डीआरडीओ के विरोध में मेवात के किसानों की दस्तक : भाग तीन

अब तक कुल 27 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है. इन पर किसी किस्म का मुक़दमा दर्ज नहीं किया गया. इसके अलावा 17 लोगों पर शांतिभंग करने के आरोप में नामजद मुकदमा दर्ज किया गया है. ये 17 लोग चूहड़सिद्ध की मजार पर जा रहे थे. इन लोगों पर आरोप है कि इन्होने निर्माण कार्य में बाधा पहुंचाई और निर्माण कार्य कर रहे मजदूरों पर हमला किया. दिल्ली लौटने के बाद जब इस मामले की तफ्सीलात जानने के लिए गूगल करना शुरू किया तो रामगढ़ के विधायक ज्ञानदेव आहूजा के बयान पर नजर पड़ी. 3 सितम्बर को राजस्थान पत्रिका के स्थानीय संस्करण में यह बयान प्रकाशित हुआ था-"DRDO के प्रोजेक्ट का विरोध करना गलत है. यह राष्ट्र के हित में है और अलवर के हित में है. सिमी और आईएसआई के ऐजेंट मेवात क्षेत्र में हैं. कोई बड़ी बात नहीं है कि लश्कर-ए- तैयाब्बा के भी हों." पेश है  विनय सुल्तान की रिपोर्ट का अंतिम और तीसरा भाग;

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खुर्शीद की तक़रीर में जिन मोरमल साहब का जिक्र हुआ था उनसे मेरी मुलाकार जलसा शुरू होने से पहले हुई थी. मैं पहाड़ की उस तलहटी में गया जहां अभी भी कुछ लोग बकरियां चराने का दुस्साहस  कर रहे थे. वहां मेरी मुलाकात मोरमल के लड़के मौसम से हुई. मौसम ने पूरी घटना कुछ इस तरह बयान कि " मेरा बाप ही बकरियां चरता था. अब वो घर से निकालने को राजी नहीं है तो मैं बकरियां चराने के लिए यहां आ गया. इतना बुजुर्ग है कि ठीक से चल भी नहीं पाता.ये जो जोहड़(तलाब) आप देख रहे हैं ना सरदारों ने मेरे बाप को यहां तक दौड़ा कर पकड़ा. उसके साथ दो और लोग भी थे. जब बाकी के ग्वालों ने देखा तो वो लोग बचाने लिए पीछे गए. इस पर सरदारों ने चाकू और तलवारें दिखाई. मेरे बाप को ज्यादा नहीं मारा साहब पर जहुरुद्दीन को बहुत मारा. इसके बाद पुलिस में दे दिया. हम किशनगढ़ बास थाने पर अपने बाप को छुड़ाने के लिए पहुंचे. तीनों लोगों को पुलिस ने 10 हजार ले कर छोड़ा.

मेरे बाप में इतनी दहशत भर गई है कि बकरियां चराने के लिए भी नहीं आता. घर से निकलने से भी डरता है. 10 हजार से ज्यादा इलाज में लगा चुका हूँ पर अब भी ठीक से चल नहीं पाता. ये खालसा लोग हमारी बकरियां काट कर खा जाते हैं. मेरी तीन बकरियां गायब हैं. यहां कोई ऐसा नहीं जिसकी एकाध बकरी कम नहीं हो. "

मौसम ने बोतले-बोलते अचानक से कहा कि ये समुच्चा आ रहा है, इसको भी मारा था. समुच्चा के पास आने पर मालूम हुआ कि उनका असल नाम रज्जाक है. रज्जाक का दावा था कि वो 35 साल के हैं पर उनके चहरे पर ढलती उम्र के निशान इस दावे पर संदेह पैदा करते हैं. रज्जाक 5 बिसवा के काश्तकार हैं. उनके लिए पशुपालन ही मुख्य व्यवसाय है. पिछली मीठी ईद के दिन रज्जाक अपनी बकरियों की देखभाल करने के लिए पहाड़ पर गए उनके साथ भी वही हुआ वो मोरमल के साथ हुआ था. उनको मार ज्यादा पड़ी. आर्थिक और शारीरिक दोनों ही. रज्जाक किशनगढ़ बास थाने से 5 हजार दे कर रिहा हुए.

मैं खोयाबास गांव से लगी पहाड़ की तलहटी से पहाड़ा के लिए लौटने के लिए मोटरसाइकिल पर सवार ही हुआ था कि मुझे यहां तक ले कर आने वाले राशीद भाई ने तेज ब्रेक लगाए. सामने से 70 साल का एक बूढा आदमी अपनी रेवड़ हांकते हुए जा रहा था. उन्होंने जल्दी से उतरते हुए कहा कि यही है जहूर का बाप कल्लू जिसको मोरमल के साथ पकड़ा था.

हाथ में डोरी से लटकती प्लास्टिक की बोतल, एक हाथ में कुल्हाड़ी, घुटनों से ऊपर चढ़ी धोती और सर पर सफ़ेद गमछा. कल्लू पहले बोलने से कतराते रहे पर बाद में आसपास खड़े लोगों के कहने पर बात करने को राजी हुए. कल्लू ने पूरी घटना को इस तरहसे बताया-
"मुझे शाम के वक़्त पता लगा कि मेरे बेटे को थाने में बंद कर दिया है. मैं गांव से किशनगढ़ पहुंचा. ये तीन लोग थे. मोरमल के अलवा घसौली का एक हरिजन भी था. सबसे ज्यादा जहूर को ही मार पड़ी. पहले सरदारों ने पीटा फिर थाने भी पीटा गया. रात तक उसे छुड़ा कर घर लाए. घर लाने के बाद उसे उल्टियाँ शुरू हो गई. उसके मुंह से खून निकल रहा था. इसके बाद हम अस्पताल गए. यहां उसे दो-तीन दिन रखने के बाद जयपुर रेफर कर दिया. हमें लगा था कि अब वो बचेगा नहीं. महीने भर से जयपुर में भर्ती है. सुना है कल-परसों में छुट्टी दे देंगे. आज भी जब बकरी चारा रहा था तो सामने खड़ा सरदार चिल्ला रहा था. कह रहा था कि भाग जाओ वरना मार देंगे. अब हम क्या करें इन्होने जीना हराम कर दिया है."

मैं सभा की तरफ लौट रहा था. रास्ते में मोरमल मिल गए. उन्होंने मेरे से बात करने से साफ़ इंकार कर दिया. राशीद भाई राह चलते हर आदमी को सभा में पहुंचने के लिए कहटे हुए निकल रहे थे. राशीद भाई हर एक आदमी को यह बताना नहीं भूलते कि कोई पुलिसवाला नहीं आया है. पुलिस को ले कर लोगों में जिस किस्म का खौफ बैठा हुआ वो राशीद भाई के तकाजे से समझी जा सकती है.

पहाड़ा गांव के मोहम्मद खुर्शीद की मुर्गी को पहाड़ पर जाती स्कार्पियो ने कुचल दिया. जब वो मोटरसाईकिल ले कर उसके पीछे गया तो उसे पकड़ कर पीटा गया. खुर्शीद जब तीन साल के थे तो उनके वालिद का इन्तेकाल हो गया. उनकी बेवा माँ रसिमन दूकान चलाती हैं.  65 साल की रसिमन रोते हुए कहती हैं, "मैंने किस तकलीफ से अपने बच्चों को पाला है. इस दिन के लिए कि कोई भी मेरे बे-खता बच्चों को मारे. मुर्गा-मुर्गी का दुख नहीं है, पर आस-पास बच्चे हैं. मैंने ही इसे भेजा था कि उसको बोले गाड़ी धीरे चलाने के लिए. बदले में उन्होंने इसकी सारी देही तोड़ दी."

सभा शुरू होने से पहले मैं 22 साल के साहून के घर पहुंचा. उनके पिता अब्दुल खोयाबास से 60 किलोमीटर दूर तुर्क मिलकपुर में रहने वाले अपने साले जियानु मोहम्मद के घर गए हुए थे. उन्होंने अपनी पचास बकरियों में से आधी बकरियां जियानु को बेच दी हैं. सौदे में तय हुई रकम कि पहली क़िस्त के पंद्रह हजार रूपए ले कर शाम तक लौटने वाले थे.

इसी साल की 27 जुलाई को उनके भाई की 7 साल की लड़की बश्मिना बकरियों को सुबह-सुबह पहाड़ पर ले कर जा रही थी. इस पर सुरक्षा में लगी ऐजंसी खालसा सिक्युरिटी के सिक्ख गार्ड ने उसे भगा दिया. साहून उस समय पहाड़ से शौच कर के लौट रहे थे. जब उन्होंने कारण जानना चाहा तो उन्हें पकड़ कर ऊपर ले जाया गया. वहां उन्हें बुरी तरह से पीटा गया. जब उनके चाचा शेर मोहम्मद और भाई फकरुद्दीन उन्हें छुडाने के लिए ऊपर पहुंचे तो उन्हें भी पकड़ कर मारा गया. इसके बाद उन्हें किशनगढ़ बास थाने भेज दिया गया. अब्दुल अपने भाई और दो बेटों को 15 हजार रूपए दे कर छुड़ा कर लाए. इस घटना के बाद अब्दुल ने बकरियां और गायें ना रखने का फैसला किया है. वो जल्द से जल्द औने-पौने दाम पर इन्हें बेच देना चाहते हैं.

अब तक कुल 27 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है. इन पर किसी किस्म का मुक़दमा दर्ज नहीं किया गया. इसके अलावा 17 लोगों पर शांतिभंग करने के आरोप में नामजद मुकदमा दर्ज किया गया है. ये 17 लोग चूहड़सिद्ध की मजार पर जा रहे थे. इन लोगों पर आरोप है कि इन्होने निर्माण कार्य में बाधा पहुंचाई और निर्माण कार्य कर रहे मजदूरों पर हमला किया. इसके बाद यहां की सुरक्षा के लिए खालसा सिक्यूरिटी नाम की एजेंसी के गार्ड्स तैनात कर दिए गए. इस ऐजंसी के मालिक पप्पू सरदार हैं. एक स्थानीय लोगों ने मुझे बताया कि यहां तैनात किए गार्ड्स में से ज्यादातर हिस्ट्रीशीटर और अपराधी किस्म के लोग हैं. उनके पास गैरलाइसेंसी रिवाल्वर भी देखे गए हैं.

दिल्ली लौटने के बाद जब इस मामले की तफ्सीलात जानने के लिए गूगल करना शुरू किया तो रामगढ़ के विधायक ज्ञानदेव आहूजा के बयान पर नजर पड़ी. 3 सितम्बर को राजस्थान पत्रिका के स्थानीय संस्करण में यह बयान प्रकाशित हुआ था-
"DRDO के प्रोजेक्ट का विरोध करना गलत है. यह राष्ट्र के हित में है और अलवर के हित में है. सिमी और आईएसआई के ऐजेंट मेवात क्षेत्र में हैं. कोई बड़ी बात नहीं है कि लश्कर-ए- तैयाब्बा के भी हों."
आहूजा साहब के बयान ने मुझे फिर से इतिहास के झरोंखे से झांकने पर मजबूर कर दिया. मेवों ने भले ही इस्लाम स्वीकार कर लिया हो पर वो इस्लामीकरण की प्रक्रिया से बचे रहे. इतिहास के नाजुक मौकों मेवों की पक्षधरता कभी धार्मिक नहीं रही. 17 मार्च 1527 को खानवा की जंग में खानजादा हसन खान मेवाती अपने 12 हजार सैनिकों के साथ राणा सांगा की फ़ौज में बाबर के खिलाफ लड़ते-लड़ते मारा गया. भारत पर कब्जे को ले कर हेमू और अकबर के बीच पानीपत की दूसरी और निर्णायक जंग हुई. यह वही हेमू है ज्जिसे संघ परिवार भारत का आखिरी हिन्दू सम्राट घोषित करता है. आप जानते हैं हेमू के सबसे भरोसेमंद कमांडर का क्या नाम था? खानजादा हाजी खान मेवाती.

पहाड़ा से अलवर के रास्ते में मुझे शिपात खान बताते हैं कि आजादी के बाद अलवर के महाराज तेज सिंह और भरतपुर के राजा बच्चू सिंह के भाई मानसिंह ने मेवों को निशाना बनाना शुरू किया. उनकी कोशिश थी कि मेव किसी भी तरह से पकिस्तान चले जाएं. लगभग एक चौथाई आबादी पकिस्तान चली भी गई. रियासत के सैनिकों ने मेवों के गांव जलाने शुरू किए. तब हमने पहाड़ों की शरण ली. इसके बाद विनोबा भावे के नेतृत्व में मेवों का पुनर्वास हुआ. कई लोग जो पकिस्तान चले गए थे वापस लौट आए.

शिपात खान कहते हैं कि यहां हमने भाईचारे को बचा कर रखा हुआ है. गांवों में आज भी आपके लिए फर्क करना मुश्किल हो जाएगा कि कौन हिन्दू और कौन मेव. हमारे लोग आज भी धोती पहनते हैं. औरतें हिन्दुओं जैसे लिबास ही पहनती हैं. हम आज भी भात भरने की रस्म निभा रहे हैं. मेव खुद को कृष्ण भगवान का वंशज मानते हैं. हम जब अपनी बेटी के ससुराल जाते हैं तो उस गांव में ब्याही गई हिन्दू बेटी का हाल लेना नहीं भूलते. हमारे यहां शादी में आज भी मंदिर और मस्जिद के लिए नजराना बराबर निकाला जाता है. मेवात में मुसलामानों के घेटो आपको नजर नहीं आएंगे. एक ही मोहल्ले में दोनों कौम के लोग रहते हैं.

शिपात अपनी धुन में बताए जा रहे थे. दिल्ली से जब अलवर गया था तो बैग में पड़े अखबार से दादरी का खून रिस रहा था. वापस लौटते वक़्त शिपात खान की सकून भरी तसल्लियों से जेब भरी हुई थी. बहरहाल एक तथ्य यह भी है कि जजोर के पहाड़ पर अब भी चार हजार गाएं लावारिश चर रही हैं. इनके ग्वाल ऊपर जा नहीं सकते क्योंकि ऐसा करने में देशद्रोही साबित हो जाने के खतरे हैं. ऊपर चर रही गायों के लिए हिन्दू अतिवादियों को चिंता करने की जरुरत महसूस नहीं होती. ये मेवों की गायें हैं. इन्होने जरुर खुतबा पढ़ लिया होगा....

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