होने का खतरा भी खड़ा हो जाता है। संशोधित जीन वाली फसलों एवं खा़़़द्य पदार्थो के प्रतिकूल प्रभावों के बारे में अधिक जानकारी और वैज्ञानिक दस्तावेज पर उपलब्ध हैं।
  2. संशोधित जीन वाली सरसों एक छलावा: संशोधित जीन वाली सरसों का यह कह कर समर्थन किया जा रहा है कि यह सार्वजनिक क्षेत्र का उत्पाद है। क्या सार्वजनिक क्षेत्र का उप्पाद होेने से संशोधित जीन वाले उत्पाद सुरक्षित हो जाएंगे? संशोधित जीन वाले खाद्य पदार्थों के प्रति आम जनता के प्रचंड विरोध को देखते हुये निजी क्षेत्र की मोनसेंटो जैसी कम्पनियॉं, जो पअने संशोधित जीन वाली मक्का के लिए अनुमति लेने के लिए पहले से प्रयासरत थी, थोड़ी ढीली पड़ गई हैं। वो इस बात का इंतजार कर रही हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र की होने के कारण अगर संशोधित जीन वाली सरसों का छलावा हैै। इस से निजी क्षेत्र की राह आसान हो जाएगी। इस लिए दिल्ली विश्रविघालय की यह संशोधित जीन वाली सरसों एक छलावा है। इस से निजी क्षेत्र की राह आसान हो जाएगी। इस संशोधित जीन वाली सरसों को अनुमति देने की सारी प्रक्रिया पारदर्शी ना हो कर बेहद गोपनीय है। यह स्पष्ट नहीं है कि नियामक किसके हित साधने के लिए क्या छुपा रहे हैं। संशोधित जीन वाले उत्पाद असुरक्षित हैं चाहे सार्वजनिक क्षेत्र के हों या निजी क्षेत्र के!



  3. दिल्ली विष्वविघालय की यह सरसों बेयर कम्पनी की उस संशोधित जीन वाली सरसों जैसी ही है जिसे 2002 में नकारा जा चुका हैः वर्ष 2002 में ऐसी ही एक संशोधित जीन वाली सरसांे, जिसे बैयर नियंत्रित कम्पनी प्रो एग्रो ने पेश किया था और जो ’बार, बारनेज और बारसटार जीन समूह आधारित संकर किस्म थी, को भारतीय नियामकों द्वारा अस्वीकार कर दिया गया था। इस के निम्नलिखित कारण थे: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने बताया था कि वह इस संशोधित जीन वाली सरसों के परीक्षण और परिणाम से संतुष्ट नहीं है, इस के अलावा सब्जी के तौर पर सरसों की सुरक्षा जॉच की ही नहीं गई (सरसों सिर्फ तिलहन नहीं है- इस के बीज और पत्ते भी खाद्य पदार्थ हैं), संशोधित जीन वाली सरसों के अनचाहे इलाकों में प्रसार को रोकने के कोई प्रबन्ध भी नहीं थे, औश्र सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि बेयर की सरसों खरपतवार नाशक सहनशील थी, यानी इस पर खरपतवार नाशक का बखूबी प्रयोग किया सकता था। हालांकि कम्पनी यह कहती रहीं कि यह गुण-धर्म इस फसल में तकनीकी कारणों से डाला गया था और यह गुण संशोधित जीन वाली सरसों क बाजार में आने के बाद अवैध खरपतवाार नाशक के प्रयोग का नियंत्रण एवं नियमन असंभव हो जाएगा। ये सारे के सारे तर्क दिल्ली विश्वविघालय की वर्तमान संशोधित जीन वाली सरसों पर भी लागू होते हैं। 
  4. कई राज्य सरकारे, जिन मेें सरसों बोने वाले मुख्य राज्य भी शामिल हैं, तो संशोधित जीन वाली फसलों को खेतों में परीक्षण की अनुमति भी नहीं देना चाहते: भारत में सरसों बोने वाले मुख्य राज्यों जैसे राजस्थान, मध्य प्रदेश और हरियाणा ने तो अपने राज्य में संशोधित जीन वाली सरसों के क्षेत्र परीक्षण की अनुमति भी नहीं दी है। संविधान के अनुसार कृषि राज्य में संशोधित जीन वाली सरसों के क्षेत्र परीक्षण की अनुमति भी नहीं दी है। संविधान के अनुसार कृषि राज्य सरकार के अधीन विषय है। इस लिए संशोधित जीन वाले कृषि उत्पादों को मंजूरी देेते हुये राज्य सरकारों की राय को भी ध्यान में रखना चाहिए। बीटी बैगन पर रोक लगाने के पीछे भी यह एका प्रमुख कारण था। 
  5. भारत सरसों के ’जन्म एवं विविधता का केंद्र: बैगन की तरह सरसों के लिए भी भारत ’विविधता का केेद्र’ है। कई बैज्ञानिकों के अनुसार सरसों की उत्पत्ति भारत से ही हुई है। 2004 में गठित डॉ स्वामीनाथन के नेतृत्व वाली कृषि मंत्रालय की समिति की रिपोर्ट स ेले कर 2013 की सुप्रीम कोर्ट की तकनीकी विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट में उन फसलों में संशोधित जीन वाली तकनीक के प्रयोग के खिलाफ स्पष्ट निर्देश है जिन की उत्पत्ति भारत मे हुई है या जिन के लिए भारत ’ विविधता का केंद्र ’ है। बेटी बैंगन पर रोक लगाने के पीछे यह भी एक मुख्य कारण था। 
  6. संशोधित जीन वाली सरसों को क्षेत्र विशेष तक सीमित रखना असंभव - सम्मिश्रण अवश्ंयंभावी: दुनिया भर के कई उदाहरण के साथ-साथ संशोधित जीन वाली सरसों बनाने वाले बैज्ञानिक खुद भी यह मानते हैं कि संशोधित जीन वाली सरसों का अवंाछित क्षेत्रो मे फैंलाव रोकना असंभव है और सम्मिश्रण/प्रदूषण अवश्यंभावी है। हमारे खेतों मंे संशोधित जीन वाली सरसों की इजााजरत देने का परिणाम होगा सरसों की अन्य का इस संशोधित जीन वाली सरसों से भौतिक एंव जैविक, दोनों तरह का प्रदूषण और वर्तमान किस्मों की शुद्वता का खात्मा। खरपतवार की समस्या बढ़ने, अनियंत्रित किस्म की खरपतवार पनपने, संशोधित जीन वाली सरसों की वापसी असंभव होने जैसे अन्य खतरों के साथ यह जैविक किसानों औश्र उनकी फसलों की जैविक पहचान के लिए भी खतरा है क्योंकि जैविक खेती में संशोधित जीन वाले उत्पादों का प्रयोग प्रतिबधिंत है। यह ध्यान रहे कि भारत के उच्चतम न्यालय ने संशोधित जीन वाले उत्पादों पर एक जनहित याचिका (डब्ल्यूपी 260/2005) में 2007 के अपने आदेश मंे सरकार को निर्देेश दिया था कि संशोधित जीन वाली फसलों से होने वाले सम्मिश्रण/प्रदूषण पर रोक लगाई जाये। 
  7. संशोधित जीन वाली सरसों खरपतवार नाशक सहनशील है, यानी इस पर खरपतवार नाशक का खुल कर प्रयोग किया जा सकता है जब कि इस प्रचार अधिक उपज देने वाली प्रजाति के रूप में किया जा रहा हैः हालांकि इस के प्रवर्तक इस की खरपतवार सहनशीलता का जिक्र नहंीं नही कर रहे परन्तु नियामक/सरकार इसे नजरअंदाज नहीं कर सकती कई विष्वसनीय संस्थाओं ने भारत मंे, खरपतवार नाशक सहनशीलता ’ फसलों के प्रवेश के खिलाफ मत दिया है। खरपतवार नाशक सहनशील’ फसलों के दुष्प्रभाव ना केवल स्वास्थ और पर्यावरण पर पड़ते है बल्कि इस के सामाजिक -आर्थिक नुकसान भी है। इस से खेतिहार मजदूरों, मुख्य रूप् से महिलाओं, को निराई-गुड़ाई के लिए मिलने वाले काम के सीमित अवसर भी खत्म होते है। इस निए कई वैध कारणं के चलते भारत में खरपतवार नाशक सहनशील’ फसलों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। संशोधित जीन वाली सरसों भारत मं अन्य ’खरपतवार नाशक सहनशील ’ फसलों के लिए रास्ते खोलेगी। 
  8. संशोधित जीन वाली सरसों में प्रयुक्त जीन इसे ’ जनन उपयोग प्रतिबंधित तकनीक’ बनाता हैः संशोधित जीन वाली सरसों की इस संकर किस्म में प्रयोग की गई सरसों में नर बॉझपन का ’बारनेज’ जीन डाला गया है। भारत के ’पौधों की किस्मों औश्र किसानों ेक अधिकार के संरक्षण का कानून के तहत ’जनन उपयोग प्रतिबंधित तकनीक’ से अभिप्राय है मनुष्यों, पशुओं या पौधों के जीवन या स्वास्थ के लिए हानिकारक तकनीक । इस लिए सरसों की यह किस्म ’जनन उपयोग प्रतिबंधित तकनीक’की श्रेणाी मेें आती है।
  9. आयुर्वेदिक उपचार पद्वति में सरसों का मधु मक्खियों और शायद उद्योग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा: आयुर्वेदिक उपचार पद्वति मंे सरसों का भोजन और दवाएंॅ दोनों रूप् में इस्तेमाल किया जाता है। सरसों के बीज और तेल का कई तरह के रोगों के उपचार में प्रयोग किया जाता है। इस तरह के उपयोग पर संशोधित जीन वाली सरसों का प्रभाव स्पष्ट नहीं है और ना ही इस का अध्ययन किया गया है। 
  10. संशोधित जीन वाली सरसों का मधु मक्खियों और शहद उद्योग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा: संशोधित जीन उत्पाद उद्योग द्वारा स्वंय कई देशों में प्रायोजित किए गए अध्ययन यह दिखाते है कि संशोधित जीन वाली सरसों का मधु मक्खियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आंशका है। यह अन्य फसलों एंव शहद दोनों के उत्पादन को प्रभावित करेगा। भारत में शहद उद्योग तेजी से बढ़ रहा है और मधुमक्खी पालकों के लिए सरसों एक प्रमुख संसाधन है। सरसों के साथ मधुमक्खी पालन से दोहरा फायदा होता है। इस से शहद उत्पादन के रूप में अतिरिक्त आय मिलने के अलावा सरसों के पैदावार में भी लगभग 20-25 प्रतिशत की बढ़ोŸारी होती है। 





  11. उच्चतम न्यायालय के स्पष्ट आदेशों के बावजूद संशोधित जीन वाली सरसों की जैव सुरक्षा संबंधी परीक्षणों और उन के परिणामों की जानकारियां नियामकों ने सार्वजनिक नहीं की: पहले भी हमारे नियामकों द्वारा संशोधित जीन वाले उत्पादों संबंधी परीक्षण में कमियां पाई गई हैं। उस के बाद से अब तक इस दिशा में स्थिति सुधरने के कोई संकेत नहीं है। इस लिए इस मौके पर नियामकों पर आंख बंद कर के विश्वास नहीं कर सकते कि वो हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण को असुरक्षित और जोखिम भरी तकनीकों से बचा कर रखेंगे। 
  12. जब पूरी दुनिया में संशोधित जीन वाली कनोला (सरसों प्रजाति की फसल) का क्षेत्रफल घट रहा है: इस के विपरीत भारत संशोधित जीन वाली सरसों की अनुमति देने की योजना बना रहा है! बीटी बैंगन पर रोक लगने के बाद हुए अध्ययनों में संशोधित जीन वाले उत्पादों के हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के और भी सबूत मिले हैं। इस के अलावा हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण पर खरपतवार नाशकों के दुष्प्रभाव के निर्णायक सबूत अब उपलब्ध हैं। 
  13. सरसों का उत्पादन बढ़ाने के लिए अन्य प्रमाणिक विकल्प उपलब्ध हैं: सरसों का उत्पादन बढ़ाने के अन्य विकल्प उपलब्ध हैं। धान की श्री पद्धति की तर्ज़ पर सरसों की मौजूदा किस्मों से ही काफी ज़्यादा पैदावार मिली है।


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