करछना के किसानों पर पुलिसिया दमन के विरोध में जनअभियान तेज

करछना के किसानों पर पुलिसिया दमन के विरोध में जनविरोध प्रदर्शन  

16 नवम्बर 2015
समय : 3 बजे से
धरना स्थल : गांधी प्रतिमा, जीपीओ, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

साथियों,
केंद्र सरकार ने भले ही भूमि अधिग्रहण अध्यादेश वापस ले लिया हो लेकिन हम सभी इस बात से भली भांति परिचित हैं कि उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में जबरन भूमि अधिग्रहण का काम लंबे समय से चल रहा है। सोनभद्र जिले में बन रहे कनहर बांध के लिए हुआ भूमि अधिग्रहण हो या इलाहाबाद जिले में जे.पी.पावर प्लांट के लिए हो रहा भूमि अधिग्रहण। यहीं नहीं इसके अलावा नौगढ़ समेत कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां आदिवासियों को उनके वनाधिकारों से महर्रूम किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के अधिकत्तर जिलों में दलित, आदिवासी, किसान और मजदूर अपनी आजीविका बचने के लिए संघर्षरत है। जहां एक तरफ प्रशासन किसी भी कीमत पर किसानों से उनकी जमीनें छीनकर पूंजीपतियों को सौंपने पर आमादा हैं वहीं दूसरी तरफ किसान निश्चय करके बैठे हैं कि चाहे जान चली जाए लेकिन वह जमीनें नहीं देंगे....
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5 नवम्बर 2015 को करछना के किसानों पर पुलिसिया दमन के विरोध में वाराणसी, चंदोली, मिर्जापुर, मऊ, इलाहबाद, गाजीपुर, बलिया समेत दर्जनों स्थानों पर जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री को ज्ञापन दिए गए  और आगामी 16 नवम्बर को इसी मुद्दे पर लखनऊ में जनसंगठनों द्वारा जनविरोध प्रदर्शन किया जा रहा  है । पेश एकता सिंह की रिपोर्ट;

इलाहाबाद के करछना तहसील के अंतर्गत प्रस्तावित पावरप्लांट से प्रभावित होने वाले किसानो के उत्पीडन के विरोध में आज वाराणसी के शास्त्री घाट वरुनापुल पर सामाजिक कार्यकर्ताओं और किसान प्रतिनिधियों द्वारा ‘साझा संस्कृति मंच’ और ‘जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय उत्तर प्रदेश’ के संयुक्त तत्वावधान में धरना दिया गया. इस दौरान करछना के किसानो के आन्दोलन के बारे में बताते हुए वक्ताओं ने कहा कि इलाहाबाद शहर से 40 कि0मी0 दूर दक्षिण में करछना के 8 गांव के किसान जे0 पी0 समूह के संगम पावर जेनरेशन कम्पनी लिमिटेड के 660X2 मेगावाट क्षमता के प्रस्तावित पावर प्लांट के कारण विस्थापन के खिलाफ लड़ाई लड़ रहें हैं। इस परियोजना के लिए किसानो की राय जाने बिना वर्ष 2008 में पहली बार नोटिफिकेशन जारी हुआ था. जे0 पी0 समूह को पावर प्लांट के लिए कुल 555.63 हेक्टेयर जमीन की आवश्यकता है, कुल 242 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण हो चुका है।

2008 में बहुफसली जमीनों को असिंचित बताकर मुआवजा तय किया गया जो सर्किल रेट से बहुत कम है इस कारण अधिसंख्य किसान संतुष्ट नही हैं अब तक मात्र 17 प्रतिशत लोग मुआवजा लिए हैं . प्रोजेक्ट एरिया में सीधे तौर पर 2000 किसान परिवार और दो नहरें भगेसर और मेडरा प्रभावित होंगी। जब भट्टा परसौल में 14 लाख रुपया प्रति बीघे के मुआवजे का मामला उठा तब करछना के लोगों ने भी बढ़ी हुई दर पर मुआवजे की मांग करना किया, 2009 में इसी मांग को लेकर ट्रेन रोको आन्दोलन हुआ और पुलिस द्वारा आन्दोलन कारियों पर गोलियां चलाई गई जिसमे कारण आन्दोलन कर रहे एक किसान गुलाब विश्वकर्मा की मृत्यु हो गई, इसके पश्चात तत्कालीन जिलाधिकारी द्वारा हस्तक्षेप करते हुए 100 रू0 के स्टाम्प पेपर पर बढा हुआ मुआवजा, परिवार के एक व्यक्ति को नौकरी एवं घर आदि देने का वादा किया गया, लेकिन जिलाधिकारी के स्थानांतरण के बाद कुछ भी नही हुआ फलस्वरूप किसानो का संघर्ष जारी रहा.

किसानों ने संघर्ष के लिए “पुनर्वास किसान कल्याण एवं सहायता समिति” नामक एक संगठन बनाया और इसके बैनर तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गयी (याचिका संख्या-14716/2010) जिसमें 13 अप्रैल 2012 में हाईकोर्ट द्वारा मुआवजा वापस कर जमीन वापस प्राप्त करने का फैसला दिया। किसानो द्वारा राज्यपाल को एक पत्र भेजा गया जिसमें किसानों ने कहा कि जो आर्थिक नुकसान हुए हैं उनको मुआवजे की रकम से घटा दिया जाए तो वह मुआवजा वापस कर देंगे. आज भी किसान मुआवजा वापस कर जमीन वापस लेने के लिए संघर्षरत हैं.

मालूम हो कि यह आयोजन इस दमनकारी परियोजना के विरूद्ध राज्यस्तरीय रणनीति के तहत किया गया, जिसकी रूपरेखा दिनांक २६ अक्टूबर २०१५ को वाराणसी स्थित सर्व सेवा संघ में मध्य प्रदेश के पूर्व विधायक और किसान संघर्ष समिति के कार्यकारी अध्यक्ष डा. सुनीलम की अध्यक्षता में तैयार की गयी थी. इस बैठक में उत्तर प्रदेश व अन्य राज्यों के अनेक संगठनों ने हिस्सा लिया था. विरोध की इस कडी में दिनांक १६ नव. २०१५ को लखनऊ स्थित गांधी प्रतिमा पर पुरे राज्य के संगठन एकजुटता प्रदर्शित करेंगे. वक्ताओं ने आगे बताया कि समय समय पर कम्पनी के द्वारा धमकियां और अखबारों के माध्यम से भी दबाव बनाने का प्रयास किया गया, ग्रामीणों द्वारा किये जा रहे शान्तिपूर्ण आन्दोलन को विगत 9 सितम्बर 2015 को पुलिस द्वारा बल पूर्वक दबाने के लिए ग्रामीणों पर बुरी तरह अत्याचार किया गया जिसमे सैकड़ों लोग घायल हुए. वृद्धों, नाबालिगों समेंत 42 किसान, नेताओं और ग्रामीणों को हिरासत में लेकर उनपर गैंगस्टर और रासुका जैसी धारायें लगाई गई हैं।

वक्ताओं ने कहा कि आज सरकारों द्वारा विकास की जो नीतियां अपनाई जा रही हैं वह आम नागरिक के हित से अधिक पूंजीपतियों और कार्पोरेट घरानों के लिए हितकारी साबित हुयी हैं. जल, जंगल, जमीन तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर सत्ता की मदद से कार्पोरेट्स का कब्जा बढ़ता जा रहा है, जबकि वास्तविक स्थिति में गरीब दिनोंदिन बदहाल होता जा रहा है. इन संसाधनों पर कब्जा दिलाने के लिए सरकारें दमनकारी नीतियों पर चल रही हैं जो अत्यंत खतरनाक है. धरने के बाद सभी लोग जुलूस के रूप में जिला मुख्यालय पहुचे और माननीय मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन जिलाधिकारी के प्रतिनिधि (ए सी एम चतुर्थ) को सौंपा गया जिसमे मांग की गयी कि पावर प्लांट परियोजना से प्रभावित हो रहे किसानो को संतुष्ट किये जाने तक परियोजना पर रोक लगाई जाय. प्रभावित हो रहे किसानो के पक्ष को सहृदयता पूर्वक सुना जाय और सभी को सम्मानजनक मुआवजा दिया जाय. वर्तमान में चल रहे शांतिपूर्ण आन्दोलन को पुलिस द्वारा बलपूर्वक दबाने की सभी कोशिशें बंद की जाय.

9 सितम्बर को हुए बर्बर लाठीचार्ज, गोलीबारी और गिरफ्तारी की घटनाओं की निष्पक्ष जांच कराई जाय एवं शांतिपूर्ण आंदोंलनकारियों पर लादे गये फर्जी मुकदमे तत्काल वापस लेते हुए गिरफ्तार 42 लोगों की रिहाई की जाय. धरने में प्रमुख रूप से डा एस. पी. राय, डा आनंद तिवारी, रवि शेखर, प्रो सोमनाथ त्रिपाठी, चिंतामणि सेठ, वल्लभाचार्य पाण्डेय, विनय सिंह, धनञ्जय त्रिपठी, सतीश सिंह, राम जनम भाई, डा त्रिभुवन सिन्हा, देवराज, एकता सिंह, प्रेम सोनकर, दीन दयाल सिंह, प्रदीप सिंह, सूरज पाण्डेय, महेंद्र राठोर, सुनील यादव, सुरेश राठौर, मीरा, चन्द्रावती, तारा देवी, विमला, जानकी देवी, लक्ष्मण प्रसाद, सलटन, मिट्ठू राम, भाईलाल, कलीम भाई आदि शामिल रहे. धरना प्रमुख रूप से जन अन्दोलनों के राष्ट्रीय समन्वय और साझा संस्कृति मंच वाराणसी द्वारा आयोजित किया गया.
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