भू-हड़प अध्यादेश का वार, अबकी बार तीसरी बार : डॉ सुनीलम का जेपीसी अध्यक्ष को खुला पत्र

भू-अधिग्रहण अध्यादेश पर मोदी सरकार के अलोकतांत्रिक और कार्पोरेट-हितैषी रवैये के खिलाफ पिछले एक साल से देश भर में किसानों और लोकताांत्रिक समूह विरोध प्रदर्शन करते आ रहे हैं. 
लेकिन इसके बावजूद तीसरी बार सरकार द्वारा अध्यादेश का सहारा लेना पूरी तरह देश के जनमानस और लोकतंत्र का मखौल उड़ाना है. संसद के आगामी मानसून सत्र में संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के तहत इस प्रस्तावित क़ानून पर सुनवाई और बहस होनी थी जिस सम्बन्ध में JPC ने सुझाव आमंत्रित किए थे. इस प्रक्रिया के तहत अभी किसान संगठन और सरोकारी नागरिक समूह अपने सुझाव और आपत्तियां दर्ज़ कराने में लगे ही थे कि फिर से अध्यादेश का हथौड़ा उन पर चला दिया गया है. 
इस बाबत किसान नेता डॉ सुनीलम का संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष के नाम यह खुला पत्र हम संघर्ष संवाद पर साझा कर रहे हैं -   


1 जून, 2015 , नई दिल्ली

सेवा में,                                       
श्री एस.एस. आहलूवालिया
अध्यक्ष
संयुक्त संसदीय समिति

विषय- “भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुन्व्यर्वस्थापन में उचित प्रतिकार और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम, 2013” पर सुझाव प्राप्त करने की समय सीमा साधने और JPC की रिपोर्ट संसद में पेश करने के सन्दर्भ में

आदरणीय श्री आहलूवालिया  जी ,

२४ मई २०१५ में प्रकाशित आपके अख़बारों  में छपे प्रचार जिसमे 'भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुन्व्यर्वस्थापन में उचित प्रतिकार और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम, 2013' (दुसरे अध्यादेश) के जवाब में कुछ निम्नलिखित बातें आपके सामने लानी हैं-  

किसानों के कई वर्षों के संघर्ष के बाद UPA सरकार ने मजबूर होकर ब्रिटिश राज में पास हुए 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून को वापस लिया, और मनमाने ढंग से 'देश हित' और 'विकास' के नाम पर किसानों की ज़मीन की लूट को रोकने के लिए 2013 का भूमि अधिग्रहण कानून पास किया। हम अच्छी तरह जानते हैं कि कांग्रेस ने 55 साल के अपने शासन में उसी पुराने कानून का सहारा लिया है। 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून को पास करने के बाद 1 जनवरी 2014 से लागु हुए कानून में अभी तक एक इंच ज़मीन भी अधिग्रहित नहीं हुई है।  आप अच्छी तरह जानते हैं कि देश में बिना पुनर्वास के लाखों हेक्टेयर ज़मीन अधिग्रहित की गयी है जिससे साफ़ होता है की कांग्रेस ने किसानों के मुद्दे पर सिर्फ दिखावटी बातें की है। 

पहले देश की अर्थ-व्यवस्था खेती पर पूरी तरह से निर्भर थी और GDP में उसका योगदान कुछ 65 प्रतिशत था जो अब सिर्फ 13 प्रतिशत पर आ गया है।   पिछली कांग्रेस सरकार की नीतियों के कारण पूरी तरह खेती ध्वस्त हो गयी है, और किसनो और गाँव की स्थिति बदतर हो गयी है।  इसी कारण नयी सरकार के आने पर किसानों को लगा की भूमि अधिग्रहण कानून में किये गए बदलाव उनके हित में काम करेंगे।     
    
लम्बे समय से हम सब मांग कर रहे हैं कि खेती की ज़मीन को अधिग्रहित करने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगे, और अगर बेहद ज़रूरी हो तो भी अधिग्रहण सिर्फ ग्राम सभाओं की सहमति से हो।  हम मांग करते हैं कि जबरन अधिग्रहण को कानूनी गुनाह माना जाए और गैर-इस्तेमाल की ज़मीन को मालिक किसानों को अधिकतम 5 साल के भीतर वापस कर दिया जाये।  हमें विश्वास था कि नयी सरकार हमारे  इन बेहद गंभीर सवालों और मांगों को सुनेगी।  पर हमारी सारी उम्मीद बेकार हो गयी जब हमने देखा कि भूमि अधिग्रहण अध्यादेश सिर्फ कॉर्पोरेट फायदे और हितों का ध्यान रखा जा रहा है। अध्यादेश को पारित करने के बाद कई किसान आंदोलन, जन आंदोलनों और राजनैतिक पार्टियों ने पूरे देश में ये सोचकर इस अध्यादेश का विरोध किया है कि नयी सरकार आगे आकर उनसे बात करेगी, उनके मुद्दों को समझेगी और उन्हें निपटने का प्रयत्न करेगी।  हालांकि अभी तक हमें इस बारे में सरकार के किसी शाखा से कोई जवाब नहीं मिला है। 

अब हमने अख़बारों के माध्यम से ही देखा है कि JPC को अपने सुझाव भेजने की आखरी तारीख को 8 जून रखा गया है। हमें लगता है कि सरकार को भूमि अधिग्रहण जैसे गंभीर मुद्दे पर इतनी जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए और लाखों किसान जिनकी ज़मीन अधिकृत होने जा रही है, उनके जीवन और मृत्यु के सवालों को पूरे समय और विवेक से हल करना चाहिए। 

हम ये मांग करते हैं कि JPC की समय सीमा को बढ़ाया जाये जिससे वो उन जगहों में कमिश्नर ऑफिस जा पाये जहाँ बड़े स्तर पर भूमि का अधिग्रहण हो रहा है।  हमें लगता है कि आप मानेंगे कि आदर्श स्थिति में इतने ज़रूरी कानून पर न सिर्फ राज्यों की विधान सभा बल्कि ज़िला परिषदों में भी चर्चाएं होनी चाहिए।

हमने अखबारों से ही ये भी पढ़ा है की सरकार ने JPC को संसद के मानसून सत्र के पहले दिन ही अपनी रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया है।  हम आपसे आग्रह करते हैं कि आप इसपर एक ठोस कदम उठाएं क्योंकि JPC एक स्वतन्त्र संस्था है और अपने कार्यकाल की अवधि तय करने में किसी भी सरकार से दिशा-निर्देश लेने के लिए बाध्य नहीं है।

देश के किसान आंदोलन और जन आंदोलनों के तरफ से हम आपको उन जगहों पे जाकर बिना सहमति और जबरन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ चल रहे लोगों के संघर्ष को देखने का न्योता देते हैं। 

हमें उम्मीद है की आप इस पर जल्दी से जल्दी जवाब देंगे।  हमने ये भी पढ़ा है की JPC ने इस बिल पर काम करना शुरू कर दिया है।  हम आग्रह करते हैं कि मीटिंग की रिपोर्ट (मिनट्स) का ब्यौरा जनता के सामने वेबसाइट और अन्य माध्यमों से सामूहिक तौर पर दिखाया जाये जिससे समिति के सदस्यों द्वारा रखी गयी बातों को भी समझा जा सके।

सादर शुभ कामनाओं सहित

भवदीय
                  
डा० सुनीलम, पूर्व विधायक
कार्यकारी अध्यक्ष
किसान संघर्ष समिति
राष्ट्रीय संयोजक
जनादोलनों का राष्ट्रीय समन्वय
एवं समाजवादी समागम
सदस्य भूमि अधिकार आन्दोलन
09425109770,
sunilam_swp@yahoo.com ,
samajwadisunilam@gmail.com


भूमि अधिकार आन्दोलन के संपर्क-
विजू कृष्णन 9818864006
मधुरेश कुमार 9873632226
संजीव कुमार 9958797409
श्वेता त्रिपाठी 9911528696


 
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