वनाधिकार दिवस पर चेतावनी रैली; नई दिल्ली, 15 दिसम्बर 2015

वनाधिकार दिवस पर चेतावनी रैली, नई दिल्ली 15 दिसम्बर 2015

भूमि अधिकार आंदोलन के बैनर तले
वनाधिकार दिवस के मौके पर
चेतावनी रैली
संसद की ओर मार्च
जंतर-मंतर, नई दिल्ली
समय: सुबह 11 बजे से 4 बजे सायं

वन व अन्य प्राकृतिक संपदा पर वनाश्रित समुदायों के स्वतंत्र एवं पूर्ण अधिकार का विषय वनाधिकार आंदोलन में हमेशा से प्रमुख रहा है। अंग्रेज़ी राज के ज़माने में ही इन संपदाओं के ऊपर उपनिवेशिक शासकों ने पूरा कब्ज़ा जमा लिया और समुदायों का प्राकृतिक संपदा के साथ पूवर्जो के समय से जो रिश्ता रहा, उसमे दख़ल-अंदाज़ी कर उन्हें इन कुदरती संसाधनों से वंचित किया गया। वनाश्रित समुदायों पर बेइंतहा जु़ल्म और अत्याचार किये गए, जिसके खिलाफ आदिवासी समाज ने अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ सबसे पहले स्वाधीनता का संग्राम शुरू किया, जो कि 1765 से शुरू होकर बीसवीं सदी के शुरुआती दौर तक चलता रहा। इस ऐतिहासिक संग्राम को आदिवासी समाज के तिलका माझी, सिद्धु-कान्हू, बिरसा मुंडा, ताना भगत, सिताराम्मया राजू आदि ने बखूबी क्रांतिकारी नेतृत्व दिया और आदिवासी समाज ही नहीं बल्कि देश में भी एक गौरवमयी इतिहास को स्थापित किया। हांलाकि मुख्यधारा ने स्वाधीनता के इस पहले संग्राम को नहीं स्वीकारा। लेकिन तब भी दो सदी से वनाधिकार आंदोलन समुदाय के सार्वभौमिक अधिकार को स्थापित करने के लिए चलता रहा और आज भी ज़ारी है। इस समाज ने जल-जंगल-ज़मीन की लूट पर चलने वाली शासकीय राजनैतिक आर्थिक व्यवस्था को कभी भी स्वीकार नहीं किया। संघर्ष की यह क्रांतिकारी परम्परा अन्य समुदायों जोकि प्राकृतिक संसाधनों पर आश्रित हैं, उनके संघर्षो को भी प्रभावित करती रही। अर्थात मेहनतकश तबकों के संघर्ष की बुनियाद इसी परम्परा से आई है, जिसमें सत्ताधारियों का कोई दख़ल नहीं रहा। गौरतलब है कि अंग्रेज़ी हुक़ूमत ने प्राकृतिक संपदा की लूट को हिंसा के आधार पर बरक़रार रखा और मुनाफ़ाखोरी के तहत हिंसात्मक तरीके से पूंजीवादी व्यवस्था को मज़बूत किया। लेकिन इसके खिलाफ जनसंघर्ष भी ज़ारी रहे।

अंग्रेज़ी शासनकाल के समाप्ति के बाद आई आज़ाद भारत की सरकार ने भी इस लूट को बरक़रार रखा और आर्थिक राजनैतिक ढांचे में किसी प्रकार के कोई भी बुनियादी परिवर्तन नहीं किए। यानि एक ऐतिहासिक अन्यायपूर्ण व्यवस्था आज़ाद भारत में भी चलती रही। इसके खिलाफ जनांदोलन के ज़रिये से वनाश्रित समुदाय अपनी मांग उठाते रहे। इन संघर्षो की आखि़रकार जीत हुई और आज़ादी के साठ वर्ष बाद भारत की माननीय संसद ने ‘‘अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परम्परागत वननिवासी (अधिकारों की मान्यता) कानून यानि ( वनाधिकार कानून )15 दिसम्बर 2006’’ को पारित किया इस विशेष कानून का मुख्य उद्ेश्य वनाश्रित समुदायों पर किए गए ऐतिहासिक अन्याय को खत्म करना और पर्यावरण की सुरक्षा में समुदाय की भूमिका को मज़बूत करना है। ताकि लम्बे समय से चले आ रहे राजसत्ता और समुदाय के टकराव को कमतर किया जा सके। इस ऐतिहासिक कानून के पारित होने पर वनाश्रित समुदायों में एक नई चेतना विकसित हुई और साथ-साथ एक विश्वास भी कि अब जल-जंगल-ज़मीन पर लोगों के मालिकाना अधिकार स्थापित होंगे। इस लिए सन् 2006 से 15 दिसम्बर का दिन वनाश्रित समुुदायों के लिए एक मील का पत्थर है। तबसे हर साल वनाश्रित समुदाय इस दिन को ‘‘वनाधिकार आंदोलन दिवस’’ के रूप में मनाते हैं। चूंकि उनका मानना है कि वनों के अंदर उन्हें वास्तव में आज़ादी 2006 दिसम्बर में मिली न कि अगस्त 1947 में। परन्तु इस कानून के पारित होने के करीब एक दशक बीत जाने के बाद भी ज़मीनी स्तर पर इस कानून को लागू करने के लिए कोई बुनियादी परिवर्तन दिखाई नहीं दे रहे हैं। कानून को बनाने में जितना लम्बा संघर्ष हुआ है, उसी तरह से इसे लागू कराने में भी वनाश्रित समुदाय को काफी संघर्ष करना पड़ रहा है।                                  

वनाधिकार कानून में मान्यता दिये गये तमाम अधिकारों में दो प्रमुख अधिकार हैं, एक वनक्षेत्र के अंदर जिस जमींन और जंगल पर लोग अपनी आजीविका चला रहे हैं, उस पर और उनकी आवासीय ज़मीन पर मालिकाना अधिकार व दूसरा पूरे वनक्षेत्र में पहुंच और लघुवनोपज पर समुदाय का सामुदायिक मालिकाना अधिकार। जो कि समुदाय द्वारा चुनी गई ग्रामसभा ही तय करेगी जहां शासन-प्रशासन का किसी प्रकार का दख़ल नहीं होगा। लेकिन आज भी ज़मीनी स्तर पर इसका उल्टा हो रहा है। सरकारी तंत्र इस कानून के विरोध में काम कर रहा है। इसलिए हमें इस कानून को खुद ही लागू करना होगा व इसके लिए जनसंगठनों का निर्माण करना होगा व आंदोलन को तेज़ करना होगा। इस ऐतिहासिक अन्याय को खत्म करने के लिए बने इस कानून को प्रभावी ढ़ंग से लागू करने के लिए मौजूदा राजनैतिक आर्थिक व्यवस्था में कुछ बुनियादी परिवर्तन की ज़रूरत है। जिसको करने के लिए केन्द्रीय व राज्य सरकार में इच्छा शक्ति का घोर अभाव है, उनकी शासन व्यवस्था की यथा स्थिति को बनाए रखने में ज्यादा दिलचस्पी है।

वर्तमान केन्द्र सरकार एक कदम आगे बढ़कर पूरे कानून को ही बदलने की दिशा में काम कर रही है। लेकिन यह इतना आसान काम नहीं है। चूंकि वनाधिकार कानून एक विशिष्ट कानून है, इसको बदलने के लिए संसद में पास कराना ज़रूरी है। इस सच्चाई से बचने के लिए मौज़ूदा सरकार द्वारा नए-नए खतरनाक तरीेकों को इस्तेमाल करना शुरू कर दिया गया है। जैसे वनाधिकार का दावा भरने की तारीख 31 दिसम्बर 2015 को तय कर दिया गया और दूसरा वनक्षेत्र में निजि कम्पनियों को वृक्षारोपण की जिम्मेदारी सुपुर्द करने की कोशिश की जा रही है। यह दोनों ही बातें वनाधिकार कानून के खि़लाफ हैं और जिससे वनाश्रित समुदाय वनों पर आपने अधिकार से वंचित हो जाऐंगे। इस कानून में समय सीमा को निर्धारित नहीं किया जा सकता और न ही कम्पनियों को लाकर ग्रामसभा की अहमियत को कम किया जा सकता है। इसके साथ-साथ जेएफएम जैसी परियोजना को वनविभाग द्वारा जबरदस्ती लागू कराने की कोशिश की जा रही है, जिसकी कानून में कोई भी संवैधानिक मान्यता नहीं है। और तो और इन परियोजनाओं से आदिवासी एवं अन्य परम्परागत समुदाय के बीच टकराव पैदा करने की कोशिश की जा रही है। जिसके बेहद दुष्प्रभावी परिणाम होंगे। ज़ाहिर है इससे समुदाय और राजसत्ता के बीच जो टकराव है, वो कम होने के बजाय और बढ़ जाएगा।

यह निश्चित है कि ऐसी नकारात्मक प्रक्रिया के चलते हुए वनाश्रित समुदायों के ऊपर दमन और भी बढ़ेगा और वनक्षेत्र में कम्पनीराज और उनके सहयोगी, क्षेत्रीय दबंग तबका, माफिया और भ्रष्ट वनाधिकारियों का वर्चस्व बढ़ाने की कोशिश भी होगी। इन निहित स्वार्थो के खिलाफ लड़ाई अनिवार्य है चूंकि जहां पर वनाश्रित समुदाय संगठित हो चुके हैं, वे सरकार की ऐसी जनविरोधी नीतियों को स्वीकार नहीं करेंगे। अर्थात संघर्ष बढ़ेगा और यह संघर्ष एक राजनैतिक संघर्ष होगा। इस लिए वनसंपदा पर समुदाय के नियंत्रण का संघर्ष अकेले का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह संघर्ष एक सामूहिक संघर्ष है। जो कि संसाधनों पर चल रहे अन्य अधिकारों के आंदोलनों के साथ ही तेज़ हो सकता है। अलग-अलग लड़ाई से अब एक आंदोलन लम्बे समय तक टिक नहीं पाएगा।

एक बात हमें ध्यान में रखनी होगी कि वनाधिकार और खासतौर पर वनाधिकार कानून को लागू करना बुनियादी रूप से एक राजनैतिक चुनौती का काम है। वनाधिकार को अगर लोगों व वनाश्रित समुदाय के नियंत्रण में लाना है तो यह लक्ष्य राजनैतिक संघर्ष के बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता। ज़ाहिर है यह संघर्ष देश की राजनैतिक अर्थव्यवस्था की मौजूदा परिस्थियों को बिल्कुल पलट सकता है। कुदरती संसाधनों को लोगों से छीनने की प्रक्रिया अंग्रेज़ी शासनकाल से अब तक ज़ारी है, इसलिए यह भी हमें ध्यान रखना होगा कि वनाधिकार को लोगों के दायरे में रखने के लिए काफी बाधाऐं व हमले मौजूदा राजनैतिक व सामाजिक ढांचे की ओर से होंगे। चूंकि अभी भी पूंजीवादी ताकतें प्राकृतिक संसाधनों पर अपना अधिपत्य बनाए हुए हैं। इसलिए वनाधिकार के लिए शासन व प्रशासन को केवल आवेदन देने से ऐतिहासिक अन्याय जो कि नए वनाधिकार कानून में निहित किए गए हैं, समाप्त नहीं हो पाऐंगे इसके लिए भारतीय राजसत्ता को चुनौती देनी होगी। यह चुनौती वनाश्रित समुदायों द्वारा जनंतात्रिक तरीके से दीर्घकालीन जुझारू संघर्ष से ही दी जा सकती है। जिसमें यह जनवादी आंदोलन और भी व्यापक संघषर््ा जो कि जल, जंगल और जमींन पर लड़े जा रहे हैं उनकी व्यापक गोलबंदी से किए जाऐंगे। इसके साथ ही संगठित व असंगठित मज़दूर संगठनों व प्रगतिशील ताकतों का समर्थन इस व्यापक आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण है।

यहां पर हमें यह अच्छी तरह से अपनी समझदारी बनानी हागी कि पूंजीवाद जो कि इस समय एक बेहद ही गंभीर संकट के दौर से गुज़र रहा है वह हमारी सरकारों के ऊपर अभी भी हावी है। इस नवउदारवाद के दौर में पूरा सरकारी तंत्र व उसके सहयोगी जमींदार, भू-माफिया व अन्य निहित स्वार्थ भी पूंजीवाद के अधीन है जो कि पूंजीवाद का वर्गीय चरित्र भी है। इसलिए चाहे वो केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकारें हो वह इस तरह के प्रगतिशील जनहितकारी कानून को लागू करने में किसी भी प्रकार की दिलचस्पी नहीं दिखाएगें, चाहे उसके पीछे संवैधानिक बाध्यता ही क्यों न हो। चूंकि यह भ्रष्ट सरकारें इन सभी ताकतों को असंतुलित करने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि यह सरकारें इन निहित स्वार्थो के ऊपर ही अपने असतित्व के लिए निर्भरशील हैं।

इन सब परिस्थितयों में वनाधिकारों के मुद्दे को हमें व्यापक संदर्भ में भूमि अधिकार, मछुआरों के अधिकार, खनन अधिकारों के साथ व अन्य आंदोलनों जैसे श्रमिक संगठनों के आदोंलनों के साथ देखना होगा व तालमेल से संघर्षों को लड़ना होगा, ताकि हमारे संघर्षो को सफलता मिल सके। आज के दौर में किसी भी आंदोलन के लिए अकेले सफलता हासिल कर पाना बेहद कठिन है। राजनैतिक रूप से व्यापक गोलबंदी से ही राजसत्ता को टक्कर दी जा सकती है। यह राजनैतिक सबक हमें आज के दौर में लेना होगा, जिसमें अन्य मुद्दों जैसे साम्प्रदयिकता, जातिवादी उन्माद जो देश में फैलाया जा रहा है, उसे भी अपने संघर्षो में जोड़ना होगा।

हमने देखा है कि वनाधिकार कानून 2006 को पारित हुए नौ वर्ष से भी ऊपर हो चुके हैं, लेकिन जब हम अपनी सफलताओं और विफलताओं को कुछ अपवादो को छोड़ कर देखते हैं तो यहां एक बड़ी कमी नज़र आती है कि मौज़ूदा समय में वनाधिकार आंदोलन में राजनैतिक परिपक्वता की कमी है व अभी भी वह राजनैतिक गतिरोध को चुनौती दे सकने में अक्षम साबित हुआ है, अभी भी ज़्यादहतर समूह शिकायत के दायरे में ही बात कर रहे हैं। वनाधिकार आंदोलन में भूमि का सवाल अंतर्निहित है, जिसमें अभी भी आंदोलन में भूमि के सवाल पर व्यापक समझदारी का अभाव है। वनाधिकार के मुद्दे में भूमि अधिकार की मान्यता ही मूल विवाद की जड़ है, जिसमें कई तरह के निहित स्वार्थ शामिल हैं, जैसे वनविभाग, सामंत वर्ग, दबंग, पूंजीपति वर्ग, प्रशासन व सरकार जो इन संसाधनों को किसी भी कीमत पर गरीब तबकों के अधीन होने न देने के लिए दमन का सहारा लेते हैं। इसलिए भी यह एक कठिन लड़ाई है। इसलिए वनाधिकार आंदोलनों के लिए भी यह चुनौती है कि वह खुलकर सामने आए व राजनैतिक रूप से इस लड़ाई को लड़े।

गौरतलब है कि मौजूदा केन्द्र की एन0डी0ए सरकार द्वारा असंवैधानिक तरीके से भूमि अध्यादेश को पारित कराने की कोशिश का विरोध देशभर के जनसंगठनों, किसान संगठनों व वाम दलों से जुड़े किसान संगठनों ने फरवरी 2015 में संसद सत्र के दौरान किया व भूमि अधिकार की लड़ाई को और भी तेज़ करने के लिए ‘‘भूमि अधिकार आंदोलन’’ का गठन किया। व्यापक गोलबंदी व श्रमिक संगठनों के साथ ताल-मेल के साथ ही यह आंदोलन चला। जिसका सीधा असर संसद के अंदर विरोधी पार्टियों में दिखाई दिया। जिसके फलस्वरूप केन्द्र सरकार को  पीछे हटना पड़ा और भू अध्यादेश को रद्द करना पड़ा। इस तरह के मोर्चे के गठन द्वारा ही सरकार की भूमि अधिग्रहण नीतियों को भू-अधिकार आंदोलन के तहत गति तेज़ कर इस राजनैतिक संघर्ष को तेज़ किया जा सकता है, जो कि देश की मौज़ूदा राजनैतिक अर्थव्यवस्था जो कि पूंजीवाद के आगे नतमस्तक है, को पूरी तरह से बदल कर आम लोगों के अधिकारों, उनकी आजीविका व सम्मान की सुरक्षा कर सकता हैै।

इस तरह की सामूहिक चुनौती समाज की प्रगतिशील ताकतों को भी प्रेरणा दे सकती है, जो कि जनआंदोलनों के सहयोग देने में सामने आ सकती हैं। हाल ही में 2 सितम्बर 2015 को देश के 11 केन्द्रीय श्रमिक संगठनों द्वारा सरकार को श्रमिक कानूनों में सुधार व भूमि अध्यादेश रद्द करने की मांग में जो एकजुटता दिखाई गयी, इसने केन्द्र और राज्य सरकारों को हिला कर रख दिया। इसी के साथ साहित्यकारों, फिल्मकारों, लेखकों द्वारा अपने पुरुस्कार लौटा कर देश मंे असहिष्णुता की जो बहस छेड़ दी गई है, उसने भी देश में एक बार फिर बड़े लम्बे दौर के बाद एक जनवादी जगह को बनाने के लिए मुहिम छेड़ी है। यह वर्ग भी आम मेहनतकश लोगों के संघर्ष के साथ खड़ा हो कर राजसत्ता को टक्कर देने का अहम् काम कर सकता है। हालांकि पिछले कई दशकों से यह वर्ग आम लोगांे से काफी दूर हो गया था।

इन्हीं सब मुददों को लेकर भूमि अधिकार आंदोलन द्वारा यह तय किया गया है कि वनाधिकार का मुद्दा भी भू-अधिकार का मुद्दा है। इसलिए अपने आगामी कार्यक्रम में 15 दिसम्बर 2015 को ‘‘वनाधिकार दिवस’’ को चेतावनी दिवस के रूप में दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित किया जा रहा है। सभी जनसंगठनों से अपील है कि 15 दिसम्बर को ज़्यादा से ज्यादा संख्या में जंतर-मंतर पर एकजुट हो कर एक व्यापक भूमि अधिकार, वनाधिकार व भूमि पर कारपोरेटी हमले जिनको सरकारी संरक्षण प्राप्त है को परास्त करने की चुनौती दें।

साथियो! 15 दिसम्बर से ही नैरोबी में भी विश्व व्यापार संगठन की बैठक शुरू होने जा रही है, जो कि हमारे देश की खेती, शिक्षा, स्वास्थ व श्रम-अधिकारों के लिए काफी घातक है। उसका भी विरोध कर हम सरकार को यह चेताऐंगे कि देश का विकास कारपोरेटी हिसाब से नहीं तय किया जाएगा, बल्कि जल-जंगल-ज़मीन पर समुदायों का समुदायिक अधिकार, सामाजिक बराबरी, सामाजिक न्याय व सम्मान की स्थापना से किया जाएगा।

नोटः 16 दिसम्बर 2015 को भावी रणनीति पर एक दिवसीय बैठक। 

अखिल भारतीय वन-जन श्रमजीवी यूनियन एवं भूमि अधिकार आंदोलन
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