जिंदल, नैनिसार की जमीन और जन आक्रोश


उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जिले के नैनिसार में जिंदल ने अप्रैल 2015 में समुदाय की भूमि हड़प ली । शुरू से ही स्थानीय लोग भूमि की लूट का विरोध कर रहे है। विरोध के बावजूद राज्य के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने प्रस्तावित जिंदल के  विद्यालय का भूमि पूजन किया जिससे नाराज स्थानीय लोगों ने पूजन के बाद शिला को उखाड़ कर फेंक दिया। तब से लेकर आज तक स्थानीय लोगों तथा आंदोलनकारियों पर पुलिस तरह-तरह से दमन उत्पीड़न कर रही है। इसी की एक कड़ी में जब उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के पी.सी.तिवाड़ी, ग्रामीण  स्थानीय न्यायालय द्वारा विद्यालय के निर्माण कार्य पर लगाई रोक का फैसला लेकर निर्माण स्थल पर गए तो पुलिस ने उन्हें वहां फर्जी मुकदमे लगाकर गिरफ्तार कर लिया। पुलिसिया दमन के विरोध में 8 फरवरी को अल्मोड़ा में एक विशाल जन रैली निकाली गई। पेश है  रैली पर राजीव लोचन साह की टिप्पणी;

नैनिसार प्रकरण पर कल 8 फरवरी 2016 को अल्मोड़ा में हुई रैली अदभुत थी. 1994 के राज्य आन्दोलन के बाद अल्मोड़ा में ऐसा जन सैलाब कभी नहीं उमड़ा. राज्य आन्दोलन के बाद हताश होकर घर बैठ गए अनेक पुराने दिग्गज इस रैली में थे तो उस युवा पीढ़ी के प्रतिनिधि भी, जिसे हम अराजनैतिक मानते आये हैं. इस परिघटना में राज्य बनने के बाद पहली बार एक नए आन्दोलन की आहट सुनाई दे रही है. अब यह नेतृत्व के हाथ में है कि वह धैर्य, विवेक और समझदारी दिखा कर इस ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग करे, इसे स्खलित न होने दे.
दिक्कत अख़बारों की है. हिंदुस्तान और जागरण के हल्द्वानी संस्करणों ने इस खबर को पहले पेज पर छपा है तो अमर उजाला ने जनांदोलनों के प्रति अपनी वितृष्णा की परंपरा को बनाये हुए रख बिलकुल ही लापता कर दिया है.

यानी उत्तराखंड के सबसे अधिक प्रसार वाले अखबार के सिर्फ अल्मोड़ा के पाठक, जो शायद वैसे ही इस रैली की गूँज सुन चुके होंगे, इस खबर को पढ़ेंगे. यानी इन तीन अख़बारों के पाठकों के सिर्फ 25 प्रतिशत को ही नैनिसार प्रकरण की जानकारी होगी. इस तथ्य को फिलवक्त देहरादून में रह रहे मेरे भतीजे के फोन सही साबित किया, जब हिन्दुस्तान में कल की रैली की खबर पढ़ कर उसने पूछा कि यह नैनिसार मामला है क्या ?
तब इस आन्दोलन का विस्तार कैसे होगा ? राज्य आन्दोलन में इसका बिलकुल उल्टा था. मीडिया आज का एक बटे दस था, मगर पूरी तरह आन्दोलन के साथ था. इस राज्य को बर्बाद करने में जितनी बड़ी भूमिका बेईमान राजनेताओं की है, उससे कम लालची मीडिया के नहीं.

नैनिसार आन्दोलन को इन्हीं सीमाओं के साथ आगे बढ़ाना होगा.
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