क्या है जाजोर पहाड आंवटन का मामला ?

अलवर-तिजारा- दिल्ली सडक पर ग्राम किथूर के पास दाहिने हाथ की तरफ अरावली पर्वत क्षंृख्ला का एक महत्वपूर्ण पहाड है, जो लगभग 12 किमी लम्बा और पांच किमी चौडा है। इस पहाड की सीमायें ग्रा0पं0 जटियाना, सिरमोली, कारोली, किथूर, महरमपुर, खानपुर, घासोली, दोंगडा, बम्बोरा, तहनोली, इस्माइलपुर, जेरोता, राताखुर्द व भन्डवाडा से जुडी है। जिसमें 40 से अधिक गांव आते है। इन गांवों की आबादी 65000 से अधिक है और इनमें रहने वाले नागरिक कृषि व पशुपालन से अपना जीवन यापन करते है। इनमें से 35000 से अधिक नागरिक इस पहाड से सीधे प्रभावित हो रहे है। सवंत् 2001 तक यह पहाड राजस्व रिकार्ड में शामलाती भूमि था। इस पहाड के एक हिस्से यानि जाजोर, खोहबास, पहाडा आदि की 3400 बीघा जमीन गत दिनों भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अधीन डीआरडीओं को आंवटित कर दी गई है।

इस आंवटन का विरोध क्यों हो रहा है ?

राजस्थान सरकार, वन विभाग व अलवर प्रशासन ने इस पहाड को आंवटित करने के लिये बडे पैमाने पर फर्जकारी व कानूनों की अवेहलना की। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार उपखन्ड अधिकारी किशनगढ बास ने 31/08/2012 को इस भूमि के आवंटन हेतु अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी कर दिया। जिसमें ग्राम पचंायत महरमपुर व किथूर की तरफ से प्राप्त अनापत्ति प्रमाणपत्र को आंवटन का आधार बनाया गया था। यद्यपि इन ग्राम पंचायतों को इस अनापत्ति प्रमाणपत्र के बारे में कोई जानकारी नही थी। इस बात का पता ग्राम पंचायत को उप वन संरक्षक अलवर के दिनांक 25/5/13 के पत्र से मिली, जिसमें उप वन संरक्षक ने वनाधिकार कानून 2006 की अनुपालना में सम्बन्धित ग्राम पंचायतों से ग्राम सभा आयोजित करके प्रस्ताव भेजने का निवेदन किया था। उप वन संरक्षक के उक्त पत्र के बाद ग्राम पंचायत किथूर ने एक शिकायती पत्र दिनांक 30 मई 2013 को जिला कलैक्टर को लिखा कि उन्होनें स्पष्ट रूप  से कहा कि उनकी ग्राम पंचायत ने इस तरह का अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी नही किया है। ग्राम पंचायत किथूर की इस शिकायत पर प्रशासन ने कोई कार्यवाही नही की। अलबत्ता प्रशासन ने यह कहा कि ग्राम पंचायत स्वंय एफआइआर दर्ज कराये। ग्राम पंचायत का तर्क था कि चूंकि प्रशासन ने ही फर्जी दस्तावेजों के आधार पर अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी किया है, इसलिये एफआइआर भी प्रशासन ही दर्ज कराये। परन्तु अभी तक प्रशासन ना तो एफआइआर दर्ज कराई और ना ही किसी भी अधिकारी व कर्मचारी के खिलाफ कार्यवाही की। अलबत्ता प्रशासन ने बाद की तिथियों में वनाधिकार कानून 2006 की अनुपालना में सम्बन्धित ग्राम पंचायतों की कथित अनापत्ति दिनांक 21/8/13 व 20/9/13 को प्राप्त कर ली, ऐसे दस्तावेज तैयार किये गये। ये नये बने दस्तावेज भी फर्जी है। ग्रामीणों की मान्यता है कि फर्जी दस्तावेजों से पहाड आंवटित करने की पूरी प्रक्रिया गलत है। अतः यह आंवटन रदद होना आवश्यक है।

इस पहाड के आवंटन से ग्रामीणों को क्या क्या नुकसान है ?

चूंकि इस क्षेत्र में और कोई गौचर भूमि नहीं है, इसलिये इन गांवो का पशुधन उक्त आवन्टित क्षेत्र पर ही निर्भर है। अभी भी लगभग 4 हजार गायें पहाड पर रह रही है। अनके अतिरिक्त हजारों की तादाद में बकरी व अन्य पशु इस पहाड पर निर्भर है। यदि इस पहाड से गा्रमीणों को बेदखल कर दिया जायेगा, तो  इस क्षेत्र के नागरिकों को मजबूरन अपने दुधारु पशु बेचने के लिए मजबूर होना पडेगा जिससे बेरोजगारी बढेगी और आर्थिक स्थिति कमजोर होगी। यह पहाड बरसों से इन गांवों की साझी सम्पत्ति रहा है। इस पहाड पर अनेक जल स्त्रोत है, जिनमें महानरेगा की राशि से विकास कार्य करवाये गये है। इनमें जोहड, एनीकट आदि है। चूंकि यह पहाड बोल्डर से बना है, इसलिये पहाड पर बने जलाशयों के कारण काफी बडे क्षेत्र में पानी रिचार्ज होता है।
इस पहाड पर अनेक मजार व धार्मिक स्थान है, जिनमें आज भी सभी समुदायों के लोग अपनी आस्था व विश्वास के अनुसार धार्मिक आयोजन करते है। यह प्रवृति हमारी साझी संस्कृति व विरासत को दर्शाती है। पहाड सिर्फ पत्थरों व चट्टानों का जखीरा नही होता, इसका अपना अर्थ शास्त्र है, जिसे वे ही समझ सकते है जो पहाडों के साये में जीवन जी रहे है। शायद इसलिये ही अरावली पर्वत श्रृंख्ला के सरंक्षण की बात अर्न्तराष्ट््रीय स्तर पर भी उठी है।

सरकार ने कौन कौन से कानूनों का उल्लंघन किया है ?

सबसे पहला व सबसे बडा उल्लंघन तो भारतीय संविधान से अस्तित्व में आई ग्राम पंचायत के नाम पर तैयार किये फर्जी दस्तावेज है। जिले के जिम्मेदार अधिकारियों ने अपने कृत्य से यह प्रमाणित किया है कि उनकी नजरों में ग्राम पंचायतों का कोई महत्व नही है। यानि वे भारत के सविंधान की इज्जत नही करते। चूंकि सम्पूर्ण आंवटन का आधार, पंचायतों के अधिकार का गम्भीर उल्लंघन है, इसलिये प्राथमिक तौर पर यह आंवटन रद्द करना ही चाहिये। सरकार चाहे तो अब सम्बन्धित पंचायतों में जन मत संग्रह करवा ले।

दूसरा बडा उल्लंघन यह है कि अलवर जिले का पर्यावरणीय मास्टर प्लान उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद भारत सरकार के अरावली नोटिफिकेशन 1992 के आधार पर 1999 में बन गया था। जिसके बाद राजस्थान सरकार ने 26/8/2011 में अधिसूचना जारी करके अलवर जिले में विकास योजना बनाने में उक्त मास्टर प्लान के प्रावधानों को ही लागू करने की आज्ञा प्रसारित कर दी थी। कोई भी परियोजना जो अलवर जिले में लाई जायेगी उसे इसी मास्टर प्लान के आधार पर कसौटी पर कसना होगा। परन्तु ऐसा नही हुआ। दिल्ली से एक योजना आई, जिले के अधिकारियों ने उस परियोजना का आकलन ही नही किया। आज भी जिला प्रशासन कहता है कि उन्हें नही मालूम की डीआरडीओ इस पहाड पर क्या कर रहा है। इस मास्टर प्लान के अनुसार अलवर जिले में पांच प्रकार की भूमि को सरंक्षित घोषित किया गया था। जिसमें गैर मुमकिन पहाड, गैर मुमकिन राडा, गैर मुमकिन बीड, बंजड व रूंध सम्मिलित है। आंवटन से पूर्व इस मास्टर प्लान के प्रावधानों की अनुपालना नही की गई। इस मास्टर प्लान में स्पष्ट रूप से अरावली पहाड की इकोलोजी में आये क्षरण की बात को गम्भीरता से उठाया गया है। इसके लिये इको-रेस्टोरेशन की गम्भीर आवश्यकता बताई गई है। इसी मास्टर प्लान में इको-रेस्टोरेशन के तरीकों के बारे में भी बताया गया है। इस आंवटन से इको-रेस्टोरेशन का काम हरगिज नही होता।

तीसरा बडा एतराज यह है कि भारत सरकार द्वारा बनाये गये वन अधिकार कानून 2006 यहां लागू है। इसमें स्पष्ट रूप से वनों व उनका लाभ उठाने वाले परम्परागत नागरिकों के वन अधिकारों की मान्यता दी गई है। इस कानून के अनुसार वनों के आधार पर जीविकोपार्जन करने वाले नागरिकों के परम्परागत वन अधिकारों की रक्षा करना आवश्यक है। उक्त आंवटित भूमि पर अनेक गांवों के नागरिक लघु वन उपज लेते है और उनके मवेशियों के लिये यह भूमि चारागाह के रूप में काम आती है। इसकी पुष्टि उप वन संरक्षक अलवर ने 25 अगस्त 15 को सम्पन्न वार्ता में की थी। शामलाती वन अधिकारों का उल्लंघन करके इस भूमि का आंवटन करना उक्त कानून की अवेहलना है। सरकार को पहले यहां रहने वाले नागरिकों के वन अधिकारों को मान्यता देनी चाहिये थी, परन्तु यहां के अधिकारी जब फर्जी अनापत्ति प्रमाण पत्र ही ले लेते है तो वन अधिकार कानून की पालना की उनसे कल्पना भी नही की जा सकती। क्या अलवर का प्रशासन संविधान, कानून और संसद से बडा है?

इसी तरह एक तथ्य यह भी है कि राजस्थान में भूमि अधिग्रहण में पारदर्शिता व उचित मुआवजे के कानून (Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act 2013) को एक अप्रेल 2014 को लागू कर दिया गया था। जबकि उक्त भूमि का आवटन केन्द्र सरकार के पत्र दिनांक 26/05/2014, राज्य सरकार के पत्र दिनंाक 24/07/2014, व दिनांक 27/8/2014 के पत्र के आधार पर उक्त आंवटन किया गया है।  उक्त एक्ट 2013 के अनुसार इस परियोजना के सामाजिक आर्थिक प्रभावों का आकलन करना आवश्यक है। आंवटन से पूर्व इस प्रकार का कोई आकलन नही हुआ। यह भी तो कानून का गम्भीर उल्लंघन है। इस कानून में ही प्रावधान है कि इस तरह की अवेहलना करने वाले प्रशासनिक अधिकारी के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करके दंडित किया जाये।

कुछ लोग, इस आंवटन का विरोध करने वालों को खनन माफिया कह रहे है- यह कहां तक सही है ?

जो लोग ऐसा कह रहे है, उनके बारे में पडताल करने की जरूरत है। उनमें से कितने है, जो पशुपालक है।  हमारे जो पक्ष है उनके बारे में विरोध करने वालों को कितनी जानकारी है ? क्या उनका विरोध राजनैतिक विरोध नही है। रहा सवाल खनन माफिया का, इस पूरे पहाड पर बम्बोरा से लेकर सिरमोली तक कहीं भी वैध या अवैध खनन नही हो रहा। बल्कि यहां पर अनेक ताकतवर लोगों ने खानों के लिये आवेदन दिये थे, जिनका इन्ही ग्राम वासियों ने भरपूर विरोध किया। और बाद में खान विभाग को उनके आवेदन रद्द करने पडे। ऐसे लगभग 37 मामले है। जिन लोगों की खान यहां आवटत नही हो पाई है उनकी शह पर गरीब पशुपालकों को खनन माफिया कहना उचित नही है। 12 किमी लम्बे और पांच किमी चौडे पहाड पर सिर्फ दो जगह खनन हो रहा है। एक जहारखेडा में जहां खनन विभाग द्वारा जारी खनन लीज की आड में अवैध खनन हो रहा है और दूसरा इस्माइलपुर में, जहां सरकार की अनुमति से लगे क्रेशरों के कारण खनन हो रहा है। यह जांच करें कि इन दो स्थान पर खनन करने वाले कौन है और इन्हें किन राजनैतिक ताकतों का संरक्षण प्राप्त है। नेशनल  ग्रीन ट्रिब्यूनल में जो पक्ष यहां के वन विभाग ने रखा है वही तर्क यहां भी रखों, अलवर जिले में या समीपवर्ती हरियाना में चलने वाले क्रेशर के लिये पत्थर कहां से आ रहे है। ईमानदारी से जांच करने पर सब सच पता चल जायेगा। बस गरीबों को खनन माफिया मत कहो।

एक तर्क यह है कि अब जब पहाड आंवटित हो गया तो रक्षा मंत्रालय की इस महत्वपूर्ण परियोजना का विरोध क्यों ?

ग्रामीणों व साथ में लगे सामाजिक कार्यकर्तों में से किसी ने भी रक्षा मंत्रालय की परियोजना के बारे में कुछ टिप्पणी नही की है। हमारा सम्बन्ध आंवटन के नाम पर आम जनता के साथ किये गये खिलवाड से है। जो जिला प्रशासन ने किया है। हमारा सम्बन्ध देश के कानूनों ने से है, जिसकी पालना सबको करनी होती है। हमने परियोजना के बारे में कभी कुछ नही कहा और ना कुछ जानना चाहते। यह काम हमारे जन प्रतिनिधियों का है। वे रक्षा मंत्रालय से सम्वाद करें। वे जाने की आखिर इस परियोजना के लिये यही पहाड क्यों ? क्या परियोजना प्रस्ताव आने के बाद इस परियोजना का आकलन स्थानीय स्तर पर कानूनों के अनुरूप नही होना चाहिये था। परियोजना कैसी भी हो, कानून की पालना करना सबके लिये आवश्यक है और फिलहाल यहां रक्षा मंत्रालय नही उनके द्वारा नियुक्त ठेकदार काम कर रहा है। हमने प्रशासन से कहा है कि यहां काम कर रहे ठेकेदार ने भी कानूनों की व्यापक पैमाने पर अवेहलना की है। वे इस पहाड पर भारी मशीनरी व जेसीबी से कार्य कर रहे है। जो वन कानून के अन्तगर्त अपराध है। उन्होनें ने अपनी कार्ययोजना व नक्शा अभी तक सम्बन्धित ऐजेन्सीज से अनुमोदित नही कराया है । ऐसे अनेक निर्माण जो ग्राम पंचायतों ने कराये है, ठेकदार उसे बिना किसी सक्षम अधिकारी की आज्ञा से स्वंय ही अपनी जद में ले रहा है। विवाद भी तभी उठा था। इस पहाड को इस क्षेत्र के नागरिकों ने बरसों से सजोये रखा है। स्थानीय नागरिकों के विरोध के कारण यह पहाड अभी तक सुरक्षित व संरक्षित है। इस पहाड में आज तक वैध या अवैध खनन नही होने दिया गया। परन्तु डीआरडीओ की तरफ से नियुक्त ठेकेदार  इस पहाड के मूल स्वरूप  को नष्ट कर रहे है। प्रशासन कुछ नही करना चाहता।

आप आगे क्या करेगें ?

हम इन सवालों को हर स्तर तक ले जायेगें। हमारा विरोध करने का संवैधानिक अधिकार है। हम ग्रीन ट्रिब्यूनल तक भी जा सकते है। फिलहाल हमने एक ज्ञापन जिला प्रशासन को 25 अगस्त 15 को दिया है। उनके साथ हमारी दो बार बातचीत हो चुकी है। हम उनके कदम का भी इन्तजार कर रहे है।



निवेदक


2/519 अरावली विहार अलवर 301001 फोन न0 0144-2360432
सम्पर्कः मौलाना हनीफ 9252447266, मैनेजर सपातखान 9461138786, खुर्शीद अहमद 9414035097,
वीरेन्द्र क्रान्तिकारी 9783823037, डॉ0 वीरेन्द्र विद्रोही 9414017241, अनूप दायमा 9772986764





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