भू-अधिग्रहण अध्यादेश और पेंच व्यपवर्धन परियोजना में जबरदस्ती से जारी भू-अधिग्रहण के खिलाफ किसान महापंचायत; 16 जून 2015

किसान महापंचायत एवं जन सुनवाई

16 जून 2015, 10: 00 बजे
स्थान : फब्बारा चोक, छिन्दवाडा
मध्यप्रदेश
 
31 मई 2015 को केन्द्र की एन.डी.ए सरकार ने देशभर में हो रहे भरपूर विरोध के बावजूद तीसरी बार भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को एक बार फिर से जारी कर दिया है। इससे पूर्व इस अध्यादेश को दिनांक 31 दिसम्बर 2014 को व 3 अप्रैल को भी जारी किया गया था। देशभर के खेतिहर किसान, दलित आदिवासी तबकों और भूमि अधिकार के सवाल पर लड़ रहे जनसंगठनों, ट्रेड यूनियनों, संगठनों, संस्थाओं व आम लोगों में भी इसके खिलाफ एक हाहाकार मच गयी थी व संसद में भी विपक्षी सदस्यों ने इस अध्यादेश का भारी विरोध किया। नियमानुसार अध्यादेश जारी होने के बाद इसे कानून के रूप में बदलने के लिये इसे संसद के दोनों सदनों लोकसभा व राज्यसभा में पारित कराना जरूरी होता है।

संसद में भी भारी विरोध के चलते यह कानून पारित नहीं हो पाया। इसी लिये सरकार को तीन बार अध्यादेश जारी करने की जरूरत पड़ी। दोनों बार ही प्रस्तावित कानून लेाकसभा में पारित हो गया था, लेकिन पहली बार राज्य सभा में पारित नहीं हो पाया और दूसरी बार तो राज्य सभा में विरोध के चलते पेश ही नहीं किया गया। क्योंकि तब तक दूसरी बार अध्यादेश जारी होने के बाद उस समय में इस अध्यादेश के विरोध में जो सशक्त जनांदोलन चल रहा है, उनके साथ संसद में अध्यादेश का विरोध कर रहे दलों के साथ इस जनांदोलन का एक तालमेल बन गया, जिसके कारण इसे वे राज्यसभा में पेश नहीं कर पाए और सरकार को मजबूरन इस प्रस्तावित कानून को संयुक्त संसदीय समिति को गठित कर विचार के लिए रखना पड़ा। यह सरकार के लिए एक कदम पीछे हटना था। संसदीय समिति को जुलाई माह में संसदीय सत्र शुरू होते ही रिर्पोट देने को कहा गया है और तब इस प्रस्तावित कानून पर दोनों सदनों में चर्चा होगी और यह तय होगा कि यह कानून पारित होगा या नहीं। सवाल यह है कि जब सरकार ने प्रस्तावित विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति में भेज दिया था, तो फिर तीसरी बार अध्यादेश जारी करने की जरूरत क्यों पड़ी ? साफ जाहिर है कि सरकार को संसदीय प्रणाली में भरोसा नहीं है, इसलिए वह बार-बार अध्यादेश जारी कर रही है।

इससे यही साबित होता है कि सरकार जमीनों को हड़पने पर तुली हुई है। यह सूटबूट और रंग बिरंगी बंडियों की मोदी सरकार बड़ी-बड़ी कम्पनियों के हाथ देश की जमीनें व सम्पदा को सौंपने के लिए जरूरत से ज्यादा बेचैन है। इससे पहले भी सरकारों ने प्राकृतिक सम्पदा को कम्पनियों के हाथों में देने के लिए इसी तरह की नीति अपनाई थी। उन्हें इस बात की कोई फिक्र नहीं है कि देश में हर तबके के लोग ऐसे कानून का विरोध कर रहे हैं। तमाम जनसंगठन, किसान संगठन, खेतीहर मजदूर संगठन, मानवाधिकार संगठन व तमाम केन्द्रीय मजदूर संगठन भी सम्मिलत रूप से भूमि अधिकार आंदोलन के तहत इसका विरोध कर रहे हैं। लगभग सभी विपक्षी पार्टियां ऐसे कानून का न केवल विरोध कर रही हैं, बल्कि जनसंगठनों के समूह ‘‘भूमि अधिकार आंदोलन’’ के साथ भी तालमेल बना रही हैं। 24 फरवरी की विशाल रैली के बाद 2 अप्रैल 2015 को कंस्टीट्यूशन क्लब में राष्ट्रीय संवाद आयोजित किया गया, तथा 5 मई को संसद मार्ग पर जोरदार संयुक्त प्रर्दशन हुआ। सरकार जनसंगठनों और विपक्ष के तालमेल से घबरा गई है।

भूमि अधिकार आंदोलन के तहत 16 जून को छिन्दवाडा में किसान महापंचायत तथा जन सुनवाई का आयोजन बस स्टैंड पर सुबह 10 बजे से किया गया है। इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय की नेत्री सुश्री मेधा पाटकर, चौधरी मनोबर सलिम सांसद, डा. सुनीलम, एकता परिषद के राष्ट्रीय संयोजक राजगोपाल, सीपीएम के प्रदेश सचिव बादल सरोज, सीपीआई के प्रदेश सचिव एड. अरविन्द श्रीवास्तव, भारत जन आंदोलन के विजय भाई, नर्मदा बचाओं आंदोलन से सुश्री मीरा, ऑल इंडिया अग्रगामी किसान सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयंत वर्मा, विवेकानन्द माथने, आजादी बचाओ आंदोलन, जन आंदोलनों के बिंध्य समर्थक समूह के संयोजक उमेश तिवारी, राजकुमार सिन्हा संयोजक महा कौशल जन आंदोलन समर्थक समूह, डा.एके खान उपाध्यक्ष किसान संगठन, विनोद सिंह संयोजक किसान मंच तथा अन्य संगठनों के नेतृत्वकर्ता भाग लेंगे।

आप सभी साथियों से अनुरोध है कि अधिक से अधिक संख्या में कार्यक्रम में पहुंचकर भूमि अधिकार आंदोलन में शामिल हो।
एड. अराधना भार्गव उपाध्यक्ष किसान संघर्ष समिति, 9425146991

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