सुरेंद्र मोहन की 5 वीं पुण्यतिथि पर संगोष्ठी : लोकतंत्र के समक्ष चुनौतियां और चुनाव सुधार


समाजवादी चिंतक एवं पूर्व सांसद सुरेंद्र मोहन की पांचवीं पुण्यतिथि पर सुरेंद्र मोहन मेमोरियल फाउंडेशन, जनता ट्रस्ट और समाजवादी समागम द्वारा 17 दिसंबर 2015 को नई दिल्ली स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान में लोकतंत्र के समक्ष चुनौतियां और चुनाव सुधार विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता जिसकी अध्यक्षता जस्टिस राजेंद्र सच्चर ने की। अपने अध्यक्षीय भाषण में जस्टिस सच्चर ने कहा कि कंपनियों द्वारा दलों को चंदा देने पर पाबंदी लगानी चाहिए। आपातकाल से पूर्व श्री मधु लिमये ने इसी आशय का प्राइवेट मेंबर बिल लोकसभा में रखना चाहा था, लेकिन सरकार की ओर से यह आश्वासन दिया गया था कि सरकार इस बाबत खुद ही कानून में परिवर्तन करेगी। 1978 में न्यायविद् फलीमन और उद्योगपति महेंद्र और मेरी अध्यक्षता में कंपनी लॉ में संशोधन करने के लिए बनी कमेटी ने अपनी सिफारिशों में इस सुझाव को भी शामिल किया था। उनके मुताबिक, अब इस सवाल पर फौरी कानून बदलने की जरूरत है। अपने सुझाव में उन्होंने कहा कि चुनावों में लिस्ट सिस्टम शुरू करना चाहिए। जिस प्रकार जर्मनी में है।

इस अवसर पर जनता दल (यू), समाजवादी पार्टी, सी.पी.आई., राष्ट्रवादी कांग्रेस, हिन्द मजदूर सभा, जनता दल सेक्युलर, सोशलिस्ट जनता पार्टी, जय किसान आन्दोलन, सोशलिस्ट पार्टी इंडिया पी.यू.सी.एल. दिल्ली, लोकतान्त्रिक समाजवादी पार्टी दक्षिण एशिया बिरादरी, समता संदेश के संपादक  के  व अन्य गणमान्य वक्ता अपने विचार व्यक्त किए।

जनता दल यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने कहा कि चुनाव सुधार को लेकर बातें बहुत हुईं, कमेटियां भी बहुत बनीं, लेकिन ईमानदारी और मजबूत इच्छाशक्ति के साथ जो प्रयास किए जाने थे वे नहीं किए गए। यदि गंभीरता से नहीं सोचा गया तो जिस चुनाव प्रणाली पर हम नाज करते आए हैं, वे बेतलब हो जाएंगे और देश में लोकतंत्र अपना अर्थ खो देगा। दक्षिण एशिया बिरादरी के सतपाल जी ने कहा कि चुनाव सुधार का मसला केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश और दुनिया के लिए गंभीर विषय है, क्योंकि आम आदमी लगातार चुनाव प्रक्रिया से अलग-थलग पड़ता जा रहा है। सोशलिस्ट पार्टी इंडिया के पंजाब से आए बलवंत सिंह खेड़ा ने कहा कि, समाजवादियों के लिए चुनाव सुधार का विषय सर्वाधिक महत्वपूर्ण इसलिए रहा है, क्योंकि समाजवादी लोकतंत्र को सर्वोच्च मूल्य के तौर पर मानते हैं। उनके मुताबिक, राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के दायरे में लाना चाहिए। फैक्टर के संयोजक अरुण श्रीवास्तव ने कहा कि धनशक्ति के आगे पार्टियों में कार्यकर्ताओं की चुनाव लड़ने के लिए पूछ-परख लगभग समाप्त हो चुकी है। उनका इस्तेमाल पार्टियां केवल धनपति उम्मीदवारों के लिए इस्तेमाल के तौर पर लेती हैं। किसी भी पार्टी में उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया न तो विकेंद्रित है और न पारदर्शी। समता संदेश के संपादक राजस्थान से आए हिम्मत सेठ ने कहा कि कॉरपोरेट ने लोकतंत्र पर कब्जा कर लिया है। जनतंत्र की बहाली के लिए चुनाव को कॉरपोरेट के चंगुल से मुक्त कराने की जरूरत है। इस मौके पर स्वराज अभियान के योगेंद्र यादव ने कहा कि चुनाव सुधार पर परंपरागत बहस बेमानी हो गई है। अब जरूरी यह है कि पैसे के प्रभाव को सीमित करने के तौर-तरीके तथा मीडिया में सभी पार्टियों के उम्मॊदवारों और नेताओं को तरजीह मिले। इस पर सोचने की जरूरत है। निगम पार्षद राकेश कुमार मे अपने भाषण में कहा कि मौजूदा राजनीति में धनबल और जातिवाद हावी हो गया है, यही वजह है कि आम लोगों का विश्वास इसके प्रति कम हो रहा है। संगोष्ठी का संचालन समाजवादी समागम के राष्ट्रीय संयोजक पूर्व विधायक डॉ. सुनीलम ने किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि आर्चाय नरेंद्र देव, लोकनायक जयप्रकाश नारायण एवं डॉ. राममनोहर लोहिया ने आजादी के पहले हुए चुनावों में दिखलाई पड़ी विकृतियों को समझकर समय-समय पर तमाम चुनाव सुधार के सुझाव दिए, जिन्हें विभिन्न सरकारों द्वारा अनसुना कर दिया गया। राज्य द्वारा वित्त पोषित, अनुपातिक चुनाव प्रणाली तथा एक साथ सभी चुनाव कराए जाने जैसे सुझावों पर यदि अमल किया गया होता तो आज राजनीति और लोकतंत्र की सूरत अलग होती और वह गांधी के अंतिम आदमी के नजदीक होता।

संगोष्ठी को संबोधित करते हुए समाजवादी समागम के विजय प्रताप ने कहा कि आजादी के बाद चुनाव सुधार की उपेक्षा के चलते लोकतंत्र क्रूर मजाक बनकर रह गया है। यही वजह है कि फासीवादी ताकतें देश की राजनीति में हावी हो गई हैं। सुरेंद्र मोहन मेमोरियल फाउंडेशन की ओर से बोलते हुए सुरेंद्र मोहन की पत्नी तथा सोशलिस्ट जनता पार्टी की अध्यक्ष श्रीमती मंजू मोहन ने कहा कि सुरेंद्र मोहन जी आजीवन लोकतंत्र और चुनाव सुधार के लिए संघर्ष करते रहे। वे बार-बार यह कहते थे कि सत्तर लाख लोकसभा तथा विधानसभा की अठ्ठाइस लाख रुपये की सीमा से स्पष्ट है कि इस चुनाव प्रक्रिया में देश की अस्सी लाख जनसंख्या की कोई भूमिका नहीं है, जिनकी आमदनी प्रतिदिन बीस रुपये से कम है। इस मौके पर जनता दल सेक्युलर के महासचिव दानिश अली समेत कई गणमान्य लोगों ने अपने विचार प्रकट किए।
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