मोदी के डिजिटल इंडिया का वर्तमान सच

प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही अपने एक और सपने डिजिटल इंडिया को मूर्त रूप देने का उपक्रम शुरु किया है। इसकी सफलता पहुंच बढ़ाने में  हैं न कि 4.5 लाख करोड़ के निवेश में। वैसे उन्होंने सायबर अपराधों से निपटने के लिए रक्तविहीन युद्ध का नया शिगूफा भी छोड़ा है। हमें इंतजार करना होगा सन् 2019 का क्योंकि तब इस सपने की हकीकत हमें मालूम पड़ेगी। पेश है सौमित्र राय का सप्रेस से साभार यह आलेख;

मध्यप्रदेश की 5.23 करोड़ की आबादी में हर पांचवें व्यक्ति तक ही मोबाइल फोन पहुंचा है, जबकि राज्य के चार बड़े शहरों में संचार के सबसे लोकप्रिय साधन की संख्या कुल आबादी से ज्यादा है। मोबाइल फोन अब विकास के निर्धारित मानकों में से एक बन चुका है। भारत में लगभग 95 करोड़ मोबाइल उपयोगकर्ताओं में ग्रामीण उपयोगकर्ता केवल 42 प्रतिषत ही हैं। वहीं मध्यप्रदेष में यह पहुंच राष्ट्रीय औसत के आधे से भी कम है। वैसे शहरों के ठीक उलट गांवों में बेसिक टेलीफोन की उपलब्धता भी महज पांच फीसदी से कुछ अधिक है। यानी गांवों में संपर्क के लिए मोबाइल के सिवा दूसरे विकल्प न के बराबर हैं।

मोबाइल फोन की पहुंच के मामले में शहरों और गांव के बीच फासले का एक प्रमुख कारण गांवों में कनेक्टिविटी का न होना है। दूरदराज के आदिवासी अंचलों में कस्बे से बाहर निकलते ही मोबाइल फोन का कवरेज चला जाता है। डिंडोरी के समनापुर जनपद से 50 किलोमीटर दूर शौलाटोला में लोग गांव से कुछ दूर लगे पेड़ के नीचे खड़े होकर मोबाइल पर बात करने की कोषिश करते हैं। नेटवर्क मिला तो ठीक, वरना उन्हें तीन किलोमीटर दूर पहाड़ चढ़ना पडता है। इक्कीसवीं सदी की संचार क्रांति के दौर में यह बात हास्यास्पद लग सकती है, लेकिन कुछ कंपनियों के मोबाइल नेटवर्क महानगरीय उपयोगकर्ताओं को भी इसी तरह की मशक्कत करने पर मजबूर कर देते हैं। मुंबई में रहने वाले मेरे एक मित्र अक्सर खिड़की से लटककर मुझे फोन किया करते थे। एक दिन गिरते-गिरते बचे तो कंपनी ही बदल ली। अनेक आदिवासी गांवों की स्थिति शौलाटोला से भी बद्तर है।

डिंडोरी से पश्चिम की ओर चलें तो बुंदेलखंड में पन्ना टाइगर रिजर्व के बफर जोन में बसे गांव कटरिया में लोगों ने कनेक्टिविटी के लिए गांव के बाहर एक चबूतरे का सहारा लिया है। हैरत की बात यह है कि समूचे गांव में मोबाइल फोन का नेटवर्क न होने के बावजूद चबूतरे पर 3जी कनेक्टिविटी तक मिल जाती है। टाइगर रिजर्व के बफर जोन में होने के कारण वन विभाग वहां  बिजली के खम्बे लगाने की इजाजत नहीं दे रहा है। वन ग्राम होने के कारण ही मोबाइल टॉवर खड़ा करने में भी परेषानी है। कटरिया गांव के लोगों के पुनर्वास और उनकी हकदारियों की गारंटी लेने को कोई तैयार नहीं। हम यहां इस बात को नहीं भूल सकते कि एक सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन, जीवनयापन के साधन और संसाधनों के साथ ही अभिव्यक्ति की आजादी पर भी कटरिया के लोगों का उतना ही हक है, जितना शहरी लोगों का।

कनेक्टिविटी राज्य सरकार का नहीं केंद्र का विषय है जिसके पास दूरसंचार और ट्राई (दूरसंचार नियामक प्राधिकरण) जैसी भारी-भरकम ढांचागत संरचनाएं हैं। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि गांवों में खराब कनेक्टिविटी के कारण म.प्र. की 5.2 करोड की आबादी में से अधिकांश के पास न तो सरकार की  बात ही
पहुंच पा रही है और न ही उनकी आवाज सरकार तक पहुंच रही है। वैसे बीते 10 साल में केंद्र सरकार को स्पेक्ट्रम और लाइसेंस फीस के रूप में अरबों की आमदनी तो हुई, लेकिन उपयोगकर्ताओं को जरूरत के हिसाब से ढांचागत सुविधाएं नहीं मिलीं। एरिक्सन कंज्यूमर लैब की हालिया रिपोर्ट कहती है कि भारत में 60 फीसदी से ज्यादा लोगों को मोबाइल नेटवर्क न मिलने की समस्या पेष आ रही है। इनमें भी अधिकांश लोगों को घरों के भीतर कनेक्टिविटी न मिलने की शिकायत है। इसका मतलब यह है कि सरकार के स्पेक्ट्रम प्रबंधन में बड़ी खामियां हैं। साथ ही यह भी साफ नहीं है कि दूरसंचार कंपनियां अपने पास मौजूद स्पेक्ट्रम का कितनी कुषलता से उपयोग कर रही हैं। म.प्र. के डिंडोरी, बालाघाट, बुंदेलखंड, छिंदवाड़ा जैसे जिलों में मोबाइल टॉवरों के बीच की दूरी 30 से 50 किलोमीटर है। भारत में दूरसंचार घनत्व तेजी से संतृप्तता के स्तर पर आ रहा है। यहां से आगे का रास्ता गांव की ओर निकलता है, जहां पैर पसारने की काफी गुंजाइष है।

वहीं दूसरी ओर दूरसंचार कंपनियों का सारा जोर शहरों पर केंद्रित है, जहां मोबाइल कॉल और इंटरनेट के रूप में मोटी कमाई की खासी संभावनाएं मौजूद हैं। ट्राई और इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएषन ऑफ इंडिया (आईएमएआई) की रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेष में 6 करोड़ मोबाइलधारकों में तकरीबन हर तीसरा शख्स स्मार्टफोन चला रहा है। इनमें से अधिकांश इंटरनेट भी चलाते होंगे। हालांकि, एरिक्सन की रिपोर्ट में 63 प्रतिषत उपयोगकर्ताओं ने कहा है कि उन्हें 3जी के शुल्क पर 2जी सेवाएं मिल पा रही हैं। गांवों की बात छोड़ दें तो शहरों में भी इंटरनेट की रफ्तार एक समान नहीं है। कम से कम उतनी तो बिल्कुल नहीं, जितना कि सेवा प्रदाता दावा करती हैं। दूसरी तरफ ट्राई के पास भी इन दावों को परखने का कोई पुख्ता तंत्र नहीं है। जब तक कोई षिकायत न करे, तब तक न तो ट्राई को पता चलेगा और न ही टेलीकॉम कंपनियों को जमीनी हकीकत मालूम पड़ेगी।

केंद्र सरकार ने डिजिटल इंडिया मिशन के तहत ढाई लाख पंचायतों को ब्रॉडबैंड इंटरनेट कनेक्षन से जोड़ने का लक्ष्य रखा है। बीते चार साल से नेशनल ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क (एनओएफएन) के तहत तार बिछाने का काम चल रहा है। इस साल मार्च तक इसके तहत 50 हजार पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ा जाना था, लेकिन अभी तक यह काम हो नहीं पाया है। ऐसे में दिसंबर 2016 तक इसके पूरा होने की उम्मीद कम ही है। इसका खामियाजा मध्यप्रदेश के दूर-दराज के आदिवासी अंचलों को ज्यादा भुगतना पड़ रहा है, जहां जनपद से पंचायतों की औसत दूरी 30 किलोमीटर से ज्यादा है। डिंडोरी के तहसील कार्यालय में पंचायत पदाधिकारी देर रात तक जानकारियां फीड करते हुए देखे जा सकते हैं, क्योंकि उनके गांवों में कनेक्टिविटी नहीं है। खुद समनापुर जनपद का लोकसेवा केंद्र आए दिन फाइबर लाइन कटने से हलाकान है। इस सूरतेहाल के पीछे अकेला कोई एक विभाग जिम्मेदार नहीं है। यह विभागीय समन्वय का मसला है। मिसाल के लिए पन्ना के जरधोबा पंचायत पदाधिकारियों को लैपटॉप तो दिए गए, लेकिन कनेक्टिविटी नहीं होने से वे रोजमर्रा के काम की जानकारियां कंप्यूटर पर दर्ज करने के लिए जनपद ही आते हैं।

इन हालात में देश के दूरसंचार मंत्री का यह बयान और भी दिलचस्प हो जाता है, जिसमें वे भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या अगले दो साल में मौजूदा 30 करोड़ से बढ़ाकर 50 करोड़ के पार ले जाने का दावा करते हैं। हालांकि, इस आंकड़े को छूने के लिए सरकार को खास मशक्कत नहीं करनी है, क्योंकि स्मार्टफोन उपयोग करने वालों की संख्या 35 फीसदी से अधिक गति से बढ़ रही है। असली चुनौती तो दूर-दराज के अंचलों तक इंटरनेट को पहुंचाने की है, जिसे दुरुस्त करने का सरकार के पास कोई पुख्ता रोडमैप अभी तक तैयार नहीं है।

 श्री सौमित्र राय विकास संवाद से जुड़े हैं।  

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