डॉक्टर ब्रह्मदेव शर्मा नहीं रहे

पेशे से भारतीय प्रशासनिक सेवा(आईएएस) के अधिकारी, शिक्षा से गणित में पीएचडी लेकिन ज़िंदगी भर आदिवासियों की लड़ाई लड़ने के कारण शोहरत पाने वाले डॉक्टर ब्रह्मदेव शर्मा नहीं रहे। मध्य प्रदेश काडर के सेवा निवृत्त आईएएस अधिकारी डॉ. बीडी शर्मा का रविवार रात देहांत हो गया। वे ग्वालियर में अपने घर पर दोनों बेटों और पत्नी के साथ । एक साल से वे बीमार थे और शारीरिक तौर पर भी काफ़ी कमज़ोर हो गए थे। आज सोमवार दोपहर 12 बजे ग्वालियर के लक्ष्मीनगर शमशान घाट में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।
भारत में आदिवासियों की दुर्दशा और समस्या के मुद्दे पर वे लगातार आवाज़ उठाते रहे ।लेकिन पिछले दिनों वो तब सुर्खियों में आए थे जब छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले के कलेक्टर को माओवादियों से छुड़ाने में उन्होंने प्रोफ़ेसर हरगोपाल के साथ अहम भूमिका निभाई थी। बीबीसी से  साभार;

''वो कहते थे अगर संविधान को सही में लागू कर दिया जाए तो भारत की समस्याएं हल हो जाएंगी, परेशानी यह है कि संविधान पुस्तक बन कर रह गई है।''

आदिवासियों के लिए कई सरकारी नीतियों के निर्धारण में उन्होंने अहम भूमिका । बैच के आईएएस अधिकारी डॉ. शर्मा मौजूदा छत्तीसगढ़ (उस समय मध्य प्रदेश) के बस्तर ज़िले के कलेक्टर के तौर पर आदिवासियों के पक्ष मे खड़े रहने के लिए बहुत चर्चा में रहे।

आदिवासियों और दलितों के लिए सरकारी नीतियों को लेकर उनके और सरकार में मतभेद के कारण 1981 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी। लेकिन ग़रीबों, आदिवासियों और दलितों के लिए उनका संघर्ष जारी रहा। सरकार ने 1981 में ही उन्हें नॉर्थ ईस्ट युनिवर्सिटी का वाइस चांसलर बनाकर शिलॉंग भेजा।

बस्तर के कलेक्टर के तौर पर डॉ. शर्मा ने आदिवासियों के हक़ों के लिए काम किया।

1986-1991 तक वो अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति आयोग के आयुक्त रहे।

इस पद पर रहने वाले वो आख़िरी आयुक्त थे क्योंकि इसके बाद एससीएसटी राष्ट्रीय आयोग का गठन कर दिया गया था। लेकिन अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति के आयुक्त के तौर जो रिपोर्ट उन्होंने तैयार की उसे देश के आदिवासियों की भयावह स्थिति बताने वाले और उनकी सिफ़ारिशों को आदिवसियों को न्याय दिलाने की ताक़त रखने वाले दस्तावेज़ के रूप में देखा जाता है। उन्होंने गांवों की ग़रीबी का राज़ बताते हुए किसानों की सुनियोजित लूट का विस्तृत ब्योरा दिया था। 1991 के बाद से वो पूरी तरह आदिवासियों और दलितों के अधिकार के लिए लड़ने लगे। 1991 में भारत जन आंदोलन और किसानी प्रतिष्ठा मंच का गठन कर उन्होंने आदिवासी और किसानों के मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर लोगों का ध्यान खींचा।

अक्सर सामाजिक आंदोलन पहले संस्था बनाते हैं फिर विचारों को फैलाने का काम करते हैं लेकिन डॉ. शर्मा के मुताबिक़ संस्था नहीं विचारों को पहले आमजन तक पहुंचना चाहिए।

"जल जंगल ज़मीन" का नारा दिया डॉ. शर्मा ने

इस संबंध में उनकी लिखी हुई किताबों ने भी अहम भूमिका अदा की और "गांव गणराज" की परिकल्पना ने ठोस रूप लिया जिसके तहत ये स्पष्ट हुआ कि गांव के लोग अपने संसाधनों का एक हिस्सा नहीं चाहते, वे उसकी मिल्कियत चाहते हैं।

इसी आंदोलन के तहत, "जल जंगल और ज़मीन" का नारा और विचार उभरा।

वो एक बेहतरीन लेखक भी थे और 'गणित जगत की सैर', 'बेज़ुबान', 'वेब ऑफ़ पोवर्टी', 'फ़ोर्स्ड मैरिज इन बेलाडिला', 'दलित्स बिट्रेड' आदि अनेक विचारणीय पुस्तक लिखी।

इसके साथ-साथ वो हस्तलिखित पत्रिका भूमिकाल का संपादन भी करते थे।

वो किसी भी पीढ़ी के लिए एक इंसान और एक सिविल सर्वेंट के तौर पर आदर्श व्यक्ति हैं। वे एक बहुत ही ईमानदार और सत्यनिष्ठ व्यक्ति थे। वो ग़रीब आदमी की तरह रहते थे. दिल्ली में अगर आप उनका मकान देखें तो वह एक झुग्गी झोपड़ी वाले इलाक़े में था।

ऐसा नहीं था कि उनके पास पैसे नहीं थे लेकिन उनका मानना था कि जीना है तो एक साधारण आदमी की तरह जीना है । वो भौतिक सुखसुविधाओं का ख़्याल नहीं करते थे।

भारत की प्रशासनिक सेवा के इतिहास में आपको ऐसा सिविल सर्वेंट नहीं मिलेगा जो बीडी शर्मा जैसा बस्तर के कलेक्टर थे। वहां और जहां भी उन्हें काम दिया गया वो ज़िंदगी भर ग़रीबों और आदिवासियों के लिए जीए और उनके लिए ही काम किया। जब वो अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति आयोग के प्रमुख थे तो उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से कहा था कि मैं एक रुपए तन्ख़्वाह लूंगा लेकिन आप हमारे काम में दख़ल मत दीजिएगा।

जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने एक दिन शर्मा जी से पूछा कि आपका काम और स्टेटस क्या है । तो उन्होंने कहा कि देखिए राजीव जी, स्टेटस तो मेरा कुछ नहीं है क्योंकि मैं सिर्फ़ एक रुपए की तन्ख़्वाह लेता हूं लेकिन मुझे कोई ख़रीद नहीं सकता. ये मेरा स्टेटस है। भारत के प्रधानमंत्री को जवाब देने का जो उनमें साहस था वो अद्भुत और असाधारण था. उन्होंने आदिवासियों के लिए कई किताबें लिखीं और बहुत काम किया।
वो कहते थे कि जब हमारा संविधान बना तो भारत आज़ाद हुआ लेकिन आदिवासियों की आज़ादी छिन गई। आदिवासी उन्हें पिता की तरह मानते थे. हरेक गांव में उनकी बहुत इज़्ज़त थी. बहुत अच्छी तरह मिले और वो भूल ही गए कि हम वहां सरकार की तरफ़ से बात करने आए हैं। वे चाहे किसी भी विभाग में कोई भी अधिकारी रहे यहां तक कि जब वे नॉर्थ ईस्ट युनिवर्सिटी में वाइसचांसलर थे तब भी उन्होंने आदिवासियों के लिए काम किया. उनके बच्चों की तरह थे, आदिवासी। बीडी शर्मा ने प्रधानमंत्री राजीव गांधी के पूछने पर बताया था, मुझे कोई खरीद नहीं सकता।

सलवाजुडूम और बीजेपी के लोग उनका बहुत अपमान करते थे क्योंकि आदिवासियों के लिए वो बहुत साहस से बोलते थे लेकिन उन्होंने उसे अपमान नहीं माना।

उनका मानना था कि सत्ताधारी लोग जो दलितों को पीड़ित करते हैं, जो उनका शोषण करते हैं तो वो तो ऐसा करेंगे ही। ज़िंदगी के आख़िरी क्षण तक उनकी यही इच्छा थी कि वो बस्तर जाएं और आदिवासियों के साथ रहें। उनमें जितना नैतिक साहस और नैतिक दृढ़ता थी, वो विलक्षण है और काम करने के साथ-साथ वो लिखते भी बहुत थे।

अनेक कार्यक्रमों में उनसे मिलने और उन्हें सुनने का मुझे मौका मिला बहुत ही सहज और सरल ढंग से अपने अनुभव सुनाते थे। उनके द्वारा लिखी अनेक किताबें मेरे पास संग्रहित है। जो उनके जाने के बाद दलित शोषित और आदिवासी समुदाय के लिए काम करने के लिए प्रेरणा देती रहेंगी।
उन्हें सादर श्रधान्जली।
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