महाजनी संस्कृति, प्रेमचंद और वर्तमान

प्रेमचंद की 135वीं जयंती पर आदियोग का आलेख; 

विकास के भागते पहिये से वह चमक पैदा हुई कि आजादी की आधी सदी गुजर जाने के बावजूद लालटेन-ढ़िबरी के युग में जीने को मजबूर ग़रीब-गुरबों और मेहनत-मशक़्क़त करनेवालों की आंखें चुंधिया गयीं, निगाहों के सामने घुप्प अंधेरा छा गया। मुठ्ठी भर जमात विकास की रोशनी को अपने हरम में बंधक बना कर रखने और उसका अंधेरा दुखियारी जनता के हवाले कर देने पर आमादा है। नतीज़े में हड़कंप और हाहाकार है, दिल और दिमाग़ को सुन्न कर देनेवाली मजबूरियों की कंटीली बाड़ है। निकलने का कोई रास्ता नहीं और सामने अंधेरा है। यह अंधेरा पिछड़ेपन और ग़ैर जानकारी का है, शोषण-उत्पीड़न और अत्याचार का है, भूख-कुपोषण और अभाव का है और उसे अपनी नियति मान लेने का है। 

चोर-लुटेरों और सेंधमारों के लिए अंधेरे की काली दीवार बड़ी सौगात हुआ करती है जिसकी आड़ में काले कारनामों को अंजाम दिया जा सकता है और बग़ैर कोई सुराग छोड़े इत्मीनान से रफूचक्कर भी हुआ जा सकता है। नये ज़माने में काजर की कोठरी कुछ ऐसी है कि जिसमें आराम से घुसें तो भी बेदाग़ रहें, कि चेहरा और चाल निखर जाये, कि सौ चूहे खा कर बिल्ली हज कर आये, कि कुत्ता भी भगवान नजर आये।

भुगतना तो उनको है जो पहले से भुक्तभोगी हैं। कमर उनकी पतली होनी है जो पहले से ही सींक-सलाई हैं। लुटना-पिटना उनको है जिनका लुटने-पिटने में पुराना रिकार्ड है। जो अधमरे हैं, मरन तो उन्हीं की तय है।

जीने के लिए लोग क्या नहीं करते ? मुनव्वर राणा कहते हैं कि हमें भी पेट की ख़ातिर खजाना ढूंढ़ लेना है/ इसी फेंके हुए खाने से दाना ढूंढ़ लेना है। हर जगह यह ख़जाना नहीं मिल सकता और हर भूखा उसके पीछे भाग भी नहीं सकता, अपने स्वाभिमान को लांछित नहीं कर सकता। जहां जूठन का भी सहारा नहीं, वहां आम की गुठलियों या कि घास उबाल कर चट कर जाने में झिझक या देर नहीं लगती। जहां भूख सातवें आसमान पर हो, वहां ईमान और गुर्दा क्या, बहू-बेटी भी बिक जाती है। पेट की आग बुझे, भले ही जीवन पशुवत या फिर ठंडा हो जाये।

यह त्रासदी अपराध और नैतिक गिरावट के मुहाने खोलती है, और दूसरी तरफ ज़िंदगी की रुकी-धंसी गाड़ी को सरपट दौड़ाने के नाम पर कर्ज़ का मकड़जाल बुने जाने की पक्की ज़मीन तैयार करती है। जो फंसा, शिकार हो गया। भूख इनसान को निगल जाती है। किसानों की ख़ुदकुशी चीख़-चीख़ कर गवाही दे रही है कि कर्ज़ भी बड़ा आदमख़ोर है। विकास के गर्वीले नारों के बीच देश के कई हिस्सों में कर्ज़ के बोझ तले किसानों की ख़ुदकुशी का बहीखाता लगातार खुलता जा रहा है और भारत भाग्य विधाता अपनी पीठ थपथपाने में व्यस्त हैं। यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।  

ऐसे में याद आते हैं प्रेमचंद और उनका साहित्य संसार- सवा सेर गेहूं जैसी कहानियां, गोदान जैसे उपन्यास और महाजनी सभ्यता जैसे लेख। प्रेमचंद मूलतः उर्दू में लिखते थे। सेवा सदन हिंदी में प्रकाशित उनका पहला उपन्यास माना जाता है। उसकी पंक्तियां हैं कि जिस समाज में अत्याचारी जमींदार, रिश्वती राज कर्मचारी, अन्यायी महाजन और स्वार्थी बंधु आदर और सम्मान के पात्र हों, वहां दालमंडी क्यों न आबाद हो। कर्मभूमि का सीधा सवाल है कि इतनी अदालतों की ज़रूरत क्या? ये बड़े-बड़े मकहमे किसलिए? ऐसा मालूम होता है, ग़रीबों की लाश नोचनेवाले गिद्धों का समूह है, ... इस संसार को अगर मनुष्य ने रचा है तो अन्याय है, ईश्वर ने रचा है तो उसे क्या कहें?

ज़िंदगी के आख़िरी दौर में लिखे गये महाजनी सभ्यता शीर्षक लेख की इन पंक्तियों पर भी ग़ौर करें कि जहां धन की कमीबेशी के आधार पर असमानता है, वहां ईर्ष्या, ज़ोर-ज़बरदस्ती, बेइमानी, झूठ, मिथ्या अभियोग-आरोप, वेश्यावृत्ति, व्याभिचार और सारी दुनिया की बुराइयां अनिवार्य रुप से मौजूद हैं। … ये सारी बुराइयां तो दौलत की देन हैं, पैसे के प्रसाद हैं, महाजनी सभ्यता ने इनकी सृष्टि की है।

प्रेमचंद की डायरी की वृहस्पतिवार, 2 जनवरी 1936 की तारीख़ में गोदान के होरी पर चढ़े कर्ज़े का हिसाब-किताब बाक़ायदा दर्ज़ है: मंगरूशाह-60 से बढ़ कर हो गये 300, दुलारी-100, दातादीन-100, लगान-25, नाम अस्पष्ट-35 से 38 रूपये। इससे पता चलता है कि अपने किरदारों के साथ उनका कितना घना और क़रीबी रिश्ता था। होरी ग़रीब और अनपढ़ है, मुसीबत का मारा है लेकिन जानता है कि ज़मींदार भले एक हो लेकिन महाजन तीन हैं- सहुआइन, मंगरु और दातादीन पंडित। प्रेमचंद की कहानियों में महाजन की सीधी मौजूदगी है तो उपन्यासों में उसकी कई-कई शक़्लें हैं और सबकी सब शोषण के लिए मुस्तैद हैं, इंसाफ़ और बराबरी के ख़िलाफ़ कतारबद्ध हैं। तानाबाना इस क़दर ज़ालिम है कि जहन्नुम की ज़िंदगी से निजात पाने का सपना देख पाना भी मोहाल है। यहां महाजन का संबोधन प्रचलित अर्थों तक सीमित नहीं है।

सवाल है कि महाजन कौन है, क्यों है और उसे महाजन किसने बनाया, यह महाजनी ताक़त आख़िर कहां से और कैसे आयी कि जो ग़रीब को और ग़रीब और किसान को मज़दूर बना दे, किसी की मुश्क़िलों को और बढ़ा दे। मशहूर पत्रकार पी. साइनाथ की रपटों के मुताबिक दक्षिण भारत में किसानों की आत्महत्या के पीछे घटिया खाद और बीज के व्यापारी तक महाजन की भूमिका में थे और बाराबंकी के हादसे ने बैंक और सरकारी अधिकारियों की महाजनी मनोवृत्ति और उसके झूठ-फरेब को उजागर कर दिया।

सूचना क्रांति के बरक़स पूंजीवाद अपने लूटतंत्र को लगातार तराश रहा है- व्यापक, सहज और सरल बनाने के अलावा उसे मानवीय स्पर्श दिये जाने का ढोंग भी रच रहा है। भूमंडलीकरण और निजीकरण मुनाफ़े की इसी लूट का झंडा-बैनर हैं, महाजनवाद के लिए खुला मैदान हैं। विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक वगैरह इसीलिए हैं। इरादा है कि मुठ्ठी भर देशों और मुठ्ठी भर लोगों के हित में पूरी दुनिया को एक गांव और इस गांव को ख़ालिस बाज़ार बना दिया जाये। यह मायाजाल शोषण-उत्पीड़न और ग़ैर बराबरी का सिद्धांत थोप रहा है, गरीब देशों की आत्मनिर्भरता और उनकी सार्वभौमिकता को बंधक बना रहा है, तथा नीतियों और प्राथमिकताओं को प्रभावित करते हुए कमज़ोर तबक़ों को और अधिक कमज़ोर बना रहा है। सुख-शांति और स्वतंत्रता की बात कौन करे, ज़िंदा रहने का अधिकार ही संकट में है और रोजी-रोटी का सवाल सुरसा की तरह मुंह बाये खड़ा है। और तुर्रा यह कि दान-अनुदान से समाज कल्याण, वंचित-उपेक्षितों का सशक्तिकरण, सामुदायिक भागीदारी, स्वशासन, स्वयं सहायता जैसे लुभावने जुमले भी इतरा रहे हैं। बावजूद इसके बाहर निकलने के रास्ते बंद के बंद हैं।

प्रेमचंद ने कहा था कि मानो आज दुनिया में महाजनों का ही राज्य है। आज इस टिप्पणी से केवल ‘मानो’ शब्द को हटाया जा सकता है, महाजनों से पहले ‘केवल’ जोड़ कर इसे ठोस और सामयिक बनाया जा सकता है। इसीलिए अंदर और बाहर की ग़ुलामी से एक साथ जूझनेवाले, दबी-कुचली जमात के सपनों और संघर्षों को सधा स्वर देनेवाले, नारकीय जीवन और उसकी यातनाओं से मुक्ति की चाह भरनेवाले और साहित्य सृजन की जनपक्षीय धारा विकसित करनेवाले महान सांस्कृतिक योद्धा के रूप में प्रेमचंद आज भी प्रासंगिक हैं। प्रेमचंद के ज़माने में बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बाज़ारवाद के सर पर चढ़ कर बोलने की हैसियत और उसकी गुंजाइश नही थी लेकिन आज है। चौथे दशक में किसी अंग्रेज़ अर्थशास्त्री ने तत्कालीन मंदी से उबरने के लिए अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बंद कर देने का तरीक़ा सुझाया था। इस पर प्रेमचंद ने राय दी कि कहीं ऐसा हो जाये तो भारत मूसलों ढ़ोल बजावे। हां, इंग्लैंड के लिए यह पतन का दिन होगा।

प्रेमचंद गदगद नहीं थे, जानते थे कि इस सुझाव पर अमल मुमकिन नहीं। इसलिए कि ‘उन्हें तो धन चाहिए, धन के लिए माल की खपत होना जरुरी है और माल की खपत के लिए निर्बल देशों का होना लाज़िमी है।’ अंधा पूंजीवाद नामक लेख में प्रेमचंद की ताक़ीद है कि पूंजीपतियों से यह आशा करना कि वे लाभ उठाना छोड़ देंगे, कुत्ते से चमड़े की रखवाली करने की आशा करना है। इस खूंख्वार जानवर से रक्षा करने के लिए हमें स्वयं सशस्त्र होना पड़ेगा। तो नवाब धनपत भी बदले, सबसे पहले अपने नाम के साथ नत्थी सामंती और पूंजीवादी भाव बोध को उतार फेंक कर प्रेमचंद हो गये।

प्रेमचंद दलित नहीं थे लेकिन दलितों के सामाजिक विकास के पक्षधर और किसी भी स्तर पर उनके शोषण-उत्पीड़न के मुखर विरोधी थे, ठीक उसी तरह जैसे वह नारी अस्मिता और मुक्ति के प्रबल आकांक्षी थे। कोई दो दशक से प्रेमचंद की प्रासंगिकता पर बहस तेज़ हुई है, हिंदी के कुछेक दलित लेखकों की नज़र में प्रेमचंद का साहित्य सवर्ण मानसिकता से प्रेरित है, कि वहां दलितों का केवल अपमान और उनकी हीनता है, कि उनके दलित किरदारों के भीतर विद्रोह नहीं मिलता। खास कर कफ़न कहानी में दलितों का लंपटीकरण किये जाने का संगीन आरोप है। इसी कड़ी में सहानुभूति और स्वानुभूति के फर्क को रखा गया। वयोवृद्ध साहित्यकार मुद्राराक्षस ने कहा कि कि घोड़े का दुख तो घोड़ा ही समझ सकता है, कोई घुड़सवार नहीं।

अच्छा है कि प्रेमचंद की प्रासंगिकता पर बहस छिड़े और तेज़ हो, प्रेमचंद के साहित्य का मूल्यांकन नये सिरे से हो। ताकि तय हो सके कि कफ़न अगर दलित विरोधी कहानी है तो फिर ठाकुर का कुंआ या दलितों के दुख-दर्द और उनके सामाजिक अलगाव की तस्वीर खींचती प्रेमचंद की बाक़ी दूसरी कहानियों को किस खाने में रखा जाये। यह अस्वीकार की धारा नहीं कि प्रेमचंद की रचना पर किसी जाति विशेष के अवमूल्यन का आरोप लगा कर उसे आग के हवाले कर दिया जाये जैसा कि भारतीय दलित साहित्य परिषद ने कुछ बरस पहले रंगभूमि के साथ यह सलूक किये जाने का दुर्भाग्यपूर्ण फैसला किया था। इसकी तुलना बाबा साहब अंबेदकर द्वारा लिये गये मनु स्मृति दहन के फ़ैसले से नहीं की जा सकती। किसी साहित्यिक रचना के विरोध का यह फासीवादी तरीक़ा है। समझना होगा कि प्रेमचंद के रचनाकर्म को कटघरे में भी खड़ा किया जा सकता है लेकिन उसे ख़ारिज़ नहीं किया जा सकता।
Share on Google Plus

संघर्ष संवाद के बारे में

एक दूसरे के संघर्षों से सीखना और संवाद कायम करना आज के दौर में जनांदोलनों को एक सफल मुकाम तक पहुंचाने के लिए जरूरी है। आप अपने या अपने इलाके में चल रहे जनसंघर्षों की रिपोर्ट संघर्ष संवाद से sangharshsamvad@gmail.com पर साझा करें। के आंदोलन के बारे में जानकारियाँ मिलती रहें।